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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 783, कुल 878 में से

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पृष्ठ 783

७५६ | * अग्निपुराण *

यह 'सुवाच्' शब्दका रूप है। 'यत्' शब्दके ये दो यत्-यद् (प्र० द्वि०-ए०) हैं। 'तत्' शब्दके 'तत्-तद् (प्र०, द्वि०-ए०), 'कर्म' शब्दके कर्माणि (प्र० द्वि०-ब०), 'इदम्' शब्दके इदम् (प्र०, द्वि०-ए०), इमे (प्र० द्वि०-द्वि०), इमानि (प्र०, द्वि०-ब०)—ये रूप हैं। ईदृक्-ईदृग् (प्र०, द्वि०-ए०)—यह 'ईदृश्' शब्दका रूप है। अदः (प्र०, द्वि०-ए०), अमुनी (प्र०, द्वि०-द्वि०), अमूनि (प्र०, द्वि०-ब०)। अमुना (तृ-ए०), अमीषु (स०-ब०)—'अदस्' शब्दके ये रूप भी पूर्ववत् सिद्ध होते हैं। 'युष्मद्' और 'अस्मद्' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं—अहम् (प्र०-ए०), आवाम् (प्र०-द्वि०), वयम् (प्र०-ब०)। माम् (द्वि०-ए०), आवाम् (द्वि०-द्वि०), अस्मान् (द्वि०-ब०)। मया (तृ०-ए०), आवाभ्याम् (तृ०, च०-द्वि०), अस्माभिः (तृ०-ब०)। मह्यम् (च०-ए०), अस्मभ्यम् (च०-ब०)। मत् (प०-ए०), आवाभ्याम् (प०-द्वि०), अस्मत् (प०-ब०)। मम (ष०-ए०), आवयोः (ष०, स०-द्वि०), अस्माकम् (ष०-ब०)। अस्मासु (स०-ब०)—ये 'अस्मद्' शब्दके रूप हैं। त्वम् (प्र०-ए०), युवाम् (प्र०-द्वि०) यूयम् (प्र०-ब०)। त्वाम् (द्वि०-ए०), युवाम् (द्वि०-द्वि०), युष्मान् (द्वि०-ब०)। त्वया (तृ०-ए०), युष्माभिः (तृ०-ब०)। तुभ्यम् (च०-ए०), युवाभ्याम् (तृ०, च०-द्वि०), युष्मभ्यम् (च०-ब०)। त्वत् (प०-ए०) युवाभ्याम् (प०-द्वि०) युष्मत् (प०-ब०)। तव (ष०-ए०), युवयोः (ष०, स०-द्वि०), युष्माकम् (ष०-ब०)। त्वयि (स०-ए०), युष्मासु (स०-ब०)—ये 'युष्मद्' शब्दके रूप हैं। यहाँ 'अजन्त' और 'हलन्त' शब्दोंका दिग्दर्शन-मात्र कराया गया है॥ १-९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूपोंका वर्णन' नामक तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५३ ॥


तीन सौ चौवनवाँ अध्याय

कारकप्रकरण

भगवान् स्कन्द कहते हैं—अब मैं विभक्तियोंसे युक्त 'कारक'का वर्णन करूँगा*। 'ग्रामोऽस्ति' (ग्राम है)—यहाँ प्रातिपदिकार्थमात्रमें प्रथमा विभक्ति हुई है। विभक्त्यर्थमें प्रथमा होनेका विधान पहले कहा जा चुका है। 'हे महार्क'—इस वाक्यमें जो 'महार्क' शब्द है, उसमें सम्बोधनमें प्रथमा विभक्ति हुई है। सम्बोधनमें प्रथमाका विधान पहले आ चुका है। 'इह नौमि विष्णुं श्रिया सह।' (मैं यहाँ लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका स्तवन करता हूँ।)—इस वाक्यमें 'विष्णु' शब्दकी कर्म-संज्ञा हुई है। और 'द्वितीया कर्मणि स्मृता'—इस पूर्वकथित नियमके अनुसार कर्ममें द्वितीया हुई है। 'श्रिया सह'—यहाँ 'श्री' शब्दमें 'सह'का योग होनेसे तृतीया हुई है। सहार्थक और सदृशार्थक शब्दोंका योग होनेपर तृतीया विभक्ति होती है, यह सर्वसम्मत मत है। क्रियामें जिसकी स्वतन्त्रता विवक्षित हो, वह 'कर्ता' या 'स्वतन्त्र कर्ता' कहलाता है। जो उसका प्रयोजक हो, वह 'प्रयोजक कर्ता' और 'हेतुकर्ता' भी कहलाता है। जहाँ कर्म ही कर्ताके रूपमें विवक्षित हो, वह


* अध्याय तीन सौ इक्यावनमें श्लोक बाईससे अट्ठाईसतक विभक्तियोंके प्रयोगका नियम बताया गया है। वे सब श्लोक यहाँ होने चाहिये थे; क्योंकि वहाँ जो नियम या विधान दिये गये हैं, उनके उदाहरण यहाँ मिलते हैं।