अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 784, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३५४ * ७५७
'कर्मकर्ता' कहलाता है। इनके सिवा 'अभिहित' और 'अनभिहित'—ये दो कर्ता और होते हैं। 'अभिहित' उत्तम और 'अनभिहित' अधम माना गया है। स्वतन्त्रकर्ताका उदाहरण—'कृतिनः तां विद्यां समुपासते।' (विद्वान् पुरुष उस विद्याकी उपासना करते हैं) यहाँ विद्याकी उपासनामें विद्वानोंकी स्वतन्त्रता विवक्षित है, इसलिये वे 'स्वतन्त्रकर्ता' हैं। हेतुकर्ताका उदाहरण—'चैत्रो मैत्रं हितं लम्भयते।' (चैत्र मैत्रको हितकी प्राप्ति कराता है।) 'मैत्रो हितं लभते तं चैत्रः प्रेरयति इति चैत्रो मैत्रं हितं लम्भयते।' (मैत्र हितको प्राप्त करता है और चैत्र उसे प्रेरणा देता है। अतः यह कहा जाता है कि 'चैत्र मैत्रको हितकी प्राप्ति कराता है'—यहाँ 'चैत्र' प्रयोजककर्ता या हेतुकर्ता है। कर्मकर्ताका उदाहरण—'प्राकृतधीः स्वयं भिद्यते।' (गँवार बुद्धिवाला मनुष्य स्वयं ही फूट जाता है।), 'तरुः स्वयं छिद्यते।' (वृक्ष स्वयं कट जाता है)। यहाँ फोड़नेवाले और काटनेवाले कर्ताओंके व्यापारको विवक्षाका विषय नहीं बनाया गया। जहाँ कार्यके अतिशय सौकर्यको प्रकट करनेके लिये कर्तृव्यापार अविवक्षित हो, वहाँ कर्म आदि अन्य कारक भी कर्ता-जैसे हो जाते हैं और तदनुसार ही क्रिया होती है। इस दृष्टिसे यहाँ 'प्राकृतधीः' और 'तरुः' पद कर्मकर्ताके रूपमें प्रयुक्त हैं। अभिहित कर्ताका उदाहरण—'रामो गच्छति।' (राम जाता है।) यहाँ 'कर्ता' अर्थमें तिङन्तका प्रयोग है, इसलिये कर्ता उक्त हुआ। जहाँ कर्ममें प्रत्यय हो, वहाँ 'कर्म' उक्त और 'कर्ता' अनुक्त या अनभिहित हो जाता है। अनभिहित कर्ताका उदाहरण—'गुरुणा शिष्ये धर्मः व्याख्यायते।' (गुरुद्वारा शिष्यके निमित्त धर्मकी व्याख्या की जाती है।) यहाँ कर्ममें प्रत्यय होनेसे 'धर्मं' की जगह 'धर्मः' हो गया; क्योंकि उक्त कर्ममें प्रथमा विभक्ति होनेका नियम है। अनभिहित कर्तामें पहले कथित नियमके अनुसार तृतीया विभक्ति होती है, इसीलिये 'गुरुणा' पदमें तृतीया विभक्ति प्रयुक्त हुई है। इस तरह पाँच प्रकारके 'कर्ता' बताये गये। अब सात प्रकारके कर्मका वर्णन सुनो॥१-४॥
१-ईप्सितकर्म, २-अनीप्सितकर्म, ३-ईप्सितानीप्सित-कर्म, ४-अकथितकर्म, ५-कर्तृकर्म, ६-अभिहितकर्म तथा ७-अनभिहितकर्म। ईप्सितकर्मका उदाहरण—'यतिः हरिं श्रद्दधाति।' (विरक्त साधु या संन्यासी हरिमें श्रद्धा रखता है।) यहाँ कर्ता यतिको हरि अभीष्ट हैं, इसलिये वे 'ईप्सितकर्म' हैं। अतएव हरिमें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग हुआ है। अनीप्सितकर्मकका उदाहरण—'अहिं लङ्घयते भृशम्।' (उससे सर्पको बहुधा लँघवाता है।) यहाँ 'अहिं' यह 'अनीप्सितकर्म' है। लाँघनेवाला सर्पको लाँघना नहीं चाहता। वह किसीके हठ या प्रेरणासे सर्पलंघनमें प्रवृत्त होता है। ईप्सितानीप्सितकर्मका उदाहरण—'दुग्धं संभक्षयन्व्रजः भक्षयेत्।' (मनुष्य दूध पीता हुआ धूल भी पी जाता है।) यहाँ दुग्ध 'ईप्सितकर्म' है और धूल 'अनीप्सितकर्म'। अकथितकर्म—जहाँ अपादान आदि विशेष नामोंसे कारकको व्यक्त करना अभीष्ट न हो, वहाँ वह कारक 'कर्मसंज्ञक' हो जाता है। यथा—गोपालः गां पयः दोग्धि। (ग्वाला गायसे दूध दुहता है।) यहाँ 'गाय' अपादान है, तथापि अपादानके रूपमें कथित न होनेसे अकथित हो गया और उसमें पञ्चमी विभक्ति न होकर द्वितीया विभक्ति हुई। कर्तृकर्म—जहाँ प्रयोजक कर्ताका प्रयोग होता है, वहाँ प्रयोज्य कर्ता कर्मके रूपमें परिणत हो जाता है। यथा—'गुरुः शिष्यं ग्रामं गमयेत्।' (गुरु शिष्यको गाँव भेजें।) 'शिष्यो ग्रामं गच्छेत् तं गुरुः प्रेरयेत् इति गुरुः शिष्यं ग्रामं गमयेत्।' (शिष्य गाँवको जाय, इसके लिये गुरु उसे प्रेरित