अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 785, कुल 878 में से
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करे, इस अर्थमें गुरु शिष्यको गाँव भेजें, यह वाक्य है।) यहाँ गुरु 'प्रयोजक कर्ता' है, और शिष्य प्रयोज्य कर्ता या 'कर्मभूत कर्ता' है। अभिहितकर्म — 'श्रियै हरेः पूजा क्रियते।' (लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये श्रीहरिकी पूजा की जाती है।) यहाँ कर्ममें प्रत्यय होनेसे पूजा 'उक्त कर्म' है, इसीको 'अभिहितकर्म' कहते हैं, अतएव इसमें प्रथमा विभक्ति हुई। अनभिहितकर्म — जहाँ कर्तामें प्रत्यय होता है, वहाँ कर्म अनभिहित हो जाता है, अतएव उसमें द्वितीया विभक्ति होती है। उदाहरणके लिये यह वाक्य है—'हरेः सर्वदं स्तोत्रं कुर्यात्' (श्रीहरिकी सर्वमनोरथदायिनी स्तुति करे।)<br> करण दो प्रकारका बताया गया है—'बाह्य' और 'आभ्यन्तर'। 'तृतीया करणे भवेत्।'—इस पूर्वोक्त नियमके अनुसार करणमें तृतीया होती है। आभ्यन्तर करणका उदाहरण देते हैं—'चक्षुषा रूपं गृह्णाति।' (नेत्रसे रूपको ग्रहण करता है।) यहाँ नेत्र 'आभ्यन्तर करण' हैं, अतः इसमें तृतीया विभक्ति हुई। 'बाह्य करण'का उदाहरण है—'दात्रेण तल्लुनेत्।' (हँसुआसे उसको काटे।) यहाँ दात्र 'बाह्य करण' है। अतः उसमें तृतीया हुई है। सम्प्रदान तीन प्रकारका बताया गया है—प्रेरक, अनुमन्तृक और अनिराकर्तृक। जो दानके लिये प्रेरित करता हो, वह 'प्रेरक' है। जो प्राप्त हुई किसी वस्तुके लिये अनुमति या अनुमोदनमात्र करता है, वह 'अनुमन्तृक' है। जो न 'प्रेरक' है, न 'अनुमन्तृक' है, अपितु किसीकी दी हुई वस्तुको स्वीकार कर लेता है, उसका निराकरण नहीं करता, वह 'अनिराकर्तृक सम्प्रदान' है। 'सम्प्रदाने चतुर्थी।'—इस पूर्वोक्त नियमके अनुसार सम्प्रदानमें चतुर्थी विभक्ति होती है। तीनों सम्प्रदानोंके क्रमशः उदाहरण दिये जाते हैं—१-'नरो ब्राह्मणाय गां ददाति।' (मनुष्य ब्राह्मणको गाय देता है।) यहाँ ब्राह्मण 'प्रेरक सम्प्रदान' होनेके कारण उसमें चतुर्थी विभक्ति हुई है। ब्राह्मणलोग प्रायः यजमानको गोदानके लिये प्रेरित करते रहते हैं, अतः उन्हें 'प्रेरक सम्प्रदान' की संज्ञा दी गयी है। २-'नरो नृपतये दासं ददाति।' (मनुष्य राजाको दास अर्पित करता है।) यहाँ राजाने दास अर्पणके लिये कोई प्रेरणा नहीं दी है। केवल प्राप्त हुए दासको ग्रहण करके उसका अनुमोदनमात्र किया है, इसलिये वह 'अनुमन्तृक सम्प्रदान' है; अतएव 'नृपतये' में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। ३-'सज्जनः भर्त्रे पुष्पाणि दद्यात्।' (सज्जन पुरुष स्वामीको पुष्प दे)—यहाँ स्वामीने पुष्पदानकी मनाही न करके उसको अङ्गीकारमात्र कर लिया है, इसलिये 'भर्तृ' शब्द 'अनिराकर्तृक सम्प्रदान' है। सम्प्रदान होनेके कारण ही उसमें चतुर्थी विभक्ति हुई है। अपादान दो प्रकारका होता है—'चल' और 'अचल'। कोई भी अपादान क्यों न हो, 'अपादाने पञ्चमी स्यात्।'—इस पूर्वकथित नियमके अनुसार उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है। 'धावतः अश्वात् पतितः।' (दौड़ते हुए घोड़ेसे गिरा)—यहाँ दौड़ता हुआ घोड़ा 'चल अपादान' है। अतः 'धावतः अश्वात्' में पञ्चमी विभक्ति हुई है। 'स वैष्णवः ग्रामादायाति।' (वह वैष्णव गाँवसे आता है)—यहाँ ग्राम शब्द 'अचल अपादान' है, अतः उसमें पञ्चमी विभक्ति हुई है॥५–११॥
अधिकरण चार प्रकारके होते हैं—अभिव्यापक, औपश्लेषिक, वैषयिक और सामीप्यक। जो तत्त्व किसी वस्तुमें व्यापक हो, वह आधारभूत वस्तु अभिव्यापक 'अधिकरण' है। यथा—'दध्नि घृतम्।' (दहीमें घी है)। 'तिलेषु तैलं देवार्थम्।' (तिलमें तेल है, जो देवताके उपयोगमें आता है।) यहाँ घी दहीमें और तैल तिलमें व्याप्त है। अतः इनके आधारभूत दही और तिल अभिव्यापक अधिकरण हैं। 'आधारो योऽधिकरणं