सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 786, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 786
  • अध्याय ३५४ * ७५९

विभक्तिस्तत्र सप्तमी।'—इस पूर्वोक्त नियमके अनुसार अधिकरणमें सप्तमी विभक्ति होती है। प्रस्तुत उदाहरणमें 'दध्नि' और 'तिलेषु'—इन पदोंमें इसी नियमसे सप्तमी विभक्ति हुई है। अब 'औपश्लेषिक अधिकरण' बताया जाता है—'कपिर्गृहे तिष्ठेद् वृक्षे च तिष्ठेत्।' (बंदर घरके ऊपर स्थित होता है और वृक्षपर भी स्थित होता है।) कपिके आधारभूत जो गृह और वृक्ष हैं, उनपर वह सटकर बैठता है। इसीलिये वह 'औपश्लेषिक अधिकरण' माना गया है। अधिकरण होनेसे ही 'गृहे' और 'वृक्षे'—इन पदोंमें सप्तमी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। अब 'वैषयिक अधिकरण' बताते हैं—विषयभूत अधिकरणको 'वैषयिक' कहते हैं। यथा—'जले मत्स्यः।', 'वने सिंहः।' (जलमें मछली, वनमें सिंह।) यहाँ जल और वन 'विषय' हैं और मत्स्य तथा सिंह 'विषयी'। अतः विषयभूत अधिकरणमें सप्तमी विभक्ति हुई। अब 'सामीप्यक अधिकरण' बताते हैं—'गङ्गायां घोषो वसति।' (गङ्गामें गोशाला बसती है।) यहाँ 'गङ्गा' का अर्थ है—गङ्गाके समीप। अतः 'सामीप्यक अधिकरण' होनेके कारण गङ्गामें सप्तमी विभक्ति हुई। ऐसे वाक्य 'औपचारिक' माने जाते हैं। जहाँ मुख्यार्थ बाधित होनेसे उसके सम्बन्धसे युक्त अर्थान्तरकी प्रतीति होती है, वहाँ 'लक्षणा' होती है। 'गौर्वाहीकः' इत्यादि स्थलोंमें 'गो' शब्दका मुख्यार्थ बाधित होता है, अतः वह स्वसदृशको लक्षित कराता है। इस तरहके वाक्यप्रयोगको 'औपचारिक' कहते हैं। 'अनभिहित कर्ता' में तृतीया अथवा षष्ठी विभक्ति होती है। यथा—'विष्णुः सम्पूज्यते लोकैः।' (लोगोंद्वारा विष्णु पूजे जाते हैं।) यहाँ कर्ममें प्रत्यय हुआ है। अतः कर्म उक्त है और कर्ता अनुक्त। इसलिये अनुक्त कर्ता 'लोक' शब्दमें तृतीया विभक्ति हुई है। 'तेन गन्तव्यम्, तस्य गन्तव्यम्' (उसको जाना चाहिये) यहाँ उपर्युक्त नियमके अनुसार तृतीया और षष्ठी—दोनोंका प्रयोग हुआ है। षष्ठीका प्रयोग कृदन्तके योगमें ही होता है। अभिहित कर्ता और कर्ममें प्रथमा विभक्ति होती है। इसीलिये 'विष्णुः' में प्रथमा विभक्ति हुई है। 'भक्तः हरिं प्रणमेत्।' (भक्त भगवान्‌को प्रणाम करे।) यहाँ अभिहित कर्ता 'भक्त'में प्रथमा विभक्ति हुई है और अनुक्त कर्म 'हरि' में द्वितीया विभक्ति। 'हेतु'में तृतीया विभक्ति होती है। यथा—'अन्नेन वसेत्।' (अन्नके हेतु कहीं भी निवास करे।) यहाँ हेतुभूत अन्नमें तृतीया विभक्ति हुई है। 'तादर्थ्य'में चतुर्थी विभक्ति कही गयी है। यथा—'वृक्षाय जलम्' 'वृक्षके लिये पानी।' यहाँ 'वृक्ष' शब्दमें 'तादर्थ्यप्रयुक्त' चतुर्थी विभक्ति हुई है। परि, उप, आङ् आदिके योगमें पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा—'परि ग्रामात् पुरा बलवत् वृष्टोऽयं देवः।' (गाँवसे कुछ दूर हटकर दैवने पूर्वकालमें बड़े जोरकी वर्षा की थी।)—इस वाक्यमें 'परि'के साथ योग होनेके कारण 'ग्राम' शब्दमें पञ्चमी विभक्ति हुई है। दिग्वाचक शब्द, अन्यार्थक शब्द तथा 'ऋते' आदि शब्दोंके योगमें भी पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा—'पूर्वो ग्रामात्। ऋते विष्णोः। न मुक्तिः इतरा हरेः।' 'पृथक्' और 'विना' आदिके योगमें तृतीया एवं पञ्चमी विभक्ति होती है—जैसे 'पृथग् ग्रामात्।' यहाँ 'पृथक्' शब्दके योगमें 'ग्राम' शब्दसे पञ्चमी और 'पृथग् विहारेण'—यहाँ 'पृथक्' शब्दके योगमें 'विहार' शब्दसे तृतीया विभक्ति हुई। इसी प्रकार 'विना' शब्दके योगमें भी जानना चाहिये। 'विना श्रिया'—यहाँ 'विना' के योगमें 'श्री'शब्दसे द्वितीया, 'विना श्रिया'—यहाँ 'विना'के योगमें 'श्री'शब्दसे तृतीया और 'विना श्रियः'—यहाँ