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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ
  • अध्याय ३५४ * ७५९

विभक्तिस्तत्र सप्तमी।'—इस पूर्वोक्त नियमके अनुसार अधिकरणमें सप्तमी विभक्ति होती है। प्रस्तुत उदाहरणमें 'दध्नि' और 'तिलेषु'—इन पदोंमें इसी नियमसे सप्तमी विभक्ति हुई है। अब 'औपश्लेषिक अधिकरण' बताया जाता है—'कपिर्गृहे तिष्ठेद् वृक्षे च तिष्ठेत्।' (बंदर घरके ऊपर स्थित होता है और वृक्षपर भी स्थित होता है।) कपिके आधारभूत जो गृह और वृक्ष हैं, उनपर वह सटकर बैठता है। इसीलिये वह 'औपश्लेषिक अधिकरण' माना गया है। अधिकरण होनेसे ही 'गृहे' और 'वृक्षे'—इन पदोंमें सप्तमी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। अब 'वैषयिक अधिकरण' बताते हैं—विषयभूत अधिकरणको 'वैषयिक' कहते हैं। यथा—'जले मत्स्यः।', 'वने सिंहः।' (जलमें मछली, वनमें सिंह।) यहाँ जल और वन 'विषय' हैं और मत्स्य तथा सिंह 'विषयी'। अतः विषयभूत अधिकरणमें सप्तमी विभक्ति हुई। अब 'सामीप्यक अधिकरण' बताते हैं—'गङ्गायां घोषो वसति।' (गङ्गामें गोशाला बसती है।) यहाँ 'गङ्गा' का अर्थ है—गङ्गाके समीप। अतः 'सामीप्यक अधिकरण' होनेके कारण गङ्गामें सप्तमी विभक्ति हुई। ऐसे वाक्य 'औपचारिक' माने जाते हैं। जहाँ मुख्यार्थ बाधित होनेसे उसके सम्बन्धसे युक्त अर्थान्तरकी प्रतीति होती है, वहाँ 'लक्षणा' होती है। 'गौर्वाहीकः' इत्यादि स्थलोंमें 'गो' शब्दका मुख्यार्थ बाधित होता है, अतः वह स्वसदृशको लक्षित कराता है। इस तरहके वाक्यप्रयोगको 'औपचारिक' कहते हैं। 'अनभिहित कर्ता' में तृतीया अथवा षष्ठी विभक्ति होती है। यथा—'विष्णुः सम्पूज्यते लोकैः।' (लोगोंद्वारा विष्णु पूजे जाते हैं।) यहाँ कर्ममें प्रत्यय हुआ है। अतः कर्म उक्त है और कर्ता अनुक्त। इसलिये अनुक्त कर्ता 'लोक' शब्दमें तृतीया विभक्ति हुई है। 'तेन गन्तव्यम्, तस्य गन्तव्यम्' (उसको जाना चाहिये) यहाँ उपर्युक्त नियमके अनुसार तृतीया और षष्ठी—दोनोंका प्रयोग हुआ है। षष्ठीका प्रयोग कृदन्तके योगमें ही होता है। अभिहित कर्ता और कर्ममें प्रथमा विभक्ति होती है। इसीलिये 'विष्णुः' में प्रथमा विभक्ति हुई है। 'भक्तः हरिं प्रणमेत्।' (भक्त भगवान्‌को प्रणाम करे।) यहाँ अभिहित कर्ता 'भक्त'में प्रथमा विभक्ति हुई है और अनुक्त कर्म 'हरि' में द्वितीया विभक्ति। 'हेतु'में तृतीया विभक्ति होती है। यथा—'अन्नेन वसेत्।' (अन्नके हेतु कहीं भी निवास करे।) यहाँ हेतुभूत अन्नमें तृतीया विभक्ति हुई है। 'तादर्थ्य'में चतुर्थी विभक्ति कही गयी है। यथा—'वृक्षाय जलम्' 'वृक्षके लिये पानी।' यहाँ 'वृक्ष' शब्दमें 'तादर्थ्यप्रयुक्त' चतुर्थी विभक्ति हुई है। परि, उप, आङ् आदिके योगमें पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा—'परि ग्रामात् पुरा बलवत् वृष्टोऽयं देवः।' (गाँवसे कुछ दूर हटकर दैवने पूर्वकालमें बड़े जोरकी वर्षा की थी।)—इस वाक्यमें 'परि'के साथ योग होनेके कारण 'ग्राम' शब्दमें पञ्चमी विभक्ति हुई है। दिग्वाचक शब्द, अन्यार्थक शब्द तथा 'ऋते' आदि शब्दोंके योगमें भी पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा—'पूर्वो ग्रामात्। ऋते विष्णोः। न मुक्तिः इतरा हरेः।' 'पृथक्' और 'विना' आदिके योगमें तृतीया एवं पञ्चमी विभक्ति होती है—जैसे 'पृथग् ग्रामात्।' यहाँ 'पृथक्' शब्दके योगमें 'ग्राम' शब्दसे पञ्चमी और 'पृथग् विहारेण'—यहाँ 'पृथक्' शब्दके योगमें 'विहार' शब्दसे तृतीया विभक्ति हुई। इसी प्रकार 'विना' शब्दके योगमें भी जानना चाहिये। 'विना श्रिया'—यहाँ 'विना' के योगमें 'श्री'शब्दसे द्वितीया, 'विना श्रिया'—यहाँ 'विना'के योगमें 'श्री'शब्दसे तृतीया और 'विना श्रियः'—यहाँ

७६० * अग्निपुराण *


‘विना’ के योगमें ‘श्री’ शब्दसे पञ्चमी विभक्ति हुई है। कर्मप्रवचनीयसंज्ञक शब्दोंके योगमें द्वितीया विभक्ति होती है—जैसे ‘अन्वर्जुनं योद्धारः—योद्धा अर्जुनके संनिकट प्रदेशमें हैं।’—यहाँ ‘अनु’ कर्मप्रवचनीय-संज्ञक है—इसके योगमें ‘अर्जुन’ शब्दमें द्वितीया विभक्ति हुई। इसी प्रकार अभितः, परितः आदिके योगमें भी द्वितीया होती है। यथा ‘अभितो ग्राममीरितम्।’—गाँवके सब तरफ कह दिया है।’ यहाँ ‘अभितः’ शब्दके योगमें ‘ग्राम’ शब्दमें द्वितीया विभक्ति हुई है। नमः, स्वाहा, स्वधा, स्वस्ति एवं वषट् आदि शब्दोंके योगमें चतुर्थी विभक्ति होती है—जैसे ‘नमो’ देवाय—(देवको नमस्कार है)—यहाँ ‘नमः’ के योगमें ‘देव’ शब्दमें चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। इसी प्रकार ‘ते स्वस्ति’—तुम्हारा कल्याण हो—यहाँ ‘स्वस्ति’ के योगमें ‘युष्मद्’ शब्दसे चतुर्थी विभक्ति हुई (‘युष्मद्’ शब्दको चतुर्थीके एकवचनमें वैकल्पिक ‘ते’ आदेश हुआ है)। तुमुन्प्रत्ययार्थक भाववाची शब्दसे चतुर्थी विभक्ति होती है—जैसे ‘पाकाय याति’ और ‘पक्तये याति’—पकानेके लिये जाता है।’ यहाँ ‘पाक’ और ‘पक्ति’ शब्द ‘तुमर्थक भाववाची’ हैं। इन दोनोंसे चतुर्थी विभक्ति हुई। ‘सहार्थ’ शब्दके योगमें हेतु-अर्थ और कुत्सित अङ्गवाचकमें तृतीया विभक्ति होती है। सहार्थयोगमें तृतीया विशेषणवाचकसे होती है। जैसे ‘पिताऽगात् सह पुत्रेण’—पिता पुत्रके साथ चले गये।’ यहाँ ‘सह’ शब्दके योगमें विशेषणवाचक ‘पुत्र’ शब्दसे तृतीया विभक्ति हुई। इसी प्रकार ‘गदया हरिः’ (भगवान् हरि गदाके सहित रहते हैं)—यहाँ ‘सहार्थक’ शब्दके न रहनेपर भी सहार्थ है, इसलिये विशेषणवाचक ‘गदा’ शब्दसे तृतीया विभक्ति हुई। ‘अक्ष्णा काणः—आँखसे काना है।’—यहाँ कुत्सितअङ्गवाचक ‘अक्षि’ शब्द है। उससे तृतीया विभक्ति हुई। ‘अर्थेन निवसेद् भृत्यः।’—‘भृत्य धनके कारणसे रहता है।’—यहाँ हेतु-अर्थ है ‘धन’। तद्वाचक ‘अर्थ’ शब्दसे तृतीया विभक्ति हुई। कालवाचक और भाव अर्थमें सप्तमी विभक्ति होती है। अर्थात् जिसकी क्रियासे अन्य क्रिया लक्षित होती है, तद्वाचक शब्दसे सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे—‘विष्णौ नते भवेन्मुक्तिः’—भगवान् विष्णुको नमस्कार करनेपर मुक्ति मिलती है।—यहाँ श्रीविष्णुकी नमस्कार-क्रियासे मुक्ति-भवनरूपा क्रिया लक्षित होती है, अतः ‘विष्णु’ शब्दसे सप्तमी विभक्ति हुई। इसी प्रकार ‘वसन्ते स गतो हरिम्’—वह वसन्त ऋतुमें हरिके पास गया।’—यहाँ ‘वसन्त’ कालवाचक है, उससे सप्तमी हुई। (स्वामी, ईश, पति, साक्षी, सूत और दायाद आदि शब्दोंके योगमें षष्ठी एवं सप्तमी विभक्तियाँ होती हैं—) जैसे—‘नृणां स्वामी, नृषु स्वामी’—मनुष्योंका स्वामी,—यहाँ ‘स्वामी’ शब्दके योगमें ‘नृ’ शब्दसे षष्ठी एवं सप्तमी विभक्तियाँ हुईं। इसी प्रकार ‘नृणामीशः’—नरोंके ईश’—यहाँ ‘ईश’ शब्दके योगमें ‘नृ’ शब्दसे, तथा ‘सतां पतिः’—सज्जनोंका पति—यहाँ ‘सत्’ शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई। ऐसे ही ‘नृणां साक्षी, नृषु साक्षी—मनुष्योंका साक्षी’—यहाँ ‘नृ’ शब्दसे षष्ठी एवं सप्तमी विभक्तियाँ हुईं। ‘गोषु नाथो गवां पतिः—गौओंका स्वामी है, यहाँ ‘नाथ’ और ‘पति’ शब्दोंके योगमें ‘गो’ शब्दसे षष्ठी और सप्तमी विभक्तियाँ हुईं। ‘गोषु सूतो गवां सूतः—गौओंमें उत्पन्न है’—यहाँ ‘सूत’ शब्दके योगमें ‘गो’ शब्दसे षष्ठी एवं सप्तमी विभक्ति हुई। ‘इह राज्ञां दायादकोऽस्तु’—यहाँ राजाओंका दायाद हो। यहाँ ‘दायाद’ शब्दके योगमें ‘राजन्’ शब्दमें षष्ठी विभक्ति हुई है। हेतुवाचकसे ‘हेतु’ शब्दके प्रयोग होनेपर षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे ‘अन्नस्य हेतोर्वसति—अन्नके कारण वास करता है।’—यहाँ ‘वास’ में

  • अध्याय ३५५ * ७६१

अन्न 'हेतु' है, तद्वाचक 'हेतु' शब्दका भी प्रयोग हुआ है, अतः 'अन्न' शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई। स्मरणार्थक धातुके प्रयोगमें उसके कर्ममें षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे—**‘मातुः स्मरति।—*माताको स्मरण करता है।' यहाँ ‘स्मरति'के योगमें ‘मातृ’ शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई। कृत्प्रत्ययके योगमें कर्त्ता एवं कर्ममें षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे—'अपां भेत्ता—जलको भेदन करनेवाला।' यहाँ—‘भेत्तृ' शब्द ‘कृत्' प्रत्ययान्त है। उसके योगमें—कर्मभूत ‘अप्’ शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई। इसी प्रकार **‘तव कृतिः—**तुम्हारी कृति है'—यहाँ ‘कृति' शब्द ‘कृत्प्रत्ययान्त’ है। उसके योगमें कर्तृभूत ‘युष्मद्’ शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई (युष्मद्-ङस्=तव)—निष्ठा आदि अर्थात् क्त-क्तवतु, शतृ-शानच्, उ, उक, क्त, तुमुन्, खलर्थक, तृन्, शानच्, चानश् आदिके योगमें षष्ठी विभक्ति नहीं होती (यथा ‘ग्रामं गतः’ इत्यादि) ॥१२—२६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कारक-निरूपण' नामक तीन सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥३५४॥


तीन सौ पचपनवाँ अध्याय

समास-निरूपण

भगवान् कार्त्तिकेय कहते हैं— कात्यायन! मैं छः* प्रकारके 'समास' बताऊँगा। फिर अवान्तर-भेदोंसे 'समास'के अट्ठाईस भेद हो जाते हैं। समास ‘नित्य’ और ‘अनित्य’ के भेदसे दो प्रकारका है तथा ‘लुक्’ और ‘अलुक्’के भेदसे भी उसके दो प्रकार और हो जाते हैं। कुम्भकार और हेमकार ‘नित्य समास’ हैं। (क्योंकि विग्रह-वाक्यद्वारा ये शब्द जातिविशेषका बोध नहीं करा सकते।)**‘राज्ञः+पुमान्= राजपुमान्’—**यह षष्ठी-तत्पुरुष समास स्वपदविग्रह होनेके कारण ‘अनित्य’ है। **कष्टश्रितः (कष्टं+श्रितः)—**इसमें ‘लुक्’ समास है; क्योंकि ‘कष्ट’ पदके अन्तमें स्थित द्वितीया विभक्तिका ‘लुक्’ (लोप) हो जाता है। ‘कण्ठेकालः’ आदि ‘अलुक्’ समास हैं; क्योंकि इसमें कण्ठशब्दोत्तरवर्तिनी सप्तमी विभक्तिका ‘लुक्’ नहीं होता। तत्पुरुष-समास आठ प्रकारका होता


* जहाँ अनेक पदोंका परस्पर एकार्थीभावरूप सामर्थ्य लक्षित हो, उनमें ‘समास’ होता है। कृत्, तद्धित, समास, एकशेष तथा सनाद्यन्त धातु—ये पाँच वृत्तियाँ मानी गयी हैं। परार्थका अभिधान (कथन) ‘वृत्ति’ है। वृत्त्यर्थके अवबोधक वाक्यको ‘विग्रह’ कहते हैं। ‘विग्रह’ दो प्रकारका होता है—‘लौकिक’ और ‘अलौकिक’। परिनिष्ठित (प्रयोगाई) होनेके कारण जो साधुवाक्य है, वह ‘लौकिक विग्रह’ कहलाता है। जो प्रयोगयोग्य न होनेसे असाधु है, वह ‘अलौकिक विग्रह’ है। ‘राज्ञः पुरुषः’—यह ‘लौकिक विग्रह’ है ‘राजन्+ङस्, पुरुष+सु’ यह अलौकिक विग्रह है। समास ‘नित्य’ और ‘अनित्य’के भेदसे दो प्रकारका है। जो अविग्रह (लौकिक विग्रहसे रहित) या अस्वपद-विग्रह (समस्यमान ‘यावत्’ पदसे अघटित) हो, वह ‘नित्य-समास’ है; इसके विपरीत ‘अनित्य-समास’ है। प्राचीन विद्वानोंने समासके छः प्रकार बताये हैं। यथा—

सुपां सुपा तिङा नाम्ना धातुनाथ तिङां तिङा। सुबन्तेनेति विज्ञेयः समासः षड्विधो बुधैः॥

(१) उदाहरणके लिये सुबन्तका सुबन्तके साथ समास—राजपुरुषः। यहाँ ('राज्ञः पुरुषः' इस विग्रहके अनुसार) पूर्व और उत्तर दोनों पद ‘सुबन्त’ हैं। (२) सुबन्तका तिङ्के साथ समास—यथा—‘पर्यभूषत्’। (३) ‘सुबन्त’को नामके साथ—कुम्भकारः। हेमकारः इत्यादि। (४) ‘सुबन्त, का धातुके साथ समास। यथा—‘कटप्रूः', अजस्रम् इत्यादि। (५) तिङन्तका तिङन्तके साथ समास, यथा—पिबतखादता। खादतमोदता इत्यादि। (६) तिङन्तका सुबन्तके साथ समास, यथा—कृन्तविचक्षणा। इसका मयूरव्यंसकादिगणमें पाठ है।'

७६२ * अग्निपुराण *


है। प्रथमान्त आदि शब्द सुबन्तके साथ समस्त होते हैं। ‘पूर्वकायः’ इस तत्पुरुषसमासमें जब ‘पूर्वं कायस्य’—ऐसा विग्रह किया जाता है, तब यह ‘प्रथमा-तत्पुरुष’ समास कहा जाता है। इसी प्रकार ‘अपरकायः’—कायस्य अपरम्, इस विग्रहमें, ‘अधरकायः’—कायस्य अधरम्—इस विग्रहमें और ‘उत्तरकायः’—कायस्योत्तरम्—इस विग्रहमें भी प्रथमा-तत्पुरुष समास कहा जाता है। ऐसे ही ‘अर्द्धकणा’ इसमें अर्द्धम् कणायाः—ऐसा विग्रह होनेसे प्रथमा-तत्पुरुष समास होता है एवं ‘भिक्षातुर्यम्’—इसमें तुर्यं भिक्षायाः—ऐसा विग्रह होनेसे तुर्यभिक्षा और पक्षान्तरमें ‘भिक्षातुर्यम्’—ऐसा षष्ठी-तत्पुरुष होता है। ऐसे ही ‘आपन्नजीविकः’ यह द्वितीया-तत्पुरुष समास है। इसका विग्रह इस प्रकार होता है—‘आपन्नो जीविकाम्।’ पक्षान्तरमें ‘जीविकापन्नः’ ऐसा रूप होता है। इसी प्रकार ‘माधवाश्रितः’—यह द्वितीया-समास है; इसका विग्रह ‘माधवम् आश्रितः’—इस प्रकार है। ‘वर्षभोग्यः’—यह द्वितीया-तत्पुरुष समास है—इसका विग्रह है ‘वर्षं भोग्यः।’ ‘धान्यार्थः’ यह तृतीया-समास है। इसका विग्रह ‘धान्येन अर्थः’ इस प्रकार है। ‘विष्णुबलिः’ यहाँ ‘विष्णवे बलिः’—इस विग्रहमें चतुर्थी-तत्पुरुष समास होता है। ‘वृकभीतिः’ यह पञ्चमी-तत्पुरुष है। इसका विग्रह ‘वृकाद् भीतिः’—इस प्रकार है। ‘राजपुमान्’—यहाँ ‘राज्ञः पुमान्’—इस विग्रहमें षष्ठी-तत्पुरुष समास होता है। इसी प्रकार ‘वृक्षस्य फलम्—वृक्षफलम्’—यहाँ षष्ठी-तत्पुरुष समास है। ‘अक्षशौण्डः’ (द्यूतक्रीडामें निपुण) इसमें सप्तमी-तत्पुरुष समास है। अहितः—जो हितकारी न हो, वह—इसमें ‘नञ्समास’ है॥ १-७॥

‘नीलोत्पल’ आदि जिसके उदाहरण हैं, वह ‘कर्मधारय’ समास सात प्रकारका होता है १-विशेषणपूर्वपद (जिसमें विशेषण पूर्वपद हो और विशेष्य उत्तरपद अथवा)। इसका उदाहरण है—‘नीलोत्पल’ (नीला कमल)। २-विशेष्योत्तर-विशेषणपद—इसका उदाहरण है—‘वैया-करणखसूचिः’ (कुछ पूछनेपर आकाशकी ओर देखनेवाला वैयाकरण)। ३-विशेषणोभयपद (अथवा विशेषणद्विपद) जिसमें दोनों पद विशेषणरूप ही हों। जैसे—शीतोष्ण (ठंडा-गरम)। ४-उपमानपूर्वपद। इसका उदाहरण है—शङ्खपाण्डुरः (शङ्खके समान सफेद)। ५-उपमानोत्तरपद—इसका उदाहरण है—‘पुरुष-व्याघ्रः’ (पुरुषो व्याघ्र इव)। ६-सम्भावना-पूर्वपद—(जिसमें पूर्वपद सम्भावनात्मक हो) उदाहरण—गुणवृद्धिः (गुण इति वृद्धिः स्यात्। अर्थात् ‘गुण’ शब्द बोलनेसे वृद्धिकी सम्भावना होती है)। तात्पर्य यह है कि ‘वृद्धि हो’—यह कहनेकी आवश्यकता हो तो ‘गुण’ शब्दका ही उच्चारण करना चाहिये। ७-अवधारणपूर्वपद—[जहाँ पूर्वपदमें ‘अवधारण’ (निश्चय) सूचक शब्दका प्रयोग हो, वह]। जैसे—‘सुहृदेव सुबन्धुकः’ (सुहृद् ही सुबन्धु है)। बहुव्रीहिसमास भी सात प्रकारका ही होता है॥ ८-११॥

१-द्विपद, २-बहुपद, ३-संख्योत्तरपद, ४-संख्योभयपद, ५-सहपूर्वपद, ६-व्यतिहारलक्षणार्थ तथा ७- दिगलक्षणार्थ। ‘द्विपद बहुव्रीहि’में दो ही पदोंका समास होता है। यथा—‘आरूढभवनो नरः’। (आरूढं भवनं येन सः—इस विग्रहके अनुसार जो भवनपर आरूढ हो गया हो, उस मनुष्यका बोध कराता है।) ‘बहुपद बहुव्रीहि’में दोसे अधिक पद समासमें आबद्ध होते हैं। इसका उदाहरण है—‘अयम् अर्चिताशेषपूर्वः।’ (अर्चिता अशेषाः पूर्वा यस्य सोऽयम् अर्चिताशेषपूर्वः।) अर्थात् जिसके सारे पूर्वज पूजित हुए हों, वह ‘अर्चिताशेषपूर्व’ है। इसमें

  • अध्याय ३५६ * | ७६३ --- | --- 'अर्चित' 'अशेष' तथा 'पूर्व'—ये तीनों पद समासमें आबद्ध हैं। ऐसा समास 'बहुपद' कहा गया है। 'संख्योत्तरपद'का उदाहरण है—'एते विप्रा उपदशाः'—ये ब्राह्मण लगभग दस हैं'। इसमें 'दस' संख्या उत्तरपदके रूपमें प्रयुक्त है। 'द्वित्राः द्वयेकत्रयः' इत्यादि संख्योभयपदके उदाहरण हैं। 'सहपूर्वपद'का उदाहरण—'समूलोद्धृतकः तरुः' (सह मूलेन उद्धृतं कं शिखा यस्य सः। अर्थात् जडसहित उखड़ गयी है शिखा जिसकी, वह वृक्ष)—यहाँ पूर्वपदके स्थानमें 'सह' (स)-का प्रयोग हुआ है। व्यतिहार-लक्षणका उदाहरण है—केशाकेशि, नखानखि युद्धम् (आपसमें झोंटा-झुटौअल, परस्पर नखोंसे बकोटा-बकोटीपूर्वक कलह) ॥ १२—१४॥<br><br>दिगलक्षणार्थका उदाहरण—उत्तरपूर्वा (उत्तर और पूर्वके अन्तरालकी दिशा)। 'द्विगु' समास दो प्रकारका बताया गया है। 'एकवद्भाव' तथा 'अनेकधा' स्थितिको लेकर ये भेद किये गये हैं। संख्या पूर्वपदवाला समास 'द्विगु' है। इसे कर्मधारयका ही एक भेदविशेष स्वीकार किया गया है। 'एकवद्भाव'का उदाहरण है—द्विशृङ्गम् (दो सींगोंका समाहार)। 'पञ्चमूली' भी इसीका | उदाहरण है। 'अनेकधा' या 'अनेकवद्भाव'का उदाहरण है—सप्तर्षयः इत्यादि। 'पञ्च ब्राह्मणाः'में समास नहीं होगा; क्योंकि यहाँ संज्ञा नहीं है॥ १५॥<br><br>'द्वन्द्व' समास भी दो ही प्रकारका होता है—१-'इतरेतरयोगी' तथा २-'समाहारवान्'। प्रथमका उदाहरण है—'रुद्रविष्णू (रुद्रश्च विष्णुश्च—रुद्र तथा विष्णु)। यहाँ इतरेतर-योग है। समाहारका उदाहरण है—भेरीपटहम् (भेरी च पटहश्च, अनयोः समाहारः—अर्थात् भेरी और पटहका समाहार)। यहाँ 'तुर्याङ्ग' होनेसे इनका एकवद्भाव होता है। अव्ययीभाव समास भी दो तरहका होता है—१-'नामपूर्वपद' और २-('यथा' आदि) अव्यय-पूर्वपद। प्रथमका उदाहरण है—शाकस्य मात्रा—शाकप्रति। यहाँ 'शाक' पूर्वपद है और मात्रार्थक 'प्रति' अव्यय उत्तरपद। दूसरेका उदाहरण—'उपकुमारम्-उपरथ्यम्' इत्यादि हैं। समासको प्रायः चार प्रकारोंमें विभक्त किया जाता है—१-उत्तरपदार्थकी प्रधानतासे युक्त (तत्पुरुष), २-उभयपदार्थ-प्रधान द्वन्द्व समास, ३-पूर्वपदार्थ-प्रधान 'अव्ययीभाव' तथा ४-अन्य अथवा बाह्यपदार्थ-प्रधान 'बहुव्रीहि' ॥ १६—१९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'समासविभागका वर्णन' नामक तीन सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५५॥


तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय

त्रिविध तद्धित-प्रत्यय

कुमार स्कन्ध कहते हैं—कात्यायन ! अब त्रिविध 'तद्धित'का वर्णन करूँगा। 'तद्धित'के तीन भेद हैं—सामान्यावृत्ति तद्धित, अव्यय तद्धित तथा भाववाचक तद्धित। 'सामान्यावृत्ति तद्धित' इस प्रकार है—'अंस' शब्दसे 'लच्' प्रत्यय होनेपर 'अंसलः' बनता है; इसका अर्थ है—बलवान्। 'वत्स' शब्दसे 'लच्' प्रत्यय होनेपर 'वत्सलः' रूप होता है, इसका अर्थ स्नेहवान् है*।


* पाणिनि-व्याकरणके अनुसार 'वत्सांसाभ्यां कामबले।' (५।२।९८)—इस सूत्रसे क्रमशः 'कामवान्' और 'बलवान्'के अर्थमें 'वत्स' और 'अंस' शब्दोंसे 'लच्' प्रत्यय होता है। सूत्रमें 'काम' तथा 'बल' शब्द अर्श आद्यजन्त्य माने गये हैं। 'काम' शब्द यहाँ 'स्नेह'का

७६४ * अग्निपुराण *

'फेन' शब्दसे 'इलच्' प्रत्यय होनेपर 'फेनिलम्' १ रूप होता है, इसका अर्थ है—फेनयुक्त जल। लोमादिगणसे 'श' प्रत्यय होता है, (विकल्पसे 'मतुप्' भी होता है)—इस नियमके अनुसार 'श' प्रत्यय होनेपर 'लोमशः'२ प्रयोग बनता है। ('मतुप्' होनेपर 'लोमवान्' होता है। इसी तरह 'रोमशः, रोमवान्'—ये प्रयोग सिद्ध होते हैं।) पामादि शब्दोंसे 'न' होता है—इस नियमके अनुसार 'पाम' शब्दसे 'न' होनेपर 'पामनः' 'अङ्गात् कल्याणे।'—इस वार्तिकके अनुसार 'कल्याण' अर्थमें 'अङ्ग' शब्दसे 'न' होनेपर 'लक्ष्मणः' (उत्तम लक्षणोंसे युक्त) ये रूप बनते हैं। वैकल्पिक 'मतुप्' होनेपर तो 'पामवान्' आदि रूप होंगे। जिसे खुजली हुई हो, वह 'पामन' या 'पामवान्' है। इसी तरह पिच्छादि शब्दोंसे 'इलच्' होता है—इस नियमके अनुसार 'इलच्' होनेपर 'पिच्छिलः', 'पिच्छवान्'; 'उरसिरः', 'उरस्वान्' इत्यादि रूप होते हैं। 'पिच्छिलः' का अर्थ 'पंखवान्' होता है। मार्गका विशेषण होनेपर यह फिसलनयुक्तका बोधक होता है—यथा 'पिच्छिलः पन्थाः।'

'उरस्वान्' का अर्थ 'मनस्वी' समझना चाहिये। ['प्रज्ञाश्रद्धार्चाभ्यो णः।' (५। २। १०१)—इस पाणिनि-सूत्रके अनुसार] 'ण' प्रत्यय करनेपर 'प्रज्ञा' शब्दसे 'प्राज्ञः' (प्रज्ञावान्), 'श्रद्धा' शब्दसे 'श्राद्धः' (श्रद्धावान्) और 'अर्चा' शब्दसे 'आर्चः' (अर्चावान्) रूप बनते हैं। वाक्यमें प्रयोग—'प्राज्ञो व्याकरणे।' स्त्रीलिङ्गमें 'प्राज्ञा' (प्रज्ञावती) रूप होगा। 'ण' प्रत्यय होनेसे अणन्तत्वप्रयुक्त 'ङीप्' प्रत्यय यहाँ नहीं होगा। यद्यपि 'प्रकर्षेण जानातीति प्रज्ञः स एव प्रज्ञावान्।' प्रज्ञ एव प्राज्ञः। (स्वार्थे अण् प्रत्ययः)—इस प्रकार भी 'प्राज्ञः' की सिद्धि तो होती है, तथापि इससे स्त्रीलिङ्गमें 'प्राज्ञी' रूप बनेगा, 'प्राज्ञा' नहीं। 'वृत्ति' शब्दसे भी 'ण' प्रत्यय होता है—'वार्तः' (वृत्तिमान्)। 'वार्ता' विद्या इत्यादि। ऊँचे दाँत हैं इसके—इस अर्थमें 'दन्त' शब्दसे 'उरच्' प्रत्यय होनेपर 'दन्तुरः'—यह रूप होता है। 'दन्त उन्नत उरच्।' (५। २। १०६)—इस पाणिनि-सूत्रसे उक्त अर्थमें 'दन्तुरः' इस पदकी सिद्धि होती है। 'मधु' शब्दसे 'र' प्रत्यय होनेपर 'मधुरम्'३, 'सुषि' शब्दसे 'र' प्रत्यय होनेपर 'सुषिरम्', 'केश' शब्दसे 'व' प्रत्यय होनेपर 'केशवः'४


वाचक है। यद्यपि लोकमें 'वत्स' का अर्थ बछड़ा और 'अंस' का अर्थ कंधा समझा जाता है, तथापि तद्धित वृत्तिमें 'वत्स' और 'अंस' शब्द क्रमशः 'स्नेह' तथा 'बल' के अर्थमें ही लिये गये हैं (तत्त्वबोधिनी)। इन अर्थोंमें 'मतुप्' प्रत्ययका समुच्चय नहीं होता; क्योंकि 'मतुप्' प्रत्यय करनेपर उक्त अर्थोंकी प्रतीति न होकर अर्थान्तरकी ही प्रतीति होती है। यथा 'वत्सवती गौः।' 'अंसवान् दुर्बलः।' इत्यादि।

१. पाणिनिके अनुसार 'फेनादिलच् च' (५। २। ९९)—इस सूत्रसे 'इलच्' प्रत्यय होता है। यहाँ चकारसे 'लच्' प्रत्ययका भी विकल्पसे विधान सूचित होता है। 'प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम्।' (५। २। ९६)—इस सूत्रसे 'अन्यतरस्याम्' पदकी अनुवृत्ति होती है, जिससे यहाँ 'मतुप्' का भी समुच्चय होता है। इस प्रकार 'फेन' शब्दसे तीन रूप होते हैं—'फेनिलः', फेनलः' तथा 'फेनवान्' सागरः। २. 'लोमशः' 'पामनः' और 'पिच्छिलः' आदि पदोंके साधनके लिये पाणिनिने एक ही सूत्रका उल्लेख किया है—'लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः।' (५। २। १००) ३. 'ऊषसुषिमुष्कमधो रः' (पा० सू० ५। २। १०७)—इस सूत्रसे 'र' प्रत्यय होनेपर 'ऊष' आदि शब्दोंसे 'ऊषरः', 'सुषिरम्', 'मुष्करः', 'मधुरम्'—ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। ये क्रमशः ऊसर भूमि, छिद्र, अण्डकोशवान् तथा माधुर्ययुक्तके बोधक हैं। ४. 'केशाद्वोऽन्यतरस्याम्।' (५। २। १०९)—इस सूत्रसे 'केश' शब्दसे 'व' प्रत्यय होनेपर 'केशवः' रूप बनता है। 'अन्यतरस्याम्' की अनुवृत्ति प्रकरणतः प्राप्त होनेसे 'मतुप्' सिद्ध था; पुनः उक्त सूत्रमें जो उसका ग्रहण किया गया, इससे 'इन्' और 'ठन्' का भी समावेश होता है, अतः केशवान्, केशी और केशिकः—ये तीन रूप और बनते हैं। ये सभी प्रयोग मत्वर्थीयप्रत्ययान्त हैं, तथापि व्यवहारमें अन्तर है। 'केशवः' का अर्थ है—घुँघराले केशवाले भगवान् श्रीकृष्ण। अन्य किसीके लिये इस शब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता। 'केशी' और 'केशिक' उस दैत्यका वाचक है, जो अश्वरूपधारी था और उसकी गर्दनपर बड़े-बड़े बाल (अयाल) थे। 'केशवान्' पद सामान्यतः सभी केशधारियोंके लिये प्रयुक्त होता है।

  • अध्याय ३५६ * ७६५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

‘हिरण्य’ तथा ‘मणि’ शब्दोंसे ‘व’ प्रत्यय होनेपर ‘हिरण्यवमणि वः$^{१-२}$’—ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। ‘रजस्’ शब्दसे ‘वलच्’ प्रत्यय होनेपर ‘रजस्वलम्$^३$’ पदकी सिद्धि होती है। १-३।

‘धन’, ‘कर’ तथा ‘हस्त’—इन शब्दोंसे ‘इनि’ प्रत्यय होनेपर क्रमशः ‘धनी’, ‘करी’ और ‘हस्ती’—ये पद सिद्ध होते हैं। ‘धन’ शब्दसे ‘ठन्’ प्रत्यय होनेपर ‘धनिकं कुलम्’ या ‘धनिकः पुरुषः’—ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। ‘पयस्’ तथा ‘माया’ शब्दोंसे ‘विनि’ प्रत्यय होनेपर ‘पयस्वी’, ‘मायावी’—ये रूप बनते हैं। ‘ऊर्णा’ शब्दसे मत्वर्थीय ‘युस्’ प्रत्यय होनेपर ‘ऊर्णायुः’ पदकी सिद्धि बतायी गयी है।$^४$ ‘वाच्’ शब्दसे ‘ग्मिनि’ प्रत्यय होनेपर ‘वाग्मी’ तथा ‘आलच्’ प्रत्यय होनेपर ‘वाचालः’—ये रूप बनते हैं। उसीसे ‘आटच्’ प्रत्यय होनेपर ‘वाचाटः’ रूप बनता है। ‘फल’ तथा ‘बर्ह’ शब्दोंसे ‘इनच्’ प्रत्यय होनेपर क्रमशः ‘फलिनः’, ‘बर्हिणः’—ये रूप बनते हैं। ‘वृन्द’ शब्दसे ‘आरकन्’ प्रत्यय होनेपर ‘वृन्दारकः’—इस पदकी सिद्धि होती है$^५$॥ ४-५॥

‘शीतं न सहते’, ‘हिमं न सहते’—इस विग्रहमें ‘शीत’ तथा ‘हिम’ शब्दोंसे ‘आलुच्’ प्रत्यय करनेपर ‘शीतालुः’ तथा ‘हिमालुः’ रूप बनते हैं। ‘वात’ शब्दसे ‘उलच्’ प्रत्यय होनेपर ‘वातुलः’ रूप बनता है। ‘अपत्य’ अर्थमें ‘अण्’ प्रत्यय होता है। ‘वसिष्ठस्यापत्यं पुमान् वासिष्ठः।’, ‘कुरोरपत्यं पुमान् कौरवः।’ (वसिष्ठकी संतान ‘वासिष्ठ’ कहलाती है तथा कुरुकी संतति ‘कौरव’)—‘वहाँ उसका निवास है’—इस अर्थमें सप्तम्यन्त ‘समर्थ’ शब्दसे ‘अण्’ प्रत्यय होता है। यथा ‘मथुरायां वासोऽस्येति माथुरः।’ (मथुरामें निवास है इसका, इसलिये यह ‘माथुर’ है।) ‘सोऽस्य वासः।’—वह इसका वासस्थान है, इस अर्थमें भी प्रथमान्त ‘समर्थसे’ ‘अण्’ प्रत्यय होता है। ‘उसको जानता और उसे पढ़ता है’—इस अर्थमें द्वितीयान्त ‘समर्थ’ पदसे ‘अण्’ प्रत्यय होता है। ‘चान्द्रं व्याकरणमधीते तद् वेद वा इति चान्द्रः।’ (चान्द्र एव चान्द्रकः स्वार्थे कप्रत्ययः)। ‘क्रमादि’ शब्दोंसे ‘वुन्’ प्रत्यय होता है (‘वु’के स्थानमें ‘अक’ आदेश होता है।) ‘क्रमं वेत्ति इति क्रमकः’—जो क्रमपाठको जानता है, वह ‘क्रमक’ है। इसी तरह ‘पदकः’, ‘शिक्षकः’, ‘मीमांसकः’ इत्यादि पद बनते हैं। ‘कोशम् अधीते वेद वा।’—जो कोशको जानता या पढ़ता है, वह ‘कौशक’ है॥ ६-८॥


१-२. ‘हिरण्यवः’ का अर्थ ‘हिरण्यवान्’ (सुवर्ण-सम्पत्तिसे युक्त) तथा ‘मणिवः’ शब्द ‘मणिधारी’ (मनियारा) सर्प या नागके लिये प्रयुक्त होता है। ३. ‘रजः कृष्यासुतिपरिषदो वलच्’ (५। २। ११२)—इस सूत्रसे ‘वलच्’ प्रत्यय होनेपर क्रमशः ‘रजस्वल’, ‘कृषीवल’, ‘आसुतीवल’ तथा ‘परिषद्वल’ शब्द सिद्ध होते हैं। इनके अर्थ क्रमशः इस प्रकार हैं—धूलसे भरा, किसान, जुआरी तथा परिषत्—सभा या समूहसे युक्त। ४. ‘अत इनिठनौ’ (५। २। ११५)—इस सूत्रसे ‘इनि’ प्रत्यय होनेपर ‘धनी’ तथा ‘ठन्’ प्रत्यय होनेपर ‘धनिकः’ रूप बनते हैं। इसी प्रकार करी, करिकः, हस्ती, हस्तिकः—ये रूप बनते हैं। ‘धनी’ का अर्थ है—धनवान् तथा ‘करी’ और ‘हस्ती’ का अर्थ है—हाथी। ‘पयस्वी’ का अर्थ है—दूधवाला तथा ‘मायावी’ का अर्थ है—माया फैलानेवाला। ‘विनि’ प्रत्ययका विधायक सूत्र है—‘अस्मायामेधास्रजो विनिः।’ (५। २। १२१)। ‘ऊर्णाया युस्।’ (५। २। १२३)—इस सूत्रसे ‘युस्’ प्रत्ययका विधान हुआ। ‘ऊर्णायुः’ माने ऊनी। ५. ‘वाचोग्ग्मिनिः।’ (५। २। १२४)—इस सूत्रसे ‘ग्मिनि’ प्रत्यय होता है। ‘आलजाटचौ बहुभाषिणि।’ ‘कुत्सित इति वक्तव्यम्’—इन वार्तिकोंद्वारा ‘आलच्’ और ‘आटच्’ प्रत्यय होते हैं। अच्छी बातको बहुत बोलनेवाला ‘वाग्मी’ कहलाता है और कुत्सित बातको अधिक बोलनेवाला ‘वाचाल’ और ‘वाचाट’ कहलाता है। ‘फलबर्हाभ्यामिनच्।’ इस वार्तिकसे ‘इनच्’ और ‘शृङ्गवृन्दाभ्याम् आरकन्।’ इस वार्तिकसे ‘आरकन्’ प्रत्यय होनेपर ‘फलिनः’ (फलवान्), ‘बर्हिणः’ (मोर) तथा ‘वृन्दारकः’ (देवता)—ये प्रयोग सिद्ध होते हैं।

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'धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ्।' (पा०सू० ५। २।१)—इस सूत्रके अनुसार धान्योंकी उत्पत्तिके आधारभूत क्षेत्रके अर्थमें षष्ठ्यन्त समर्थ धान्य-वाचक शब्दसे 'खञ्' प्रत्यय होता है। (स्कन्दने कात्यायनको जिसका उपदेश किया, उस कौमार-व्याकरणमें भी यह नियम देखा जाता है।) इसके अनुसार प्रियंगोर्भवनं क्षेत्रं प्रयंगवीनम्—प्रियंगु (कँगनी) की उत्पत्तिके आधारभूत क्षेत्रका बोध करानेके लिये 'खञ्' प्रत्यय होनेपर ('ख' के स्थानपर 'ईन्' आदेश हो जानेपर) 'प्रैयंगवीनम्'—यह पद बनता है। इसका अर्थ है—'प्रियंगु (कँगनी) की उपज देनेवाला खेत'। इसी तरह मूंग, कोदो आदिकी उत्पत्तिके उपयुक्त खेतको 'मौद्गीन' तथा 'कौद्रवीण' कहते हैं। यहाँ 'मुद्ग' शब्दसे 'खञ्' होनेपर 'मौद्गीन' शब्द और 'कोद्रव' शब्दसे 'खञ्' होनेपर 'कौद्रवीण' शब्दकी सिद्धि होती है। 'विदेहस्यापत्यम्' (विदेहका पुत्र)—इस अर्थमें 'विदेह' शब्दसे 'अण्' प्रत्यय होनेपर 'वैदेहः' पदकी सिद्धि होती है। (इन सबमें आदि स्वरकी वृद्धि होती है।) अकारान्त शब्दसे 'अपत्य' अर्थमें 'अण्' का बाधक 'इ' प्रत्यय होता है। आदि स्वरकी वृद्धि तथा अन्तिम स्वरका लोप। 'दक्षस्यापत्यं—दाक्षिः, दशरथस्यापत्यं दाशरथिः।' इत्यादि पद बनते हैं। 'नडादिभ्यः फक्।' (४।१।९९)—इस सूत्रके नियमानुसार 'नड'-आदि शब्दोंसे 'फक्' प्रत्यय होता है। 'फ' के स्थानमें 'आयन' होता है। अतएव 'नडस्य गोत्रापत्यं नाडायनः, चरस्य गोत्रापत्यं चारायणः।' इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। ('कित्' होनेके कारण आदि वृद्धि हो जाती है।) इसी तरह 'अश्वस्य गोत्रापत्यम्, आश्वायनः' होता है। इसमें 'अश्वादिभ्यः फञ्।' (४। १। ११०)—इस सूत्रके अनुसार 'फञ्' प्रत्यय होता है। ('गोत्रे कुञ्जादिभ्यः फञ्।' ४। १।९८) यह भी फञ्-विधायक सूत्र है। ब्रध्न, शङ्ख, शकट आदि शब्द कुञ्जादिके अन्तर्गत हैं, अतएव 'शाङ्खायनः', 'शाकटायनः' आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं।) 'गर्गादिभ्यो यञ्' (४। १। १०५)—इस सूत्रके अनुसार गर्ग, वत्स आदि शब्दोंसे गोत्रापत्यार्थक 'यञ्' प्रत्यय होनेपर 'गार्ग्यः', 'वात्स्यः' इत्यादि रूप बनते हैं। 'स्त्रीभ्यो ढक्।' (४।१।१२०) के नियमानुसार स्त्रीप्रत्ययान्त शब्दोंसे 'अपत्य' अर्थमें 'ढक्' प्रत्यय होता है। फिर उसके स्थानमें 'एय' होता है। जैसे 'विनतायाः पुत्रः' (विनताका पुत्र) 'वैनतेय' कहलाता है। 'सुमित्रा' आदि शब्द बाह्वादिगणमें पठित हैं, अतः उनसे अपत्यार्थमें 'इञ्' प्रत्यय होता है। अतएव 'सौमित्रेयः' न होकर 'सौमित्रिः' रूप बनता है। 'चटका' शब्दसे 'चटकाया ऐरक्।' (४।१।१२८)—इस सूत्रके विधानानुसार 'ऐरक्' प्रत्यय होनेपर 'चटकाया अपत्यं पुमान्' (चटकाका नर पुत्र) 'चाटकैर' कहलाता है। 'गोधा' शब्दसे 'ढ्रक्' का विधान है। 'गोधाया ढ्रक्।' (४। १। १२९) अतः गोधाका अपत्य 'गोधेर' कहलाता है। 'आरगुदीचाम्।' (४।१।१३०) के नियमानुसार 'आरक्' प्रत्यय होनेपर 'गौधारः' रूप बनता है। ऐसा वैयाकरणोंने बताया है॥ ९–११॥

'क्षत्र' शब्दसे 'घ' प्रत्यय होनेपर 'घ' के स्थानमें 'इय' होनेके कारण 'क्षत्रिय' शब्द सिद्ध होता है। 'क्षत्राद् घः।' (४। १। १३८)—'जाति' बोधक 'घ' प्रत्यय होनेपर ही 'क्षत्रियः' रूप बनता है। अपत्यार्थमें तो 'इञ्' होकर 'क्षत्रस्यापत्यं पुमान् क्षात्रिः'—यही रूप बनेगा। 'कुलात् खः।' (४। १। १३९) के अनुसार 'कुल' शब्दसे 'ख' प्रत्यय और 'ख' के स्थानमें 'ईन' आदेश होनेपर 'कुलीनः'—इस पदकी सिद्धि होती है। 'कुर्वादिभ्यो ण्यः।' (४।१।

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* अध्याय ३५६ *७६७

१५१) के अनुसार अपत्यार्थमें ‘कुरु’ शब्दसे ‘ण्य’ प्रत्यय होनेपर आदिवृद्धिपूर्वक गुण-वान्तादेश होकर ‘कौरव्यः’ इत्यादि प्रयोग बनते हैं। ‘शरीरावयवाद् यत्।’ (५।१।६) के नियमानुसार शरीरावयववाचक शब्दोंसे ‘यत्’ प्रत्यय होनेपर ‘मूर्धन्य’ तथा ‘मुख्य’ आदि शब्द सिद्ध होते हैं। ‘सुगन्धिः’‘शोभनो गन्धो यस्य सः’—इस लौकिक विग्रहमें बहुव्रीहि समास करनेके पश्चात् ‘गन्धस्येदुत्पूतिसुसुरभिभ्यः।’ (५।४।१३५)—इस सूत्रके अनुसार अन्तमें ‘इ’ हो जानेसे ‘सुगन्धिः’—इस शब्दरूपकी सिद्धि होती है॥ १२॥

‘तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच्।’ (५।२।३६)—तारकादिगणसे ‘इतच्’ प्रत्यय होता है, इस नियमके अनुसार ‘तारकाः संजाता अस्य’ (तारे उग आये हैं, इसके) इस अर्थमें ‘तारका’ शब्दसे ‘इतच्’ प्रत्यय होनेपर ‘तारकितं नभः’ इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। ‘कुण्डमिव ऊधो यस्याः सा’ (कुण्डके समान है थन जिसका, वह)—इस लौकिक विग्रहमें बहुव्रीहि समास होनेपर ‘ऊधसोऽनङ्।’ (५।४।१३१)—इस सूत्रके अनुसार ऊधोऽन्त बहुव्रीहिसे स्त्रीलिङ्गमें ‘अनङ्’ होता है। इस प्रकार ‘अनङ्’ होनेपर ‘बहुव्रीहेरूथसो ङीष्।’ (४।१।२५)—इस सूत्रसे ‘ङीष्’ प्रत्यय होता है। तत्पश्चात् अन्यान्य प्रक्रियात्मक कार्य होनेके बाद ‘कुण्डोध्नी’ पदकी सिद्धि होती है। ‘पुष्यं धनुर्यस्य स पुष्पधन्वा’ (कामदेवः), ‘सुष्ठु धनुर्यस्य स सुधन्वा’ (श्रेष्ठ धनुष धारण करनेवाला योद्धा)—इन दोनों बहुव्रीहि-पदोंमें ‘धनुषश्च।’ (५।४।१३२)-इस सूत्रसे ‘अनङ्’ होता है। तत्पश्चात् सुबादि कार्य होनेपर ‘पुष्पधन्वा’ तथा ‘सुधन्वा’—ये दोनों पद सिद्ध होते हैं॥ १३॥

‘वित्तेन वित्तः इति वित्तचुञ्चुः।।’—जो धन-वैभवके द्वारा प्रसिद्ध हो, वह ‘वित्तचुञ्चुः’ है। शब्दशास्त्रमें जिसकी प्रसिद्धि है, वह ‘शब्दचुञ्चु’ कहलाता है। ये दोनों शब्द ‘चुञ्चुप्’ प्रत्यय होनेपर निष्पन्न होते हैं। इसी अर्थमें ‘चणप्’ प्रत्यय भी होता है। यथा—‘केशचणः’। जो अपने केशोंसे विदित है, वह ‘केशचणः’ कहा गया है। (इन प्रत्ययोंका विधान ‘तेन वित्तश्चुञ्चुप्चणपौ।’ (५।२।२६) —इस सूत्रके अनुसार होता है। ‘पटु’ शब्दसे ‘प्रशस्त’ अर्थमें ‘रूप’ प्रत्यय होनेपर ‘पटुरूपः’ पद बनता है। ‘प्रशस्तः पटुः-पटुरूपः।’ जो प्रशस्त पटु है, वह ‘पटुरूप’ कहा जाता है। यह ‘रूप’ प्रत्यय ‘सुबन्त’ और ‘तिङन्त’—दोनों प्रकारके शब्दोंसे होता है। ‘तिङन्त’ शब्दसे इस प्रकार होता है—प्रशस्तं पचति इति ‘पचतिरूपम्।’ ‘पचतिरूपम्’ का अर्थ है—अच्छी तरह पकाता है। अतिशयार्थ-द्योतनके लिये ‘तमप्’, ‘इष्ठन्’, ‘तरप्’ और ‘ईयसुन्’—ये प्रत्यय होते हैं। इनमेंसे ‘तरप्’ और ‘ईयसुन्’—ये दोनों दोमेंसे एककी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं और ‘तमप्’ तथा ‘इष्ठन्’—ये दोनों बहुतोंमेंसे एककी श्रेष्ठता बताते हैं। पाणिनिने इसके लिये दो सूत्रोंका उल्लेख किया है—‘अतिशायने तमबिष्ठनौ।’ (५।३।५५) तथा ‘द्विवचनविभज्योत्तरपदे तरबीयसुनौ।’ (५।३।५७)। इसके सिवा, यदि किसी द्रव्यका प्रकर्ष न बताना हो तो ‘तरप्’ ‘तमप्’ प्रत्ययोंसे परे ‘आम्’ हो जाता है। यह ‘आम्’ ‘किम्’ शब्द, ‘एदन्त’ शब्द, तिङन्त पद तथा अव्यय पदसे भी होते हैं। इन सब नियमोंके अनुसार ‘अयम् अनयोरतिशयेन पटुः।’ (यह इन दोनोंमें अधिक पटु है)—इस अर्थको बतानेके लिये ‘पटु’ शब्दसे ‘ईयसुन्’ प्रत्यय करनेपर विभक्तिकार्यपूर्वक ‘पटीयान्’ रूप होता है। ‘अक्ष’ शब्दसे ‘तरप्’ प्रत्यय होनेपर ‘अक्षतर’ और ‘पटु’ आदि शब्दोंसे उक्त प्रत्यय होनेपर ‘पटुतरः’ आदि रूप बनते हैं। तिङन्तसे ‘तरप्’ प्रत्यय करके अन्तमें

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‘आम्’ करनेपर ‘पचतितराम्’ रूप बनता है। ‘तमप्’ और ‘आम्’ प्रत्यय होनेपर ‘अटतितमाम्’ इत्यादि उदाहरण उपलब्ध होते हैं॥ १४-१५॥

किंचित् न्यूनता तथा असमासिका भाव प्रकट करनेके लिये ‘सुबन्त’ और ‘तिङन्त’ शब्दोंसे ‘कल्पप्’, ‘देश्य’ तथा ‘देशीयर्’ प्रत्यय होते हैं। ‘ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः’ (५। ३। ६७)—इस सूत्रके अनुसार ‘मृदु’ शब्दसे ‘कल्पप्’ प्रत्यय होनेपर ‘मृदुकल्पः’ प्रयोग बनता है। इसका अर्थ हुआ—‘कुछ कम मृदु या कोमल’। ‘ईषदूनः इन्द्रः—इन्द्रकल्पः। ईषदूनः अर्कः—अर्ककल्पः।’ इत्यादि उदाहरण इसी तरह जाननेयोग्य हैं। ‘ईषदूनः राजा’—इस अर्थमें ‘राजन्’ शब्दसे ‘देशीयर्’ प्रत्यय करनेपर ‘राजदेशीयः’ तथा ‘देश्य’ प्रत्यय करनेपर ‘राजदेश्यः’—ये रूप बनते हैं। इसी तरह ‘पटु’ शब्दसे ‘जातीय’ प्रत्यय करनेपर ‘पटुजातीयः’ पद बनता है। इसका अर्थ है—पटुप्रकार—पटुके प्रकारका। ‘थल्’ प्रत्यय प्रकारमात्रका बोधक है, किंतु ‘जातीयर्’ प्रत्यय ‘प्रकारवान्’ का बोध कराता है। [इसका विधायक पा० सू० है— ‘प्रकारवचने जातीयर्।’ ५। ३। ६९] ‘प्रमाणे द्वयसज्दध्नञ्मात्रचः।’ (५। २। ३७)—इस सूत्रके अनुसार ‘जल’ आदिका प्रमाण बतानेके लिये ‘सुबन्त’ शब्दोंसे ‘द्वयसच्’ ‘दध्नच्’ तथा ‘मात्रच्’ प्रत्यय होते हैं। इस नियमसे ‘मात्रच्’ प्रत्यय होनेपर ‘जानुमात्रम्’ पद बनता है। इसका अर्थ है—घुटनेतक (पानी है)। ‘ऊरु’ शब्दसे ‘द्वयसच्’ प्रत्यय करनेपर ‘ऊरुद्वयसम्’ तथा ‘दध्नच्’ प्रत्यय करनेपर ‘ऊरुदध्नम्’—ये प्रयोग बनते हैं॥ १६-१७॥

‘संख्याया अवयवे तयप्।’ (पा०सू० ५। २। ४२)—इस सूत्रके अनुसार ‘पञ्चावयवा यस्य तत्’ (पाँच अवयव हैं, जिसके वह) इस अर्थमें ‘पञ्चन्’ शब्दसे ‘तयप्’ प्रत्यय करनेपर ‘पञ्चतयम्’— यह रूप बनता है। ‘द्वारं रक्षति, द्वारे नियुक्तो वा दौवारिकः’—जो द्वारकी रक्षा करता है, अथवा द्वारपर रक्षाके लिये नियुक्त है, वह ‘दौवारिक’ है। ‘रक्षति।’ (पा० सू० ४। ४। ३३) अथवा ‘तत्र नियुक्तः।’ (पा०सू० ४। ४। ६९) सूत्रसे यहाँ ‘ठक्’ प्रत्यय हुआ है। ‘ठ’ के स्थानमें ‘इक’ आदेश हो जाता है तथा ‘द्वारादीनां च।’ (७। ३। ४)—इस सूत्रसे ‘ऐच्’ का आगम होता है। फिर विभक्तिकार्य होनेपर ‘दौवारिकः’ इस पदकी सिद्धि होती है। इस प्रकार ‘ठक्’ प्रत्यय होनेपर ‘दौवारिक’ शब्दकी सिद्धि बतायी गयी है। यहाँतक ‘तद्धितकी सामान्यवृत्ति’ कही गयी। अब ‘अव्ययसंज्ञक तद्धित’का निरूपण किया जाता है॥ १८॥

‘यस्मादिति यतः’, ‘तस्मादिति ततः’—यहाँ ‘पञ्चम्यास्तसिल्।’ (५। ३। ७) सूत्रके अनुसार ‘तसिल्’ प्रत्यय होता है। इकार और लकारकी इत्संज्ञा होकर उनका लोप हो जाता है। ‘तसिल्’ प्रत्यय विभक्तिसंज्ञक होनेके कारण ‘त्यदादीनामः।’ (७। २। १०२) के नियमानुसार अकारान्तादेश हो जाता है। अतः, ‘यत्’ की जगह ‘य’ और तत् की जगह ‘त’ होनेसे ‘यतः’, ‘ततः’—ये रूप बनते हैं। ‘तसिलादयः प्राक् पाशपः।’ (‘तसिल्’ आदिसे लेकर ‘पाशप्’ प्रत्ययके पूर्वतक जितने प्रत्यय विहित या अभिहित हुए हैं, उन सबकी ‘अव्ययसंज्ञा’ होती है)—इस परिगणनाके अनुसार ‘यतः’, ‘ततः’ आदि शब्द ‘अव्यय’ माने गये हैं। ‘तसिल्’ आदिमें ‘त्रल्’ प्रत्यय भी आता है। इसका विधायक पाणिनिसूत्र है—‘सप्तम्यास्त्रल्।’ (५। ३। १०)। ‘यस्मिन्निति यत्र’, ‘तस्मिन्निति तत्र’—इस लौकिक विग्रहमें ‘त्रल्’ प्रत्यय होनेपर ‘यस्मिन् त्र’, ‘तस्मिन् त्र।’ इस अवस्थामें ‘कृत्तद्धितसमासाश्च’ (१।२।४६) से प्रातिपदिक

  • अध्याय ३५६ * ७६९

संज्ञा, ‘सुपो धातुप्रातिपदिकयोः।’ (२। ४। ७१) सूत्रसे विभक्तिका लोप और ‘त्यदादीनामः।’ (७। २। १०२) सूत्रसे अकारान्तादेश होनेपर ‘यत्र, तत्र’—इन पदोंकी सिद्धि बतायी गयी है। ‘अस्मिन् काले’—इस लौकिक विग्रहमें ‘अधुना।’ (५। ३। १७) सूत्रसे ‘अधुना’ प्रत्यय होने ‘अस्मिन् अधुना’ इस अवस्थामें विभक्तिलोप, ‘इदम्’ के स्थानमें ‘इश्’ अनुबन्धलोप तथा ‘यस्येति च।’ (६। ४। १४८) से इकारलोप होनेपर ‘अधुना’ की सिद्धि हुई। इसी अर्थमें ‘दानीम्’ प्रत्यय होनेपर ‘इदम्’ के स्थानमें ‘इ’ होकर ‘इदानीम्’ रूप बनता है। ‘सर्वस्मिन् काले’—इस विग्रहमें ‘सर्वैकान्यकिंयत्तदः काले दा’ (५। ३। १५)—इस सूत्रसे ‘दा’ प्रत्यय होनेपर ‘सर्वदा’ रूप बनता है। ‘तस्मिन् काले—तर्हि’, ‘कस्मिन् काले—कर्हि’ यहाँ ‘तत्’ और ‘किम्’ शब्दोंसे ‘काल’ अर्थमें ‘अनद्यतने र्हिल्न्यतरस्याम्।’ (५। ३। २१)—इस सूत्रसे ‘र्हिल्’ प्रत्यय हुआ। फिर पूर्ववत् प्रातिपदिकावयव विभक्तिका लोप होकर ‘त्यदादीनामः।’ (७। २। १०२)—इस सूत्रसे ‘तत्’ के स्थानपर ‘त’ और ‘किमः कः।’ (७। २। १०३) सूत्रसे ‘किम्’ के स्थानमें ‘क’ होनेपर ‘तर्हि’ और ‘कर्हि’—इन पदोंकी सिद्धि कही गयी है। ‘अस्मिन्’—इस विग्रहमें ‘त्रल्’ प्रत्ययकी प्राप्ति हुई, किंतु उसे बाधित करके ‘इदमो हः।’ (५। ३। ११)—इस सूत्रसे ‘हः’ प्रत्यय हो गया। फिर ‘इदम्’ के स्थानमें इकार होनेपर ‘इह’ रूपकी सिद्धि हुई ॥ १९-२० ॥

‘येन प्रकारेण यथा, केन प्रकारेण कथम्’—इन स्थलोंपर ‘प्रकारवचने थाल्।’ (५। ३। २३) के अनुसार ‘थाल्’ प्रत्यय होनेपर ‘यथा’, ‘तथा’ आदि रूप होते हैं। ‘किम्’ शब्दसे ‘किम्श्च।’ (५। ३। २५) के अनुसार ‘थम्’ प्रत्यय होता है। अतः ‘कथम्’ इस रूपकी सिद्धि होती है। जो शब्द दिशाके अर्थमें रूढ़ होते हैं, ऐसे ‘दिशा’, ‘देश’ और ‘काल’ अर्थमें प्रयुक्त शब्दोंसे स्वार्थमें ‘अस्ताति’ प्रत्यय होता है। श्लोकमें ‘पूर्वस्याम्’ यह सप्तमी विभक्तिका, ‘पूर्वस्याः’ यह पञ्चमी विभक्तिका तथा ‘पूर्वा’ यह प्रथमा विभक्तिका प्रतिरूप है। अर्थात् उक्त शब्द यदि सप्तम्यन्त, पञ्चम्यन्त और प्रथमान्त हों, तभी उनसे ‘अस्ताति’ प्रत्यय होता है। ‘पूर्व’, ‘अधर’ और ‘अवर’ शब्दोंके स्थानमें क्रमशः ‘पुर’ ‘अध’ और ‘अव’ आदेश होते हैं। ‘अस्ताति’ के स्थानमें ‘असि’ प्रत्ययका भी विधान होता है। इन निर्दिष्ट नियमोंके अनुसार ‘पूर्वस्यां दिशि’, ‘पूर्वस्याः दिशः’ ‘पूर्वा वा दिक्’—इन लौकिक विग्रहोंमें ‘पुरः’, ‘पुरस्तात्’—ये रूप होते हैं। उसी प्रकार ‘अधः, अधस्तात्’—‘अवः, अवस्तात्’—इत्यादि रूप जानने चाहिये। इनके वाक्यप्रयोग ‘पुरस्तात् संचरेद्’, ‘पुरस्ताद् गच्छेत्’ इत्यादि रूपमें होते हैं। ‘समाने अहनि’—इस अर्थमें ‘सद्यः’—इस शब्दका प्रयोग होता है। ‘समान’का ‘स’ और ‘अहनि’ के स्थानमें ‘द्यस्’ निपातित होकर ‘सद्यः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘पूर्वस्मिन् वर्षे परुत्’—‘पूर्वतरेवर्षे परारि’ इति (पूर्व वर्षमें—इस अर्थको बतानेके लिये ‘परुत्’ शब्दका प्रयोग होता है तथा पूर्वसे पूर्व वर्षमें—इस अर्थका बोध करानेके लिये ‘परारि’ शब्दका प्रयोग होता है।) पहलेमें ‘पूर्व’ शब्दके स्थानमें ‘पर’ आदेश होता है और उससे ‘उत्’ प्रत्यय किया जाता है। दूसरेमें ‘आरि’ प्रत्यय होता है और ‘पूर्व’ के स्थानमें ‘पर’ आदेश। ‘अस्मिन् संवत्सरे’ (इस वर्षमें) इस अर्थका बोध करानेके लिये ‘ऐषमः’ पदका प्रयोग होता है। इसमें ‘इदम्’ शब्दके स्थानमें ‘इकार’ आदेश और उससे परे ‘समसण्’ प्रत्ययका निपातन होता है। अकार-णकारकी

७७० * अग्निपुराण *


इत्संज्ञा हो जानेपर 'इ+समः'—इस अवस्थामें आदिवृद्धि और सकारके स्थानमें मूर्धन्यादेश होनेपर 'ऐषमः' रूपकी सिद्धि होती है। 'परस्मिन्नहनि' (दूसरे दिन)—के अर्थमें 'पर' शब्दसे 'एद्यवि' प्रत्यय करनेपर 'परेद्यवि'—यह रूप होता है। 'अस्मिन्नहनि' (आजके दिन) इस अर्थमें 'इदम्' शब्दसे 'द्य' प्रत्यय होता है और 'इदम्' के स्थानमें 'अ' हो जाता है। इस प्रकार 'अद्य'—यह रूप बनता है। 'पूर्वस्मिन् दिने' (पहले दिन)—इस अर्थमें 'पूर्व' शब्दसे 'एद्युस्' प्रत्यय होता है तो 'पूर्वेद्युः' यह रूप बनता है। इसी प्रकार 'परस्मिन् दिने''परेद्युः', 'अन्यस्मिन् दिने''अन्येद्युः' इत्यादि प्रयोग जानने चाहिये। 'दक्षिणस्यां दिशि वसेत्' (दक्षिण दिशामें निवास करे।)—इस अर्थमें 'दक्षिणा' और 'दक्षिणाहि'—ये रूप बनते हैं। पहलेमें 'दक्षिणादाच्' (५। ३। ३६)—इस सूत्रसे 'आच्' प्रत्यय होता है और दूसरेमें 'आहि च दूरे।' (५। ३। ३७)—इस सूत्रसे 'आहि' प्रत्यय किया गया है। 'दक्षिणाहि वसेत्' का अर्थ हुआ—'दक्षिण दिशामें दूर निवास करे।' 'दक्षिणोत्तराभ्यामतसुच्।' (५। ३। २८) तथा 'उत्तराधरदक्षिणादातिः।' (५। ३। ३४)—इन सूत्रोंके अनुसार 'दक्षिणतः', 'दक्षिणात्', 'उत्तरतः', 'उत्तरात्'—ये दो रूप भी बनते हैं। 'उत्तरस्यां दिशि वसेत्' (उत्तर दिशामें निवास करे)—इस अर्थमें 'उत्तराच्च।' (५। ३। ३८)—इस सूत्रके अनुसार 'आच्' और 'आहि' प्रत्यय होनेपर 'उत्तरा' तथा 'उत्तराहि'—ये दोनों रूप सिद्ध होते हैं। 'अस्ताति' प्रत्ययके विषयभूत 'ऊर्ध्व' शब्दसे 'रिल्' और 'रिष्टातिल्' प्रत्यय होते हैं तथा 'ऊर्ध्व' के स्थानमें 'उप' आदेश हो जाता है। इस प्रकार 'उपरि वसेत्', 'उपरिष्टाद् भवेत्' इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'उत्तर' शब्दसे 'एनप्' प्रत्यय होनेपर 'उत्तरेण' होता है। पूर्वोक्त 'दक्षिणा' शब्दकी सिद्धि 'आच्' प्रत्यय होनेसे होती है—इसका निर्देश पहले किया जा चुका है। 'आहि' प्रत्यय होनेपर 'दक्षिणाहि' पद बनता है—यह भी कहा जा चुका है। 'दक्षिणाहि वसेत्' इसका अर्थ भी दिया जा चुका है। 'संख्याया विधायार्थेधा।' (५। ३। ४२)—इस सूत्रके अनुसार संख्यावाची शब्दोंसे 'धा' प्रत्यय करनेपर द्विधा, त्रिधा, चतुर्धा, पञ्चधा इत्यादि रूप होते हैं। 'द्विधा' का अर्थ है—दो प्रकारका। 'एक' शब्दसे प्रकार अर्थमें पूर्वोक्त नियमानुसार जो 'धा' प्रत्यय होता है, उसके स्थानमें 'ध्यमुञ्' हो जाता है। 'उञ्' की इत्संज्ञा हो जाती है। 'ध्यम्' शेष रह जाता है। यथा—ऐकध्यम्, 'एकधा' (द्रष्टव्य पा० सू० ५। ३। ४४)। 'ऐकध्यं कुरु त्वम्' इस वाक्यका अर्थ है—'तुम एक ही प्रकारसे कर्म करो।' इसी प्रकार 'द्वि' और 'त्रि' शब्दसे 'धा' के स्थानमें 'धमुञ्' होता है। विकल्पसे (द्रष्टव्य—पा० सू० ५। ३। ४५)। 'धमु' होनेपर 'द्वैधम्', 'त्रैधम्' रूप होते हैं और 'धमुञ्' न होनेपर 'द्विधा', 'त्रिधा''द्वि', 'त्रि' शब्दोंसे सम्बद्ध 'धा' के स्थानमें 'एधाच्' भी होता है। यथा—द्वेधा, त्रेधा। ये सभी प्रयोग सुष्ठुतर हैं॥ २१—२७॥

यहाँतक 'निपातसंज्ञक तद्धित' (अथवा अव्ययतद्धित) प्रत्यय बताये गये। अब 'भाववाचक तद्धितका' वर्णन किया जाता है।—'तस्य भावस्त्वतलौ।' (५। १। ११९)—इस सूत्रके अनुसार भावबोधक प्रत्यय दो हैं—'त्व' और 'तल्'। प्रकृतिजन्य बोधमें जो प्रकार होता है, उसे 'भाव' कहते हैं। 'पटु' शब्दसे 'पटोर्भावः'—इस अर्थमें 'त्व' प्रत्यय होनेपर 'पटुत्वम्' रूप होता है और 'तल्' प्रत्यय होनेपर 'पटुता'

  • अध्याय ३५७ * ७७१

'पृथौर्भावः' (पृथुका भाव)—इस अर्थमें 'पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा।' (५।१।१२२)—इस सूत्रसे वैकल्पिक 'इमनिच्' प्रत्यय होनेपर 'प्रथिमा'—यह रूप बनता है। 'प्रथिमा' का अर्थ है—मोटापन। 'सुखस्य भावः कर्म वा' (सुखका भाव या कर्म)—इस अर्थमें 'गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च।' (५।१।१२४)—इस सूत्रके अनुसार 'ष्यञ्' प्रत्यय होनेपर 'सौख्यम्'—इस पदकी सिद्धि कही गयी है। 'स्तेनस्य भावः कर्म वा' (स्तेन—चोरका भाव या कर्म)—इस अर्थमें 'स्तेन' शब्दसे 'यत्' प्रत्यय और 'न'—इस समुदायका लोप हो जाता है। (द्रष्टव्य—पा० सू० ५।१।१२५)। इस प्रकार 'स्तेय' शब्दकी सिद्धि होती है। इसी प्रकार 'सख्युर्भावः कर्म वा' (सखाका भाव या कर्म)—इस अर्थमें 'य' प्रत्यय होनेपर 'सख्यम्' इस पदकी सिद्धि कही गयी है। यहाँ 'सख्युर्यः।' (५।१।१२६)—इस सूत्रसे 'य' प्रत्यय होता है। 'कपेर्भावः कर्म वा'—इस अर्थमें 'कपिज्ञात्योर्ढक्।' (५।१।१२७)—इस सूत्रसे 'ढक्' प्रत्यय होनेपर 'कापेयम्' पदकी सिद्धि होती है। 'सेना एव सैन्यम्'—यहाँ 'चतुर्वर्णादीनां स्वार्थ उपसंख्यानम्'— इस वार्तिकके अनुसार स्वार्थमें 'ष्यञ्' प्रत्यय होता है। 'शास्त्रीयात् पथः अनपेतम्' (शास्त्रीय पथसे जो भ्रष्ट नहीं हुआ है, वह)—इस अर्थमें 'धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते।' (४।४।९२)—इस सूत्रके अनुसार 'पथिन्' शब्दसे 'यत्' प्रत्यय होनेपर 'पथ्यम्'—यह रूप होता है। 'अश्वस्य भावः कर्म वा आश्वम्'—यहाँ 'अश्व' शब्दसे 'अञ्' हुआ है। ('उष्ट्रस्य भावः कर्म वा औष्ट्रम्'—यहाँ भी 'अञ्' प्रत्यय हुआ है।) 'कुमारस्य भावः कर्म वा कौमारम्'—इसमें भी 'कुमार' शब्दसे 'अञ्' प्रत्यय हुआ। 'यूनोर्भावः कर्म वा यौवनम्'—यहाँ भी पूर्ववत् 'युवन्' शब्दसे 'अञ्' प्रत्यय हुआ है। इन सबमें 'अञ्' प्रत्यय विधायक सूत्र है—'प्राणभृज्जातिवयोवचनोद्गात्रादिभ्योऽञ्' (५।१।१२९)। 'आचार्य' शब्दसे 'कन्' प्रत्यय होनेपर 'आचार्यकम्'—यह रूप बनता है। इसी तरह अन्य भी बहुत-से तद्धित प्रत्यय होते हैं, (उन्हें अन्य ग्रन्थोंसे जानना चाहिये) ॥ २८–३० ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'तद्धितान्त शब्दोंके रूपका कथन' नामक
तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५६ ॥


तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय

उणादिसिद्ध शब्दरूपोंका दिग्दर्शन

कुमार स्कन्द कहते हैं—कात्यायन! अब 'उणादि' प्रत्यय बताये जाते हैं, जो धातुसे परे होते हैं। 'कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्।' (१)—इस सूत्रके अनुसार 'कृ' आदि धातुओंसे 'उण्' प्रत्यय होता है। 'करोतीति कारुः।' (जो शिल्पकर्म करता है, वह 'कारु' कहलाता है। लोकभाषामें उसे 'शिल्पी' या 'कारीगर' कहते हैं)। 'कृ' धातुसे 'उण्' प्रत्यय होनेपर अनुबन्धलोप, वृद्धि तथा विभक्तिकार्य किये जाते हैं। इससे 'कारुः'— इस पदकी सिद्धि होती है। 'जि' धातुसे 'उण्' होनेपर 'जायुः' रूप बनता है। 'जायुः' का अर्थ है—औषध। इसकी व्युत्पत्ति

७७२ * अग्निपुराण *


इस प्रकार समझनी चाहिये—'जयति रोगान् इति जायुः।' 'मि' धातुसे वही (उण्) प्रत्यय करनेपर 'मायुः'—यह पद सिद्ध होता है। 'मायुः' का अर्थ है—'पित्त'। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'मिनोति'—प्रक्षिपति देहे ऊष्माणम् इति मायुः।' इसी प्रकार 'स्वदते—रोचते इति स्वादुः।', 'साध्नोति परकार्यमिति साधुः।' इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। गोमायुः, आयुः—इत्यादि प्रयोग भी इसी तरह सिद्ध होते हैं। 'गोमायु' का अर्थ है—गीदड़ तथा 'आयुः' शब्द आयुर्वेदके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'उणादयो बहुलम्।'—(३।३।१) इस सूत्रके अनुसार 'उण्' आदि बाहुल्येन होते हैं। कहीं होते हैं, कहीं नहीं होते। 'आयुः', 'स्वादुः' तथा 'हेतु' आदि शब्द भी उणादिसिद्ध हैं। 'किंशारु' नाम है—धान्यके शूकका। 'किं शृणातीति किंशारुः'। यहाँ 'किं' पूर्वक 'शृ' धातुसे 'जुण्' होता है। 'ज्' तथा 'ण्' अनुबन्ध हैं। किंश्शृ+उ। वृद्धि होकर 'किंशारुः' बनता है। 'कृकवाकुः' का अर्थ है—मुर्गा या मोर। 'कृकेन गलेन वक्तीति कृकवाकुः।' 'कृके वचः कश्च'—इस उणादिसूत्रसे 'जुण्' प्रत्यय होनेपर कृक+वच्+जुण्—इस अवस्थामें अनुबन्धलोप, चकारको ककार और 'अत उपधायाः।' (पा० सू० ७।२।११६) से वृद्धि होती है। 'भरति बिभर्ति वा भरुः।' 'भृ' धातु से 'उ' प्रत्यय, गुण; विभक्तिकार्य-भरुः। इसका अर्थ है—भर्त्ता (स्वामी)। मरुः—जलहीन देश। मृ+उ गुणादेश, विभक्तिकार्य=मरुः। शी+उ=शयुः। इसका अर्थ है—सोया पड़ा रहनेवाला अजगर। त्सर+उ=त्सरुः-अर्थात् खड्गकी मूठ। 'स्वर्यन्ते प्राणा अनेन' इस लौकिक विग्रहमें 'उ' प्रत्यय होता है। फिर गुण होकर 'स्वरुः' पद बनता है। 'स्वरु' का अर्थ है—वज्र। त्रप्+उ=त्रपु। 'त्रपु' नाम है शीशेका। फल्ग्+उ=फल्गुः—सारहीन। अभिकाङ्क्षार्थक 'गृध्' धातुसे 'सुसुधागृधिभ्यः क्रन्', (१९२)—इस सूत्रके अनुसार 'क्रन्' प्रत्यय होनेपर गृध्+क्रन्, ककार-नकारकी इत्संज्ञा गृध्रः<sup></sup> अर्थात् गीध पक्षी। मदि+किरच्=मन्दिरम्। तिमि+किरच्=तिमिरम्। 'मन्दिर' का अर्थ गृह तथा 'तिमिर' का अर्थ अन्धकार है। 'सलिकल्य-निमहिभडिभण्डिशण्डिपिण्डितुण्डिकुकिभूभ्य इलच्।' (५७)—इस उणादि सूत्रके अनुसार गत्यर्थक 'षल्' धातुसे 'इलच्' प्रत्यय करनेपर 'सलिलम्' यह रूप बनता है। 'सलति गच्छति निम्नमिति सलिलम्'—यह इसकी व्युत्पत्ति है। 'सलिल' शब्द वारि-जलका वाचक है। (इसी प्रकार उक्त सूत्रसे ही कलिलम्, अनिलः, महिला—पृषोदरादित्वात् महेला—इत्यादि शब्द निष्पन्न होते हैं।) भण्डि+इलच्=भण्डिलम्। इसका अर्थ है—कल्याण। 'भण्डिल' शब्द दूतके अर्थमें भी आता है। ज्ञानार्थक 'विद्' धातुसे औणादिक 'क्रसु' प्रत्यय होनेपर विद्+क्रसु—इस अवस्थामें 'लशक्वतद्धिते।' (१।३।८) से ककारकी इत्संज्ञा तथा 'उपदेशेऽजनुनासिक इत्।' (१।३।२) से उकारकी इत्संज्ञा होती है; तत्पश्चात् विभक्ति-कार्य करनेपर 'विद्वान्'—यह रूप बनता है। 'विद्वान्' का अर्थ है—बुध या पण्डित। 'शेरतेऽस्मिन् राजबलानि इति शिविरम्।'—इस व्युत्पत्तिका अनुसार 'शीङ्' धातुसे 'किरच्' प्रत्यय, 'शीङ्' से 'वुक्' का


१. गृध+उ='गृधुः' रूप होता है। 'गृधुः' का अर्थ है—कामदेव।
२. 'विद्' धातुसे 'शतृ' प्रत्यय करनेपर 'विदेः शतुर्वसुः।' (७।१।३६)—इस सूत्रके अनुसार 'विद्' धातुसे परे विद्यमान 'शतृ' के स्थानमें 'वसु' आदेश हो जाता है। यह आदेश वैकल्पिक होता है। अतः 'विदन् और 'विद्वान्'—ये दोनों रूप विशुद्ध कृदन्त हैं। औणादिक 'विद्वान्' का अर्थ बुध है और कृदन्त 'विद्वान्' का अर्थ जानता हुआ है।

  • अध्याय ३५७ * | ७७३ ---|---

आगम तथा 'शी' के दीर्घ ईकारके स्थानमें ह्रस्व आदेश होनेपर 'शिविर' शब्दकी सिद्धि होती है। 'शिविर' कहते हैं—सेनाकी छावनीको। अग्निपुराणके अनुसार गुप्त निवासस्थानको 'शिविर' कहते हैं॥ १–५॥

'अव्' धातुसे 'सितनिगमिमसि।' (७२) इत्यादि सूत्रके अनुसार 'तुट्' प्रत्यय होनेपर वकारके स्थानमें 'ऊठ्' होकर गुण होनेसे 'ओतु' शब्दकी सिद्धि होती है। 'ओतु' कहते हैं—बिलावको। अभिधानमात्रसे उणादि प्रत्यय होते हैं। 'कृ' धातुसे 'न' प्रत्यय करनेपर गुण होता है और नकारका णकारादेश हो जानेपर 'कर्ण' शब्दकी सिद्धि होती है। 'कर्ण'का अर्थ है—कान अथवा कन्यावस्थामें कुन्तीसे उत्पन्न सूर्यपुत्र कर्ण। 'वस्' धातुसे 'तुन्' प्रत्यय, अगार अर्थमें उसका 'णित्व' होकर वृद्धि होनेसे 'वास्तु' शब्द बनता है। 'वास्तु' का अर्थ है—गृहभूमि। 'जीव' शब्दसे 'आतुकन्' प्रत्यय और वृद्धि होकर 'जैवातृक' शब्दकी सिद्धि होती है। 'जैवातृक' का अर्थ है—चन्द्रमा। 'अनः शकटं वहति।'—इस लौकिक विग्रहमें 'वह' धातुसे 'क्विप्' प्रत्यय, 'अनस्'के सकारका डकार आदेश तथा 'वह' के वकारका सम्प्रसारण होनेपर 'अनडुह्' शब्द बनता है, उसके सुबन्तमें अनड्वान्, अनड्वाहौ इत्यादि रूप होते हैं। 'जीव्' धातुसे 'जीवेरातुः।' (८२)—इस सूत्रके अनुसार 'आतु' प्रत्यय करनेपर 'जीवातु' शब्दकी सिद्धि होती है। 'जीवातु' नाम है—संजीवन औषधका। प्रापणार्थक 'वह्' धातुसे 'वहिश्रिश्रुयुद्रुग्लाहात्वरिभ्यो नित्।' (५०१)—इस सूत्रके अनुसार 'नित्' प्रत्यय करनेपर विभक्तिकार्यके पश्चात् 'वह्निः'—इस रूपकी सिद्धि होती है। (इसी प्रकार श्रेणिः, श्रोणिः, योनिः, द्रोणिः, ग्लानिः, हानिः, तूर्णिः बाहुलकात् म्लानिः—इत्यादि पदोंकी सिद्धि होती है।) 'हृ' धातुसे 'इनच्' प्रत्यय होनेपर और अनुबन्धभूत चकारका लोप कर देनेपर 'ह्+इन', गुण तथा विभक्ति-कार्य=हरिणः—इस रूपकी सिद्धि होती है। 'श्यास्त्याह्वञ्विभ्य इनच्।' (२१३)—इस औणादिक सूत्रसे यहाँ 'इनच्' प्रत्यय हुआ है। 'हरिण' कहते हैं—मृगको। यह शब्द कामी तथा पात्रविशेषके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'अण्डन् कृसृभृवृञः।' (१३४)—इस सूत्रके अनुसार 'कृ' आदि धातुओंसे 'अण्डन्' प्रत्यय करनेपर क्रमशः—करण्डः, सरण्डः, भरण्डः, वरण्डः—ये रूप सिद्ध होते हैं। 'करण्ड' शब्द भाजन और भाण्डका वाचक है। मेदिनीकोशके अनुसार यह शहदके छत्तेके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'सरण्ड' शब्द चौपायेका वाचक है। कुछ विद्वान् 'सरण्ड' का अर्थ पक्षी मानते हैं। 'बाहुलकात् तृ प्लवनतरणयोः।' इस धातुसे भी 'अण्डन्' प्रत्यय होकर 'तरण्ड' पदकी सिद्धि होती है। 'तरण्ड' शब्द काठके बेड़ेके लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग मछली फँसानेके लिये बनायी गयी बंसीके डोरेको भी 'तरण्ड' कहते हैं। 'वरण्ड' शब्द सामवेदके लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग 'साम' और 'यजुष्'—दो वेदोंके लिये इसका प्रयोग मानते हैं। कुछ लोगोंके मतमें 'वरण्ड' शब्द मुखसम्बन्धी रोगका वाचक है। 'स्फायितञ्चिवञ्चि० (१७८)।' इत्यादि सूत्रसे वृद्ध्यर्थक 'स्फायि' धातुसे 'रक्' प्रत्यय होनेपर 'स्फार' पदकी सिद्धि होती है। 'स्फार' शब्दका अर्थ होता है—प्रभूत अर्थात् अधिक। 'मेदिनीकोश'के अनुसार 'स्फार' शब्द विकट अर्थमें आता है और करका या करवा आदि पात्रके भरते समय पानीमें जो बुलबुले उठते हैं, उनका वाचक भी 'स्फार' शब्द है। 'शुसिचिमीनां दीर्घश्च (१९३)।' इस सूत्रसे 'क्रन्' प्रत्यय और पूर्व ह्रस्वस्वरके स्थानमें दीर्घ कर देनेपर क्रमशः शूरः, सीरं, चीरं, मीरः—

७७४* अग्निपुराण *

ये प्रयोग बनते हैं। ‘चीर’ शब्द गायके थन, वस्त्रविशेष तथा वल्कलके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘भी’ धातुसे ‘भियः क्रुकन्’—(१९९) इस सूत्रसे ‘क्रुकन्’ प्रत्यय करनेपर ‘भीरुकः’—इस पदकी सिद्धि होती है। इसके पर्यायवाची शब्द हैं—‘भीरु’ और ‘कातर’। ‘उच समवाये’—इस धातुसे ‘रन्’ प्रत्यय करनेपर ‘उग्रः’ पदकी सिद्धि होती है। ‘उग्रः’ का अर्थ है—प्रचण्ड। ‘वहियूभ्यां षित्।’—इस सूत्रके अनुसार ‘षित् असच्’ प्रत्यय करनेपर ‘वाहसः’, ‘यावसः’—ये दो रूप सिद्ध होते हैं। ‘वाहसः’ का अर्थ है—अजगर और ‘यावसः’ का अर्थ है—तृणसमूह। ‘वर्तमाने पृषद्वृहन्महज्जगच्छत्रिवच्च।’—इस सूत्रके अनुसार ‘गम्’ धातुसे ‘अत्’ प्रत्ययका निपातन हुआ। ‘गम्’ के स्थानमें ‘जग’ आदेश हुआ। इस प्रकार ‘जगत्’ शब्दकी सिद्धि हुई। ‘जगत्’ का अर्थ है—भूलोक। ‘ऋतन्यञ्जिवन्यञ्ज्यर्षि०’ इत्यादि (४५०) सूत्रके अनुसार ‘कृश’ धातुसे ‘आनुक्’ प्रत्यय करनेपर ‘कृशानुः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘कृशानुः’ का अर्थ है—अग्नि। द्योतते इति ज्योतिः। ‘द्युतेरिसिन्नादेशश्च जः।’ (२७५)—इस सूत्रके अनुसार ‘द्युत्’, धातुसे ‘इसिन्’ प्रत्यय, द्यकारका जकारादेश तथा गुण होनेपर ‘ज्योतिः’ इस पदकी सिद्धि होती है। ‘ज्योतिः’ का अर्थ है—अग्नि और सूर्य। ‘अर्च’ धातुसे ‘कृदाधाराचिकलिभ्यः।’ (३२७)—इस सूत्रके अनुसार ‘क’ प्रत्यय होनेपर ‘अर्कः’ पदकी सिद्धि होती है। ‘अर्क एवं अर्ककः’। स्वार्थे कः। ‘अर्कः’ पद सूर्यका वाचक है। ‘कृगृशृवृञ्जतिभ्यः ष्वरच्।’ (२८६)—इस सूत्रके अनुसार वरणार्थक ‘वृ’ धातुसे तथा याचनार्थक ‘चते’ धातुसे ‘ष्वरच्’ प्रत्यय करनेपर क्रमशः ‘वर्वरः’, ‘चत्वरम्’—इन दो पदोंकी सिद्धि होती है। ‘वर्वर’ का अर्थ है—प्राकृत जन अथवा कुटिल मनुष्य। ‘हसिमृग्रिण्वार्डमिदमिपूपूधूर्विभ्यस्तन्।’ (३७३) —इस सूत्रके अनुसार हिंसार्थक ‘धूर्वि’ धातुसे ‘तन्’ प्रत्यय करनेपर ‘धूर्त्तः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘धूर्त्त’ शब्दका अर्थ है—शठ। ‘चत्वरम्’का अर्थ है—चौराहा। ‘लित्वरचत्वरधीवर’ इत्यादि औणादिक सूत्रसे ‘चीवरम्’ इस पदका निपातन हुआ है। ‘चीवरम्’ का अर्थ है—चिथड़ा अथवा भिक्षुकका वस्त्र। स्नेहार्थक ‘ञिमिदा’ अथवा ‘मिद्’ धातुसे ‘अमिचिमिदिशसिभ्यः क्त्रः।’ (६१३)—इस सूत्रके अनुसार ‘क्त्र’ प्रत्यय हुआ। ककारका इत्यसंज्ञालोप हुआ—‘मिद्+त्र=मित्र। विभक्ति-कार्य करनेपर ‘मित्रः’—इस पदकी सिद्धि हुई। ‘मित्र’ का अर्थ है—सूर्य। नपुंसकलिङ्गमें इसका अर्थ—सुहृद् होता है। ‘कुवोह्रस्वश्च।’ इस सूत्रके अनुसार ‘पुनातीति’ इस लौकिक विग्रहमें ‘पू’ धातुसे ‘क्त्र’ प्रत्यय और दीर्घके स्थानमें ह्रस्व होनेपर ‘पुत्र’ शब्दकी सिद्धि होती है। ‘पुत्र’ का अर्थ है—बेटा। ‘सुवः कित्।’ (३२८)—इस सूत्रके अनुसार प्राणिप्रसवार्थक ‘षूङ्’ धातुसे ‘नु’ प्रत्यय होता है और वह ‘कित्’ माना जाता है। धातुके आदि षकारको सकारादेश हो जाता है। इस प्रकार ‘सूनु’ शब्दकी सिद्धि होती है। विभक्तिकार्य होनेपर ‘सूनुः’ पद बनता है। ‘विश्वकोश’के अनुसार इसका अर्थ पुत्र और सूर्य है। ‘नप्तृनेष्टृत्वष्टृहोतृ०’ (२६०) इत्यादि सूत्रके अनुसार ‘पितृ’ शब्द निपातित होता है। ‘पातीति पिता’। ‘पा’ धातुसे ‘तृच्’ होकर आकारके स्थानमें इकार हो जाता है। पिता, पितरौ, पितरः इत्यादि इसके रूप हैं। जन्मदाता या बापको ‘पिता’ कहते हैं। विस्तारार्थक ‘तन्’ धातुसे ‘वृतनिभ्यां दीर्घश्च।’—इस सूत्रके अनुसार ‘तन्’ प्रत्यय तथा ह्रस्वके स्थानमें दीर्घ होनेपर ‘तात’ शब्दकी सिद्धि होती है। यहाँ अनुनासिक लोप हुआ है। ‘तात’

  • अध्याय ३५८ * ७७५

शब्द कृपापात्र तथा पिताके लिये प्रयुक्त होता है। कुत्सितशब्दार्थक 'पर्द' धातुसे 'काकु' प्रत्यय होता है और वह 'नित्' माना जाता है। धातुके रेफका सम्प्रसारण और अकारका लोप हो जाता है। जैसा कि सूत्र है—‘पर्द्देर्नित् सम्प्रसारणमह्लोपश्च।’ (३६७) 'काकु' प्रत्ययके आदि ककारका 'लशक्वतद्धिते।' (१।३।८)—इस सूत्रसे लोप हो जाता है। इस प्रक्रियासे 'पृदाकु' शब्दकी सिद्धि होती है। पर्दते—कुत्सितं 'शब्दं करोति इति पृदाकुः।' इसका अर्थ है—सर्प, बिच्छू या व्याघ्र। 'हसिमृगृण्वाऽम्दि-मिलूपूथूर्विभ्यस्तन्।' (३७३) इस सूत्रके द्वारा 'गृ' धातुसे 'तन्' प्रत्यय और गुणादेश करनेपर 'गर्त' शब्दकी सिद्धि होती है। यह 'अवट' अर्थात् गड्ढेका वाचक है। 'भृमृशितॄ०' इत्यादि (७) सूत्रके अनुसार 'भृ' धातुसे 'अतच्' प्रत्यय तथा गुणादेश करनेपर 'भरत' शब्द निष्पन्न होता है। जो भरण-पोषण करे, वह 'भरत' है। 'नमतीति नटः'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'जनिदाच्युसृवृमदि०' इत्यादि (५५४) सूत्रके द्वारा 'नम' धातुसे 'डट्' प्रत्यय करनेपर 'टि' लोप होनेके पश्चात् 'नट' शब्द बनता है। इसका अर्थ है—वेषधारी अभिनेता। ये थोड़े-से उणादि प्रत्यय यहाँ प्रदर्शित किये गये। इनके अतिरिक्त भी बहुत-से उणादि प्रत्यय होते हैं॥ ६–१२॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'उणादिसिद्ध रूपोंका वर्णन' नामक तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५७॥


तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय

तिङ्‌विभक्त्यन्त सिद्धरूपोंका वर्णन

कुमार कार्तिकेय कहते हैं—कात्यायन ! अब मैं 'तिङ्-विभक्ति' तथा 'आदेश'का संक्षेपसे वर्णन करूँगा। तिङ्-प्रत्यय भाव, कर्म और कर्ता—तीनोंमें होते हैं। सकर्मक तथा अकर्मक धातुसे कर्तामें आत्मनेपद तथा परस्मैपद—दोनों पदोंके 'तिङ्प्रत्यय' होते हैं। (सकर्मकसे कर्ता और कर्ममें तथा अकर्मकसे भाव और कर्तामें वे 'तिङ्' प्रत्यय हुआ करते हैं—यह विवेक कर्तव्य है) 'तिङादेश' सकर्मक धातुसे कर्म तथा कर्तामें बताये गये हैं। वर्तमानकालकी क्रियाके बोधके लिये धातुसे 'लट्' लकारका विधान कहा गया है। विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट (सत्कारपूर्वक व्यापार), सम्प्रश्न तथा प्रार्थना आदि अर्थका प्रतिपादन अभीष्ट हो तो धातुसे 'लिङ्' लकार होता है। 'विधि' आदि अर्थोंमें तथा आशीर्वादमें भी 'लोट्' लकारका प्रयोग होता है। अनद्यतन भूतकालका बोध करानेके लिये 'लङ्' लकार प्रयुक्त होता है। सामान्य भूतकालमें 'लुङ्', परोक्ष-भूतमें 'लिट्' अनद्यतन भविष्यमें 'लुट्' आशीर्वादमें 'लिङ्' शेष अर्थमें अर्थात् सामान्य भविष्यत् अर्थके बोधके लिये धातुसे 'लृट्' लकार होता है—क्रियार्था क्रिया हो तो भी, न हो तो भी। हेतुहेतुमद्भाव आदि 'लिङ्' का निमित्त होता है; उसके होनेपर भविष्यत् अर्थका बोध करानेके लिये धातुसे 'लृङ्' लकार होता है—क्रियाकी अतिपत्ति (असिद्धि) गम्यमान हो, तब। 'तङ्' प्रत्यय तथा 'शानच्', 'कानच्'—इनकी आत्मनेपद संज्ञा होती है। 'तिङ्' विभक्तियाँ अठारह हैं। इनमें पूर्वकी नौ विभक्तियाँ 'परस्मैपद' कही जाती हैं। वे प्रथमपुरुष आदिके भेदसे तीन भागोंमें बँटी हैं। 'तिप् तस् अन्ति'—ये तीन प्रथमपुरुष हैं।

७७६ * अग्निपुराण *


'सिप्, थस्, थ'—ये तीन मध्यमपुरुष हैं। तथा 'मिप्, वस्, मस्'—ये उत्तमपुरुष कहे गये हैं॥ १–५$\frac{१}{२}$॥

'त, आताम्, झ'—ये आत्मनेपदके प्रथमपुरुषसम्बन्धी प्रत्यय हैं। 'थास्, आथाम्, ध्वम्'—ये मध्यमपुरुष हैं। 'इ, वहि, महिङ्'—ये उत्तमपुरुष हैं। आत्मनेपदके नौ प्रत्यय 'तङ्' कहलाते हैं और दोनों पदोंके प्रत्यय 'तिङ्' शब्दसे समझे जाते हैं। क्रियावाची 'भू', वा आदि धातु कहे गये हैं। भू, एध्, पच्, नन्द्, ध्वंस्, स्रंस्, पद्, अद्, शीङ्, क्रीड्, हु, हा, धा, दिव्, स्वप्, नह्, षूञ्, तुद्, मृश्, मुच्, रुध्, भुज्, त्यज्, तन्, मन् और कृ—ये सब धातु शप् आदि विकरण होनेपर क्रियार्थबोधक होते हैं। 'क्रीड्, वृङ्, ग्रह्, चुर्, पा, नी तथा अचि'—ये तथा उपर्युक्त धातु 'नायक' (प्रधान) हैं। इन्हींके समान अन्य धातुओंके भी रूप होते हैं। 'भू' धातुसे क्रमशः 'तिङ्' प्रत्यय होनेपर 'भवति, भवतः, भवन्ति'—इत्यादि रूप होते हैं। इनका वाक्यमें प्रयोग इस प्रकार समझना चाहिये—'स भवति। तौ भवतः। ते भवन्ति। त्वं भवसि। युवां भवथः। यूयं भवथ। अहं भवामि। आवां भवावः। वयं भवामः।' ये 'भू' धातुके 'लट्' लकारमें परस्मैपदी रूप हैं। 'भू' धातुका अर्थ है—'होना'। 'एध्' धातु 'वृद्धि' अर्थमें प्रयुक्त होता है। यह आत्मनेपदी धातु है। इसका 'लट्' लकारमें प्रथमपुरुषके एकवचनमें 'एधते' रूप बनता है। वाक्यमें प्रयोग—'एधते कुलम्।' (कुलकी वृद्धि होती है)—इस प्रकार होता है। 'लट्' लकारमें 'एध्' धातुके शेष रूप इस प्रकार होते हैं—'द्वे एधेते'। (दो बढ़ते हैं)। यह द्विवचनका रूप है। बहुवचनमें 'एधन्ते' रूप होता है। इस प्रकार प्रथमपुरुषके एकवचन, द्विवचन और बहुवचनान्त रूप बताये गये। अब मध्यम और उत्तम पुरुषोंके रूप प्रस्तुत किये जाते हैं—'एधसे' यह मध्यमपुरुषका एकवचनान्त रूप है। वाक्यमें इसका प्रयोग इस प्रकार हो सकता है—'त्वं हि मेधया एधसे।' (निश्चय ही तुम बुद्धिसे बढ़ते हो।) 'एधेये, एधध्वे' ये दोनों मध्यमपुरुषके क्रमशः द्विवचनान्त और बहुवचनान्त रूप हैं। 'एधे, एधावहे, एधामहे'—ये उत्तमपुरुषमें क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचनान्त रूप हैं। वाक्यमें प्रयोग—'अहं धिया एधे।' (मैं बुद्धिसे बढ़ता हूँ।) 'आवां मेधया एधावहे।' (हम दोनों मेधासे बढ़ते हैं।) 'वयं हरेर्भक्त्या एधामहे।' (हम श्रीहरिकी भक्तिसे बढ़ते हैं।) 'पाक' अर्थमें 'पच्' धातुका प्रयोग होता है। उसके 'पचति' इत्यादि रूप पूर्ववत् ('भू' धातुके समान) होते हैं। 'भू' धातुसे भावमें और 'अनु+भू' धातुसे कर्ममें 'यक्' प्रत्यय होनेपर क्रमशः 'भूयते' और 'अनुभूयते' रूप होते हैं। भावमें प्रत्यय होनेपर क्रिया केवल एकवचनान्त ही होती है और सभी पुरुषोंमें कर्ता तृतीयान्त होनेके कारण एक ही क्रिया सबके लिये प्रयुक्त होती है। यथा—'त्वया मया अन्यैश्च भूयते।' जहाँ कर्ममें प्रत्यय होता है, वहाँ कर्म उक्त होनेके कारण उसमें प्रथमा विभक्ति होती है और तदनुसार सभी पुरुषों तथा सभी वचनोंमें क्रियाके रूप प्रयोगमें लाये जाते हैं। यथा—'असौ अनुभूयते। तौ अनुभूयेते। ते अनुभूयन्ते। त्वम् अनुभूयसे। युवाम् अनुभूयेथे। यूयम् अनुभूयध्वे। अहम् अनुभूये। आवाम् अनुभूयावहे। वयम् अनुभूयामहे'॥ ६–१३॥

अर्थविशेषको लेकर धातुसे 'णिच्', 'सन्', 'यङ्' तथा 'यङ्लुक्' होते हैं। इन्हें क्रमसे 'ण्यन्त', 'सन्नन्त', 'यङन्त' और 'यङ्लुगन्त' कहते हैं। जहाँ किसी क्रियाके कर्ताका कोई प्रेरक या प्रयोजक कर्ता होता है, वहाँ प्रयोजक

* अध्याय ३५८ * ७७७

कर्ताकी 'हेतु' संज्ञा होती है और प्रयोज्य कर्ता 'कर्म' बन जाता है। प्रयोजकके व्यापार प्रेषण आदि वाच्य हों तो धातुसे 'णिच्' प्रत्यय होता है। उसके होनेपर 'भू' धातुके 'लट्' लकारमें 'भावयति' इत्यादि रूप होते हैं। उदाहरणके लिये—'ईश्वरो भवति, तं यज्ञदत्तो ध्यानादिना प्रेरयति इत्यस्मिन्नर्थे यज्ञदत्त ईश्वरं भावयति इति प्रयोगो भवति' (ईश्वर होता है और यज्ञदत्त उसको ध्यानादिके द्वारा प्रेरित करता है—इस अर्थको व्यक्त करनेके लिये 'यज्ञदत्त ईश्वरं भावयति' यह प्रयोग बनता है)।$^१$ जहाँ कोई धातु इच्छाक्रियाका कर्म बनता है तथा इच्छाक्रियाका कर्ता ही उस धातुका भी कर्ता होता है, वहाँ उस धातुसे इच्छाकी अभिव्यक्तिके लिये 'सन्' प्रत्यय होता है। 'भू' धातुके सन्नन्तमें 'बुभूषति' इत्यादि रूप होते हैं। यथा—'भवितुम् इच्छति बुभूषति।' (होना चाहता है।) वक्ता चाहे तो 'बुभूषति' कहे अथवा 'भवितुम् इच्छति'—इस वाक्यका प्रयोग करे। यह स्मरणीय है कि 'सन्' और 'यङ्' प्रत्यय परे रहनेपर धातुका द्वित्व हो जाता है। शेष कार्य व्याकरणकी प्रक्रियाके अनुसार होते हैं। जहाँ क्रियाका समभिहार हो, अर्थात् पुनः-पुनः या अतिशयरूपसे क्रियाका होना बताया जाय, वहाँ उक्त अभिप्रायका द्योतन या प्रकाशन करनेके लिये धातुसे 'यङ्' प्रत्यय होता है। 'यङ्' और 'यङ्लुगन्त' में धातुका द्वित्व होनेपर पूर्वभागके, जिसे 'अभ्यास' कहते हैं, 'इक्' का 'गुण' हो जाता है। 'भू' धातुके 'यङन्त' में 'बोभूयते' इत्यादि रूप होते हैं। 'पुनः पुनः अतिशयेन वा भवति'—इस अर्थमें 'बोभूयते' क्रियाका प्रयोग होता है। यथा—'वाद्यं बोभूयते।' (वाद्यवादन बार-बार या अधिक मात्रामें होता है)। 'यङ्लुगन्त' में 'भू' धातुके 'बोभोति' इत्यादि रूप होते हैं। अर्थ वही है, जो 'यङन्त' क्रियाका होता है। 'यङन्त' में आत्मनेपदीय प्रत्यय होते हैं और 'यङ्लुगन्त' में परस्मैपदीय ॥ १४ ॥

कहीं-कहीं 'नाम' या 'सुबन्त' शब्दसे 'क्यच्' आदि प्रत्यय होनेपर उस शब्दकी 'धातु' संज्ञा होती है और उसके धातुके ही समान रूप चलते हैं। ऐसे प्रकरणको 'नामधातु' कहते हैं। जो इच्छाका कर्म हो और इच्छा करनेवालेका सम्बन्धी हो, ऐसे 'सुबन्त' से इच्छा-अर्थमें विकल्पसे 'क्यच्' प्रत्यय होता है। 'आत्मनः पुत्रम् इच्छति।' (अपने लिये पुत्र चाहता है)—इस अर्थमें 'पुत्रम्' इस 'सुबन्त' पदसे 'क्यच्' प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप होनेपर 'पुत्र अम् य' हुआ। 'सनाद्यन्ता धातवः।' (३।१।३२) से धातुसंज्ञा होकर 'सुपो धातुप्रातिपदिकयोः।' (२।४।७०) से 'अम्' का लोप हो गया। पुत्र=य—इस स्थितिमें 'क्यचि च।' (७।४।३३)—इस सूत्रके अनुसार 'अकार' के स्थानमें 'ईकार' हो गया। इस प्रकार 'पुत्रीय' से 'तिप्' 'शप्' आदि कार्य होनेपर 'पुत्रीयति' इत्यादि रूप होते हैं। इसी अर्थमें 'काम्यच्' प्रत्यय भी होता है और 'पुत्र' शब्दसे 'काम्यच्' प्रत्यय होनेपर 'पुत्रकाम्यति' इत्यादि रूप होते हैं। 'पटत् भवति इति पटपटायते।' यहाँ 'अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्धादनितौ डाच्।' (५।४।५७)—इस सूत्रके अनुसार 'भू' के योगमें 'डाच्' प्रत्यय होनेपर 'पटत् डा' इस स्थितिमें 'डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम्।' इस वार्तिकसे द्वित्व होकर 'नित्यमाम्रेडितं डाचि।' इस वार्तिकसे पररूप हुआ तो टि-लोपके अनन्तर 'पटपटा+भू'—यह अवस्था प्राप्त हुई। इसके बाद 'लोहितादिडाब्भ्यः क्यष्।' (३।१।१३)—इस सूत्रसे 'भवति' इस अर्थमें 'क्यष्' प्रत्यय हुआ तो 'पटपटा+क्यष्' बना। फिर अनुबन्धलोप, धातु संज्ञा तथा धातुसम्बन्धी कार्य होनेसे 'पटपटायते'—यह रूप सिद्ध हुआ। इसका अर्थ

७७८* अग्निपुराण *

है कि 'पटपट' की आवाज होती है। 'घटं करोति।'- इस अर्थमें 'तत्करोति तदाचष्टे' के अनुसार 'घटयति' रूप बनता है। 'सन्नन्त' से 'णिच्' प्रत्यय किया जाय तो 'भू' धातुके सन्नन्त रूप 'बुभूषति' की जगह 'बुभूषयति' रूप बनेगा। प्रयोग- 'गुरुः शिष्यं बुभूषयति' ॥ १५ ॥

'भू' धातुके 'विधिलिङ्' लकारमें क्रमशः ये रूप होते हैं- 'भवेत्, भवेताम्, भवेयुः। भवेः, भवेतम्, भवेत। भवेयम्, भवेव, भवेम'। 'एध्' धातुके 'विधिलिङ्' में इस प्रकार रूप बनते हैं- एधेत, एधेयाताम्, एधेरन्। एधेथाः, एधेयाथाम्, एधेध्वम्। एधेय, एधेवहि, एधेमहि।' वाक्यप्रयोग- 'ते मनसा एधेरन्' (वे मनसे बढ़ें- उन्नति करें)। 'त्वं श्रिया एधेथाः।' (तुम लक्ष्मीके द्वारा बढ़ो इत्यादि)। 'भू' धातुके 'लोट्' लकारमें ये रूप होते हैं- 'भवतु, भवतात्, भवताम्, भवन्तु। भव-भवतात्, भवतम्, भवत। भवानि, भवाव, भवाम।' 'एध्' धातुके 'लोट्' लकारमें ये रूप जानने चाहिये- 'एधताम्, एधेताम्, एधन्ताम्। एधस्व, एधेथाम्, एधध्वम्। एधै, एधावहै, एधामहै।' 'पच्' धातुके भी आत्मनेपदमें ऐसे ही रूप होते हैं। यथा उत्तमपुरुषमें - 'पचै, पचावहै, पचामहै।' 'अभि' पूर्वक 'नदि' धातुका 'लङ्' लकारमें प्रथमपुरुषके एकवचनमें 'अभ्यनन्दत्'- यह रूप होता है। 'पच्' धातुके 'लङ्' लकारमें - 'अपचत्, अपचताम्, अपचन्' इत्यादि रूप होते हैं। 'भू' धातुके 'लङ्' लकारमें 'अभवत्, अभवताम्, अभवन्' इत्यादि रूप होते हैं। 'पच्' धातुके 'लङ्' लकारके उत्तमपुरुषमें - 'अपचम्, अपचाव, अपचाम'-ये रूप होते हैं। 'एध्' धातुके 'लङ्' लकारमें-ऐधत, ऐधेताम्, ऐधन्त। ऐधथाः, ऐधेथाम्, ऐधध्वम्। ऐधे, ऐधावहि, ऐधामहि-ये रूप होते हैं। 'भू' धातुके 'लुङ्' लकारमें अभूत्, अभूताम्, अभूवन्। अभूः, अभूतम्, अभूत। अभूवम्, अभूव, अभूम'-ये रूप होते हैं। 'एध्' धातुके 'लुङ्' लकारमें ऐधिष्ट, ऐधिषाताम्, ऐधिषत। ऐधिष्ठाः, ऐधिषाथाम्, ऐधिध्वम्। ऐधिषि, ऐधिष्वहि, ऐधिष्महि'-ये रूप जानने चाहिये। वाक्यप्रयोग- 'नरौ ऐधिषाताम्' (दो मनुष्य बढ़ें)।

'भू' धातुके 'परोक्षलिट्' में 'बभूव, बभूवतुः, बभूवुः। बभूविथ, बभूवथुः, बभूव। बभूव, बभूविव, बभूविम।' -ये रूप होते हैं। 'पच्' धातुके आत्मनेपदी 'लिट्' लकारमें प्रथमपुरुषके रूप इस प्रकार हैं- 'पेचे, पेचाते, पेचिरे।' 'एध्' धातुके 'लिट्' लकारमें इस प्रकार रूप समझने चाहिये- 'एधाञ्चक्रे, एधाञ्चक्राते, एधाञ्चक्रिरे। एधाञ्चकृषे, एधाञ्चक्राथे, एधाञ्चकृढ्वे। एधाञ्चक्रे, एधाञ्चकृवहे, एधाञ्चकृमहे।' 'पच्' धातुके 'परोक्षलिट्' में प्रथमपुरुषके रूप बताये गये हैं। मध्यम और उत्तम पुरुषके रूप इस प्रकार होते हैं- 'पेचिषे, पेचाथे पेचिध्वे। पेचे, पेचिवहे, पेचिमहे।' 'भू' धातुके 'अनद्यतन भविष्य लुट्' लकारमें इस प्रकार रूप जानने चाहिये- 'भविता, भवितारौ, भवितारः। भवितासि, भवितास्थः, भवितास्थ। भवितास्मि, भवितास्वः, भवितास्मः।' वाक्यप्रयोग- 'हरादयो भवितारः।' (हर आदि होंगे।) 'वयं भवितास्मः।' (हम होंगे।) 'पच्' धातुके 'लुट्' लकारमें 'परस्मैपदीय' रूप इस प्रकार हैं- 'पक्ता, पक्तारौ, पक्तारः, पक्तासि। (शेष भूधातुकी तरह)। वाक्यप्रयोग- 'त्वं शुभौदनं पक्तासि।' (तुम अच्छा भात राँधोगे।) 'पच्' धातुके 'लुट्' लकारमें 'आत्मनेपदीय' रूप इस प्रकार हैं- प्रथमपुरुषमें तो 'परस्मैपदीय' रूपके समान ही होते हैं, मध्यम और उत्तम पुरुषमें- 'पक्तासे, पक्तासाथे, पक्ताध्वे। पक्ताहे, पक्तास्वहे, पक्तास्महे।' वाक्यप्रयोग- 'अहं पक्ताहे।' (मैं पकाऊँगा।) 'वयं हरेश्चरुं पक्तास्महे।' (हम श्रीहरिके लिये चरु पकावेंगे या तैयार करेंगे।) 'आशीर्लिङ्'