अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 792, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३५६ * ७६५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
‘हिरण्य’ तथा ‘मणि’ शब्दोंसे ‘व’ प्रत्यय होनेपर ‘हिरण्यवमणि वः$^{१-२}$’—ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। ‘रजस्’ शब्दसे ‘वलच्’ प्रत्यय होनेपर ‘रजस्वलम्$^३$’ पदकी सिद्धि होती है। १-३।
‘धन’, ‘कर’ तथा ‘हस्त’—इन शब्दोंसे ‘इनि’ प्रत्यय होनेपर क्रमशः ‘धनी’, ‘करी’ और ‘हस्ती’—ये पद सिद्ध होते हैं। ‘धन’ शब्दसे ‘ठन्’ प्रत्यय होनेपर ‘धनिकं कुलम्’ या ‘धनिकः पुरुषः’—ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। ‘पयस्’ तथा ‘माया’ शब्दोंसे ‘विनि’ प्रत्यय होनेपर ‘पयस्वी’, ‘मायावी’—ये रूप बनते हैं। ‘ऊर्णा’ शब्दसे मत्वर्थीय ‘युस्’ प्रत्यय होनेपर ‘ऊर्णायुः’ पदकी सिद्धि बतायी गयी है।$^४$ ‘वाच्’ शब्दसे ‘ग्मिनि’ प्रत्यय होनेपर ‘वाग्मी’ तथा ‘आलच्’ प्रत्यय होनेपर ‘वाचालः’—ये रूप बनते हैं। उसीसे ‘आटच्’ प्रत्यय होनेपर ‘वाचाटः’ रूप बनता है। ‘फल’ तथा ‘बर्ह’ शब्दोंसे ‘इनच्’ प्रत्यय होनेपर क्रमशः ‘फलिनः’, ‘बर्हिणः’—ये रूप बनते हैं। ‘वृन्द’ शब्दसे ‘आरकन्’ प्रत्यय होनेपर ‘वृन्दारकः’—इस पदकी सिद्धि होती है$^५$॥ ४-५॥
‘शीतं न सहते’, ‘हिमं न सहते’—इस विग्रहमें ‘शीत’ तथा ‘हिम’ शब्दोंसे ‘आलुच्’ प्रत्यय करनेपर ‘शीतालुः’ तथा ‘हिमालुः’ रूप बनते हैं। ‘वात’ शब्दसे ‘उलच्’ प्रत्यय होनेपर ‘वातुलः’ रूप बनता है। ‘अपत्य’ अर्थमें ‘अण्’ प्रत्यय होता है। ‘वसिष्ठस्यापत्यं पुमान् वासिष्ठः।’, ‘कुरोरपत्यं पुमान् कौरवः।’ (वसिष्ठकी संतान ‘वासिष्ठ’ कहलाती है तथा कुरुकी संतति ‘कौरव’)—‘वहाँ उसका निवास है’—इस अर्थमें सप्तम्यन्त ‘समर्थ’ शब्दसे ‘अण्’ प्रत्यय होता है। यथा ‘मथुरायां वासोऽस्येति माथुरः।’ (मथुरामें निवास है इसका, इसलिये यह ‘माथुर’ है।) ‘सोऽस्य वासः।’—वह इसका वासस्थान है, इस अर्थमें भी प्रथमान्त ‘समर्थसे’ ‘अण्’ प्रत्यय होता है। ‘उसको जानता और उसे पढ़ता है’—इस अर्थमें द्वितीयान्त ‘समर्थ’ पदसे ‘अण्’ प्रत्यय होता है। ‘चान्द्रं व्याकरणमधीते तद् वेद वा इति चान्द्रः।’ (चान्द्र एव चान्द्रकः स्वार्थे कप्रत्ययः)। ‘क्रमादि’ शब्दोंसे ‘वुन्’ प्रत्यय होता है (‘वु’के स्थानमें ‘अक’ आदेश होता है।) ‘क्रमं वेत्ति इति क्रमकः’—जो क्रमपाठको जानता है, वह ‘क्रमक’ है। इसी तरह ‘पदकः’, ‘शिक्षकः’, ‘मीमांसकः’ इत्यादि पद बनते हैं। ‘कोशम् अधीते वेद वा।’—जो कोशको जानता या पढ़ता है, वह ‘कौशक’ है॥ ६-८॥
१-२. ‘हिरण्यवः’ का अर्थ ‘हिरण्यवान्’ (सुवर्ण-सम्पत्तिसे युक्त) तथा ‘मणिवः’ शब्द ‘मणिधारी’ (मनियारा) सर्प या नागके लिये प्रयुक्त होता है। ३. ‘रजः कृष्यासुतिपरिषदो वलच्’ (५। २। ११२)—इस सूत्रसे ‘वलच्’ प्रत्यय होनेपर क्रमशः ‘रजस्वल’, ‘कृषीवल’, ‘आसुतीवल’ तथा ‘परिषद्वल’ शब्द सिद्ध होते हैं। इनके अर्थ क्रमशः इस प्रकार हैं—धूलसे भरा, किसान, जुआरी तथा परिषत्—सभा या समूहसे युक्त। ४. ‘अत इनिठनौ’ (५। २। ११५)—इस सूत्रसे ‘इनि’ प्रत्यय होनेपर ‘धनी’ तथा ‘ठन्’ प्रत्यय होनेपर ‘धनिकः’ रूप बनते हैं। इसी प्रकार करी, करिकः, हस्ती, हस्तिकः—ये रूप बनते हैं। ‘धनी’ का अर्थ है—धनवान् तथा ‘करी’ और ‘हस्ती’ का अर्थ है—हाथी। ‘पयस्वी’ का अर्थ है—दूधवाला तथा ‘मायावी’ का अर्थ है—माया फैलानेवाला। ‘विनि’ प्रत्ययका विधायक सूत्र है—‘अस्मायामेधास्रजो विनिः।’ (५। २। १२१)। ‘ऊर्णाया युस्।’ (५। २। १२३)—इस सूत्रसे ‘युस्’ प्रत्ययका विधान हुआ। ‘ऊर्णायुः’ माने ऊनी। ५. ‘वाचोग्ग्मिनिः।’ (५। २। १२४)—इस सूत्रसे ‘ग्मिनि’ प्रत्यय होता है। ‘आलजाटचौ बहुभाषिणि।’ ‘कुत्सित इति वक्तव्यम्’—इन वार्तिकोंद्वारा ‘आलच्’ और ‘आटच्’ प्रत्यय होते हैं। अच्छी बातको बहुत बोलनेवाला ‘वाग्मी’ कहलाता है और कुत्सित बातको अधिक बोलनेवाला ‘वाचाल’ और ‘वाचाट’ कहलाता है। ‘फलबर्हाभ्यामिनच्।’ इस वार्तिकसे ‘इनच्’ और ‘शृङ्गवृन्दाभ्याम् आरकन्।’ इस वार्तिकसे ‘आरकन्’ प्रत्यय होनेपर ‘फलिनः’ (फलवान्), ‘बर्हिणः’ (मोर) तथा ‘वृन्दारकः’ (देवता)—ये प्रयोग सिद्ध होते हैं।