अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 791, कुल 878 में से
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'फेन' शब्दसे 'इलच्' प्रत्यय होनेपर 'फेनिलम्' १ रूप होता है, इसका अर्थ है—फेनयुक्त जल। लोमादिगणसे 'श' प्रत्यय होता है, (विकल्पसे 'मतुप्' भी होता है)—इस नियमके अनुसार 'श' प्रत्यय होनेपर 'लोमशः'२ प्रयोग बनता है। ('मतुप्' होनेपर 'लोमवान्' होता है। इसी तरह 'रोमशः, रोमवान्'—ये प्रयोग सिद्ध होते हैं।) पामादि शब्दोंसे 'न' होता है—इस नियमके अनुसार 'पाम' शब्दसे 'न' होनेपर 'पामनः' 'अङ्गात् कल्याणे।'—इस वार्तिकके अनुसार 'कल्याण' अर्थमें 'अङ्ग' शब्दसे 'न' होनेपर 'लक्ष्मणः' (उत्तम लक्षणोंसे युक्त) ये रूप बनते हैं। वैकल्पिक 'मतुप्' होनेपर तो 'पामवान्' आदि रूप होंगे। जिसे खुजली हुई हो, वह 'पामन' या 'पामवान्' है। इसी तरह पिच्छादि शब्दोंसे 'इलच्' होता है—इस नियमके अनुसार 'इलच्' होनेपर 'पिच्छिलः', 'पिच्छवान्'; 'उरसिरः', 'उरस्वान्' इत्यादि रूप होते हैं। 'पिच्छिलः' का अर्थ 'पंखवान्' होता है। मार्गका विशेषण होनेपर यह फिसलनयुक्तका बोधक होता है—यथा 'पिच्छिलः पन्थाः।'
'उरस्वान्' का अर्थ 'मनस्वी' समझना चाहिये। ['प्रज्ञाश्रद्धार्चाभ्यो णः।' (५। २। १०१)—इस पाणिनि-सूत्रके अनुसार] 'ण' प्रत्यय करनेपर 'प्रज्ञा' शब्दसे 'प्राज्ञः' (प्रज्ञावान्), 'श्रद्धा' शब्दसे 'श्राद्धः' (श्रद्धावान्) और 'अर्चा' शब्दसे 'आर्चः' (अर्चावान्) रूप बनते हैं। वाक्यमें प्रयोग—'प्राज्ञो व्याकरणे।' स्त्रीलिङ्गमें 'प्राज्ञा' (प्रज्ञावती) रूप होगा। 'ण' प्रत्यय होनेसे अणन्तत्वप्रयुक्त 'ङीप्' प्रत्यय यहाँ नहीं होगा। यद्यपि 'प्रकर्षेण जानातीति प्रज्ञः स एव प्रज्ञावान्।' प्रज्ञ एव प्राज्ञः। (स्वार्थे अण् प्रत्ययः)—इस प्रकार भी 'प्राज्ञः' की सिद्धि तो होती है, तथापि इससे स्त्रीलिङ्गमें 'प्राज्ञी' रूप बनेगा, 'प्राज्ञा' नहीं। 'वृत्ति' शब्दसे भी 'ण' प्रत्यय होता है—'वार्तः' (वृत्तिमान्)। 'वार्ता' विद्या इत्यादि। ऊँचे दाँत हैं इसके—इस अर्थमें 'दन्त' शब्दसे 'उरच्' प्रत्यय होनेपर 'दन्तुरः'—यह रूप होता है। 'दन्त उन्नत उरच्।' (५। २। १०६)—इस पाणिनि-सूत्रसे उक्त अर्थमें 'दन्तुरः' इस पदकी सिद्धि होती है। 'मधु' शब्दसे 'र' प्रत्यय होनेपर 'मधुरम्'३, 'सुषि' शब्दसे 'र' प्रत्यय होनेपर 'सुषिरम्', 'केश' शब्दसे 'व' प्रत्यय होनेपर 'केशवः'४
वाचक है। यद्यपि लोकमें 'वत्स' का अर्थ बछड़ा और 'अंस' का अर्थ कंधा समझा जाता है, तथापि तद्धित वृत्तिमें 'वत्स' और 'अंस' शब्द क्रमशः 'स्नेह' तथा 'बल' के अर्थमें ही लिये गये हैं (तत्त्वबोधिनी)। इन अर्थोंमें 'मतुप्' प्रत्ययका समुच्चय नहीं होता; क्योंकि 'मतुप्' प्रत्यय करनेपर उक्त अर्थोंकी प्रतीति न होकर अर्थान्तरकी ही प्रतीति होती है। यथा 'वत्सवती गौः।' 'अंसवान् दुर्बलः।' इत्यादि।
१. पाणिनिके अनुसार 'फेनादिलच् च' (५। २। ९९)—इस सूत्रसे 'इलच्' प्रत्यय होता है। यहाँ चकारसे 'लच्' प्रत्ययका भी विकल्पसे विधान सूचित होता है। 'प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम्।' (५। २। ९६)—इस सूत्रसे 'अन्यतरस्याम्' पदकी अनुवृत्ति होती है, जिससे यहाँ 'मतुप्' का भी समुच्चय होता है। इस प्रकार 'फेन' शब्दसे तीन रूप होते हैं—'फेनिलः', फेनलः' तथा 'फेनवान्' सागरः। २. 'लोमशः' 'पामनः' और 'पिच्छिलः' आदि पदोंके साधनके लिये पाणिनिने एक ही सूत्रका उल्लेख किया है—'लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः।' (५। २। १००) ३. 'ऊषसुषिमुष्कमधो रः' (पा० सू० ५। २। १०७)—इस सूत्रसे 'र' प्रत्यय होनेपर 'ऊष' आदि शब्दोंसे 'ऊषरः', 'सुषिरम्', 'मुष्करः', 'मधुरम्'—ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। ये क्रमशः ऊसर भूमि, छिद्र, अण्डकोशवान् तथा माधुर्ययुक्तके बोधक हैं। ४. 'केशाद्वोऽन्यतरस्याम्।' (५। २। १०९)—इस सूत्रसे 'केश' शब्दसे 'व' प्रत्यय होनेपर 'केशवः' रूप बनता है। 'अन्यतरस्याम्' की अनुवृत्ति प्रकरणतः प्राप्त होनेसे 'मतुप्' सिद्ध था; पुनः उक्त सूत्रमें जो उसका ग्रहण किया गया, इससे 'इन्' और 'ठन्' का भी समावेश होता है, अतः केशवान्, केशी और केशिकः—ये तीन रूप और बनते हैं। ये सभी प्रयोग मत्वर्थीयप्रत्ययान्त हैं, तथापि व्यवहारमें अन्तर है। 'केशवः' का अर्थ है—घुँघराले केशवाले भगवान् श्रीकृष्ण। अन्य किसीके लिये इस शब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता। 'केशी' और 'केशिक' उस दैत्यका वाचक है, जो अश्वरूपधारी था और उसकी गर्दनपर बड़े-बड़े बाल (अयाल) थे। 'केशवान्' पद सामान्यतः सभी केशधारियोंके लिये प्रयुक्त होता है।