अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 790, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३५६ * | ७६३ --- | --- 'अर्चित' 'अशेष' तथा 'पूर्व'—ये तीनों पद समासमें आबद्ध हैं। ऐसा समास 'बहुपद' कहा गया है। 'संख्योत्तरपद'का उदाहरण है—'एते विप्रा उपदशाः'—ये ब्राह्मण लगभग दस हैं'। इसमें 'दस' संख्या उत्तरपदके रूपमें प्रयुक्त है। 'द्वित्राः द्वयेकत्रयः' इत्यादि संख्योभयपदके उदाहरण हैं। 'सहपूर्वपद'का उदाहरण—'समूलोद्धृतकः तरुः' (सह मूलेन उद्धृतं कं शिखा यस्य सः। अर्थात् जडसहित उखड़ गयी है शिखा जिसकी, वह वृक्ष)—यहाँ पूर्वपदके स्थानमें 'सह' (स)-का प्रयोग हुआ है। व्यतिहार-लक्षणका उदाहरण है—केशाकेशि, नखानखि युद्धम् (आपसमें झोंटा-झुटौअल, परस्पर नखोंसे बकोटा-बकोटीपूर्वक कलह) ॥ १२—१४॥<br><br>दिगलक्षणार्थका उदाहरण—उत्तरपूर्वा (उत्तर और पूर्वके अन्तरालकी दिशा)। 'द्विगु' समास दो प्रकारका बताया गया है। 'एकवद्भाव' तथा 'अनेकधा' स्थितिको लेकर ये भेद किये गये हैं। संख्या पूर्वपदवाला समास 'द्विगु' है। इसे कर्मधारयका ही एक भेदविशेष स्वीकार किया गया है। 'एकवद्भाव'का उदाहरण है—द्विशृङ्गम् (दो सींगोंका समाहार)। 'पञ्चमूली' भी इसीका | उदाहरण है। 'अनेकधा' या 'अनेकवद्भाव'का उदाहरण है—सप्तर्षयः इत्यादि। 'पञ्च ब्राह्मणाः'में समास नहीं होगा; क्योंकि यहाँ संज्ञा नहीं है॥ १५॥<br><br>'द्वन्द्व' समास भी दो ही प्रकारका होता है—१-'इतरेतरयोगी' तथा २-'समाहारवान्'। प्रथमका उदाहरण है—'रुद्रविष्णू (रुद्रश्च विष्णुश्च—रुद्र तथा विष्णु)। यहाँ इतरेतर-योग है। समाहारका उदाहरण है—भेरीपटहम् (भेरी च पटहश्च, अनयोः समाहारः—अर्थात् भेरी और पटहका समाहार)। यहाँ 'तुर्याङ्ग' होनेसे इनका एकवद्भाव होता है। अव्ययीभाव समास भी दो तरहका होता है—१-'नामपूर्वपद' और २-('यथा' आदि) अव्यय-पूर्वपद। प्रथमका उदाहरण है—शाकस्य मात्रा—शाकप्रति। यहाँ 'शाक' पूर्वपद है और मात्रार्थक 'प्रति' अव्यय उत्तरपद। दूसरेका उदाहरण—'उपकुमारम्-उपरथ्यम्' इत्यादि हैं। समासको प्रायः चार प्रकारोंमें विभक्त किया जाता है—१-उत्तरपदार्थकी प्रधानतासे युक्त (तत्पुरुष), २-उभयपदार्थ-प्रधान द्वन्द्व समास, ३-पूर्वपदार्थ-प्रधान 'अव्ययीभाव' तथा ४-अन्य अथवा बाह्यपदार्थ-प्रधान 'बहुव्रीहि' ॥ १६—१९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'समासविभागका वर्णन' नामक तीन सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५५॥
तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय
त्रिविध तद्धित-प्रत्यय
कुमार स्कन्ध कहते हैं—कात्यायन ! अब त्रिविध 'तद्धित'का वर्णन करूँगा। 'तद्धित'के तीन भेद हैं—सामान्यावृत्ति तद्धित, अव्यय तद्धित तथा भाववाचक तद्धित। 'सामान्यावृत्ति तद्धित' इस प्रकार है—'अंस' शब्दसे 'लच्' प्रत्यय होनेपर 'अंसलः' बनता है; इसका अर्थ है—बलवान्। 'वत्स' शब्दसे 'लच्' प्रत्यय होनेपर 'वत्सलः' रूप होता है, इसका अर्थ स्नेहवान् है*।
* पाणिनि-व्याकरणके अनुसार 'वत्सांसाभ्यां कामबले।' (५।२।९८)—इस सूत्रसे क्रमशः 'कामवान्' और 'बलवान्'के अर्थमें 'वत्स' और 'अंस' शब्दोंसे 'लच्' प्रत्यय होता है। सूत्रमें 'काम' तथा 'बल' शब्द अर्श आद्यजन्त्य माने गये हैं। 'काम' शब्द यहाँ 'स्नेह'का