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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 789, कुल 878 में से

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पृष्ठ 789

७६२ * अग्निपुराण *


है। प्रथमान्त आदि शब्द सुबन्तके साथ समस्त होते हैं। ‘पूर्वकायः’ इस तत्पुरुषसमासमें जब ‘पूर्वं कायस्य’—ऐसा विग्रह किया जाता है, तब यह ‘प्रथमा-तत्पुरुष’ समास कहा जाता है। इसी प्रकार ‘अपरकायः’—कायस्य अपरम्, इस विग्रहमें, ‘अधरकायः’—कायस्य अधरम्—इस विग्रहमें और ‘उत्तरकायः’—कायस्योत्तरम्—इस विग्रहमें भी प्रथमा-तत्पुरुष समास कहा जाता है। ऐसे ही ‘अर्द्धकणा’ इसमें अर्द्धम् कणायाः—ऐसा विग्रह होनेसे प्रथमा-तत्पुरुष समास होता है एवं ‘भिक्षातुर्यम्’—इसमें तुर्यं भिक्षायाः—ऐसा विग्रह होनेसे तुर्यभिक्षा और पक्षान्तरमें ‘भिक्षातुर्यम्’—ऐसा षष्ठी-तत्पुरुष होता है। ऐसे ही ‘आपन्नजीविकः’ यह द्वितीया-तत्पुरुष समास है। इसका विग्रह इस प्रकार होता है—‘आपन्नो जीविकाम्।’ पक्षान्तरमें ‘जीविकापन्नः’ ऐसा रूप होता है। इसी प्रकार ‘माधवाश्रितः’—यह द्वितीया-समास है; इसका विग्रह ‘माधवम् आश्रितः’—इस प्रकार है। ‘वर्षभोग्यः’—यह द्वितीया-तत्पुरुष समास है—इसका विग्रह है ‘वर्षं भोग्यः।’ ‘धान्यार्थः’ यह तृतीया-समास है। इसका विग्रह ‘धान्येन अर्थः’ इस प्रकार है। ‘विष्णुबलिः’ यहाँ ‘विष्णवे बलिः’—इस विग्रहमें चतुर्थी-तत्पुरुष समास होता है। ‘वृकभीतिः’ यह पञ्चमी-तत्पुरुष है। इसका विग्रह ‘वृकाद् भीतिः’—इस प्रकार है। ‘राजपुमान्’—यहाँ ‘राज्ञः पुमान्’—इस विग्रहमें षष्ठी-तत्पुरुष समास होता है। इसी प्रकार ‘वृक्षस्य फलम्—वृक्षफलम्’—यहाँ षष्ठी-तत्पुरुष समास है। ‘अक्षशौण्डः’ (द्यूतक्रीडामें निपुण) इसमें सप्तमी-तत्पुरुष समास है। अहितः—जो हितकारी न हो, वह—इसमें ‘नञ्समास’ है॥ १-७॥

‘नीलोत्पल’ आदि जिसके उदाहरण हैं, वह ‘कर्मधारय’ समास सात प्रकारका होता है १-विशेषणपूर्वपद (जिसमें विशेषण पूर्वपद हो और विशेष्य उत्तरपद अथवा)। इसका उदाहरण है—‘नीलोत्पल’ (नीला कमल)। २-विशेष्योत्तर-विशेषणपद—इसका उदाहरण है—‘वैया-करणखसूचिः’ (कुछ पूछनेपर आकाशकी ओर देखनेवाला वैयाकरण)। ३-विशेषणोभयपद (अथवा विशेषणद्विपद) जिसमें दोनों पद विशेषणरूप ही हों। जैसे—शीतोष्ण (ठंडा-गरम)। ४-उपमानपूर्वपद। इसका उदाहरण है—शङ्खपाण्डुरः (शङ्खके समान सफेद)। ५-उपमानोत्तरपद—इसका उदाहरण है—‘पुरुष-व्याघ्रः’ (पुरुषो व्याघ्र इव)। ६-सम्भावना-पूर्वपद—(जिसमें पूर्वपद सम्भावनात्मक हो) उदाहरण—गुणवृद्धिः (गुण इति वृद्धिः स्यात्। अर्थात् ‘गुण’ शब्द बोलनेसे वृद्धिकी सम्भावना होती है)। तात्पर्य यह है कि ‘वृद्धि हो’—यह कहनेकी आवश्यकता हो तो ‘गुण’ शब्दका ही उच्चारण करना चाहिये। ७-अवधारणपूर्वपद—[जहाँ पूर्वपदमें ‘अवधारण’ (निश्चय) सूचक शब्दका प्रयोग हो, वह]। जैसे—‘सुहृदेव सुबन्धुकः’ (सुहृद् ही सुबन्धु है)। बहुव्रीहिसमास भी सात प्रकारका ही होता है॥ ८-११॥

१-द्विपद, २-बहुपद, ३-संख्योत्तरपद, ४-संख्योभयपद, ५-सहपूर्वपद, ६-व्यतिहारलक्षणार्थ तथा ७- दिगलक्षणार्थ। ‘द्विपद बहुव्रीहि’में दो ही पदोंका समास होता है। यथा—‘आरूढभवनो नरः’। (आरूढं भवनं येन सः—इस विग्रहके अनुसार जो भवनपर आरूढ हो गया हो, उस मनुष्यका बोध कराता है।) ‘बहुपद बहुव्रीहि’में दोसे अधिक पद समासमें आबद्ध होते हैं। इसका उदाहरण है—‘अयम् अर्चिताशेषपूर्वः।’ (अर्चिता अशेषाः पूर्वा यस्य सोऽयम् अर्चिताशेषपूर्वः।) अर्थात् जिसके सारे पूर्वज पूजित हुए हों, वह ‘अर्चिताशेषपूर्व’ है। इसमें