अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 788, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३५५ * ७६१
अन्न 'हेतु' है, तद्वाचक 'हेतु' शब्दका भी प्रयोग हुआ है, अतः 'अन्न' शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई। स्मरणार्थक धातुके प्रयोगमें उसके कर्ममें षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे—**‘मातुः स्मरति।—*माताको स्मरण करता है।' यहाँ ‘स्मरति'के योगमें ‘मातृ’ शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई। कृत्प्रत्ययके योगमें कर्त्ता एवं कर्ममें षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे—'अपां भेत्ता—जलको भेदन करनेवाला।' यहाँ—‘भेत्तृ' शब्द ‘कृत्' प्रत्ययान्त है। उसके योगमें—कर्मभूत ‘अप्’ शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई। इसी प्रकार **‘तव कृतिः—**तुम्हारी कृति है'—यहाँ ‘कृति' शब्द ‘कृत्प्रत्ययान्त’ है। उसके योगमें कर्तृभूत ‘युष्मद्’ शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई (युष्मद्-ङस्=तव)—निष्ठा आदि अर्थात् क्त-क्तवतु, शतृ-शानच्, उ, उक, क्त, तुमुन्, खलर्थक, तृन्, शानच्, चानश् आदिके योगमें षष्ठी विभक्ति नहीं होती (यथा ‘ग्रामं गतः’ इत्यादि) ॥१२—२६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कारक-निरूपण' नामक तीन सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥३५४॥
तीन सौ पचपनवाँ अध्याय
समास-निरूपण
भगवान् कार्त्तिकेय कहते हैं— कात्यायन! मैं छः* प्रकारके 'समास' बताऊँगा। फिर अवान्तर-भेदोंसे 'समास'के अट्ठाईस भेद हो जाते हैं। समास ‘नित्य’ और ‘अनित्य’ के भेदसे दो प्रकारका है तथा ‘लुक्’ और ‘अलुक्’के भेदसे भी उसके दो प्रकार और हो जाते हैं। कुम्भकार और हेमकार ‘नित्य समास’ हैं। (क्योंकि विग्रह-वाक्यद्वारा ये शब्द जातिविशेषका बोध नहीं करा सकते।)**‘राज्ञः+पुमान्= राजपुमान्’—**यह षष्ठी-तत्पुरुष समास स्वपदविग्रह होनेके कारण ‘अनित्य’ है। **कष्टश्रितः (कष्टं+श्रितः)—**इसमें ‘लुक्’ समास है; क्योंकि ‘कष्ट’ पदके अन्तमें स्थित द्वितीया विभक्तिका ‘लुक्’ (लोप) हो जाता है। ‘कण्ठेकालः’ आदि ‘अलुक्’ समास हैं; क्योंकि इसमें कण्ठशब्दोत्तरवर्तिनी सप्तमी विभक्तिका ‘लुक्’ नहीं होता। तत्पुरुष-समास आठ प्रकारका होता
* जहाँ अनेक पदोंका परस्पर एकार्थीभावरूप सामर्थ्य लक्षित हो, उनमें ‘समास’ होता है। कृत्, तद्धित, समास, एकशेष तथा सनाद्यन्त धातु—ये पाँच वृत्तियाँ मानी गयी हैं। परार्थका अभिधान (कथन) ‘वृत्ति’ है। वृत्त्यर्थके अवबोधक वाक्यको ‘विग्रह’ कहते हैं। ‘विग्रह’ दो प्रकारका होता है—‘लौकिक’ और ‘अलौकिक’। परिनिष्ठित (प्रयोगाई) होनेके कारण जो साधुवाक्य है, वह ‘लौकिक विग्रह’ कहलाता है। जो प्रयोगयोग्य न होनेसे असाधु है, वह ‘अलौकिक विग्रह’ है। ‘राज्ञः पुरुषः’—यह ‘लौकिक विग्रह’ है ‘राजन्+ङस्, पुरुष+सु’ यह अलौकिक विग्रह है। समास ‘नित्य’ और ‘अनित्य’के भेदसे दो प्रकारका है। जो अविग्रह (लौकिक विग्रहसे रहित) या अस्वपद-विग्रह (समस्यमान ‘यावत्’ पदसे अघटित) हो, वह ‘नित्य-समास’ है; इसके विपरीत ‘अनित्य-समास’ है। प्राचीन विद्वानोंने समासके छः प्रकार बताये हैं। यथा—
सुपां सुपा तिङा नाम्ना धातुनाथ तिङां तिङा। सुबन्तेनेति विज्ञेयः समासः षड्विधो बुधैः॥
(१) उदाहरणके लिये सुबन्तका सुबन्तके साथ समास—राजपुरुषः। यहाँ ('राज्ञः पुरुषः' इस विग्रहके अनुसार) पूर्व और उत्तर दोनों पद ‘सुबन्त’ हैं। (२) सुबन्तका तिङ्के साथ समास—यथा—‘पर्यभूषत्’। (३) ‘सुबन्त’को नामके साथ—कुम्भकारः। हेमकारः इत्यादि। (४) ‘सुबन्त, का धातुके साथ समास। यथा—‘कटप्रूः', अजस्रम् इत्यादि। (५) तिङन्तका तिङन्तके साथ समास, यथा—पिबतखादता। खादतमोदता इत्यादि। (६) तिङन्तका सुबन्तके साथ समास, यथा—कृन्तविचक्षणा। इसका मयूरव्यंसकादिगणमें पाठ है।'