अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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'धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ्।' (पा०सू० ५। २।१)—इस सूत्रके अनुसार धान्योंकी उत्पत्तिके आधारभूत क्षेत्रके अर्थमें षष्ठ्यन्त समर्थ धान्य-वाचक शब्दसे 'खञ्' प्रत्यय होता है। (स्कन्दने कात्यायनको जिसका उपदेश किया, उस कौमार-व्याकरणमें भी यह नियम देखा जाता है।) इसके अनुसार प्रियंगोर्भवनं क्षेत्रं प्रयंगवीनम्—प्रियंगु (कँगनी) की उत्पत्तिके आधारभूत क्षेत्रका बोध करानेके लिये 'खञ्' प्रत्यय होनेपर ('ख' के स्थानपर 'ईन्' आदेश हो जानेपर) 'प्रैयंगवीनम्'—यह पद बनता है। इसका अर्थ है—'प्रियंगु (कँगनी) की उपज देनेवाला खेत'। इसी तरह मूंग, कोदो आदिकी उत्पत्तिके उपयुक्त खेतको 'मौद्गीन' तथा 'कौद्रवीण' कहते हैं। यहाँ 'मुद्ग' शब्दसे 'खञ्' होनेपर 'मौद्गीन' शब्द और 'कोद्रव' शब्दसे 'खञ्' होनेपर 'कौद्रवीण' शब्दकी सिद्धि होती है। 'विदेहस्यापत्यम्' (विदेहका पुत्र)—इस अर्थमें 'विदेह' शब्दसे 'अण्' प्रत्यय होनेपर 'वैदेहः' पदकी सिद्धि होती है। (इन सबमें आदि स्वरकी वृद्धि होती है।) अकारान्त शब्दसे 'अपत्य' अर्थमें 'अण्' का बाधक 'इ' प्रत्यय होता है। आदि स्वरकी वृद्धि तथा अन्तिम स्वरका लोप। 'दक्षस्यापत्यं—दाक्षिः, दशरथस्यापत्यं दाशरथिः।' इत्यादि पद बनते हैं। 'नडादिभ्यः फक्।' (४।१।९९)—इस सूत्रके नियमानुसार 'नड'-आदि शब्दोंसे 'फक्' प्रत्यय होता है। 'फ' के स्थानमें 'आयन' होता है। अतएव 'नडस्य गोत्रापत्यं नाडायनः, चरस्य गोत्रापत्यं चारायणः।' इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। ('कित्' होनेके कारण आदि वृद्धि हो जाती है।) इसी तरह 'अश्वस्य गोत्रापत्यम्, आश्वायनः' होता है। इसमें 'अश्वादिभ्यः फञ्।' (४। १। ११०)—इस सूत्रके अनुसार 'फञ्' प्रत्यय होता है। ('गोत्रे कुञ्जादिभ्यः फञ्।' ४। १।९८) यह भी फञ्-विधायक सूत्र है। ब्रध्न, शङ्ख, शकट आदि शब्द कुञ्जादिके अन्तर्गत हैं, अतएव 'शाङ्खायनः', 'शाकटायनः' आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं।) 'गर्गादिभ्यो यञ्' (४। १। १०५)—इस सूत्रके अनुसार गर्ग, वत्स आदि शब्दोंसे गोत्रापत्यार्थक 'यञ्' प्रत्यय होनेपर 'गार्ग्यः', 'वात्स्यः' इत्यादि रूप बनते हैं। 'स्त्रीभ्यो ढक्।' (४।१।१२०) के नियमानुसार स्त्रीप्रत्ययान्त शब्दोंसे 'अपत्य' अर्थमें 'ढक्' प्रत्यय होता है। फिर उसके स्थानमें 'एय' होता है। जैसे 'विनतायाः पुत्रः' (विनताका पुत्र) 'वैनतेय' कहलाता है। 'सुमित्रा' आदि शब्द बाह्वादिगणमें पठित हैं, अतः उनसे अपत्यार्थमें 'इञ्' प्रत्यय होता है। अतएव 'सौमित्रेयः' न होकर 'सौमित्रिः' रूप बनता है। 'चटका' शब्दसे 'चटकाया ऐरक्।' (४।१।१२८)—इस सूत्रके विधानानुसार 'ऐरक्' प्रत्यय होनेपर 'चटकाया अपत्यं पुमान्' (चटकाका नर पुत्र) 'चाटकैर' कहलाता है। 'गोधा' शब्दसे 'ढ्रक्' का विधान है। 'गोधाया ढ्रक्।' (४। १। १२९) अतः गोधाका अपत्य 'गोधेर' कहलाता है। 'आरगुदीचाम्।' (४।१।१३०) के नियमानुसार 'आरक्' प्रत्यय होनेपर 'गौधारः' रूप बनता है। ऐसा वैयाकरणोंने बताया है॥ ९–११॥
'क्षत्र' शब्दसे 'घ' प्रत्यय होनेपर 'घ' के स्थानमें 'इय' होनेके कारण 'क्षत्रिय' शब्द सिद्ध होता है। 'क्षत्राद् घः।' (४। १। १३८)—'जाति' बोधक 'घ' प्रत्यय होनेपर ही 'क्षत्रियः' रूप बनता है। अपत्यार्थमें तो 'इञ्' होकर 'क्षत्रस्यापत्यं पुमान् क्षात्रिः'—यही रूप बनेगा। 'कुलात् खः।' (४। १। १३९) के अनुसार 'कुल' शब्दसे 'ख' प्रत्यय और 'ख' के स्थानमें 'ईन' आदेश होनेपर 'कुलीनः'—इस पदकी सिद्धि होती है। 'कुर्वादिभ्यो ण्यः।' (४।१।
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