अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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'धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ्।' (पा०सू० ५। २।१)—इस सूत्रके अनुसार धान्योंकी उत्पत्तिके आधारभूत क्षेत्रके अर्थमें षष्ठ्यन्त समर्थ धान्य-वाचक शब्दसे 'खञ्' प्रत्यय होता है। (स्कन्दने कात्यायनको जिसका उपदेश किया, उस कौमार-व्याकरणमें भी यह नियम देखा जाता है।) इसके अनुसार प्रियंगोर्भवनं क्षेत्रं प्रयंगवीनम्—प्रियंगु (कँगनी) की उत्पत्तिके आधारभूत क्षेत्रका बोध करानेके लिये 'खञ्' प्रत्यय होनेपर ('ख' के स्थानपर 'ईन्' आदेश हो जानेपर) 'प्रैयंगवीनम्'—यह पद बनता है। इसका अर्थ है—'प्रियंगु (कँगनी) की उपज देनेवाला खेत'। इसी तरह मूंग, कोदो आदिकी उत्पत्तिके उपयुक्त खेतको 'मौद्गीन' तथा 'कौद्रवीण' कहते हैं। यहाँ 'मुद्ग' शब्दसे 'खञ्' होनेपर 'मौद्गीन' शब्द और 'कोद्रव' शब्दसे 'खञ्' होनेपर 'कौद्रवीण' शब्दकी सिद्धि होती है। 'विदेहस्यापत्यम्' (विदेहका पुत्र)—इस अर्थमें 'विदेह' शब्दसे 'अण्' प्रत्यय होनेपर 'वैदेहः' पदकी सिद्धि होती है। (इन सबमें आदि स्वरकी वृद्धि होती है।) अकारान्त शब्दसे 'अपत्य' अर्थमें 'अण्' का बाधक 'इ' प्रत्यय होता है। आदि स्वरकी वृद्धि तथा अन्तिम स्वरका लोप। 'दक्षस्यापत्यं—दाक्षिः, दशरथस्यापत्यं दाशरथिः।' इत्यादि पद बनते हैं। 'नडादिभ्यः फक्।' (४।१।९९)—इस सूत्रके नियमानुसार 'नड'-आदि शब्दोंसे 'फक्' प्रत्यय होता है। 'फ' के स्थानमें 'आयन' होता है। अतएव 'नडस्य गोत्रापत्यं नाडायनः, चरस्य गोत्रापत्यं चारायणः।' इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। ('कित्' होनेके कारण आदि वृद्धि हो जाती है।) इसी तरह 'अश्वस्य गोत्रापत्यम्, आश्वायनः' होता है। इसमें 'अश्वादिभ्यः फञ्।' (४। १। ११०)—इस सूत्रके अनुसार 'फञ्' प्रत्यय होता है। ('गोत्रे कुञ्जादिभ्यः फञ्।' ४। १।९८) यह भी फञ्-विधायक सूत्र है। ब्रध्न, शङ्ख, शकट आदि शब्द कुञ्जादिके अन्तर्गत हैं, अतएव 'शाङ्खायनः', 'शाकटायनः' आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं।) 'गर्गादिभ्यो यञ्' (४। १। १०५)—इस सूत्रके अनुसार गर्ग, वत्स आदि शब्दोंसे गोत्रापत्यार्थक 'यञ्' प्रत्यय होनेपर 'गार्ग्यः', 'वात्स्यः' इत्यादि रूप बनते हैं। 'स्त्रीभ्यो ढक्।' (४।१।१२०) के नियमानुसार स्त्रीप्रत्ययान्त शब्दोंसे 'अपत्य' अर्थमें 'ढक्' प्रत्यय होता है। फिर उसके स्थानमें 'एय' होता है। जैसे 'विनतायाः पुत्रः' (विनताका पुत्र) 'वैनतेय' कहलाता है। 'सुमित्रा' आदि शब्द बाह्वादिगणमें पठित हैं, अतः उनसे अपत्यार्थमें 'इञ्' प्रत्यय होता है। अतएव 'सौमित्रेयः' न होकर 'सौमित्रिः' रूप बनता है। 'चटका' शब्दसे 'चटकाया ऐरक्।' (४।१।१२८)—इस सूत्रके विधानानुसार 'ऐरक्' प्रत्यय होनेपर 'चटकाया अपत्यं पुमान्' (चटकाका नर पुत्र) 'चाटकैर' कहलाता है। 'गोधा' शब्दसे 'ढ्रक्' का विधान है। 'गोधाया ढ्रक्।' (४। १। १२९) अतः गोधाका अपत्य 'गोधेर' कहलाता है। 'आरगुदीचाम्।' (४।१।१३०) के नियमानुसार 'आरक्' प्रत्यय होनेपर 'गौधारः' रूप बनता है। ऐसा वैयाकरणोंने बताया है॥ ९–११॥
'क्षत्र' शब्दसे 'घ' प्रत्यय होनेपर 'घ' के स्थानमें 'इय' होनेके कारण 'क्षत्रिय' शब्द सिद्ध होता है। 'क्षत्राद् घः।' (४। १। १३८)—'जाति' बोधक 'घ' प्रत्यय होनेपर ही 'क्षत्रियः' रूप बनता है। अपत्यार्थमें तो 'इञ्' होकर 'क्षत्रस्यापत्यं पुमान् क्षात्रिः'—यही रूप बनेगा। 'कुलात् खः।' (४। १। १३९) के अनुसार 'कुल' शब्दसे 'ख' प्रत्यय और 'ख' के स्थानमें 'ईन' आदेश होनेपर 'कुलीनः'—इस पदकी सिद्धि होती है। 'कुर्वादिभ्यो ण्यः।' (४।१।
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१५१) के अनुसार अपत्यार्थमें ‘कुरु’ शब्दसे ‘ण्य’ प्रत्यय होनेपर आदिवृद्धिपूर्वक गुण-वान्तादेश होकर ‘कौरव्यः’ इत्यादि प्रयोग बनते हैं। ‘शरीरावयवाद् यत्।’ (५।१।६) के नियमानुसार शरीरावयववाचक शब्दोंसे ‘यत्’ प्रत्यय होनेपर ‘मूर्धन्य’ तथा ‘मुख्य’ आदि शब्द सिद्ध होते हैं। ‘सुगन्धिः’—‘शोभनो गन्धो यस्य सः’—इस लौकिक विग्रहमें बहुव्रीहि समास करनेके पश्चात् ‘गन्धस्येदुत्पूतिसुसुरभिभ्यः।’ (५।४।१३५)—इस सूत्रके अनुसार अन्तमें ‘इ’ हो जानेसे ‘सुगन्धिः’—इस शब्दरूपकी सिद्धि होती है॥ १२॥
‘तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच्।’ (५।२।३६)—तारकादिगणसे ‘इतच्’ प्रत्यय होता है, इस नियमके अनुसार ‘तारकाः संजाता अस्य’ (तारे उग आये हैं, इसके) इस अर्थमें ‘तारका’ शब्दसे ‘इतच्’ प्रत्यय होनेपर ‘तारकितं नभः’ इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। ‘कुण्डमिव ऊधो यस्याः सा’ (कुण्डके समान है थन जिसका, वह)—इस लौकिक विग्रहमें बहुव्रीहि समास होनेपर ‘ऊधसोऽनङ्।’ (५।४।१३१)—इस सूत्रके अनुसार ऊधोऽन्त बहुव्रीहिसे स्त्रीलिङ्गमें ‘अनङ्’ होता है। इस प्रकार ‘अनङ्’ होनेपर ‘बहुव्रीहेरूथसो ङीष्।’ (४।१।२५)—इस सूत्रसे ‘ङीष्’ प्रत्यय होता है। तत्पश्चात् अन्यान्य प्रक्रियात्मक कार्य होनेके बाद ‘कुण्डोध्नी’ पदकी सिद्धि होती है। ‘पुष्यं धनुर्यस्य स पुष्पधन्वा’ (कामदेवः), ‘सुष्ठु धनुर्यस्य स सुधन्वा’ (श्रेष्ठ धनुष धारण करनेवाला योद्धा)—इन दोनों बहुव्रीहि-पदोंमें ‘धनुषश्च।’ (५।४।१३२)-इस सूत्रसे ‘अनङ्’ होता है। तत्पश्चात् सुबादि कार्य होनेपर ‘पुष्पधन्वा’ तथा ‘सुधन्वा’—ये दोनों पद सिद्ध होते हैं॥ १३॥
‘वित्तेन वित्तः इति वित्तचुञ्चुः।।’—जो धन-वैभवके द्वारा प्रसिद्ध हो, वह ‘वित्तचुञ्चुः’ है। शब्दशास्त्रमें जिसकी प्रसिद्धि है, वह ‘शब्दचुञ्चु’ कहलाता है। ये दोनों शब्द ‘चुञ्चुप्’ प्रत्यय होनेपर निष्पन्न होते हैं। इसी अर्थमें ‘चणप्’ प्रत्यय भी होता है। यथा—‘केशचणः’। जो अपने केशोंसे विदित है, वह ‘केशचणः’ कहा गया है। (इन प्रत्ययोंका विधान ‘तेन वित्तश्चुञ्चुप्चणपौ।’ (५।२।२६) —इस सूत्रके अनुसार होता है। ‘पटु’ शब्दसे ‘प्रशस्त’ अर्थमें ‘रूप’ प्रत्यय होनेपर ‘पटुरूपः’ पद बनता है। ‘प्रशस्तः पटुः-पटुरूपः।’ जो प्रशस्त पटु है, वह ‘पटुरूप’ कहा जाता है। यह ‘रूप’ प्रत्यय ‘सुबन्त’ और ‘तिङन्त’—दोनों प्रकारके शब्दोंसे होता है। ‘तिङन्त’ शब्दसे इस प्रकार होता है—प्रशस्तं पचति इति ‘पचतिरूपम्।’ ‘पचतिरूपम्’ का अर्थ है—अच्छी तरह पकाता है। अतिशयार्थ-द्योतनके लिये ‘तमप्’, ‘इष्ठन्’, ‘तरप्’ और ‘ईयसुन्’—ये प्रत्यय होते हैं। इनमेंसे ‘तरप्’ और ‘ईयसुन्’—ये दोनों दोमेंसे एककी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं और ‘तमप्’ तथा ‘इष्ठन्’—ये दोनों बहुतोंमेंसे एककी श्रेष्ठता बताते हैं। पाणिनिने इसके लिये दो सूत्रोंका उल्लेख किया है—‘अतिशायने तमबिष्ठनौ।’ (५।३।५५) तथा ‘द्विवचनविभज्योत्तरपदे तरबीयसुनौ।’ (५।३।५७)। इसके सिवा, यदि किसी द्रव्यका प्रकर्ष न बताना हो तो ‘तरप्’ ‘तमप्’ प्रत्ययोंसे परे ‘आम्’ हो जाता है। यह ‘आम्’ ‘किम्’ शब्द, ‘एदन्त’ शब्द, तिङन्त पद तथा अव्यय पदसे भी होते हैं। इन सब नियमोंके अनुसार ‘अयम् अनयोरतिशयेन पटुः।’ (यह इन दोनोंमें अधिक पटु है)—इस अर्थको बतानेके लिये ‘पटु’ शब्दसे ‘ईयसुन्’ प्रत्यय करनेपर विभक्तिकार्यपूर्वक ‘पटीयान्’ रूप होता है। ‘अक्ष’ शब्दसे ‘तरप्’ प्रत्यय होनेपर ‘अक्षतर’ और ‘पटु’ आदि शब्दोंसे उक्त प्रत्यय होनेपर ‘पटुतरः’ आदि रूप बनते हैं। तिङन्तसे ‘तरप्’ प्रत्यय करके अन्तमें
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‘आम्’ करनेपर ‘पचतितराम्’ रूप बनता है। ‘तमप्’ और ‘आम्’ प्रत्यय होनेपर ‘अटतितमाम्’ इत्यादि उदाहरण उपलब्ध होते हैं॥ १४-१५॥
किंचित् न्यूनता तथा असमासिका भाव प्रकट करनेके लिये ‘सुबन्त’ और ‘तिङन्त’ शब्दोंसे ‘कल्पप्’, ‘देश्य’ तथा ‘देशीयर्’ प्रत्यय होते हैं। ‘ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः’ (५। ३। ६७)—इस सूत्रके अनुसार ‘मृदु’ शब्दसे ‘कल्पप्’ प्रत्यय होनेपर ‘मृदुकल्पः’ प्रयोग बनता है। इसका अर्थ हुआ—‘कुछ कम मृदु या कोमल’। ‘ईषदूनः इन्द्रः—इन्द्रकल्पः। ईषदूनः अर्कः—अर्ककल्पः।’ इत्यादि उदाहरण इसी तरह जाननेयोग्य हैं। ‘ईषदूनः राजा’—इस अर्थमें ‘राजन्’ शब्दसे ‘देशीयर्’ प्रत्यय करनेपर ‘राजदेशीयः’ तथा ‘देश्य’ प्रत्यय करनेपर ‘राजदेश्यः’—ये रूप बनते हैं। इसी तरह ‘पटु’ शब्दसे ‘जातीय’ प्रत्यय करनेपर ‘पटुजातीयः’ पद बनता है। इसका अर्थ है—पटुप्रकार—पटुके प्रकारका। ‘थल्’ प्रत्यय प्रकारमात्रका बोधक है, किंतु ‘जातीयर्’ प्रत्यय ‘प्रकारवान्’ का बोध कराता है। [इसका विधायक पा० सू० है— ‘प्रकारवचने जातीयर्।’ ५। ३। ६९] ‘प्रमाणे द्वयसज्दध्नञ्मात्रचः।’ (५। २। ३७)—इस सूत्रके अनुसार ‘जल’ आदिका प्रमाण बतानेके लिये ‘सुबन्त’ शब्दोंसे ‘द्वयसच्’ ‘दध्नच्’ तथा ‘मात्रच्’ प्रत्यय होते हैं। इस नियमसे ‘मात्रच्’ प्रत्यय होनेपर ‘जानुमात्रम्’ पद बनता है। इसका अर्थ है—घुटनेतक (पानी है)। ‘ऊरु’ शब्दसे ‘द्वयसच्’ प्रत्यय करनेपर ‘ऊरुद्वयसम्’ तथा ‘दध्नच्’ प्रत्यय करनेपर ‘ऊरुदध्नम्’—ये प्रयोग बनते हैं॥ १६-१७॥
‘संख्याया अवयवे तयप्।’ (पा०सू० ५। २। ४२)—इस सूत्रके अनुसार ‘पञ्चावयवा यस्य तत्’ (पाँच अवयव हैं, जिसके वह) इस अर्थमें ‘पञ्चन्’ शब्दसे ‘तयप्’ प्रत्यय करनेपर ‘पञ्चतयम्’— यह रूप बनता है। ‘द्वारं रक्षति, द्वारे नियुक्तो वा दौवारिकः’—जो द्वारकी रक्षा करता है, अथवा द्वारपर रक्षाके लिये नियुक्त है, वह ‘दौवारिक’ है। ‘रक्षति।’ (पा० सू० ४। ४। ३३) अथवा ‘तत्र नियुक्तः।’ (पा०सू० ४। ४। ६९) सूत्रसे यहाँ ‘ठक्’ प्रत्यय हुआ है। ‘ठ’ के स्थानमें ‘इक’ आदेश हो जाता है तथा ‘द्वारादीनां च।’ (७। ३। ४)—इस सूत्रसे ‘ऐच्’ का आगम होता है। फिर विभक्तिकार्य होनेपर ‘दौवारिकः’ इस पदकी सिद्धि होती है। इस प्रकार ‘ठक्’ प्रत्यय होनेपर ‘दौवारिक’ शब्दकी सिद्धि बतायी गयी है। यहाँतक ‘तद्धितकी सामान्यवृत्ति’ कही गयी। अब ‘अव्ययसंज्ञक तद्धित’का निरूपण किया जाता है॥ १८॥
‘यस्मादिति यतः’, ‘तस्मादिति ततः’—यहाँ ‘पञ्चम्यास्तसिल्।’ (५। ३। ७) सूत्रके अनुसार ‘तसिल्’ प्रत्यय होता है। इकार और लकारकी इत्संज्ञा होकर उनका लोप हो जाता है। ‘तसिल्’ प्रत्यय विभक्तिसंज्ञक होनेके कारण ‘त्यदादीनामः।’ (७। २। १०२) के नियमानुसार अकारान्तादेश हो जाता है। अतः, ‘यत्’ की जगह ‘य’ और तत् की जगह ‘त’ होनेसे ‘यतः’, ‘ततः’—ये रूप बनते हैं। ‘तसिलादयः प्राक् पाशपः।’ (‘तसिल्’ आदिसे लेकर ‘पाशप्’ प्रत्ययके पूर्वतक जितने प्रत्यय विहित या अभिहित हुए हैं, उन सबकी ‘अव्ययसंज्ञा’ होती है)—इस परिगणनाके अनुसार ‘यतः’, ‘ततः’ आदि शब्द ‘अव्यय’ माने गये हैं। ‘तसिल्’ आदिमें ‘त्रल्’ प्रत्यय भी आता है। इसका विधायक पाणिनिसूत्र है—‘सप्तम्यास्त्रल्।’ (५। ३। १०)। ‘यस्मिन्निति यत्र’, ‘तस्मिन्निति तत्र’—इस लौकिक विग्रहमें ‘त्रल्’ प्रत्यय होनेपर ‘यस्मिन् त्र’, ‘तस्मिन् त्र।’ इस अवस्थामें ‘कृत्तद्धितसमासाश्च’ (१।२।४६) से प्रातिपदिक
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संज्ञा, ‘सुपो धातुप्रातिपदिकयोः।’ (२। ४। ७१) सूत्रसे विभक्तिका लोप और ‘त्यदादीनामः।’ (७। २। १०२) सूत्रसे अकारान्तादेश होनेपर ‘यत्र, तत्र’—इन पदोंकी सिद्धि बतायी गयी है। ‘अस्मिन् काले’—इस लौकिक विग्रहमें ‘अधुना।’ (५। ३। १७) सूत्रसे ‘अधुना’ प्रत्यय होने ‘अस्मिन् अधुना’ इस अवस्थामें विभक्तिलोप, ‘इदम्’ के स्थानमें ‘इश्’ अनुबन्धलोप तथा ‘यस्येति च।’ (६। ४। १४८) से इकारलोप होनेपर ‘अधुना’ की सिद्धि हुई। इसी अर्थमें ‘दानीम्’ प्रत्यय होनेपर ‘इदम्’ के स्थानमें ‘इ’ होकर ‘इदानीम्’ रूप बनता है। ‘सर्वस्मिन् काले’—इस विग्रहमें ‘सर्वैकान्यकिंयत्तदः काले दा’ (५। ३। १५)—इस सूत्रसे ‘दा’ प्रत्यय होनेपर ‘सर्वदा’ रूप बनता है। ‘तस्मिन् काले—तर्हि’, ‘कस्मिन् काले—कर्हि’ यहाँ ‘तत्’ और ‘किम्’ शब्दोंसे ‘काल’ अर्थमें ‘अनद्यतने र्हिल्न्यतरस्याम्।’ (५। ३। २१)—इस सूत्रसे ‘र्हिल्’ प्रत्यय हुआ। फिर पूर्ववत् प्रातिपदिकावयव विभक्तिका लोप होकर ‘त्यदादीनामः।’ (७। २। १०२)—इस सूत्रसे ‘तत्’ के स्थानपर ‘त’ और ‘किमः कः।’ (७। २। १०३) सूत्रसे ‘किम्’ के स्थानमें ‘क’ होनेपर ‘तर्हि’ और ‘कर्हि’—इन पदोंकी सिद्धि कही गयी है। ‘अस्मिन्’—इस विग्रहमें ‘त्रल्’ प्रत्ययकी प्राप्ति हुई, किंतु उसे बाधित करके ‘इदमो हः।’ (५। ३। ११)—इस सूत्रसे ‘हः’ प्रत्यय हो गया। फिर ‘इदम्’ के स्थानमें इकार होनेपर ‘इह’ रूपकी सिद्धि हुई ॥ १९-२० ॥
‘येन प्रकारेण यथा, केन प्रकारेण कथम्’—इन स्थलोंपर ‘प्रकारवचने थाल्।’ (५। ३। २३) के अनुसार ‘थाल्’ प्रत्यय होनेपर ‘यथा’, ‘तथा’ आदि रूप होते हैं। ‘किम्’ शब्दसे ‘किम्श्च।’ (५। ३। २५) के अनुसार ‘थम्’ प्रत्यय होता है। अतः ‘कथम्’ इस रूपकी सिद्धि होती है। जो शब्द दिशाके अर्थमें रूढ़ होते हैं, ऐसे ‘दिशा’, ‘देश’ और ‘काल’ अर्थमें प्रयुक्त शब्दोंसे स्वार्थमें ‘अस्ताति’ प्रत्यय होता है। श्लोकमें ‘पूर्वस्याम्’ यह सप्तमी विभक्तिका, ‘पूर्वस्याः’ यह पञ्चमी विभक्तिका तथा ‘पूर्वा’ यह प्रथमा विभक्तिका प्रतिरूप है। अर्थात् उक्त शब्द यदि सप्तम्यन्त, पञ्चम्यन्त और प्रथमान्त हों, तभी उनसे ‘अस्ताति’ प्रत्यय होता है। ‘पूर्व’, ‘अधर’ और ‘अवर’ शब्दोंके स्थानमें क्रमशः ‘पुर’ ‘अध’ और ‘अव’ आदेश होते हैं। ‘अस्ताति’ के स्थानमें ‘असि’ प्रत्ययका भी विधान होता है। इन निर्दिष्ट नियमोंके अनुसार ‘पूर्वस्यां दिशि’, ‘पूर्वस्याः दिशः’ ‘पूर्वा वा दिक्’—इन लौकिक विग्रहोंमें ‘पुरः’, ‘पुरस्तात्’—ये रूप होते हैं। उसी प्रकार ‘अधः, अधस्तात्’—‘अवः, अवस्तात्’—इत्यादि रूप जानने चाहिये। इनके वाक्यप्रयोग ‘पुरस्तात् संचरेद्’, ‘पुरस्ताद् गच्छेत्’ इत्यादि रूपमें होते हैं। ‘समाने अहनि’—इस अर्थमें ‘सद्यः’—इस शब्दका प्रयोग होता है। ‘समान’का ‘स’ और ‘अहनि’ के स्थानमें ‘द्यस्’ निपातित होकर ‘सद्यः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘पूर्वस्मिन् वर्षे परुत्’—‘पूर्वतरेवर्षे परारि’ इति (पूर्व वर्षमें—इस अर्थको बतानेके लिये ‘परुत्’ शब्दका प्रयोग होता है तथा पूर्वसे पूर्व वर्षमें—इस अर्थका बोध करानेके लिये ‘परारि’ शब्दका प्रयोग होता है।) पहलेमें ‘पूर्व’ शब्दके स्थानमें ‘पर’ आदेश होता है और उससे ‘उत्’ प्रत्यय किया जाता है। दूसरेमें ‘आरि’ प्रत्यय होता है और ‘पूर्व’ के स्थानमें ‘पर’ आदेश। ‘अस्मिन् संवत्सरे’ (इस वर्षमें) इस अर्थका बोध करानेके लिये ‘ऐषमः’ पदका प्रयोग होता है। इसमें ‘इदम्’ शब्दके स्थानमें ‘इकार’ आदेश और उससे परे ‘समसण्’ प्रत्ययका निपातन होता है। अकार-णकारकी
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इत्संज्ञा हो जानेपर 'इ+समः'—इस अवस्थामें आदिवृद्धि और सकारके स्थानमें मूर्धन्यादेश होनेपर 'ऐषमः' रूपकी सिद्धि होती है। 'परस्मिन्नहनि' (दूसरे दिन)—के अर्थमें 'पर' शब्दसे 'एद्यवि' प्रत्यय करनेपर 'परेद्यवि'—यह रूप होता है। 'अस्मिन्नहनि' (आजके दिन) इस अर्थमें 'इदम्' शब्दसे 'द्य' प्रत्यय होता है और 'इदम्' के स्थानमें 'अ' हो जाता है। इस प्रकार 'अद्य'—यह रूप बनता है। 'पूर्वस्मिन् दिने' (पहले दिन)—इस अर्थमें 'पूर्व' शब्दसे 'एद्युस्' प्रत्यय होता है तो 'पूर्वेद्युः' यह रूप बनता है। इसी प्रकार 'परस्मिन् दिने'—'परेद्युः', 'अन्यस्मिन् दिने'—'अन्येद्युः' इत्यादि प्रयोग जानने चाहिये। 'दक्षिणस्यां दिशि वसेत्' (दक्षिण दिशामें निवास करे।)—इस अर्थमें 'दक्षिणा' और 'दक्षिणाहि'—ये रूप बनते हैं। पहलेमें 'दक्षिणादाच्' (५। ३। ३६)—इस सूत्रसे 'आच्' प्रत्यय होता है और दूसरेमें 'आहि च दूरे।' (५। ३। ३७)—इस सूत्रसे 'आहि' प्रत्यय किया गया है। 'दक्षिणाहि वसेत्' का अर्थ हुआ—'दक्षिण दिशामें दूर निवास करे।' 'दक्षिणोत्तराभ्यामतसुच्।' (५। ३। २८) तथा 'उत्तराधरदक्षिणादातिः।' (५। ३। ३४)—इन सूत्रोंके अनुसार 'दक्षिणतः', 'दक्षिणात्', 'उत्तरतः', 'उत्तरात्'—ये दो रूप भी बनते हैं। 'उत्तरस्यां दिशि वसेत्' (उत्तर दिशामें निवास करे)—इस अर्थमें 'उत्तराच्च।' (५। ३। ३८)—इस सूत्रके अनुसार 'आच्' और 'आहि' प्रत्यय होनेपर 'उत्तरा' तथा 'उत्तराहि'—ये दोनों रूप सिद्ध होते हैं। 'अस्ताति' प्रत्ययके विषयभूत 'ऊर्ध्व' शब्दसे 'रिल्' और 'रिष्टातिल्' प्रत्यय होते हैं तथा 'ऊर्ध्व' के स्थानमें 'उप' आदेश हो जाता है। इस प्रकार 'उपरि वसेत्', 'उपरिष्टाद् भवेत्' इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'उत्तर' शब्दसे 'एनप्' प्रत्यय होनेपर 'उत्तरेण' होता है। पूर्वोक्त 'दक्षिणा' शब्दकी सिद्धि 'आच्' प्रत्यय होनेसे होती है—इसका निर्देश पहले किया जा चुका है। 'आहि' प्रत्यय होनेपर 'दक्षिणाहि' पद बनता है—यह भी कहा जा चुका है। 'दक्षिणाहि वसेत्' इसका अर्थ भी दिया जा चुका है। 'संख्याया विधायार्थेधा।' (५। ३। ४२)—इस सूत्रके अनुसार संख्यावाची शब्दोंसे 'धा' प्रत्यय करनेपर द्विधा, त्रिधा, चतुर्धा, पञ्चधा इत्यादि रूप होते हैं। 'द्विधा' का अर्थ है—दो प्रकारका। 'एक' शब्दसे प्रकार अर्थमें पूर्वोक्त नियमानुसार जो 'धा' प्रत्यय होता है, उसके स्थानमें 'ध्यमुञ्' हो जाता है। 'उञ्' की इत्संज्ञा हो जाती है। 'ध्यम्' शेष रह जाता है। यथा—ऐकध्यम्, 'एकधा' (द्रष्टव्य पा० सू० ५। ३। ४४)। 'ऐकध्यं कुरु त्वम्' इस वाक्यका अर्थ है—'तुम एक ही प्रकारसे कर्म करो।' इसी प्रकार 'द्वि' और 'त्रि' शब्दसे 'धा' के स्थानमें 'धमुञ्' होता है। विकल्पसे (द्रष्टव्य—पा० सू० ५। ३। ४५)। 'धमु' होनेपर 'द्वैधम्', 'त्रैधम्' रूप होते हैं और 'धमुञ्' न होनेपर 'द्विधा', 'त्रिधा'। 'द्वि', 'त्रि' शब्दोंसे सम्बद्ध 'धा' के स्थानमें 'एधाच्' भी होता है। यथा—द्वेधा, त्रेधा। ये सभी प्रयोग सुष्ठुतर हैं॥ २१—२७॥
यहाँतक 'निपातसंज्ञक तद्धित' (अथवा अव्ययतद्धित) प्रत्यय बताये गये। अब 'भाववाचक तद्धितका' वर्णन किया जाता है।—'तस्य भावस्त्वतलौ।' (५। १। ११९)—इस सूत्रके अनुसार भावबोधक प्रत्यय दो हैं—'त्व' और 'तल्'। प्रकृतिजन्य बोधमें जो प्रकार होता है, उसे 'भाव' कहते हैं। 'पटु' शब्दसे 'पटोर्भावः'—इस अर्थमें 'त्व' प्रत्यय होनेपर 'पटुत्वम्' रूप होता है और 'तल्' प्रत्यय होनेपर 'पटुता'।
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'पृथौर्भावः' (पृथुका भाव)—इस अर्थमें 'पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा।' (५।१।१२२)—इस सूत्रसे वैकल्पिक 'इमनिच्' प्रत्यय होनेपर 'प्रथिमा'—यह रूप बनता है। 'प्रथिमा' का अर्थ है—मोटापन। 'सुखस्य भावः कर्म वा' (सुखका भाव या कर्म)—इस अर्थमें 'गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च।' (५।१।१२४)—इस सूत्रके अनुसार 'ष्यञ्' प्रत्यय होनेपर 'सौख्यम्'—इस पदकी सिद्धि कही गयी है। 'स्तेनस्य भावः कर्म वा' (स्तेन—चोरका भाव या कर्म)—इस अर्थमें 'स्तेन' शब्दसे 'यत्' प्रत्यय और 'न'—इस समुदायका लोप हो जाता है। (द्रष्टव्य—पा० सू० ५।१।१२५)। इस प्रकार 'स्तेय' शब्दकी सिद्धि होती है। इसी प्रकार 'सख्युर्भावः कर्म वा' (सखाका भाव या कर्म)—इस अर्थमें 'य' प्रत्यय होनेपर 'सख्यम्' इस पदकी सिद्धि कही गयी है। यहाँ 'सख्युर्यः।' (५।१।१२६)—इस सूत्रसे 'य' प्रत्यय होता है। 'कपेर्भावः कर्म वा'—इस अर्थमें 'कपिज्ञात्योर्ढक्।' (५।१।१२७)—इस सूत्रसे 'ढक्' प्रत्यय होनेपर 'कापेयम्' पदकी सिद्धि होती है। 'सेना एव सैन्यम्'—यहाँ 'चतुर्वर्णादीनां स्वार्थ उपसंख्यानम्'— इस वार्तिकके अनुसार स्वार्थमें 'ष्यञ्' प्रत्यय होता है। 'शास्त्रीयात् पथः अनपेतम्' (शास्त्रीय पथसे जो भ्रष्ट नहीं हुआ है, वह)—इस अर्थमें 'धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते।' (४।४।९२)—इस सूत्रके अनुसार 'पथिन्' शब्दसे 'यत्' प्रत्यय होनेपर 'पथ्यम्'—यह रूप होता है। 'अश्वस्य भावः कर्म वा आश्वम्'—यहाँ 'अश्व' शब्दसे 'अञ्' हुआ है। ('उष्ट्रस्य भावः कर्म वा औष्ट्रम्'—यहाँ भी 'अञ्' प्रत्यय हुआ है।) 'कुमारस्य भावः कर्म वा कौमारम्'—इसमें भी 'कुमार' शब्दसे 'अञ्' प्रत्यय हुआ। 'यूनोर्भावः कर्म वा यौवनम्'—यहाँ भी पूर्ववत् 'युवन्' शब्दसे 'अञ्' प्रत्यय हुआ है। इन सबमें 'अञ्' प्रत्यय विधायक सूत्र है—'प्राणभृज्जातिवयोवचनोद्गात्रादिभ्योऽञ्' (५।१।१२९)। 'आचार्य' शब्दसे 'कन्' प्रत्यय होनेपर 'आचार्यकम्'—यह रूप बनता है। इसी तरह अन्य भी बहुत-से तद्धित प्रत्यय होते हैं, (उन्हें अन्य ग्रन्थोंसे जानना चाहिये) ॥ २८–३० ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'तद्धितान्त शब्दोंके रूपका कथन' नामक
तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५६ ॥
तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय
उणादिसिद्ध शब्दरूपोंका दिग्दर्शन
कुमार स्कन्द कहते हैं—कात्यायन! अब 'उणादि' प्रत्यय बताये जाते हैं, जो धातुसे परे होते हैं। 'कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्।' (१)—इस सूत्रके अनुसार 'कृ' आदि धातुओंसे 'उण्' प्रत्यय होता है। 'करोतीति कारुः।' (जो शिल्पकर्म करता है, वह 'कारु' कहलाता है। लोकभाषामें उसे 'शिल्पी' या 'कारीगर' कहते हैं)। 'कृ' धातुसे 'उण्' प्रत्यय होनेपर अनुबन्धलोप, वृद्धि तथा विभक्तिकार्य किये जाते हैं। इससे 'कारुः'— इस पदकी सिद्धि होती है। 'जि' धातुसे 'उण्' होनेपर 'जायुः' रूप बनता है। 'जायुः' का अर्थ है—औषध। इसकी व्युत्पत्ति
७७२ * अग्निपुराण *
इस प्रकार समझनी चाहिये—'जयति रोगान् इति जायुः।' 'मि' धातुसे वही (उण्) प्रत्यय करनेपर 'मायुः'—यह पद सिद्ध होता है। 'मायुः' का अर्थ है—'पित्त'। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'मिनोति'—प्रक्षिपति देहे ऊष्माणम् इति मायुः।' इसी प्रकार 'स्वदते—रोचते इति स्वादुः।', 'साध्नोति परकार्यमिति साधुः।' इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। गोमायुः, आयुः—इत्यादि प्रयोग भी इसी तरह सिद्ध होते हैं। 'गोमायु' का अर्थ है—गीदड़ तथा 'आयुः' शब्द आयुर्वेदके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'उणादयो बहुलम्।'—(३।३।१) इस सूत्रके अनुसार 'उण्' आदि बाहुल्येन होते हैं। कहीं होते हैं, कहीं नहीं होते। 'आयुः', 'स्वादुः' तथा 'हेतु' आदि शब्द भी उणादिसिद्ध हैं। 'किंशारु' नाम है—धान्यके शूकका। 'किं शृणातीति किंशारुः'। यहाँ 'किं' पूर्वक 'शृ' धातुसे 'जुण्' होता है। 'ज्' तथा 'ण्' अनुबन्ध हैं। किंश्शृ+उ। वृद्धि होकर 'किंशारुः' बनता है। 'कृकवाकुः' का अर्थ है—मुर्गा या मोर। 'कृकेन गलेन वक्तीति कृकवाकुः।' 'कृके वचः कश्च'—इस उणादिसूत्रसे 'जुण्' प्रत्यय होनेपर कृक+वच्+जुण्—इस अवस्थामें अनुबन्धलोप, चकारको ककार और 'अत उपधायाः।' (पा० सू० ७।२।११६) से वृद्धि होती है। 'भरति बिभर्ति वा भरुः।' 'भृ' धातु से 'उ' प्रत्यय, गुण; विभक्तिकार्य-भरुः। इसका अर्थ है—भर्त्ता (स्वामी)। मरुः—जलहीन देश। मृ+उ गुणादेश, विभक्तिकार्य=मरुः। शी+उ=शयुः। इसका अर्थ है—सोया पड़ा रहनेवाला अजगर। त्सर+उ=त्सरुः-अर्थात् खड्गकी मूठ। 'स्वर्यन्ते प्राणा अनेन' इस लौकिक विग्रहमें 'उ' प्रत्यय होता है। फिर गुण होकर 'स्वरुः' पद बनता है। 'स्वरु' का अर्थ है—वज्र। त्रप्+उ=त्रपु। 'त्रपु' नाम है शीशेका। फल्ग्+उ=फल्गुः—सारहीन। अभिकाङ्क्षार्थक 'गृध्' धातुसे 'सुसुधागृधिभ्यः क्रन्', (१९२)—इस सूत्रके अनुसार 'क्रन्' प्रत्यय होनेपर गृध्+क्रन्, ककार-नकारकी इत्संज्ञा गृध्रः<sup>१</sup> अर्थात् गीध पक्षी। मदि+किरच्=मन्दिरम्। तिमि+किरच्=तिमिरम्। 'मन्दिर' का अर्थ गृह तथा 'तिमिर' का अर्थ अन्धकार है। 'सलिकल्य-निमहिभडिभण्डिशण्डिपिण्डितुण्डिकुकिभूभ्य इलच्।' (५७)—इस उणादि सूत्रके अनुसार गत्यर्थक 'षल्' धातुसे 'इलच्' प्रत्यय करनेपर 'सलिलम्' यह रूप बनता है। 'सलति गच्छति निम्नमिति सलिलम्'—यह इसकी व्युत्पत्ति है। 'सलिल' शब्द वारि-जलका वाचक है। (इसी प्रकार उक्त सूत्रसे ही कलिलम्, अनिलः, महिला—पृषोदरादित्वात् महेला—इत्यादि शब्द निष्पन्न होते हैं।) भण्डि+इलच्=भण्डिलम्। इसका अर्थ है—कल्याण। 'भण्डिल' शब्द दूतके अर्थमें भी आता है। ज्ञानार्थक 'विद्' धातुसे औणादिक 'क्रसु' प्रत्यय होनेपर विद्+क्रसु—इस अवस्थामें 'लशक्वतद्धिते।' (१।३।८) से ककारकी इत्संज्ञा तथा 'उपदेशेऽजनुनासिक इत्।' (१।३।२) से उकारकी इत्संज्ञा होती है; तत्पश्चात् विभक्ति-कार्य करनेपर 'विद्वान्'—यह रूप बनता है। 'विद्वान्' का अर्थ है—बुध या पण्डित। 'शेरतेऽस्मिन् राजबलानि इति शिविरम्।'—इस व्युत्पत्तिका अनुसार 'शीङ्' धातुसे 'किरच्' प्रत्यय, 'शीङ्' से 'वुक्' का
१. गृध+उ='गृधुः' रूप होता है। 'गृधुः' का अर्थ है—कामदेव।
२. 'विद्' धातुसे 'शतृ' प्रत्यय करनेपर 'विदेः शतुर्वसुः।' (७।१।३६)—इस सूत्रके अनुसार 'विद्' धातुसे परे विद्यमान 'शतृ' के स्थानमें 'वसु' आदेश हो जाता है। यह आदेश वैकल्पिक होता है। अतः 'विदन् और 'विद्वान्'—ये दोनों रूप विशुद्ध कृदन्त हैं। औणादिक 'विद्वान्' का अर्थ बुध है और कृदन्त 'विद्वान्' का अर्थ जानता हुआ है।
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आगम तथा 'शी' के दीर्घ ईकारके स्थानमें ह्रस्व आदेश होनेपर 'शिविर' शब्दकी सिद्धि होती है। 'शिविर' कहते हैं—सेनाकी छावनीको। अग्निपुराणके अनुसार गुप्त निवासस्थानको 'शिविर' कहते हैं॥ १–५॥
'अव्' धातुसे 'सितनिगमिमसि।' (७२) इत्यादि सूत्रके अनुसार 'तुट्' प्रत्यय होनेपर वकारके स्थानमें 'ऊठ्' होकर गुण होनेसे 'ओतु' शब्दकी सिद्धि होती है। 'ओतु' कहते हैं—बिलावको। अभिधानमात्रसे उणादि प्रत्यय होते हैं। 'कृ' धातुसे 'न' प्रत्यय करनेपर गुण होता है और नकारका णकारादेश हो जानेपर 'कर्ण' शब्दकी सिद्धि होती है। 'कर्ण'का अर्थ है—कान अथवा कन्यावस्थामें कुन्तीसे उत्पन्न सूर्यपुत्र कर्ण। 'वस्' धातुसे 'तुन्' प्रत्यय, अगार अर्थमें उसका 'णित्व' होकर वृद्धि होनेसे 'वास्तु' शब्द बनता है। 'वास्तु' का अर्थ है—गृहभूमि। 'जीव' शब्दसे 'आतुकन्' प्रत्यय और वृद्धि होकर 'जैवातृक' शब्दकी सिद्धि होती है। 'जैवातृक' का अर्थ है—चन्द्रमा। 'अनः शकटं वहति।'—इस लौकिक विग्रहमें 'वह' धातुसे 'क्विप्' प्रत्यय, 'अनस्'के सकारका डकार आदेश तथा 'वह' के वकारका सम्प्रसारण होनेपर 'अनडुह्' शब्द बनता है, उसके सुबन्तमें अनड्वान्, अनड्वाहौ इत्यादि रूप होते हैं। 'जीव्' धातुसे 'जीवेरातुः।' (८२)—इस सूत्रके अनुसार 'आतु' प्रत्यय करनेपर 'जीवातु' शब्दकी सिद्धि होती है। 'जीवातु' नाम है—संजीवन औषधका। प्रापणार्थक 'वह्' धातुसे 'वहिश्रिश्रुयुद्रुग्लाहात्वरिभ्यो नित्।' (५०१)—इस सूत्रके अनुसार 'नित्' प्रत्यय करनेपर विभक्तिकार्यके पश्चात् 'वह्निः'—इस रूपकी सिद्धि होती है। (इसी प्रकार श्रेणिः, श्रोणिः, योनिः, द्रोणिः, ग्लानिः, हानिः, तूर्णिः बाहुलकात् म्लानिः—इत्यादि पदोंकी सिद्धि होती है।) 'हृ' धातुसे 'इनच्' प्रत्यय होनेपर और अनुबन्धभूत चकारका लोप कर देनेपर 'ह्+इन', गुण तथा विभक्ति-कार्य=हरिणः—इस रूपकी सिद्धि होती है। 'श्यास्त्याह्वञ्विभ्य इनच्।' (२१३)—इस औणादिक सूत्रसे यहाँ 'इनच्' प्रत्यय हुआ है। 'हरिण' कहते हैं—मृगको। यह शब्द कामी तथा पात्रविशेषके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'अण्डन् कृसृभृवृञः।' (१३४)—इस सूत्रके अनुसार 'कृ' आदि धातुओंसे 'अण्डन्' प्रत्यय करनेपर क्रमशः—करण्डः, सरण्डः, भरण्डः, वरण्डः—ये रूप सिद्ध होते हैं। 'करण्ड' शब्द भाजन और भाण्डका वाचक है। मेदिनीकोशके अनुसार यह शहदके छत्तेके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'सरण्ड' शब्द चौपायेका वाचक है। कुछ विद्वान् 'सरण्ड' का अर्थ पक्षी मानते हैं। 'बाहुलकात् तृ प्लवनतरणयोः।' इस धातुसे भी 'अण्डन्' प्रत्यय होकर 'तरण्ड' पदकी सिद्धि होती है। 'तरण्ड' शब्द काठके बेड़ेके लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग मछली फँसानेके लिये बनायी गयी बंसीके डोरेको भी 'तरण्ड' कहते हैं। 'वरण्ड' शब्द सामवेदके लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग 'साम' और 'यजुष्'—दो वेदोंके लिये इसका प्रयोग मानते हैं। कुछ लोगोंके मतमें 'वरण्ड' शब्द मुखसम्बन्धी रोगका वाचक है। 'स्फायितञ्चिवञ्चि० (१७८)।' इत्यादि सूत्रसे वृद्ध्यर्थक 'स्फायि' धातुसे 'रक्' प्रत्यय होनेपर 'स्फार' पदकी सिद्धि होती है। 'स्फार' शब्दका अर्थ होता है—प्रभूत अर्थात् अधिक। 'मेदिनीकोश'के अनुसार 'स्फार' शब्द विकट अर्थमें आता है और करका या करवा आदि पात्रके भरते समय पानीमें जो बुलबुले उठते हैं, उनका वाचक भी 'स्फार' शब्द है। 'शुसिचिमीनां दीर्घश्च (१९३)।' इस सूत्रसे 'क्रन्' प्रत्यय और पूर्व ह्रस्वस्वरके स्थानमें दीर्घ कर देनेपर क्रमशः शूरः, सीरं, चीरं, मीरः—
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ये प्रयोग बनते हैं। ‘चीर’ शब्द गायके थन, वस्त्रविशेष तथा वल्कलके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ‘भी’ धातुसे ‘भियः क्रुकन्’—(१९९) इस सूत्रसे ‘क्रुकन्’ प्रत्यय करनेपर ‘भीरुकः’—इस पदकी सिद्धि होती है। इसके पर्यायवाची शब्द हैं—‘भीरु’ और ‘कातर’। ‘उच समवाये’—इस धातुसे ‘रन्’ प्रत्यय करनेपर ‘उग्रः’ पदकी सिद्धि होती है। ‘उग्रः’ का अर्थ है—प्रचण्ड। ‘वहियूभ्यां षित्।’—इस सूत्रके अनुसार ‘षित् असच्’ प्रत्यय करनेपर ‘वाहसः’, ‘यावसः’—ये दो रूप सिद्ध होते हैं। ‘वाहसः’ का अर्थ है—अजगर और ‘यावसः’ का अर्थ है—तृणसमूह। ‘वर्तमाने पृषद्वृहन्महज्जगच्छत्रिवच्च।’—इस सूत्रके अनुसार ‘गम्’ धातुसे ‘अत्’ प्रत्ययका निपातन हुआ। ‘गम्’ के स्थानमें ‘जग’ आदेश हुआ। इस प्रकार ‘जगत्’ शब्दकी सिद्धि हुई। ‘जगत्’ का अर्थ है—भूलोक। ‘ऋतन्यञ्जिवन्यञ्ज्यर्षि०’ इत्यादि (४५०) सूत्रके अनुसार ‘कृश’ धातुसे ‘आनुक्’ प्रत्यय करनेपर ‘कृशानुः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘कृशानुः’ का अर्थ है—अग्नि। द्योतते इति ज्योतिः। ‘द्युतेरिसिन्नादेशश्च जः।’ (२७५)—इस सूत्रके अनुसार ‘द्युत्’, धातुसे ‘इसिन्’ प्रत्यय, द्यकारका जकारादेश तथा गुण होनेपर ‘ज्योतिः’ इस पदकी सिद्धि होती है। ‘ज्योतिः’ का अर्थ है—अग्नि और सूर्य। ‘अर्च’ धातुसे ‘कृदाधाराचिकलिभ्यः।’ (३२७)—इस सूत्रके अनुसार ‘क’ प्रत्यय होनेपर ‘अर्कः’ पदकी सिद्धि होती है। ‘अर्क एवं अर्ककः’। स्वार्थे कः। ‘अर्कः’ पद सूर्यका वाचक है। ‘कृगृशृवृञ्जतिभ्यः ष्वरच्।’ (२८६)—इस सूत्रके अनुसार वरणार्थक ‘वृ’ धातुसे तथा याचनार्थक ‘चते’ धातुसे ‘ष्वरच्’ प्रत्यय करनेपर क्रमशः ‘वर्वरः’, ‘चत्वरम्’—इन दो पदोंकी सिद्धि होती है। ‘वर्वर’ का अर्थ है—प्राकृत जन अथवा कुटिल मनुष्य। ‘हसिमृग्रिण्वार्डमिदमिपूपूधूर्विभ्यस्तन्।’ (३७३) —इस सूत्रके अनुसार हिंसार्थक ‘धूर्वि’ धातुसे ‘तन्’ प्रत्यय करनेपर ‘धूर्त्तः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘धूर्त्त’ शब्दका अर्थ है—शठ। ‘चत्वरम्’का अर्थ है—चौराहा। ‘लित्वरचत्वरधीवर’ इत्यादि औणादिक सूत्रसे ‘चीवरम्’ इस पदका निपातन हुआ है। ‘चीवरम्’ का अर्थ है—चिथड़ा अथवा भिक्षुकका वस्त्र। स्नेहार्थक ‘ञिमिदा’ अथवा ‘मिद्’ धातुसे ‘अमिचिमिदिशसिभ्यः क्त्रः।’ (६१३)—इस सूत्रके अनुसार ‘क्त्र’ प्रत्यय हुआ। ककारका इत्यसंज्ञालोप हुआ—‘मिद्+त्र=मित्र। विभक्ति-कार्य करनेपर ‘मित्रः’—इस पदकी सिद्धि हुई। ‘मित्र’ का अर्थ है—सूर्य। नपुंसकलिङ्गमें इसका अर्थ—सुहृद् होता है। ‘कुवोह्रस्वश्च।’ इस सूत्रके अनुसार ‘पुनातीति’ इस लौकिक विग्रहमें ‘पू’ धातुसे ‘क्त्र’ प्रत्यय और दीर्घके स्थानमें ह्रस्व होनेपर ‘पुत्र’ शब्दकी सिद्धि होती है। ‘पुत्र’ का अर्थ है—बेटा। ‘सुवः कित्।’ (३२८)—इस सूत्रके अनुसार प्राणिप्रसवार्थक ‘षूङ्’ धातुसे ‘नु’ प्रत्यय होता है और वह ‘कित्’ माना जाता है। धातुके आदि षकारको सकारादेश हो जाता है। इस प्रकार ‘सूनु’ शब्दकी सिद्धि होती है। विभक्तिकार्य होनेपर ‘सूनुः’ पद बनता है। ‘विश्वकोश’के अनुसार इसका अर्थ पुत्र और सूर्य है। ‘नप्तृनेष्टृत्वष्टृहोतृ०’ (२६०) इत्यादि सूत्रके अनुसार ‘पितृ’ शब्द निपातित होता है। ‘पातीति पिता’। ‘पा’ धातुसे ‘तृच्’ होकर आकारके स्थानमें इकार हो जाता है। पिता, पितरौ, पितरः इत्यादि इसके रूप हैं। जन्मदाता या बापको ‘पिता’ कहते हैं। विस्तारार्थक ‘तन्’ धातुसे ‘वृतनिभ्यां दीर्घश्च।’—इस सूत्रके अनुसार ‘तन्’ प्रत्यय तथा ह्रस्वके स्थानमें दीर्घ होनेपर ‘तात’ शब्दकी सिद्धि होती है। यहाँ अनुनासिक लोप हुआ है। ‘तात’
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शब्द कृपापात्र तथा पिताके लिये प्रयुक्त होता है। कुत्सितशब्दार्थक 'पर्द' धातुसे 'काकु' प्रत्यय होता है और वह 'नित्' माना जाता है। धातुके रेफका सम्प्रसारण और अकारका लोप हो जाता है। जैसा कि सूत्र है—‘पर्द्देर्नित् सम्प्रसारणमह्लोपश्च।’ (३६७) 'काकु' प्रत्ययके आदि ककारका 'लशक्वतद्धिते।' (१।३।८)—इस सूत्रसे लोप हो जाता है। इस प्रक्रियासे 'पृदाकु' शब्दकी सिद्धि होती है। पर्दते—कुत्सितं 'शब्दं करोति इति पृदाकुः।' इसका अर्थ है—सर्प, बिच्छू या व्याघ्र। 'हसिमृगृण्वाऽम्दि-मिलूपूथूर्विभ्यस्तन्।' (३७३) इस सूत्रके द्वारा 'गृ' धातुसे 'तन्' प्रत्यय और गुणादेश करनेपर 'गर्त' शब्दकी सिद्धि होती है। यह 'अवट' अर्थात् गड्ढेका वाचक है। 'भृमृशितॄ०' इत्यादि (७) सूत्रके अनुसार 'भृ' धातुसे 'अतच्' प्रत्यय तथा गुणादेश करनेपर 'भरत' शब्द निष्पन्न होता है। जो भरण-पोषण करे, वह 'भरत' है। 'नमतीति नटः'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'जनिदाच्युसृवृमदि०' इत्यादि (५५४) सूत्रके द्वारा 'नम' धातुसे 'डट्' प्रत्यय करनेपर 'टि' लोप होनेके पश्चात् 'नट' शब्द बनता है। इसका अर्थ है—वेषधारी अभिनेता। ये थोड़े-से उणादि प्रत्यय यहाँ प्रदर्शित किये गये। इनके अतिरिक्त भी बहुत-से उणादि प्रत्यय होते हैं॥ ६–१२॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'उणादिसिद्ध रूपोंका वर्णन' नामक तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५७॥
तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय
तिङ्विभक्त्यन्त सिद्धरूपोंका वर्णन
कुमार कार्तिकेय कहते हैं—कात्यायन ! अब मैं 'तिङ्-विभक्ति' तथा 'आदेश'का संक्षेपसे वर्णन करूँगा। तिङ्-प्रत्यय भाव, कर्म और कर्ता—तीनोंमें होते हैं। सकर्मक तथा अकर्मक धातुसे कर्तामें आत्मनेपद तथा परस्मैपद—दोनों पदोंके 'तिङ्प्रत्यय' होते हैं। (सकर्मकसे कर्ता और कर्ममें तथा अकर्मकसे भाव और कर्तामें वे 'तिङ्' प्रत्यय हुआ करते हैं—यह विवेक कर्तव्य है) 'तिङादेश' सकर्मक धातुसे कर्म तथा कर्तामें बताये गये हैं। वर्तमानकालकी क्रियाके बोधके लिये धातुसे 'लट्' लकारका विधान कहा गया है। विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट (सत्कारपूर्वक व्यापार), सम्प्रश्न तथा प्रार्थना आदि अर्थका प्रतिपादन अभीष्ट हो तो धातुसे 'लिङ्' लकार होता है। 'विधि' आदि अर्थोंमें तथा आशीर्वादमें भी 'लोट्' लकारका प्रयोग होता है। अनद्यतन भूतकालका बोध करानेके लिये 'लङ्' लकार प्रयुक्त होता है। सामान्य भूतकालमें 'लुङ्', परोक्ष-भूतमें 'लिट्' अनद्यतन भविष्यमें 'लुट्' आशीर्वादमें 'लिङ्' शेष अर्थमें अर्थात् सामान्य भविष्यत् अर्थके बोधके लिये धातुसे 'लृट्' लकार होता है—क्रियार्था क्रिया हो तो भी, न हो तो भी। हेतुहेतुमद्भाव आदि 'लिङ्' का निमित्त होता है; उसके होनेपर भविष्यत् अर्थका बोध करानेके लिये धातुसे 'लृङ्' लकार होता है—क्रियाकी अतिपत्ति (असिद्धि) गम्यमान हो, तब। 'तङ्' प्रत्यय तथा 'शानच्', 'कानच्'—इनकी आत्मनेपद संज्ञा होती है। 'तिङ्' विभक्तियाँ अठारह हैं। इनमें पूर्वकी नौ विभक्तियाँ 'परस्मैपद' कही जाती हैं। वे प्रथमपुरुष आदिके भेदसे तीन भागोंमें बँटी हैं। 'तिप् तस् अन्ति'—ये तीन प्रथमपुरुष हैं।
७७६ * अग्निपुराण *
'सिप्, थस्, थ'—ये तीन मध्यमपुरुष हैं। तथा 'मिप्, वस्, मस्'—ये उत्तमपुरुष कहे गये हैं॥ १–५$\frac{१}{२}$॥
'त, आताम्, झ'—ये आत्मनेपदके प्रथमपुरुषसम्बन्धी प्रत्यय हैं। 'थास्, आथाम्, ध्वम्'—ये मध्यमपुरुष हैं। 'इ, वहि, महिङ्'—ये उत्तमपुरुष हैं। आत्मनेपदके नौ प्रत्यय 'तङ्' कहलाते हैं और दोनों पदोंके प्रत्यय 'तिङ्' शब्दसे समझे जाते हैं। क्रियावाची 'भू', वा आदि धातु कहे गये हैं। भू, एध्, पच्, नन्द्, ध्वंस्, स्रंस्, पद्, अद्, शीङ्, क्रीड्, हु, हा, धा, दिव्, स्वप्, नह्, षूञ्, तुद्, मृश्, मुच्, रुध्, भुज्, त्यज्, तन्, मन् और कृ—ये सब धातु शप् आदि विकरण होनेपर क्रियार्थबोधक होते हैं। 'क्रीड्, वृङ्, ग्रह्, चुर्, पा, नी तथा अचि'—ये तथा उपर्युक्त धातु 'नायक' (प्रधान) हैं। इन्हींके समान अन्य धातुओंके भी रूप होते हैं। 'भू' धातुसे क्रमशः 'तिङ्' प्रत्यय होनेपर 'भवति, भवतः, भवन्ति'—इत्यादि रूप होते हैं। इनका वाक्यमें प्रयोग इस प्रकार समझना चाहिये—'स भवति। तौ भवतः। ते भवन्ति। त्वं भवसि। युवां भवथः। यूयं भवथ। अहं भवामि। आवां भवावः। वयं भवामः।' ये 'भू' धातुके 'लट्' लकारमें परस्मैपदी रूप हैं। 'भू' धातुका अर्थ है—'होना'। 'एध्' धातु 'वृद्धि' अर्थमें प्रयुक्त होता है। यह आत्मनेपदी धातु है। इसका 'लट्' लकारमें प्रथमपुरुषके एकवचनमें 'एधते' रूप बनता है। वाक्यमें प्रयोग—'एधते कुलम्।' (कुलकी वृद्धि होती है)—इस प्रकार होता है। 'लट्' लकारमें 'एध्' धातुके शेष रूप इस प्रकार होते हैं—'द्वे एधेते'। (दो बढ़ते हैं)। यह द्विवचनका रूप है। बहुवचनमें 'एधन्ते' रूप होता है। इस प्रकार प्रथमपुरुषके एकवचन, द्विवचन और बहुवचनान्त रूप बताये गये। अब मध्यम और उत्तम पुरुषोंके रूप प्रस्तुत किये जाते हैं—'एधसे' यह मध्यमपुरुषका एकवचनान्त रूप है। वाक्यमें इसका प्रयोग इस प्रकार हो सकता है—'त्वं हि मेधया एधसे।' (निश्चय ही तुम बुद्धिसे बढ़ते हो।) 'एधेये, एधध्वे' ये दोनों मध्यमपुरुषके क्रमशः द्विवचनान्त और बहुवचनान्त रूप हैं। 'एधे, एधावहे, एधामहे'—ये उत्तमपुरुषमें क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचनान्त रूप हैं। वाक्यमें प्रयोग—'अहं धिया एधे।' (मैं बुद्धिसे बढ़ता हूँ।) 'आवां मेधया एधावहे।' (हम दोनों मेधासे बढ़ते हैं।) 'वयं हरेर्भक्त्या एधामहे।' (हम श्रीहरिकी भक्तिसे बढ़ते हैं।) 'पाक' अर्थमें 'पच्' धातुका प्रयोग होता है। उसके 'पचति' इत्यादि रूप पूर्ववत् ('भू' धातुके समान) होते हैं। 'भू' धातुसे भावमें और 'अनु+भू' धातुसे कर्ममें 'यक्' प्रत्यय होनेपर क्रमशः 'भूयते' और 'अनुभूयते' रूप होते हैं। भावमें प्रत्यय होनेपर क्रिया केवल एकवचनान्त ही होती है और सभी पुरुषोंमें कर्ता तृतीयान्त होनेके कारण एक ही क्रिया सबके लिये प्रयुक्त होती है। यथा—'त्वया मया अन्यैश्च भूयते।' जहाँ कर्ममें प्रत्यय होता है, वहाँ कर्म उक्त होनेके कारण उसमें प्रथमा विभक्ति होती है और तदनुसार सभी पुरुषों तथा सभी वचनोंमें क्रियाके रूप प्रयोगमें लाये जाते हैं। यथा—'असौ अनुभूयते। तौ अनुभूयेते। ते अनुभूयन्ते। त्वम् अनुभूयसे। युवाम् अनुभूयेथे। यूयम् अनुभूयध्वे। अहम् अनुभूये। आवाम् अनुभूयावहे। वयम् अनुभूयामहे'॥ ६–१३॥
अर्थविशेषको लेकर धातुसे 'णिच्', 'सन्', 'यङ्' तथा 'यङ्लुक्' होते हैं। इन्हें क्रमसे 'ण्यन्त', 'सन्नन्त', 'यङन्त' और 'यङ्लुगन्त' कहते हैं। जहाँ किसी क्रियाके कर्ताका कोई प्रेरक या प्रयोजक कर्ता होता है, वहाँ प्रयोजक
* अध्याय ३५८ * ७७७
कर्ताकी 'हेतु' संज्ञा होती है और प्रयोज्य कर्ता 'कर्म' बन जाता है। प्रयोजकके व्यापार प्रेषण आदि वाच्य हों तो धातुसे 'णिच्' प्रत्यय होता है। उसके होनेपर 'भू' धातुके 'लट्' लकारमें 'भावयति' इत्यादि रूप होते हैं। उदाहरणके लिये—'ईश्वरो भवति, तं यज्ञदत्तो ध्यानादिना प्रेरयति इत्यस्मिन्नर्थे यज्ञदत्त ईश्वरं भावयति इति प्रयोगो भवति' (ईश्वर होता है और यज्ञदत्त उसको ध्यानादिके द्वारा प्रेरित करता है—इस अर्थको व्यक्त करनेके लिये 'यज्ञदत्त ईश्वरं भावयति' यह प्रयोग बनता है)।$^१$ जहाँ कोई धातु इच्छाक्रियाका कर्म बनता है तथा इच्छाक्रियाका कर्ता ही उस धातुका भी कर्ता होता है, वहाँ उस धातुसे इच्छाकी अभिव्यक्तिके लिये 'सन्' प्रत्यय होता है। 'भू' धातुके सन्नन्तमें 'बुभूषति' इत्यादि रूप होते हैं। यथा—'भवितुम् इच्छति बुभूषति।' (होना चाहता है।) वक्ता चाहे तो 'बुभूषति' कहे अथवा 'भवितुम् इच्छति'—इस वाक्यका प्रयोग करे। यह स्मरणीय है कि 'सन्' और 'यङ्' प्रत्यय परे रहनेपर धातुका द्वित्व हो जाता है। शेष कार्य व्याकरणकी प्रक्रियाके अनुसार होते हैं। जहाँ क्रियाका समभिहार हो, अर्थात् पुनः-पुनः या अतिशयरूपसे क्रियाका होना बताया जाय, वहाँ उक्त अभिप्रायका द्योतन या प्रकाशन करनेके लिये धातुसे 'यङ्' प्रत्यय होता है। 'यङ्' और 'यङ्लुगन्त' में धातुका द्वित्व होनेपर पूर्वभागके, जिसे 'अभ्यास' कहते हैं, 'इक्' का 'गुण' हो जाता है। 'भू' धातुके 'यङन्त' में 'बोभूयते' इत्यादि रूप होते हैं। 'पुनः पुनः अतिशयेन वा भवति'—इस अर्थमें 'बोभूयते' क्रियाका प्रयोग होता है। यथा—'वाद्यं बोभूयते।' (वाद्यवादन बार-बार या अधिक मात्रामें होता है)। 'यङ्लुगन्त' में 'भू' धातुके 'बोभोति' इत्यादि रूप होते हैं। अर्थ वही है, जो 'यङन्त' क्रियाका होता है। 'यङन्त' में आत्मनेपदीय प्रत्यय होते हैं और 'यङ्लुगन्त' में परस्मैपदीय ॥ १४ ॥
कहीं-कहीं 'नाम' या 'सुबन्त' शब्दसे 'क्यच्' आदि प्रत्यय होनेपर उस शब्दकी 'धातु' संज्ञा होती है और उसके धातुके ही समान रूप चलते हैं। ऐसे प्रकरणको 'नामधातु' कहते हैं। जो इच्छाका कर्म हो और इच्छा करनेवालेका सम्बन्धी हो, ऐसे 'सुबन्त' से इच्छा-अर्थमें विकल्पसे 'क्यच्' प्रत्यय होता है। 'आत्मनः पुत्रम् इच्छति।' (अपने लिये पुत्र चाहता है)—इस अर्थमें 'पुत्रम्' इस 'सुबन्त' पदसे 'क्यच्' प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप होनेपर 'पुत्र अम् य' हुआ। 'सनाद्यन्ता धातवः।' (३।१।३२) से धातुसंज्ञा होकर 'सुपो धातुप्रातिपदिकयोः।' (२।४।७०) से 'अम्' का लोप हो गया। पुत्र=य—इस स्थितिमें 'क्यचि च।' (७।४।३३)—इस सूत्रके अनुसार 'अकार' के स्थानमें 'ईकार' हो गया। इस प्रकार 'पुत्रीय' से 'तिप्' 'शप्' आदि कार्य होनेपर 'पुत्रीयति' इत्यादि रूप होते हैं। इसी अर्थमें 'काम्यच्' प्रत्यय भी होता है और 'पुत्र' शब्दसे 'काम्यच्' प्रत्यय होनेपर 'पुत्रकाम्यति' इत्यादि रूप होते हैं। 'पटत् भवति इति पटपटायते।' यहाँ 'अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्धादनितौ डाच्।' (५।४।५७)—इस सूत्रके अनुसार 'भू' के योगमें 'डाच्' प्रत्यय होनेपर 'पटत् डा' इस स्थितिमें 'डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम्।' इस वार्तिकसे द्वित्व होकर 'नित्यमाम्रेडितं डाचि।' इस वार्तिकसे पररूप हुआ तो टि-लोपके अनन्तर 'पटपटा+भू'—यह अवस्था प्राप्त हुई। इसके बाद 'लोहितादिडाब्भ्यः क्यष्।' (३।१।१३)—इस सूत्रसे 'भवति' इस अर्थमें 'क्यष्' प्रत्यय हुआ तो 'पटपटा+क्यष्' बना। फिर अनुबन्धलोप, धातु संज्ञा तथा धातुसम्बन्धी कार्य होनेसे 'पटपटायते'—यह रूप सिद्ध हुआ। इसका अर्थ
| ७७८ | * अग्निपुराण * |
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है कि 'पटपट' की आवाज होती है। 'घटं करोति।'- इस अर्थमें 'तत्करोति तदाचष्टे' के अनुसार 'घटयति' रूप बनता है। 'सन्नन्त' से 'णिच्' प्रत्यय किया जाय तो 'भू' धातुके सन्नन्त रूप 'बुभूषति' की जगह 'बुभूषयति' रूप बनेगा। प्रयोग- 'गुरुः शिष्यं बुभूषयति' ॥ १५ ॥
'भू' धातुके 'विधिलिङ्' लकारमें क्रमशः ये रूप होते हैं- 'भवेत्, भवेताम्, भवेयुः। भवेः, भवेतम्, भवेत। भवेयम्, भवेव, भवेम'। 'एध्' धातुके 'विधिलिङ्' में इस प्रकार रूप बनते हैं- एधेत, एधेयाताम्, एधेरन्। एधेथाः, एधेयाथाम्, एधेध्वम्। एधेय, एधेवहि, एधेमहि।' वाक्यप्रयोग- 'ते मनसा एधेरन्' (वे मनसे बढ़ें- उन्नति करें)। 'त्वं श्रिया एधेथाः।' (तुम लक्ष्मीके द्वारा बढ़ो इत्यादि)। 'भू' धातुके 'लोट्' लकारमें ये रूप होते हैं- 'भवतु, भवतात्, भवताम्, भवन्तु। भव-भवतात्, भवतम्, भवत। भवानि, भवाव, भवाम।' 'एध्' धातुके 'लोट्' लकारमें ये रूप जानने चाहिये- 'एधताम्, एधेताम्, एधन्ताम्। एधस्व, एधेथाम्, एधध्वम्। एधै, एधावहै, एधामहै।' 'पच्' धातुके भी आत्मनेपदमें ऐसे ही रूप होते हैं। यथा उत्तमपुरुषमें - 'पचै, पचावहै, पचामहै।' 'अभि' पूर्वक 'नदि' धातुका 'लङ्' लकारमें प्रथमपुरुषके एकवचनमें 'अभ्यनन्दत्'- यह रूप होता है। 'पच्' धातुके 'लङ्' लकारमें - 'अपचत्, अपचताम्, अपचन्' इत्यादि रूप होते हैं। 'भू' धातुके 'लङ्' लकारमें 'अभवत्, अभवताम्, अभवन्' इत्यादि रूप होते हैं। 'पच्' धातुके 'लङ्' लकारके उत्तमपुरुषमें - 'अपचम्, अपचाव, अपचाम'-ये रूप होते हैं। 'एध्' धातुके 'लङ्' लकारमें-ऐधत, ऐधेताम्, ऐधन्त। ऐधथाः, ऐधेथाम्, ऐधध्वम्। ऐधे, ऐधावहि, ऐधामहि-ये रूप होते हैं। 'भू' धातुके 'लुङ्' लकारमें अभूत्, अभूताम्, अभूवन्। अभूः, अभूतम्, अभूत। अभूवम्, अभूव, अभूम'-ये रूप होते हैं। 'एध्' धातुके 'लुङ्' लकारमें ऐधिष्ट, ऐधिषाताम्, ऐधिषत। ऐधिष्ठाः, ऐधिषाथाम्, ऐधिध्वम्। ऐधिषि, ऐधिष्वहि, ऐधिष्महि'-ये रूप जानने चाहिये। वाक्यप्रयोग- 'नरौ ऐधिषाताम्' (दो मनुष्य बढ़ें)।
'भू' धातुके 'परोक्षलिट्' में 'बभूव, बभूवतुः, बभूवुः। बभूविथ, बभूवथुः, बभूव। बभूव, बभूविव, बभूविम।' -ये रूप होते हैं। 'पच्' धातुके आत्मनेपदी 'लिट्' लकारमें प्रथमपुरुषके रूप इस प्रकार हैं- 'पेचे, पेचाते, पेचिरे।' 'एध्' धातुके 'लिट्' लकारमें इस प्रकार रूप समझने चाहिये- 'एधाञ्चक्रे, एधाञ्चक्राते, एधाञ्चक्रिरे। एधाञ्चकृषे, एधाञ्चक्राथे, एधाञ्चकृढ्वे। एधाञ्चक्रे, एधाञ्चकृवहे, एधाञ्चकृमहे।' 'पच्' धातुके 'परोक्षलिट्' में प्रथमपुरुषके रूप बताये गये हैं। मध्यम और उत्तम पुरुषके रूप इस प्रकार होते हैं- 'पेचिषे, पेचाथे पेचिध्वे। पेचे, पेचिवहे, पेचिमहे।' 'भू' धातुके 'अनद्यतन भविष्य लुट्' लकारमें इस प्रकार रूप जानने चाहिये- 'भविता, भवितारौ, भवितारः। भवितासि, भवितास्थः, भवितास्थ। भवितास्मि, भवितास्वः, भवितास्मः।' वाक्यप्रयोग- 'हरादयो भवितारः।' (हर आदि होंगे।) 'वयं भवितास्मः।' (हम होंगे।) 'पच्' धातुके 'लुट्' लकारमें 'परस्मैपदीय' रूप इस प्रकार हैं- 'पक्ता, पक्तारौ, पक्तारः, पक्तासि। (शेष भूधातुकी तरह)। वाक्यप्रयोग- 'त्वं शुभौदनं पक्तासि।' (तुम अच्छा भात राँधोगे।) 'पच्' धातुके 'लुट्' लकारमें 'आत्मनेपदीय' रूप इस प्रकार हैं- प्रथमपुरुषमें तो 'परस्मैपदीय' रूपके समान ही होते हैं, मध्यम और उत्तम पुरुषमें- 'पक्तासे, पक्तासाथे, पक्ताध्वे। पक्ताहे, पक्तास्वहे, पक्तास्महे।' वाक्यप्रयोग- 'अहं पक्ताहे।' (मैं पकाऊँगा।) 'वयं हरेश्चरुं पक्तास्महे।' (हम श्रीहरिके लिये चरु पकावेंगे या तैयार करेंगे।) 'आशीर्लिङ्'
* अध्याय ३५९ * ७७९
में ‘भू’ धातुके रूप इस प्रकार जानने चाहिये— ‘भूयात्, भूयास्ताम्, भूयासुः। भूयाः, भूयास्तम्, भूयास्त। भूयासम्, भूयास्व, भूयास्म। वाक्यप्रयोग— ‘सुखं भूयात्।’ (सुख हो।) ‘हरिशङ्करौ भूयास्ताम्।’ (विष्णु और शिव हों।) ‘ते भूयासुः।’ (वे हों।) ‘त्वं भूयाः।’ (तुम होओ।) ‘युवाम् ईश्वरौ भूयास्तम्।’ (तुम दोनों ईश्वर—ऐश्वर्यशाली होओ।) ‘यूयं भूयास्त।’ (तुम सब होओ।) ‘अहं भूयासम्।’ (मैं होऊँ।) ‘वयं सर्वदा भूयास्म।’ ‘यक्ष्’ धातुके आत्मनेपदी आशिष्-लिङ् में इस प्रकार रूप होते हैं—‘यक्षीष्ट, यक्षीयास्ताम्, यक्षीरन्। यक्षीष्ठाः, यक्षीयास्थाम्, यक्षीध्वम्। यक्षीय, यक्षीवहि, यक्षीमहि।’ इसी प्रकार ‘एध्’ धातुके ‘आशीर्लिङ्’ में ये रूप जानने चाहिये—‘एधिषीष्ट, एधिषीयास्ताम्, एधिषीरन्। एधिषीष्ठाः, एधिषीयास्थाम्, एधिषीध्वम्। एधिषीय, एधिषीवहि, एधिषीमहि। ‘यक्ष्’ धातुके ‘लृङ्’ लकारमें ये रूप होते हैं—‘अयक्ष्यत, अयक्ष्येताम्, अयक्ष्यन्त। अयक्ष्यथाः, अयक्ष्येथाम्, अयक्ष्यध्वम्। अयक्ष्ये, अयक्ष्यावहि, अयक्ष्यामहि।’ ‘एध्’ धातुके ‘लृङ्’ लकारके रूप इस प्रकार हैं—‘ऐधिष्यत, ऐधिष्येताम्, ऐधिष्यन्त। ऐधिष्यथाः, ऐधिष्येथाम्, ऐधिष्यध्वम्। ऐधिष्ये, ऐधिष्यावहि, ऐधिष्यामहि।’ वाक्यप्रयोग—काचिद् बाधा नाभाविष्यच्चेद् वयम् अरेः ऐधिष्यामहि। (यदि कोई बाधा न पड़े तो हम अवश्य शत्रुसे बढ़ जायँ।) ‘भू’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें ‘भविष्यति, भविष्यतः, भविष्यन्ति’— इत्यादि रूप होते हैं। ‘एध्’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें— ‘एधिष्यते, एधिष्येते, एधिष्यन्ते। एधिष्यसे, एधिष्येथे, एधिष्यध्वे। एधिष्ये, एधिष्यावहे, एधिष्यामहे।’ ये रूप होते हैं॥ १६—२९॥
इसी प्रकार ‘णिजन्त’ वि-पूर्वक ‘भू’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें—‘विभावयिष्यति, विभावयिष्यतः, विभावयिष्यन्ति’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘यङ्लुगन्त’ ‘भू’ धातुके ‘लृट्’ लकारमें ‘बोभविष्यति’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘नामधातु’ में घटं करोति, पटं करोति’ इत्यादि अर्थमें जिनके ‘घटयति, पटयति’ इत्यादि रूप कह आये हैं, उन्हींके ‘विधिलिङ्’ में ‘घटयेत्, पटयेत्’ इत्यादि रूप होते हैं। इसी तरह ‘पुत्रीयति’ और ‘पुत्रकाम्यति’ इत्यादि नामधातु-सम्बन्धिनी क्रियाओंके रूपोंकी ऊहा कर लेनी चाहिये॥ ३०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘तिङ्-विभक्त्यन्त सिद्ध रूपोंका वर्णन’ नामक तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५८॥
तीन सौ उनसठवाँ अध्याय
कृदन्त शब्दोंके सिद्ध रूप
कुमार कार्तिकेय कहते हैं—कात्यायन! यह जानना चाहिये कि ‘कृत्’ प्रत्यय भाव, कर्म तथा कर्ता—तीनोंमें होते हैं। वे इस प्रकार हैं— ‘अच्’, ‘अप्’, ‘ल्युट्’, ‘क्तिन्’, भावार्थक ‘घञ्’ करणार्थक ‘घञ्,’, ‘युच्’, ‘अ’ तथा ‘तव्य’ आदि। ‘अच्’ प्रत्यय होनेपर ‘विनी+अच्’ (गुण, अयादेश और विभक्तिकार्य)=विनयः। (ऋदोरप्) उत्कृ+अप्=उत्करः। प्रकृ+अप्=प्रकरः। दिव+अच्=देवः। भद्र+अच्=भद्रः। श्रीकृ+अप्=श्रीकरः।’ इत्यादि रूप होते हैं। ‘ल्युट्’ प्रत्यय होनेपर शुभ+ल्युट् (लकार, टकारकी इत्संज्ञा, लघूपध गुण) ‘युवोरनाकौ।’ (७। १। १) से अनादेश=‘शोभनम्’—इस रूपकी सिद्धि होती है। ‘वृध्’ धातुसे ‘क्तिन्’ प्रत्यय करनेपर ‘वृध्+क्ति’
७८० * अग्निपुराण *
(ककारकी इत्संज्ञा, तकारका धकारादेश, पूर्व धकारका जश्त्वेन दकार और विभक्तिकार्य)= ‘वृद्धिः’। स्तु+क्तिन्=‘स्तुतिः’। मन्+क्तिन्= ‘मतिः’—ये पद सिद्ध होते हैं। ‘भू’ धातुसे ‘घञ्’ प्रत्यय होनेपर भू+घञ्=‘भावः’—यह पद बनता है। णिजन्त ‘कृ’ धातुसे ‘ण्यासश्रन्थो युच्’ (३।३।१०७)—इस सूत्रके अनुसार ‘युच्’ प्रत्यय करनेपर कारि+यु (णिलोप, अनादेश)= ‘कारणा’। ‘भावि+युच्’= ‘भावना’ इत्यादि पद सिद्ध होते हैं। प्रत्ययान्त धातुसे स्त्रीलिङ्गमें ‘अ’ प्रत्यय होता है। उसके होनेपर ‘चिकित्स+अ, चिकीर्ष+अ= चिकित्सा, चिकीर्षा’ इत्यादि पद सिद्ध होते हैं। धातुसे ‘तव्य’ और ‘अनीय’ प्रत्यय भी होते हैं। कृ+तव्य=कर्तव्यम्। कृ+अनीय=करणीयम् —इत्यादि पदोंकी सिद्धि होती है। ‘अचो यत्।’ (३।१।९७) सूत्रके अनुसार ‘अजन्त’ धातुसे ‘यत्’ प्रत्यय होता है। उसके होनेपर दा+यत् (‘ईद्यति।’ सूत्रसे ‘आ’ के स्थानमें ‘ईकारादेश’, गुण और विभक्तिकार्य)= देयम्। ध्यै+यत् (‘आदेच उपदेशेऽशिति।’ से ‘ऐ’ के स्थानमें आ, ‘ईद्यति’ से ‘आ’ के स्थानमें ‘ई’ (विभक्तिकार्य) =ध्येयम्—ये पद सिद्ध होते हैं। ‘ऋहलोर्ण्यत्’ (३।१।१२४)—इस सूत्रके अनुसार ण्यत् प्रत्यय होनेपर कृ+ण्यत् (‘चुटू’ १।३।७१) सूत्रसे णकारकी तथा ‘हलन्त्यम्।’ (१।३।३) सूत्रसे तकारकी इत्संज्ञा। ‘अचोञ्णिति।’ (७।२।११५) से ‘वृद्धि’ तथा विभक्तिकार्य)= ‘कार्यम्’—यह पद सिद्ध होता है। यहाँतक ‘कृत्यसंज्ञक’ प्रत्यय कहे गये हैं॥ १-४॥
‘क्त’ आदि प्रत्यय कर्तामें होते हैं—यह जाननेयोग्य बात है। वे कहीं-कहीं भाव और कर्ममें भी होते हैं। कर्तामें ‘गम्’ धातुसे ‘क्त’ प्रत्यय होनेपर ‘गतः’—यह रूप बनता है। प्रयोगमें (‘स ग्रामं गतः, स ग्रामे गतः।’ इत्यादि वाक्य होते हैं। इस वाक्यका अर्थ है—वह गाँवको गया)। कर्ममें ‘क्त’ प्रत्ययका उदाहरण है—‘त्वया गुरुः आश्लिष्टः।’ (तुमने गुरुका आलिङ्गन किया।) यहाँ कर्ममें प्रत्यय होनेसे कर्मभूत ‘गुरु’ उक्त हो गया। अतः उसमें प्रथमा विभक्ति हुई। ‘त्वम्’ यह कर्ता अनुक्त हो गया। अतः उसमें तृतीया विभक्ति हुई। ‘आश्लिष्+क्त’ (ककारकी इत्संज्ञा, ‘त’ के स्थानमें ‘ष्टुत्व’ के नियमसे ‘टकार’ हुआ। तदनन्तर विभक्तिकार्य करनेपर)=‘आश्लिष्टः’ पद सिद्ध हुआ। वर्तमानार्थबोधक ‘लट्’ लकारमें धातुसे ‘शतृ’ और ‘शानच्’ प्रत्यय भी होते हैं। परस्मैपदमें ‘शतृ’ और आत्मनेपदमें ‘शानच्’ होता है। ‘भू’ धातुसे ‘शतृ’ प्रत्यय करनेपर ‘भवन्’ और ‘एध्’ धातुसे ‘शानच्’ प्रत्यय करनेपर ‘एधमानः’—ये पद सिद्ध होते हैं। सम्पूर्ण धातुओंसे ‘ण्वुल्’ और ‘तृच्’ प्रत्यय होते हैं। ‘भू’ धातुसे कर्ता अर्थमें ‘ण्वुल्’ करनेपर ‘भावकः’ और ‘तृच्’ प्रत्यय करनेपर ‘भविता’— ये पद सिद्ध होते हैं। ‘भू’ धातुसे ‘क्विप्’ प्रत्यय भी हुआ करता है। ‘स्वयम्+भू+क्विप्=स्वयम्भूः’—इस पदकी सिद्धि होती है। भूतार्थ-बोधके लिये ‘लिट्’ लकारमें धातुसे ‘क्वसु’ और ‘कानच्’ प्रत्यय होते हैं। परस्मैपदमें ‘क्वसु’ और आत्मनेपदमें ‘कानच्’ होता है। ‘भू’ धातुसे ‘क्वसु’ करनेपर ‘बभूविवान्’ और ‘पच्’ धातुसे ‘क्वसु’ प्रत्यय करनेपर ‘पेचिवान्’— ये पद सिद्ध होते हैं। इन शब्दोंकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—‘स बभूव इति बभूविवान्।’ (वह हुआ था।) ‘स पपाच इति पेचिवान्।’ (उसने पकाया था।) ‘आत्मनेपदीय पच्’ धातुसे ‘कानच्’ प्रत्यय करनेपर ‘पेचानः’ पद बनता है। ‘श्रद्+धा’—इस धातुसे ‘लिट्’ लकारमें ‘कानच्’ प्रत्यय करनेपर ‘श्रद्दधानः’—यह पद सिद्ध होता है। ‘स पेचे इति पेचानः। स श्रद्दधे इति श्रद्दधानः’। ‘कर्मण्यण्’ से ‘अण्’ प्रत्यय करनेपर ‘कुम्भकारः’ आदि पद सिद्ध होते हैं। भूत और वर्तमान अर्थमें भी ‘उणादि’
* अध्याय ३६० * ७८१
प्रत्यय होते हैं। 'ववौ वाति इति वा वायुः।' वा+उण् (युगागम एवं विभक्तिकार्य)=वायुः। 'पा+उण्=पायुः।' 'कृ+ उण्= कारुः।' इत्यादि पद सिद्ध होते हैं। 'बहुलं छन्दसि' इस नियमके अनुसार सभी 'कृत्' प्रत्यय वेदमें बाहुल्येन उपलब्ध होते हैं। वहाँ कहीं प्रवृत्ति, कहीं अप्रवृत्ति, कहीं वैकल्पिक विधान और कहीं कुछ और ही विधि दृष्टिगोचर होती है॥ ५-८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कृदन्त शब्दोंके सिद्ध रूपोंका संक्षिप्त वर्णन' नामक तीन सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५९॥
तीन सौ साठवाँ अध्याय
स्वर्ग-पाताल आदि वर्ग
अग्निदेव कहते हैं—कात्यायन! स्वर्ग आदिके नाम और लिङ्ग जिनके स्वरूप हैं, उन शुद्ध स्वरूप श्रीहरिका मैं वर्णन करता हूँ—स्वः [अव्यय], स्वर्ग, नाक, त्रिदिव [पुंल्लिङ्ग], द्यो, दिव्—ये दो स्त्रीलिङ्ग और त्रिविष्टप [नपुंसक]—ये सब 'स्वर्गलोक'के नाम हैं। देव, वृन्दारक और लेख—ये (पुँल्लिङ्ग शब्द) देवताओंके नाम हैं। 'रुद्र' आदि* शब्द गणदेवताके वाचक हैं। विद्याधर, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, किंनर, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध और भूत—ये सब 'देवयोनि'के अन्तर्गत हैं। देवद्विट्, असुर और दैत्य—ये असुरोंके तथा सुगत और तथागत—ये बुद्धके नाम हैं। ब्रह्मा, आत्मभू और सुरज्येष्ठ—ये ब्रह्माजीके; विष्णु, नारायण और हरि—ये भगवान् विष्णुके; रेवतीश, हली और राम—ये बलभद्रजीके तथा काम, स्मर और पञ्चशर—ये कामदेवके नाम हैं। लक्ष्मी, पद्मालया और पद्मा—ये लक्ष्मीजीके तथा शर्व, सर्वेश्वर और शिव—ये भगवान् शंकरके नाम हैं। उनकी बँधी हुई जटाके दो नाम हैं—कपर्द और जटाजूट। उनके धनुषके भी दो नाम हैं—पिनाक और अजगव। शिवजीके पार्षद प्रमथ कहलाते हैं। मृडानी, चण्डिका और अम्बिका—ये पार्वतीजीके; द्वैमातुर और गजास्य (गजानन)—ये गणेशजीके तथा सेनानी, अग्निभू और गुह—ये स्वामी कार्तिकेयजीके नाम हैं। आखण्डल, शुनासीर, सुत्रामा और दिवस्पति—ये इन्द्रके तथा पुलोमजा, शची और इन्द्राणी—ये उनकी प्रियतमा शची देवीके नाम हैं। इन्द्रके महलका नाम वैजयन्त, पुत्रका नाम जयन्त और पाकशासनि तथा हाथीके नाम ऐरावत, अभ्रमातङ्ग, ऐरावण और अभ्रमुवल्लभ हैं। ह्रादिनी (स्त्रीलिङ्ग), पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिंगमें प्रयुक्त होनेवाला वज्र, कुलिश (नपुंसक), भिदुर (नपुंसक) और पवि (पुँल्लिङ्ग)—ये सब इन्द्रके वज्रके नाम हैं। व्योम-यान (नपुं०) तथा विमान (पुँल्लि० नपुं०)—ये आकाशमें विचरनेवाले देववाहनोंके नाम हैं। पीयूष, अमृत और सुधा—ये अमृतके नाम हैं। (इनमें सुधा तो स्त्रीलिङ्ग और शेष दोनों नाम नपुंसकलिंग हैं।) देवताओंकी सभा 'सुधर्मा' कहलाती है। देवताओंकी नदी गङ्गाका नाम स्वर्गङ्गा और सुरदीर्घिका है। उर्वशी आदि अप्सराओंको अप्सरा और स्वर्वेश्या कहते हैं। इनमें अप्सरस् शब्द स्त्रीलिङ्ग एवं बहुवचनमें प्रयुक्त होता है। हाहा, हूहू आदि गन्धर्वोंके नाम हैं। अग्नि, वह्नि, धनंजय, जातवेदा, कृष्णवर्त्मा, आश्रयाश, पावक, हिरण्यरेताः, सप्तार्चि,
* आदि शब्दसे वसु और आदित्य आदि नामोंको ग्रहण करना चाहिये। रुद्र ११, वसु ८ और आदित्य १२ हैं।
७८२ * अग्निपुराण *
शुक्ल, आशुशुक्षणि, शुचि और अप्पित—ये अग्निके नाम हैं तथा और्व, वाडव और वडवानल—ये समुद्रके भीतर जलनेवाली आगके नाम हैं। आगकी ज्वालाके पाँच नाम हैं—ज्वाल, कील, अर्चिष्, हेति और शिखा। इनमें पहले दो शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग दोनोंमें प्रयुक्त होते हैं। अर्चिष् नपुंसकलङ्ग है तथा हेति और शिखा स्त्रीलिङ्ग शब्द हैं। आगकी चिनगारीके दो नाम हैं—स्फुलिङ्ग और अग्निकण। इनमें पहला तीनों लिङ्गोंमें और दूसरा केवल पुँल्लिङ्गमें प्रयुक्त होता है। धर्मराज, परेतराट्, काल, अन्तक, दण्डधर और श्राद्धदेव—ये यमराजके नाम हैं। रक्षस, कौणप, अश्रप, क्रव्याद, यातुधान और नैर्ऋति—ये राक्षसोंके नाम हैं। प्रचेता, वरुण और पाशी—ये वरुणके तथा श्वसन, स्पर्शन, अनिल, सदागति, मातरिश्वा, प्राण, मरुत् और समीरण—ये वायुके नाम हैं। जव, रंहस् और तरस्—ये वेगके वाचक हैं। (इनमें पहला पुँल्लिङ्ग और शेष दोनों शब्द नपुंसकलङ्ग हैं।) लघु, क्षिप्र, अर, द्रुत, सत्वर, चपल, तूर्ण, अविलम्बित और आशु—ये शीघ्रताके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। (क्रियाविशेषण होनेपर इन सबका नपुंसकलङ्ग एवं एकवचनमें प्रयोग होता है।) सतत, अनारत, अश्रान्त, संतत, अविरत, अनिश, नित्य, अनवरत और अजस्र—ये निरन्तरके वाचक हैं। (ये भी प्रायः क्रियाविशेषणमें ही प्रयुक्त होते हैं, केवल 'नित्य' शब्दका ही अन्य विशेषणोंमें भी प्रयोग होता है।) अतिशय, भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ, निर्भर, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ, बाढ और दृढ—ये अतिशय (अधिकमात्रा)-के वाचक हैं। गुह्यकेश, यक्षराज, राजराज और धनाधिप—ये कुबेरके नाम हैं। किंनर, किम्पुरुष, तुरंगवदन और मयु—ये किंनरोंके वाचक शब्द हैं। निधि और शेवधि—ये दोनों पुँल्लिङ्ग शब्द निधिके वाचक हैं। व्योम, अभ्र, पुष्कर, अम्बर, द्यो, दिव्, अन्तरिक्ष और ख—ये आकाशके पर्याय हैं। (इनमें द्यो और दिव् शब्द स्त्रीलिङ्गमें प्रयुक्त होते हैं और शेष सब नपुंसकलङ्गमें।) काष्ठा, आशा, ककुभ् और दिश—ये दिशा-अर्थके बोधक हैं। अभ्यन्तर और अन्तराल शब्द मध्यके तथा चक्रवाल और मण्डल शब्द गोलाकार मण्डल एवं समुदायके वाचक हैं। तडित्वान्, वारिद, मेघ, स्तनयित्नु और बलाहक—ये मेघके पर्याय हैं॥ १—२१॥
बादलोंकी घटाका नाम है कादम्बिनी और मेघमाला तथा स्तनित और गर्जित—ये (नपुंसकलङ्ग) शब्द मेघगर्जनाके वाचक हैं। शम्पा, शतह्रदा, ह्लादिनी, ऐरावती, क्षणप्रभा, तडित्, सौदामिनी (सौदामनी), विद्युत्, चञ्चला और चपला—ये बिजलीके पर्याय हैं। स्फूर्जथु और वज्र-निर्घोष—ये दो बिजलीकी गड़गड़ाहटके नाम हैं। वर्षाकी रुकावटको वृष्टिघात और अवग्रह कहते हैं। धारा-सम्पात और आसार—ये दो मुसलाधार वृष्टिके नाम हैं। जलके छींटों या फुहारोंको शीकर कहते हैं। वर्षाके साथ गिरनेवाले ओलोंका नाम करका है। जब मेघोंकी घटासे दिन छिप जाय तो उसे दुर्दिन कहते हैं। अन्तर्धा, व्यवधा, पुँल्लिङ्गमें प्रयुक्त होनेवाला अन्तर्धि तथा (नपुंसकलङ्ग) अपवारण, अपिधान, तिरोधान, पिधान और आच्छादन—ये आठ अन्तर्धान (अदृश्य होने)-के नाम हैं। अब्ज, जैवात्रिक, सोम, ग्लौः, मृगाङ्क, कलानिधि, विधु तथा कुमुद-बन्धु—ये चन्द्रमाके पर्याय हैं। चन्द्रमा और सूर्यके मण्डलका नाम है—बिम्ब और मण्डल। इनमें बिम्ब शब्दका पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलङ्गमें तथा मण्डल-शब्दका तीनों लिङ्गोंमें
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प्रयोग होता है। चन्द्रमाके सोलहवें भागको कला कहते हैं। भित्त, शकल और खण्ड—ये टुकड़ेके वाचक हैं। चाँदनीको चन्द्रिका, कौमुदी और ज्योत्स्ना कहते हैं। प्रसाद और प्रसन्नता—ये निर्मलता और हर्षके बोधक हैं। लक्षण, लक्ष्म और चिह्न—ये चिह्नके तथा शोभा, कान्ति, द्युति और छवि—ये शोभाके नाम हैं। उत्तम शोभाको सुषमा कहते हैं। तुषार, तुहिन, हिम, अवश्याय, नीहार, प्रालेय, शिशिर और हिम—ये पालेके वाचक हैं। नक्षत्र, ऋक्ष, भ, तारा, तारका और उडु—ये नक्षत्रके पर्याय हैं। इनमें उडु शब्द विकल्पसे स्त्रीलिङ्ग और नपुंसक होता है। गुरु, जीव और आङ्गिरस—ये बृहस्पतिके; उशना, भार्गव और कवि—ये शुक्राचार्यके तथा विधुंतुद, तम और राहु—ये तीन राहुके नाम हैं। राशियोंके उदयको लग्न कहते हैं। मरीचि और अत्रि आदि* सप्तर्षि 'चित्रशिखण्डी' के नामसे प्रसिद्ध हैं। हरिदश्व, ब्रध्न, पूषा, द्युमणि, मिहिर और रवि—ये सूर्यके नाम हैं। परिवेष, परिधि, उपसूर्य्यक और मण्डल—ये उत्पात आदिके समय दिखायी देनेवाले सूर्यमण्डलके घेरेका बोध करानेवाले हैं। किरण, उस्र, मयूख, अंशु, गभस्ति, घृणि, धृष्णि, भानु, कर, मरीचि और दीधिति—ये ग्यारह सूर्यकी किरणोंके नाम हैं। इनमें मरीचि शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग दोनोंमें प्रयुक्त होता है तथा दीधिति शब्दका प्रयोग केवल स्त्रीलिङ्गमें होता है। प्रभा, रुक्, रुचि, त्विट्, भा, आभा, छवि, द्युति, दीप्ति, रोचिष् और शोचिष्—ये प्रभाके नाम हैं। इनमें रोचिष् और शोचिष्—ये दो शब्द केवल नपुंसकलिंगमें प्रयुक्त होते हैं (शेष सभी स्त्रीलिङ्ग हैं)। प्रकाश, द्योत और आतप—ये तीन धूप या घामके नाम हैं। कोष्ण, कवोष्ण, मन्दोष्ण और कदुष्ण—ये थोड़ी गरमीका बोध करानेवाले हैं। यद्यपि स्वरूपसे ये नपुंसकलिंग हैं, तथापि जब थोड़ी गरमी रखनेवाली किसी वस्तुके विशेषण होते हैं तो विशेष्यके अनुसार इनका तीनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। तिग्म, तीक्ष्ण और खर—ये अधिक गर्मीके वाचक हैं। ये भी पूर्ववत् गुणबोधक होनेपर नपुंसकमें और गुणवान्के विशेषण होनेपर विशेष्यके अनुसार तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। दिष्ट, अनेहा और काल—ये समयके पर्याय हैं। घस्र, दिन और अहन्—ये दिनके, सायं शब्द सायंकालका और संध्या तथा पितृप्रसू—ये दो संध्याके नाम हैं। प्रत्यूष, अहर्मुख, कल्य, उषस् और प्रत्यूषस्—ये प्रभातकालके वाचक हैं। दिनके प्रथम भागको प्राह्ण, अन्तिम भागको अपराह्न और मध्यभागको मध्याह्न कहते हैं—इन तीनोंका समुदाय त्रिसंध्य कहलाता है। शर्वरी, यामी (यामिनी) और तमी—ये रात्रिके वाचक हैं। अँधेरी रातको तमिस्रा और चाँदनी रात्रिको ज्योत्स्नी कहते हैं। आगामी और वर्तमान—इन दो दिनोंसहित बीचकी रात्रिका बोध करानेके लिये पक्षिणी शब्दका प्रयोग किया जाता है। आधी रातके दो नाम हैं—अर्धरात्र और निशीथ। रात्रिके प्रारम्भको प्रदोष और रजनीमुख कहते हैं। प्रतिपदा और पूर्णिमा या अमावास्याके बीचमें जो संधिका समय है उसे पर्वसंधि कहते हैं। दोनों पञ्चदशियों अर्थात् पूर्णिमा और अमावास्याको पक्षान्त कहा जाता है। पूर्णिमाके दो नाम हैं—पौर्णमासी तथा पूर्णिमा। यदि पूर्णिमाको चन्द्रोदयके समय प्रतिपद्का योग लग जानेसे एक कलासे हीन चन्द्रमाका उदय हो तो उस पूर्णिमाकी 'अनुमति' संज्ञा है तथा पूर्ण
* आदि पदसे अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठका ग्रहण होता है।
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चन्द्रमाके उदय लेनेपर उसे 'राका' कहते हैं। अमावस्या, अमावास्या दर्श और सूर्येन्दुसंगम—ये चार अमावास्याके नाम हैं। यदि सबेरे चतुर्दशीका योग होनेसे अमावास्याके प्रातःकाल चन्द्रमाका दर्शन हो जाय तो उस अमावास्याको 'सिनीवाली' कहते हैं। किंतु चन्द्रोदयकालमें अमावस्याका योग हो जानेसे यदि चन्द्रमाकी कला बिलकुल न दिखायी दे तो वह अमा 'कुहू' कहलाती है॥ २२-४०॥
संवर्त, प्रलय, कल्प, क्षय और कल्पान्त—ये पाँच प्रलयके नाम हैं। कलुष, वृजिन, एनस्, अघ, अंहस्, दुरित और दुष्कृत शब्द पापके वाचक हैं। धर्म शब्दका प्रयोग पुंल्लिङ्ग और नपुंसक दोनोंमें होता है। इसके पर्याय हैं—पुण्य, श्रेयस्, सुकृत और वृष। (इनमें आरम्भके तीन नपुंसक और वृष शब्द पुंल्लिङ्ग है।) मुत्, प्रीति, प्रमद, हर्ष, प्रमोद, आमोद, सम्मद, आनन्धु, आनन्द, शर्म, शात और सुख—ये सुख एवं हर्षके नाम हैं। स्वःश्रेयस, शिव, भद्र, कल्याण, मङ्गल, शुभ, भावुक, भविक, भव्य, कुशल और क्षेम—ये कल्याण-अर्थका बोध करानेवाले हैं। ये सभी शब्द केवल स्त्रीलिङ्गमें नहीं प्रयुक्त होते। दैव, दिष्ट, भागधेय, भाग्य, नियति और विधि—ये भाग्यके नाम हैं। इनमें नियति-शब्द स्त्रीलिङ्ग है (और विधि पुंल्लिङ्ग तथा आरम्भके चार शब्द नपुंसकलिङ्ग हैं)। क्षेत्रज्ञ, आत्मा और पुरुष—ये आत्माके पर्याय हैं। प्रकृति या मायाके दो नाम हैं—प्रधान और प्रकृति। इनमें प्रकृति स्त्रीलिङ्ग है और प्रधान नपुंसकलिङ्ग। हेतु, कारण और बीज—ये कारणके वाचक हैं। इनमें पहला पुंल्लिङ्ग और शेष दो शब्द नपुंसकलिङ्ग हैं। कार्यकी उत्पत्तिमें प्रधान हेतुके दो नाम हैं—निदान और आदिकारण। चित्त, चेतस्, हृदय, स्वान्त, हृत्, मानस और मनस्—ये चित्तके पर्याय हैं। बुद्धि, मनीषा, धिषणा, धी, प्रज्ञा, शेमुषी, मति, प्रेक्षा, उपलब्धि, चित्, संवित्, प्रतिपत्, ज्ञप्ति और चेतना—ये बुद्धिके वाचक शब्द हैं। धारणाशक्तिसे युक्त बुद्धिको 'मेधा' कहते हैं और मानसिक व्यापारका नाम संकल्प है। संख्या, विचारणा और चर्चा—ये विचारके, विचिकित्सा और संशय संदेहके तथा अध्याहार, तर्क और ऊह—ये तर्क-वितर्कके नाम हैं। निश्चित विचारको निर्णय और निश्चय कहते हैं। 'ईश्वर और परलोक नहीं है'—ऐसे विचारको मिथ्या-दृष्टि और नास्तिकता कहते हैं। भ्रान्ति, मिथ्यामति और भ्रम—ये तीन भ्रमात्मक ज्ञानके वाचक हैं। अङ्गीकार, अभ्युपगम, प्रतिश्रव और समाधि—ये स्वीकार अर्थका बोध करानेवाले हैं। मोक्षविषयक बुद्धिको ज्ञान और शिल्प एवं शास्त्रके बोधको विज्ञान कहते हैं। मुक्ति, कैवल्य, निर्वाण, श्रेयस्, निःश्रेयस, अमृत, मोक्ष और अपवर्ग—ये मोक्षके वाचक शब्द हैं। अज्ञान, अविद्या और अहम्मति—ये तीन अज्ञानके पर्याय हैं। इनमें पहला नपुंसक और शेष दो शब्द स्त्रीलिङ्ग हैं। एक-दूसरेकी रगड़से प्रकट हुई मनोहारिणी गन्धके अर्थमें 'परिमल' शब्दका प्रयोग होता है। वही गन्ध जब अत्यन्त मनोहर हो तो उसे 'आमोद' कहते हैं। घ्राणेन्द्रियको तृप्त करनेवाली उत्तम गन्धका नाम 'सुरभि' है। शुभ्र, शुक्ल, शुचि, श्वेत, विशद, श्येत, पाण्डर, अवदात, सित, गौर, वलक्ष, धवल और अर्जुन—ये श्वेत वर्णके वाचक हैं। कुछ पीलापन लिये हुए सफेदीको हरिण, पाण्डुर और पाण्डु कहते हैं। यह रंग भी बहुत हलका हो तो उसे धूसर कहते हैं। नील, असित, श्याम, काल, श्यामल और मेचक—ये कृष्णवर्ण (काले रंग) के बोधक हैं। पीत, गौर तथा हरिद्राभ—ये पीले रंगके और पालाश, हरित तथा हरित्—ये हरे रंगके वाचक हैं। रोहित, लोहित और रक्त—ये लाल रंगका बोध करानेवाले हैं। रक्त कमलके समान जिसकी
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शोभा हो, उसे 'शोण' कहते हैं। जिसकी लालिमा जान न पड़ती हो, उस हलकी लालीका नाम 'अरुण' है। सफेदी लिये हुए लाली अर्थात् गुलाबी रंगको 'पाटल' कहते हैं। जिसमें काले और पीले—दोनों रंग मिले हों वह 'श्याव' और 'कपिश' कहलाता है। जहाँ कालेके साथ लाल रंगका मेल हो, उसे धूम्र तथा धूमल कहते हैं। कडार, कपिल, पिङ्ग, पिशङ्ग, कद्रु तथा पिङ्गल—ये भूरे रंगके वाचक हैं। चित्र, किर्मीर, कल्माष, शबल, एत और कर्बुर—ये चितकबरे रंगका बोध करानेवाले हैं॥ ४१—५६ $\frac{१}{२}$ ॥
व्याहार, उक्ति तथा लपित—ये वचनके समानार्थक शब्द हैं। व्याकरणके नियमोंसे च्युत—अशुद्ध शब्दको 'अपभ्रंश' तथा 'अपशब्द' कहते हैं। सुबन्त पदोंका समुदाय ('चैत्रेण शयितव्यम्' इत्यादि), तिङन्त पदोंका समूह ('पश्य पश्य गच्छति' इत्यादि), सुबन्त और तिङन्त—दोनों पदोंका समुदाय ('चैत्रः पचति' इत्यादि) अथवा कारकसे अन्वित क्रियाका बोध करानेवाला पद-समूह ('घटमानय') इत्यादि—ये सभी 'वाक्य' कहलाते हैं। पूर्वकालमें बीती हुई सच्ची घटनाओंका वर्णन करनेवाले ग्रन्थको 'इतिहास' तथा 'पुरावृत्त' कहते हैं। (सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—इन) पाँच लक्षणोंसे युक्त व्यासादि मुनियोंके ग्रन्थका नाम 'पुराण' है। सच्ची घटनाको लेकर लिखी हुई पुस्तक 'आख्यायिका' कहलाती है। कल्पित प्रबन्धको 'कथा' कहते हैं। संग्रहके वाचक दो शब्द हैं—समाहार तथा संग्रह। अबूझ पहेलीको 'प्रवह्लिका' और 'प्रहेलिका' कहते हैं। पूर्ण करनेके लिये दी हुई संक्षिप्त पदावलीका नाम 'समस्या' और 'समासार्था' है। वेदार्थके स्मरणपूर्वक लिखे हुए धर्मशास्त्रको 'स्मृति' और 'धर्मसंहिता' कहते हैं। आख्या, आह्वा और अभिधान—ये नामके वाचक हैं। 'वार्ता' और 'वृत्तान्त'—दोनों समानार्थक शब्द हैं। हूति, आकारणा और आह्वान—ये पुकारनेके अर्थमें आते हैं। वाणीके आरम्भको 'उपन्यास' और 'वाङ्मुख' कहते हैं। विवाद और व्यवहार मुकदमेबाजीका नाम है। प्रतिवाक्य और उत्तर—ये दोनों समानार्थक शब्द हैं। उपोद्घात और उदाहार—ये भूमिकाके नाम हैं। झूठा कलङ्क लगानेको मिथ्याभिशंसन और अभिशाप कहते हैं। यश और कीर्ति—ये सुयशके नाम हैं। प्रश्न, पृच्छा और अनुयोग—इनका पूछनेके अर्थमें प्रयोग होता है। एक ही शब्दके दो-तीन बार उच्चारण करनेको 'आम्रेडित' कहते हैं। परायी निन्दाके अर्थमें कुत्सा, निन्दा और गर्हण शब्दका प्रयोग होता है। साधारण बातचीतको आभाषण और आलाप कहते हैं। पागलोंकी तरह कहे हुए असम्बद्ध या निरर्थक वचनका नाम प्रलाप है। बारंबार किये जानेवाले वार्तालापको अनुलाप कहते हैं। शोकयुक्त उद्गारका नाम विलाप और परिदेवन है। परस्पर विरुद्ध बातचीतको विप्रलाप और विरोधोक्ति कहते हैं। दो व्यक्तियोंके पारस्परिक वार्तालापका नाम संलाप है। सुप्रलाप और सुवचन—ये उत्तम वाणीके वाचक हैं। सत्यको छिपानेके लिये जिस वाणीका प्रयोग किया जाता है, उसे अपलाप तथा निह्नव कहते हैं। अमङ्गलमयी वाणीका नाम उशती है। हृदयमें बैठनेवाली युक्तियुक्त बातको संगत और हृदयंगम कहते हैं। अत्यन्त मधुर वाणीमें जो सान्त्वना दी जाती है, उसे सान्त्व कहते हैं। जिन बातोंका परस्पर कोई सम्बन्ध न हो, वे अबद्ध और निरर्थक कहलाती हैं। निष्ठुर और परुष शब्द कठोर वाणीके तथा अश्लील और ग्राम्य शब्द गंदी बातोंके बोधक हैं। प्रिय लगनेवाली वाणीको सूनृत कहते हैं। सत्य, तथ्य, ऋत और सम्यक्—ये यथार्थ वचनका बोध करानेवाले हैं। नाद, निस्वान, निस्वन, आरव, आराव, संराव और विराव—ये अव्यक्त शब्दके वाचक हैं। कपड़ों