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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 808, कुल 878 में से

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पृष्ठ 808

* अध्याय ३६० * ७८१

प्रत्यय होते हैं। 'ववौ वाति इति वा वायुः।' वा+उण् (युगागम एवं विभक्तिकार्य)=वायुः'पा+उण्=पायुः।' 'कृ+ उण्= कारुः।' इत्यादि पद सिद्ध होते हैं। 'बहुलं छन्दसि' इस नियमके अनुसार सभी 'कृत्' प्रत्यय वेदमें बाहुल्येन उपलब्ध होते हैं। वहाँ कहीं प्रवृत्ति, कहीं अप्रवृत्ति, कहीं वैकल्पिक विधान और कहीं कुछ और ही विधि दृष्टिगोचर होती है॥ ५-८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कृदन्त शब्दोंके सिद्ध रूपोंका संक्षिप्त वर्णन' नामक तीन सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५९॥


तीन सौ साठवाँ अध्याय

स्वर्ग-पाताल आदि वर्ग

अग्निदेव कहते हैं—कात्यायन! स्वर्ग आदिके नाम और लिङ्ग जिनके स्वरूप हैं, उन शुद्ध स्वरूप श्रीहरिका मैं वर्णन करता हूँ—स्वः [अव्यय], स्वर्ग, नाक, त्रिदिव [पुंल्लिङ्ग], द्यो, दिव्—ये दो स्त्रीलिङ्ग और त्रिविष्टप [नपुंसक]—ये सब 'स्वर्गलोक'के नाम हैं। देव, वृन्दारक और लेख—ये (पुँल्लिङ्ग शब्द) देवताओंके नाम हैं। 'रुद्र' आदि* शब्द गणदेवताके वाचक हैं। विद्याधर, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, किंनर, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध और भूत—ये सब 'देवयोनि'के अन्तर्गत हैं। देवद्विट्, असुर और दैत्य—ये असुरोंके तथा सुगत और तथागत—ये बुद्धके नाम हैं। ब्रह्मा, आत्मभू और सुरज्येष्ठ—ये ब्रह्माजीके; विष्णु, नारायण और हरि—ये भगवान् विष्णुके; रेवतीश, हली और राम—ये बलभद्रजीके तथा काम, स्मर और पञ्चशर—ये कामदेवके नाम हैं। लक्ष्मी, पद्मालया और पद्मा—ये लक्ष्मीजीके तथा शर्व, सर्वेश्वर और शिव—ये भगवान् शंकरके नाम हैं। उनकी बँधी हुई जटाके दो नाम हैं—कपर्द और जटाजूट। उनके धनुषके भी दो नाम हैं—पिनाक और अजगव। शिवजीके पार्षद प्रमथ कहलाते हैं। मृडानी, चण्डिका और अम्बिका—ये पार्वतीजीके; द्वैमातुर और गजास्य (गजानन)—ये गणेशजीके तथा सेनानी, अग्निभू और गुह—ये स्वामी कार्तिकेयजीके नाम हैं। आखण्डल, शुनासीर, सुत्रामा और दिवस्पति—ये इन्द्रके तथा पुलोमजा, शची और इन्द्राणी—ये उनकी प्रियतमा शची देवीके नाम हैं। इन्द्रके महलका नाम वैजयन्त, पुत्रका नाम जयन्त और पाकशासनि तथा हाथीके नाम ऐरावत, अभ्रमातङ्ग, ऐरावण और अभ्रमुवल्लभ हैं। ह्रादिनी (स्त्रीलिङ्ग), पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिंगमें प्रयुक्त होनेवाला वज्र, कुलिश (नपुंसक), भिदुर (नपुंसक) और पवि (पुँल्लिङ्ग)—ये सब इन्द्रके वज्रके नाम हैं। व्योम-यान (नपुं०) तथा विमान (पुँल्लि० नपुं०)—ये आकाशमें विचरनेवाले देववाहनोंके नाम हैं। पीयूष, अमृत और सुधा—ये अमृतके नाम हैं। (इनमें सुधा तो स्त्रीलिङ्ग और शेष दोनों नाम नपुंसकलिंग हैं।) देवताओंकी सभा 'सुधर्मा' कहलाती है। देवताओंकी नदी गङ्गाका नाम स्वर्गङ्गा और सुरदीर्घिका है। उर्वशी आदि अप्सराओंको अप्सरा और स्वर्वेश्या कहते हैं। इनमें अप्सरस् शब्द स्त्रीलिङ्ग एवं बहुवचनमें प्रयुक्त होता है। हाहा, हूहू आदि गन्धर्वोंके नाम हैं। अग्नि, वह्नि, धनंजय, जातवेदा, कृष्णवर्त्मा, आश्रयाश, पावक, हिरण्यरेताः, सप्तार्चि,


* आदि शब्दसे वसु और आदित्य आदि नामोंको ग्रहण करना चाहिये। रुद्र ११, वसु ८ और आदित्य १२ हैं।