सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 809, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 809

७८२ * अग्निपुराण *

शुक्ल, आशुशुक्षणि, शुचि और अप्पित—ये अग्निके नाम हैं तथा और्व, वाडव और वडवानल—ये समुद्रके भीतर जलनेवाली आगके नाम हैं। आगकी ज्वालाके पाँच नाम हैं—ज्वाल, कील, अर्चिष्, हेति और शिखा। इनमें पहले दो शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग दोनोंमें प्रयुक्त होते हैं। अर्चिष् नपुंसकलङ्ग है तथा हेति और शिखा स्त्रीलिङ्ग शब्द हैं। आगकी चिनगारीके दो नाम हैं—स्फुलिङ्ग और अग्निकण। इनमें पहला तीनों लिङ्गोंमें और दूसरा केवल पुँल्लिङ्गमें प्रयुक्त होता है। धर्मराज, परेतराट्, काल, अन्तक, दण्डधर और श्राद्धदेव—ये यमराजके नाम हैं। रक्षस, कौणप, अश्रप, क्रव्याद, यातुधान और नैर्ऋति—ये राक्षसोंके नाम हैं। प्रचेता, वरुण और पाशी—ये वरुणके तथा श्वसन, स्पर्शन, अनिल, सदागति, मातरिश्वा, प्राण, मरुत् और समीरण—ये वायुके नाम हैं। जव, रंहस् और तरस्—ये वेगके वाचक हैं। (इनमें पहला पुँल्लिङ्ग और शेष दोनों शब्द नपुंसकलङ्ग हैं।) लघु, क्षिप्र, अर, द्रुत, सत्वर, चपल, तूर्ण, अविलम्बित और आशु—ये शीघ्रताके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। (क्रियाविशेषण होनेपर इन सबका नपुंसकलङ्ग एवं एकवचनमें प्रयोग होता है।) सतत, अनारत, अश्रान्त, संतत, अविरत, अनिश, नित्य, अनवरत और अजस्र—ये निरन्तरके वाचक हैं। (ये भी प्रायः क्रियाविशेषणमें ही प्रयुक्त होते हैं, केवल 'नित्य' शब्दका ही अन्य विशेषणोंमें भी प्रयोग होता है।) अतिशय, भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ, निर्भर, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ, बाढ और दृढ—ये अतिशय (अधिकमात्रा)-के वाचक हैं। गुह्यकेश, यक्षराज, राजराज और धनाधिप—ये कुबेरके नाम हैं। किंनर, किम्पुरुष, तुरंगवदन और मयु—ये किंनरोंके वाचक शब्द हैं। निधि और शेवधि—ये दोनों पुँल्लिङ्ग शब्द निधिके वाचक हैं। व्योम, अभ्र, पुष्कर, अम्बर, द्यो, दिव्, अन्तरिक्ष और ख—ये आकाशके पर्याय हैं। (इनमें द्यो और दिव् शब्द स्त्रीलिङ्गमें प्रयुक्त होते हैं और शेष सब नपुंसकलङ्गमें।) काष्ठा, आशा, ककुभ् और दिश—ये दिशा-अर्थके बोधक हैं। अभ्यन्तर और अन्तराल शब्द मध्यके तथा चक्रवाल और मण्डल शब्द गोलाकार मण्डल एवं समुदायके वाचक हैं। तडित्वान्, वारिद, मेघ, स्तनयित्नु और बलाहक—ये मेघके पर्याय हैं॥ १—२१॥

बादलोंकी घटाका नाम है कादम्बिनी और मेघमाला तथा स्तनित और गर्जित—ये (नपुंसकलङ्ग) शब्द मेघगर्जनाके वाचक हैं। शम्पा, शतह्रदा, ह्लादिनी, ऐरावती, क्षणप्रभा, तडित्, सौदामिनी (सौदामनी), विद्युत्, चञ्चला और चपला—ये बिजलीके पर्याय हैं। स्फूर्जथु और वज्र-निर्घोष—ये दो बिजलीकी गड़गड़ाहटके नाम हैं। वर्षाकी रुकावटको वृष्टिघात और अवग्रह कहते हैं। धारा-सम्पात और आसार—ये दो मुसलाधार वृष्टिके नाम हैं। जलके छींटों या फुहारोंको शीकर कहते हैं। वर्षाके साथ गिरनेवाले ओलोंका नाम करका है। जब मेघोंकी घटासे दिन छिप जाय तो उसे दुर्दिन कहते हैं। अन्तर्धा, व्यवधा, पुँल्लिङ्गमें प्रयुक्त होनेवाला अन्तर्धि तथा (नपुंसकलङ्ग) अपवारण, अपिधान, तिरोधान, पिधान और आच्छादन—ये आठ अन्तर्धान (अदृश्य होने)-के नाम हैं। अब्ज, जैवात्रिक, सोम, ग्लौः, मृगाङ्क, कलानिधि, विधु तथा कुमुद-बन्धु—ये चन्द्रमाके पर्याय हैं। चन्द्रमा और सूर्यके मण्डलका नाम है—बिम्ब और मण्डल। इनमें बिम्ब शब्दका पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलङ्गमें तथा मण्डल-शब्दका तीनों लिङ्गोंमें