अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 810, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ३६० * ७८३
प्रयोग होता है। चन्द्रमाके सोलहवें भागको कला कहते हैं। भित्त, शकल और खण्ड—ये टुकड़ेके वाचक हैं। चाँदनीको चन्द्रिका, कौमुदी और ज्योत्स्ना कहते हैं। प्रसाद और प्रसन्नता—ये निर्मलता और हर्षके बोधक हैं। लक्षण, लक्ष्म और चिह्न—ये चिह्नके तथा शोभा, कान्ति, द्युति और छवि—ये शोभाके नाम हैं। उत्तम शोभाको सुषमा कहते हैं। तुषार, तुहिन, हिम, अवश्याय, नीहार, प्रालेय, शिशिर और हिम—ये पालेके वाचक हैं। नक्षत्र, ऋक्ष, भ, तारा, तारका और उडु—ये नक्षत्रके पर्याय हैं। इनमें उडु शब्द विकल्पसे स्त्रीलिङ्ग और नपुंसक होता है। गुरु, जीव और आङ्गिरस—ये बृहस्पतिके; उशना, भार्गव और कवि—ये शुक्राचार्यके तथा विधुंतुद, तम और राहु—ये तीन राहुके नाम हैं। राशियोंके उदयको लग्न कहते हैं। मरीचि और अत्रि आदि* सप्तर्षि 'चित्रशिखण्डी' के नामसे प्रसिद्ध हैं। हरिदश्व, ब्रध्न, पूषा, द्युमणि, मिहिर और रवि—ये सूर्यके नाम हैं। परिवेष, परिधि, उपसूर्य्यक और मण्डल—ये उत्पात आदिके समय दिखायी देनेवाले सूर्यमण्डलके घेरेका बोध करानेवाले हैं। किरण, उस्र, मयूख, अंशु, गभस्ति, घृणि, धृष्णि, भानु, कर, मरीचि और दीधिति—ये ग्यारह सूर्यकी किरणोंके नाम हैं। इनमें मरीचि शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग दोनोंमें प्रयुक्त होता है तथा दीधिति शब्दका प्रयोग केवल स्त्रीलिङ्गमें होता है। प्रभा, रुक्, रुचि, त्विट्, भा, आभा, छवि, द्युति, दीप्ति, रोचिष् और शोचिष्—ये प्रभाके नाम हैं। इनमें रोचिष् और शोचिष्—ये दो शब्द केवल नपुंसकलिंगमें प्रयुक्त होते हैं (शेष सभी स्त्रीलिङ्ग हैं)। प्रकाश, द्योत और आतप—ये तीन धूप या घामके नाम हैं। कोष्ण, कवोष्ण, मन्दोष्ण और कदुष्ण—ये थोड़ी गरमीका बोध करानेवाले हैं। यद्यपि स्वरूपसे ये नपुंसकलिंग हैं, तथापि जब थोड़ी गरमी रखनेवाली किसी वस्तुके विशेषण होते हैं तो विशेष्यके अनुसार इनका तीनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। तिग्म, तीक्ष्ण और खर—ये अधिक गर्मीके वाचक हैं। ये भी पूर्ववत् गुणबोधक होनेपर नपुंसकमें और गुणवान्के विशेषण होनेपर विशेष्यके अनुसार तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। दिष्ट, अनेहा और काल—ये समयके पर्याय हैं। घस्र, दिन और अहन्—ये दिनके, सायं शब्द सायंकालका और संध्या तथा पितृप्रसू—ये दो संध्याके नाम हैं। प्रत्यूष, अहर्मुख, कल्य, उषस् और प्रत्यूषस्—ये प्रभातकालके वाचक हैं। दिनके प्रथम भागको प्राह्ण, अन्तिम भागको अपराह्न और मध्यभागको मध्याह्न कहते हैं—इन तीनोंका समुदाय त्रिसंध्य कहलाता है। शर्वरी, यामी (यामिनी) और तमी—ये रात्रिके वाचक हैं। अँधेरी रातको तमिस्रा और चाँदनी रात्रिको ज्योत्स्नी कहते हैं। आगामी और वर्तमान—इन दो दिनोंसहित बीचकी रात्रिका बोध करानेके लिये पक्षिणी शब्दका प्रयोग किया जाता है। आधी रातके दो नाम हैं—अर्धरात्र और निशीथ। रात्रिके प्रारम्भको प्रदोष और रजनीमुख कहते हैं। प्रतिपदा और पूर्णिमा या अमावास्याके बीचमें जो संधिका समय है उसे पर्वसंधि कहते हैं। दोनों पञ्चदशियों अर्थात् पूर्णिमा और अमावास्याको पक्षान्त कहा जाता है। पूर्णिमाके दो नाम हैं—पौर्णमासी तथा पूर्णिमा। यदि पूर्णिमाको चन्द्रोदयके समय प्रतिपद्का योग लग जानेसे एक कलासे हीन चन्द्रमाका उदय हो तो उस पूर्णिमाकी 'अनुमति' संज्ञा है तथा पूर्ण
* आदि पदसे अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठका ग्रहण होता है।