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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 811, कुल 878 में से

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पृष्ठ 811

७८४ * अग्निपुराण *

चन्द्रमाके उदय लेनेपर उसे 'राका' कहते हैं। अमावस्या, अमावास्या दर्श और सूर्येन्दुसंगम—ये चार अमावास्याके नाम हैं। यदि सबेरे चतुर्दशीका योग होनेसे अमावास्याके प्रातःकाल चन्द्रमाका दर्शन हो जाय तो उस अमावास्याको 'सिनीवाली' कहते हैं। किंतु चन्द्रोदयकालमें अमावस्याका योग हो जानेसे यदि चन्द्रमाकी कला बिलकुल न दिखायी दे तो वह अमा 'कुहू' कहलाती है॥ २२-४०॥

संवर्त, प्रलय, कल्प, क्षय और कल्पान्त—ये पाँच प्रलयके नाम हैं। कलुष, वृजिन, एनस्, अघ, अंहस्, दुरित और दुष्कृत शब्द पापके वाचक हैं। धर्म शब्दका प्रयोग पुंल्लिङ्ग और नपुंसक दोनोंमें होता है। इसके पर्याय हैं—पुण्य, श्रेयस्, सुकृत और वृष। (इनमें आरम्भके तीन नपुंसक और वृष शब्द पुंल्लिङ्ग है।) मुत्, प्रीति, प्रमद, हर्ष, प्रमोद, आमोद, सम्मद, आनन्धु, आनन्द, शर्म, शात और सुख—ये सुख एवं हर्षके नाम हैं। स्वःश्रेयस, शिव, भद्र, कल्याण, मङ्गल, शुभ, भावुक, भविक, भव्य, कुशल और क्षेम—ये कल्याण-अर्थका बोध करानेवाले हैं। ये सभी शब्द केवल स्त्रीलिङ्गमें नहीं प्रयुक्त होते। दैव, दिष्ट, भागधेय, भाग्य, नियति और विधि—ये भाग्यके नाम हैं। इनमें नियति-शब्द स्त्रीलिङ्ग है (और विधि पुंल्लिङ्ग तथा आरम्भके चार शब्द नपुंसकलिङ्ग हैं)। क्षेत्रज्ञ, आत्मा और पुरुष—ये आत्माके पर्याय हैं। प्रकृति या मायाके दो नाम हैं—प्रधान और प्रकृति। इनमें प्रकृति स्त्रीलिङ्ग है और प्रधान नपुंसकलिङ्ग। हेतु, कारण और बीज—ये कारणके वाचक हैं। इनमें पहला पुंल्लिङ्ग और शेष दो शब्द नपुंसकलिङ्ग हैं। कार्यकी उत्पत्तिमें प्रधान हेतुके दो नाम हैं—निदान और आदिकारण। चित्त, चेतस्, हृदय, स्वान्त, हृत्, मानस और मनस्—ये चित्तके पर्याय हैं। बुद्धि, मनीषा, धिषणा, धी, प्रज्ञा, शेमुषी, मति, प्रेक्षा, उपलब्धि, चित्, संवित्, प्रतिपत्, ज्ञप्ति और चेतना—ये बुद्धिके वाचक शब्द हैं। धारणाशक्तिसे युक्त बुद्धिको 'मेधा' कहते हैं और मानसिक व्यापारका नाम संकल्प है। संख्या, विचारणा और चर्चा—ये विचारके, विचिकित्सा और संशय संदेहके तथा अध्याहार, तर्क और ऊह—ये तर्क-वितर्कके नाम हैं। निश्चित विचारको निर्णय और निश्चय कहते हैं। 'ईश्वर और परलोक नहीं है'—ऐसे विचारको मिथ्या-दृष्टि और नास्तिकता कहते हैं। भ्रान्ति, मिथ्यामति और भ्रम—ये तीन भ्रमात्मक ज्ञानके वाचक हैं। अङ्गीकार, अभ्युपगम, प्रतिश्रव और समाधि—ये स्वीकार अर्थका बोध करानेवाले हैं। मोक्षविषयक बुद्धिको ज्ञान और शिल्प एवं शास्त्रके बोधको विज्ञान कहते हैं। मुक्ति, कैवल्य, निर्वाण, श्रेयस्, निःश्रेयस, अमृत, मोक्ष और अपवर्ग—ये मोक्षके वाचक शब्द हैं। अज्ञान, अविद्या और अहम्मति—ये तीन अज्ञानके पर्याय हैं। इनमें पहला नपुंसक और शेष दो शब्द स्त्रीलिङ्ग हैं। एक-दूसरेकी रगड़से प्रकट हुई मनोहारिणी गन्धके अर्थमें 'परिमल' शब्दका प्रयोग होता है। वही गन्ध जब अत्यन्त मनोहर हो तो उसे 'आमोद' कहते हैं। घ्राणेन्द्रियको तृप्त करनेवाली उत्तम गन्धका नाम 'सुरभि' है। शुभ्र, शुक्ल, शुचि, श्वेत, विशद, श्येत, पाण्डर, अवदात, सित, गौर, वलक्ष, धवल और अर्जुन—ये श्वेत वर्णके वाचक हैं। कुछ पीलापन लिये हुए सफेदीको हरिण, पाण्डुर और पाण्डु कहते हैं। यह रंग भी बहुत हलका हो तो उसे धूसर कहते हैं। नील, असित, श्याम, काल, श्यामल और मेचक—ये कृष्णवर्ण (काले रंग) के बोधक हैं। पीत, गौर तथा हरिद्राभ—ये पीले रंगके और पालाश, हरित तथा हरित्—ये हरे रंगके वाचक हैं। रोहित, लोहित और रक्त—ये लाल रंगका बोध करानेवाले हैं। रक्त कमलके समान जिसकी