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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 798, कुल 878 में से

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पृष्ठ 798
  • अध्याय ३५७ * ७७१

'पृथौर्भावः' (पृथुका भाव)—इस अर्थमें 'पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा।' (५।१।१२२)—इस सूत्रसे वैकल्पिक 'इमनिच्' प्रत्यय होनेपर 'प्रथिमा'—यह रूप बनता है। 'प्रथिमा' का अर्थ है—मोटापन। 'सुखस्य भावः कर्म वा' (सुखका भाव या कर्म)—इस अर्थमें 'गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च।' (५।१।१२४)—इस सूत्रके अनुसार 'ष्यञ्' प्रत्यय होनेपर 'सौख्यम्'—इस पदकी सिद्धि कही गयी है। 'स्तेनस्य भावः कर्म वा' (स्तेन—चोरका भाव या कर्म)—इस अर्थमें 'स्तेन' शब्दसे 'यत्' प्रत्यय और 'न'—इस समुदायका लोप हो जाता है। (द्रष्टव्य—पा० सू० ५।१।१२५)। इस प्रकार 'स्तेय' शब्दकी सिद्धि होती है। इसी प्रकार 'सख्युर्भावः कर्म वा' (सखाका भाव या कर्म)—इस अर्थमें 'य' प्रत्यय होनेपर 'सख्यम्' इस पदकी सिद्धि कही गयी है। यहाँ 'सख्युर्यः।' (५।१।१२६)—इस सूत्रसे 'य' प्रत्यय होता है। 'कपेर्भावः कर्म वा'—इस अर्थमें 'कपिज्ञात्योर्ढक्।' (५।१।१२७)—इस सूत्रसे 'ढक्' प्रत्यय होनेपर 'कापेयम्' पदकी सिद्धि होती है। 'सेना एव सैन्यम्'—यहाँ 'चतुर्वर्णादीनां स्वार्थ उपसंख्यानम्'— इस वार्तिकके अनुसार स्वार्थमें 'ष्यञ्' प्रत्यय होता है। 'शास्त्रीयात् पथः अनपेतम्' (शास्त्रीय पथसे जो भ्रष्ट नहीं हुआ है, वह)—इस अर्थमें 'धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते।' (४।४।९२)—इस सूत्रके अनुसार 'पथिन्' शब्दसे 'यत्' प्रत्यय होनेपर 'पथ्यम्'—यह रूप होता है। 'अश्वस्य भावः कर्म वा आश्वम्'—यहाँ 'अश्व' शब्दसे 'अञ्' हुआ है। ('उष्ट्रस्य भावः कर्म वा औष्ट्रम्'—यहाँ भी 'अञ्' प्रत्यय हुआ है।) 'कुमारस्य भावः कर्म वा कौमारम्'—इसमें भी 'कुमार' शब्दसे 'अञ्' प्रत्यय हुआ। 'यूनोर्भावः कर्म वा यौवनम्'—यहाँ भी पूर्ववत् 'युवन्' शब्दसे 'अञ्' प्रत्यय हुआ है। इन सबमें 'अञ्' प्रत्यय विधायक सूत्र है—'प्राणभृज्जातिवयोवचनोद्गात्रादिभ्योऽञ्' (५।१।१२९)। 'आचार्य' शब्दसे 'कन्' प्रत्यय होनेपर 'आचार्यकम्'—यह रूप बनता है। इसी तरह अन्य भी बहुत-से तद्धित प्रत्यय होते हैं, (उन्हें अन्य ग्रन्थोंसे जानना चाहिये) ॥ २८–३० ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'तद्धितान्त शब्दोंके रूपका कथन' नामक
तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५६ ॥


तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय

उणादिसिद्ध शब्दरूपोंका दिग्दर्शन

कुमार स्कन्द कहते हैं—कात्यायन! अब 'उणादि' प्रत्यय बताये जाते हैं, जो धातुसे परे होते हैं। 'कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्।' (१)—इस सूत्रके अनुसार 'कृ' आदि धातुओंसे 'उण्' प्रत्यय होता है। 'करोतीति कारुः।' (जो शिल्पकर्म करता है, वह 'कारु' कहलाता है। लोकभाषामें उसे 'शिल्पी' या 'कारीगर' कहते हैं)। 'कृ' धातुसे 'उण्' प्रत्यय होनेपर अनुबन्धलोप, वृद्धि तथा विभक्तिकार्य किये जाते हैं। इससे 'कारुः'— इस पदकी सिद्धि होती है। 'जि' धातुसे 'उण्' होनेपर 'जायुः' रूप बनता है। 'जायुः' का अर्थ है—औषध। इसकी व्युत्पत्ति