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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 799, कुल 878 में से

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पृष्ठ 799

७७२ * अग्निपुराण *


इस प्रकार समझनी चाहिये—'जयति रोगान् इति जायुः।' 'मि' धातुसे वही (उण्) प्रत्यय करनेपर 'मायुः'—यह पद सिद्ध होता है। 'मायुः' का अर्थ है—'पित्त'। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'मिनोति'—प्रक्षिपति देहे ऊष्माणम् इति मायुः।' इसी प्रकार 'स्वदते—रोचते इति स्वादुः।', 'साध्नोति परकार्यमिति साधुः।' इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। गोमायुः, आयुः—इत्यादि प्रयोग भी इसी तरह सिद्ध होते हैं। 'गोमायु' का अर्थ है—गीदड़ तथा 'आयुः' शब्द आयुर्वेदके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'उणादयो बहुलम्।'—(३।३।१) इस सूत्रके अनुसार 'उण्' आदि बाहुल्येन होते हैं। कहीं होते हैं, कहीं नहीं होते। 'आयुः', 'स्वादुः' तथा 'हेतु' आदि शब्द भी उणादिसिद्ध हैं। 'किंशारु' नाम है—धान्यके शूकका। 'किं शृणातीति किंशारुः'। यहाँ 'किं' पूर्वक 'शृ' धातुसे 'जुण्' होता है। 'ज्' तथा 'ण्' अनुबन्ध हैं। किंश्शृ+उ। वृद्धि होकर 'किंशारुः' बनता है। 'कृकवाकुः' का अर्थ है—मुर्गा या मोर। 'कृकेन गलेन वक्तीति कृकवाकुः।' 'कृके वचः कश्च'—इस उणादिसूत्रसे 'जुण्' प्रत्यय होनेपर कृक+वच्+जुण्—इस अवस्थामें अनुबन्धलोप, चकारको ककार और 'अत उपधायाः।' (पा० सू० ७।२।११६) से वृद्धि होती है। 'भरति बिभर्ति वा भरुः।' 'भृ' धातु से 'उ' प्रत्यय, गुण; विभक्तिकार्य-भरुः। इसका अर्थ है—भर्त्ता (स्वामी)। मरुः—जलहीन देश। मृ+उ गुणादेश, विभक्तिकार्य=मरुः। शी+उ=शयुः। इसका अर्थ है—सोया पड़ा रहनेवाला अजगर। त्सर+उ=त्सरुः-अर्थात् खड्गकी मूठ। 'स्वर्यन्ते प्राणा अनेन' इस लौकिक विग्रहमें 'उ' प्रत्यय होता है। फिर गुण होकर 'स्वरुः' पद बनता है। 'स्वरु' का अर्थ है—वज्र। त्रप्+उ=त्रपु। 'त्रपु' नाम है शीशेका। फल्ग्+उ=फल्गुः—सारहीन। अभिकाङ्क्षार्थक 'गृध्' धातुसे 'सुसुधागृधिभ्यः क्रन्', (१९२)—इस सूत्रके अनुसार 'क्रन्' प्रत्यय होनेपर गृध्+क्रन्, ककार-नकारकी इत्संज्ञा गृध्रः<sup></sup> अर्थात् गीध पक्षी। मदि+किरच्=मन्दिरम्। तिमि+किरच्=तिमिरम्। 'मन्दिर' का अर्थ गृह तथा 'तिमिर' का अर्थ अन्धकार है। 'सलिकल्य-निमहिभडिभण्डिशण्डिपिण्डितुण्डिकुकिभूभ्य इलच्।' (५७)—इस उणादि सूत्रके अनुसार गत्यर्थक 'षल्' धातुसे 'इलच्' प्रत्यय करनेपर 'सलिलम्' यह रूप बनता है। 'सलति गच्छति निम्नमिति सलिलम्'—यह इसकी व्युत्पत्ति है। 'सलिल' शब्द वारि-जलका वाचक है। (इसी प्रकार उक्त सूत्रसे ही कलिलम्, अनिलः, महिला—पृषोदरादित्वात् महेला—इत्यादि शब्द निष्पन्न होते हैं।) भण्डि+इलच्=भण्डिलम्। इसका अर्थ है—कल्याण। 'भण्डिल' शब्द दूतके अर्थमें भी आता है। ज्ञानार्थक 'विद्' धातुसे औणादिक 'क्रसु' प्रत्यय होनेपर विद्+क्रसु—इस अवस्थामें 'लशक्वतद्धिते।' (१।३।८) से ककारकी इत्संज्ञा तथा 'उपदेशेऽजनुनासिक इत्।' (१।३।२) से उकारकी इत्संज्ञा होती है; तत्पश्चात् विभक्ति-कार्य करनेपर 'विद्वान्'—यह रूप बनता है। 'विद्वान्' का अर्थ है—बुध या पण्डित। 'शेरतेऽस्मिन् राजबलानि इति शिविरम्।'—इस व्युत्पत्तिका अनुसार 'शीङ्' धातुसे 'किरच्' प्रत्यय, 'शीङ्' से 'वुक्' का


१. गृध+उ='गृधुः' रूप होता है। 'गृधुः' का अर्थ है—कामदेव।
२. 'विद्' धातुसे 'शतृ' प्रत्यय करनेपर 'विदेः शतुर्वसुः।' (७।१।३६)—इस सूत्रके अनुसार 'विद्' धातुसे परे विद्यमान 'शतृ' के स्थानमें 'वसु' आदेश हो जाता है। यह आदेश वैकल्पिक होता है। अतः 'विदन् और 'विद्वान्'—ये दोनों रूप विशुद्ध कृदन्त हैं। औणादिक 'विद्वान्' का अर्थ बुध है और कृदन्त 'विद्वान्' का अर्थ जानता हुआ है।