सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 794, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 794
* अध्याय ३५६ *७६७

१५१) के अनुसार अपत्यार्थमें ‘कुरु’ शब्दसे ‘ण्य’ प्रत्यय होनेपर आदिवृद्धिपूर्वक गुण-वान्तादेश होकर ‘कौरव्यः’ इत्यादि प्रयोग बनते हैं। ‘शरीरावयवाद् यत्।’ (५।१।६) के नियमानुसार शरीरावयववाचक शब्दोंसे ‘यत्’ प्रत्यय होनेपर ‘मूर्धन्य’ तथा ‘मुख्य’ आदि शब्द सिद्ध होते हैं। ‘सुगन्धिः’‘शोभनो गन्धो यस्य सः’—इस लौकिक विग्रहमें बहुव्रीहि समास करनेके पश्चात् ‘गन्धस्येदुत्पूतिसुसुरभिभ्यः।’ (५।४।१३५)—इस सूत्रके अनुसार अन्तमें ‘इ’ हो जानेसे ‘सुगन्धिः’—इस शब्दरूपकी सिद्धि होती है॥ १२॥

‘तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच्।’ (५।२।३६)—तारकादिगणसे ‘इतच्’ प्रत्यय होता है, इस नियमके अनुसार ‘तारकाः संजाता अस्य’ (तारे उग आये हैं, इसके) इस अर्थमें ‘तारका’ शब्दसे ‘इतच्’ प्रत्यय होनेपर ‘तारकितं नभः’ इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। ‘कुण्डमिव ऊधो यस्याः सा’ (कुण्डके समान है थन जिसका, वह)—इस लौकिक विग्रहमें बहुव्रीहि समास होनेपर ‘ऊधसोऽनङ्।’ (५।४।१३१)—इस सूत्रके अनुसार ऊधोऽन्त बहुव्रीहिसे स्त्रीलिङ्गमें ‘अनङ्’ होता है। इस प्रकार ‘अनङ्’ होनेपर ‘बहुव्रीहेरूथसो ङीष्।’ (४।१।२५)—इस सूत्रसे ‘ङीष्’ प्रत्यय होता है। तत्पश्चात् अन्यान्य प्रक्रियात्मक कार्य होनेके बाद ‘कुण्डोध्नी’ पदकी सिद्धि होती है। ‘पुष्यं धनुर्यस्य स पुष्पधन्वा’ (कामदेवः), ‘सुष्ठु धनुर्यस्य स सुधन्वा’ (श्रेष्ठ धनुष धारण करनेवाला योद्धा)—इन दोनों बहुव्रीहि-पदोंमें ‘धनुषश्च।’ (५।४।१३२)-इस सूत्रसे ‘अनङ्’ होता है। तत्पश्चात् सुबादि कार्य होनेपर ‘पुष्पधन्वा’ तथा ‘सुधन्वा’—ये दोनों पद सिद्ध होते हैं॥ १३॥

‘वित्तेन वित्तः इति वित्तचुञ्चुः।।’—जो धन-वैभवके द्वारा प्रसिद्ध हो, वह ‘वित्तचुञ्चुः’ है। शब्दशास्त्रमें जिसकी प्रसिद्धि है, वह ‘शब्दचुञ्चु’ कहलाता है। ये दोनों शब्द ‘चुञ्चुप्’ प्रत्यय होनेपर निष्पन्न होते हैं। इसी अर्थमें ‘चणप्’ प्रत्यय भी होता है। यथा—‘केशचणः’। जो अपने केशोंसे विदित है, वह ‘केशचणः’ कहा गया है। (इन प्रत्ययोंका विधान ‘तेन वित्तश्चुञ्चुप्चणपौ।’ (५।२।२६) —इस सूत्रके अनुसार होता है। ‘पटु’ शब्दसे ‘प्रशस्त’ अर्थमें ‘रूप’ प्रत्यय होनेपर ‘पटुरूपः’ पद बनता है। ‘प्रशस्तः पटुः-पटुरूपः।’ जो प्रशस्त पटु है, वह ‘पटुरूप’ कहा जाता है। यह ‘रूप’ प्रत्यय ‘सुबन्त’ और ‘तिङन्त’—दोनों प्रकारके शब्दोंसे होता है। ‘तिङन्त’ शब्दसे इस प्रकार होता है—प्रशस्तं पचति इति ‘पचतिरूपम्।’ ‘पचतिरूपम्’ का अर्थ है—अच्छी तरह पकाता है। अतिशयार्थ-द्योतनके लिये ‘तमप्’, ‘इष्ठन्’, ‘तरप्’ और ‘ईयसुन्’—ये प्रत्यय होते हैं। इनमेंसे ‘तरप्’ और ‘ईयसुन्’—ये दोनों दोमेंसे एककी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं और ‘तमप्’ तथा ‘इष्ठन्’—ये दोनों बहुतोंमेंसे एककी श्रेष्ठता बताते हैं। पाणिनिने इसके लिये दो सूत्रोंका उल्लेख किया है—‘अतिशायने तमबिष्ठनौ।’ (५।३।५५) तथा ‘द्विवचनविभज्योत्तरपदे तरबीयसुनौ।’ (५।३।५७)। इसके सिवा, यदि किसी द्रव्यका प्रकर्ष न बताना हो तो ‘तरप्’ ‘तमप्’ प्रत्ययोंसे परे ‘आम्’ हो जाता है। यह ‘आम्’ ‘किम्’ शब्द, ‘एदन्त’ शब्द, तिङन्त पद तथा अव्यय पदसे भी होते हैं। इन सब नियमोंके अनुसार ‘अयम् अनयोरतिशयेन पटुः।’ (यह इन दोनोंमें अधिक पटु है)—इस अर्थको बतानेके लिये ‘पटु’ शब्दसे ‘ईयसुन्’ प्रत्यय करनेपर विभक्तिकार्यपूर्वक ‘पटीयान्’ रूप होता है। ‘अक्ष’ शब्दसे ‘तरप्’ प्रत्यय होनेपर ‘अक्षतर’ और ‘पटु’ आदि शब्दोंसे उक्त प्रत्यय होनेपर ‘पटुतरः’ आदि रूप बनते हैं। तिङन्तसे ‘तरप्’ प्रत्यय करके अन्तमें