अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 795, कुल 878 में से
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‘आम्’ करनेपर ‘पचतितराम्’ रूप बनता है। ‘तमप्’ और ‘आम्’ प्रत्यय होनेपर ‘अटतितमाम्’ इत्यादि उदाहरण उपलब्ध होते हैं॥ १४-१५॥
किंचित् न्यूनता तथा असमासिका भाव प्रकट करनेके लिये ‘सुबन्त’ और ‘तिङन्त’ शब्दोंसे ‘कल्पप्’, ‘देश्य’ तथा ‘देशीयर्’ प्रत्यय होते हैं। ‘ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः’ (५। ३। ६७)—इस सूत्रके अनुसार ‘मृदु’ शब्दसे ‘कल्पप्’ प्रत्यय होनेपर ‘मृदुकल्पः’ प्रयोग बनता है। इसका अर्थ हुआ—‘कुछ कम मृदु या कोमल’। ‘ईषदूनः इन्द्रः—इन्द्रकल्पः। ईषदूनः अर्कः—अर्ककल्पः।’ इत्यादि उदाहरण इसी तरह जाननेयोग्य हैं। ‘ईषदूनः राजा’—इस अर्थमें ‘राजन्’ शब्दसे ‘देशीयर्’ प्रत्यय करनेपर ‘राजदेशीयः’ तथा ‘देश्य’ प्रत्यय करनेपर ‘राजदेश्यः’—ये रूप बनते हैं। इसी तरह ‘पटु’ शब्दसे ‘जातीय’ प्रत्यय करनेपर ‘पटुजातीयः’ पद बनता है। इसका अर्थ है—पटुप्रकार—पटुके प्रकारका। ‘थल्’ प्रत्यय प्रकारमात्रका बोधक है, किंतु ‘जातीयर्’ प्रत्यय ‘प्रकारवान्’ का बोध कराता है। [इसका विधायक पा० सू० है— ‘प्रकारवचने जातीयर्।’ ५। ३। ६९] ‘प्रमाणे द्वयसज्दध्नञ्मात्रचः।’ (५। २। ३७)—इस सूत्रके अनुसार ‘जल’ आदिका प्रमाण बतानेके लिये ‘सुबन्त’ शब्दोंसे ‘द्वयसच्’ ‘दध्नच्’ तथा ‘मात्रच्’ प्रत्यय होते हैं। इस नियमसे ‘मात्रच्’ प्रत्यय होनेपर ‘जानुमात्रम्’ पद बनता है। इसका अर्थ है—घुटनेतक (पानी है)। ‘ऊरु’ शब्दसे ‘द्वयसच्’ प्रत्यय करनेपर ‘ऊरुद्वयसम्’ तथा ‘दध्नच्’ प्रत्यय करनेपर ‘ऊरुदध्नम्’—ये प्रयोग बनते हैं॥ १६-१७॥
‘संख्याया अवयवे तयप्।’ (पा०सू० ५। २। ४२)—इस सूत्रके अनुसार ‘पञ्चावयवा यस्य तत्’ (पाँच अवयव हैं, जिसके वह) इस अर्थमें ‘पञ्चन्’ शब्दसे ‘तयप्’ प्रत्यय करनेपर ‘पञ्चतयम्’— यह रूप बनता है। ‘द्वारं रक्षति, द्वारे नियुक्तो वा दौवारिकः’—जो द्वारकी रक्षा करता है, अथवा द्वारपर रक्षाके लिये नियुक्त है, वह ‘दौवारिक’ है। ‘रक्षति।’ (पा० सू० ४। ४। ३३) अथवा ‘तत्र नियुक्तः।’ (पा०सू० ४। ४। ६९) सूत्रसे यहाँ ‘ठक्’ प्रत्यय हुआ है। ‘ठ’ के स्थानमें ‘इक’ आदेश हो जाता है तथा ‘द्वारादीनां च।’ (७। ३। ४)—इस सूत्रसे ‘ऐच्’ का आगम होता है। फिर विभक्तिकार्य होनेपर ‘दौवारिकः’ इस पदकी सिद्धि होती है। इस प्रकार ‘ठक्’ प्रत्यय होनेपर ‘दौवारिक’ शब्दकी सिद्धि बतायी गयी है। यहाँतक ‘तद्धितकी सामान्यवृत्ति’ कही गयी। अब ‘अव्ययसंज्ञक तद्धित’का निरूपण किया जाता है॥ १८॥
‘यस्मादिति यतः’, ‘तस्मादिति ततः’—यहाँ ‘पञ्चम्यास्तसिल्।’ (५। ३। ७) सूत्रके अनुसार ‘तसिल्’ प्रत्यय होता है। इकार और लकारकी इत्संज्ञा होकर उनका लोप हो जाता है। ‘तसिल्’ प्रत्यय विभक्तिसंज्ञक होनेके कारण ‘त्यदादीनामः।’ (७। २। १०२) के नियमानुसार अकारान्तादेश हो जाता है। अतः, ‘यत्’ की जगह ‘य’ और तत् की जगह ‘त’ होनेसे ‘यतः’, ‘ततः’—ये रूप बनते हैं। ‘तसिलादयः प्राक् पाशपः।’ (‘तसिल्’ आदिसे लेकर ‘पाशप्’ प्रत्ययके पूर्वतक जितने प्रत्यय विहित या अभिहित हुए हैं, उन सबकी ‘अव्ययसंज्ञा’ होती है)—इस परिगणनाके अनुसार ‘यतः’, ‘ततः’ आदि शब्द ‘अव्यय’ माने गये हैं। ‘तसिल्’ आदिमें ‘त्रल्’ प्रत्यय भी आता है। इसका विधायक पाणिनिसूत्र है—‘सप्तम्यास्त्रल्।’ (५। ३। १०)। ‘यस्मिन्निति यत्र’, ‘तस्मिन्निति तत्र’—इस लौकिक विग्रहमें ‘त्रल्’ प्रत्यय होनेपर ‘यस्मिन् त्र’, ‘तस्मिन् त्र।’ इस अवस्थामें ‘कृत्तद्धितसमासाश्च’ (१।२।४६) से प्रातिपदिक