अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 796, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३५६ * ७६९
संज्ञा, ‘सुपो धातुप्रातिपदिकयोः।’ (२। ४। ७१) सूत्रसे विभक्तिका लोप और ‘त्यदादीनामः।’ (७। २। १०२) सूत्रसे अकारान्तादेश होनेपर ‘यत्र, तत्र’—इन पदोंकी सिद्धि बतायी गयी है। ‘अस्मिन् काले’—इस लौकिक विग्रहमें ‘अधुना।’ (५। ३। १७) सूत्रसे ‘अधुना’ प्रत्यय होने ‘अस्मिन् अधुना’ इस अवस्थामें विभक्तिलोप, ‘इदम्’ के स्थानमें ‘इश्’ अनुबन्धलोप तथा ‘यस्येति च।’ (६। ४। १४८) से इकारलोप होनेपर ‘अधुना’ की सिद्धि हुई। इसी अर्थमें ‘दानीम्’ प्रत्यय होनेपर ‘इदम्’ के स्थानमें ‘इ’ होकर ‘इदानीम्’ रूप बनता है। ‘सर्वस्मिन् काले’—इस विग्रहमें ‘सर्वैकान्यकिंयत्तदः काले दा’ (५। ३। १५)—इस सूत्रसे ‘दा’ प्रत्यय होनेपर ‘सर्वदा’ रूप बनता है। ‘तस्मिन् काले—तर्हि’, ‘कस्मिन् काले—कर्हि’ यहाँ ‘तत्’ और ‘किम्’ शब्दोंसे ‘काल’ अर्थमें ‘अनद्यतने र्हिल्न्यतरस्याम्।’ (५। ३। २१)—इस सूत्रसे ‘र्हिल्’ प्रत्यय हुआ। फिर पूर्ववत् प्रातिपदिकावयव विभक्तिका लोप होकर ‘त्यदादीनामः।’ (७। २। १०२)—इस सूत्रसे ‘तत्’ के स्थानपर ‘त’ और ‘किमः कः।’ (७। २। १०३) सूत्रसे ‘किम्’ के स्थानमें ‘क’ होनेपर ‘तर्हि’ और ‘कर्हि’—इन पदोंकी सिद्धि कही गयी है। ‘अस्मिन्’—इस विग्रहमें ‘त्रल्’ प्रत्ययकी प्राप्ति हुई, किंतु उसे बाधित करके ‘इदमो हः।’ (५। ३। ११)—इस सूत्रसे ‘हः’ प्रत्यय हो गया। फिर ‘इदम्’ के स्थानमें इकार होनेपर ‘इह’ रूपकी सिद्धि हुई ॥ १९-२० ॥
‘येन प्रकारेण यथा, केन प्रकारेण कथम्’—इन स्थलोंपर ‘प्रकारवचने थाल्।’ (५। ३। २३) के अनुसार ‘थाल्’ प्रत्यय होनेपर ‘यथा’, ‘तथा’ आदि रूप होते हैं। ‘किम्’ शब्दसे ‘किम्श्च।’ (५। ३। २५) के अनुसार ‘थम्’ प्रत्यय होता है। अतः ‘कथम्’ इस रूपकी सिद्धि होती है। जो शब्द दिशाके अर्थमें रूढ़ होते हैं, ऐसे ‘दिशा’, ‘देश’ और ‘काल’ अर्थमें प्रयुक्त शब्दोंसे स्वार्थमें ‘अस्ताति’ प्रत्यय होता है। श्लोकमें ‘पूर्वस्याम्’ यह सप्तमी विभक्तिका, ‘पूर्वस्याः’ यह पञ्चमी विभक्तिका तथा ‘पूर्वा’ यह प्रथमा विभक्तिका प्रतिरूप है। अर्थात् उक्त शब्द यदि सप्तम्यन्त, पञ्चम्यन्त और प्रथमान्त हों, तभी उनसे ‘अस्ताति’ प्रत्यय होता है। ‘पूर्व’, ‘अधर’ और ‘अवर’ शब्दोंके स्थानमें क्रमशः ‘पुर’ ‘अध’ और ‘अव’ आदेश होते हैं। ‘अस्ताति’ के स्थानमें ‘असि’ प्रत्ययका भी विधान होता है। इन निर्दिष्ट नियमोंके अनुसार ‘पूर्वस्यां दिशि’, ‘पूर्वस्याः दिशः’ ‘पूर्वा वा दिक्’—इन लौकिक विग्रहोंमें ‘पुरः’, ‘पुरस्तात्’—ये रूप होते हैं। उसी प्रकार ‘अधः, अधस्तात्’—‘अवः, अवस्तात्’—इत्यादि रूप जानने चाहिये। इनके वाक्यप्रयोग ‘पुरस्तात् संचरेद्’, ‘पुरस्ताद् गच्छेत्’ इत्यादि रूपमें होते हैं। ‘समाने अहनि’—इस अर्थमें ‘सद्यः’—इस शब्दका प्रयोग होता है। ‘समान’का ‘स’ और ‘अहनि’ के स्थानमें ‘द्यस्’ निपातित होकर ‘सद्यः’—इस पदकी सिद्धि होती है। ‘पूर्वस्मिन् वर्षे परुत्’—‘पूर्वतरेवर्षे परारि’ इति (पूर्व वर्षमें—इस अर्थको बतानेके लिये ‘परुत्’ शब्दका प्रयोग होता है तथा पूर्वसे पूर्व वर्षमें—इस अर्थका बोध करानेके लिये ‘परारि’ शब्दका प्रयोग होता है।) पहलेमें ‘पूर्व’ शब्दके स्थानमें ‘पर’ आदेश होता है और उससे ‘उत्’ प्रत्यय किया जाता है। दूसरेमें ‘आरि’ प्रत्यय होता है और ‘पूर्व’ के स्थानमें ‘पर’ आदेश। ‘अस्मिन् संवत्सरे’ (इस वर्षमें) इस अर्थका बोध करानेके लिये ‘ऐषमः’ पदका प्रयोग होता है। इसमें ‘इदम्’ शब्दके स्थानमें ‘इकार’ आदेश और उससे परे ‘समसण्’ प्रत्ययका निपातन होता है। अकार-णकारकी