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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 803, कुल 878 में से

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पृष्ठ 803

७७६ * अग्निपुराण *


'सिप्, थस्, थ'—ये तीन मध्यमपुरुष हैं। तथा 'मिप्, वस्, मस्'—ये उत्तमपुरुष कहे गये हैं॥ १–५$\frac{१}{२}$॥

'त, आताम्, झ'—ये आत्मनेपदके प्रथमपुरुषसम्बन्धी प्रत्यय हैं। 'थास्, आथाम्, ध्वम्'—ये मध्यमपुरुष हैं। 'इ, वहि, महिङ्'—ये उत्तमपुरुष हैं। आत्मनेपदके नौ प्रत्यय 'तङ्' कहलाते हैं और दोनों पदोंके प्रत्यय 'तिङ्' शब्दसे समझे जाते हैं। क्रियावाची 'भू', वा आदि धातु कहे गये हैं। भू, एध्, पच्, नन्द्, ध्वंस्, स्रंस्, पद्, अद्, शीङ्, क्रीड्, हु, हा, धा, दिव्, स्वप्, नह्, षूञ्, तुद्, मृश्, मुच्, रुध्, भुज्, त्यज्, तन्, मन् और कृ—ये सब धातु शप् आदि विकरण होनेपर क्रियार्थबोधक होते हैं। 'क्रीड्, वृङ्, ग्रह्, चुर्, पा, नी तथा अचि'—ये तथा उपर्युक्त धातु 'नायक' (प्रधान) हैं। इन्हींके समान अन्य धातुओंके भी रूप होते हैं। 'भू' धातुसे क्रमशः 'तिङ्' प्रत्यय होनेपर 'भवति, भवतः, भवन्ति'—इत्यादि रूप होते हैं। इनका वाक्यमें प्रयोग इस प्रकार समझना चाहिये—'स भवति। तौ भवतः। ते भवन्ति। त्वं भवसि। युवां भवथः। यूयं भवथ। अहं भवामि। आवां भवावः। वयं भवामः।' ये 'भू' धातुके 'लट्' लकारमें परस्मैपदी रूप हैं। 'भू' धातुका अर्थ है—'होना'। 'एध्' धातु 'वृद्धि' अर्थमें प्रयुक्त होता है। यह आत्मनेपदी धातु है। इसका 'लट्' लकारमें प्रथमपुरुषके एकवचनमें 'एधते' रूप बनता है। वाक्यमें प्रयोग—'एधते कुलम्।' (कुलकी वृद्धि होती है)—इस प्रकार होता है। 'लट्' लकारमें 'एध्' धातुके शेष रूप इस प्रकार होते हैं—'द्वे एधेते'। (दो बढ़ते हैं)। यह द्विवचनका रूप है। बहुवचनमें 'एधन्ते' रूप होता है। इस प्रकार प्रथमपुरुषके एकवचन, द्विवचन और बहुवचनान्त रूप बताये गये। अब मध्यम और उत्तम पुरुषोंके रूप प्रस्तुत किये जाते हैं—'एधसे' यह मध्यमपुरुषका एकवचनान्त रूप है। वाक्यमें इसका प्रयोग इस प्रकार हो सकता है—'त्वं हि मेधया एधसे।' (निश्चय ही तुम बुद्धिसे बढ़ते हो।) 'एधेये, एधध्वे' ये दोनों मध्यमपुरुषके क्रमशः द्विवचनान्त और बहुवचनान्त रूप हैं। 'एधे, एधावहे, एधामहे'—ये उत्तमपुरुषमें क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचनान्त रूप हैं। वाक्यमें प्रयोग—'अहं धिया एधे।' (मैं बुद्धिसे बढ़ता हूँ।) 'आवां मेधया एधावहे।' (हम दोनों मेधासे बढ़ते हैं।) 'वयं हरेर्भक्त्या एधामहे।' (हम श्रीहरिकी भक्तिसे बढ़ते हैं।) 'पाक' अर्थमें 'पच्' धातुका प्रयोग होता है। उसके 'पचति' इत्यादि रूप पूर्ववत् ('भू' धातुके समान) होते हैं। 'भू' धातुसे भावमें और 'अनु+भू' धातुसे कर्ममें 'यक्' प्रत्यय होनेपर क्रमशः 'भूयते' और 'अनुभूयते' रूप होते हैं। भावमें प्रत्यय होनेपर क्रिया केवल एकवचनान्त ही होती है और सभी पुरुषोंमें कर्ता तृतीयान्त होनेके कारण एक ही क्रिया सबके लिये प्रयुक्त होती है। यथा—'त्वया मया अन्यैश्च भूयते।' जहाँ कर्ममें प्रत्यय होता है, वहाँ कर्म उक्त होनेके कारण उसमें प्रथमा विभक्ति होती है और तदनुसार सभी पुरुषों तथा सभी वचनोंमें क्रियाके रूप प्रयोगमें लाये जाते हैं। यथा—'असौ अनुभूयते। तौ अनुभूयेते। ते अनुभूयन्ते। त्वम् अनुभूयसे। युवाम् अनुभूयेथे। यूयम् अनुभूयध्वे। अहम् अनुभूये। आवाम् अनुभूयावहे। वयम् अनुभूयामहे'॥ ६–१३॥

अर्थविशेषको लेकर धातुसे 'णिच्', 'सन्', 'यङ्' तथा 'यङ्लुक्' होते हैं। इन्हें क्रमसे 'ण्यन्त', 'सन्नन्त', 'यङन्त' और 'यङ्लुगन्त' कहते हैं। जहाँ किसी क्रियाके कर्ताका कोई प्रेरक या प्रयोजक कर्ता होता है, वहाँ प्रयोजक