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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 804, कुल 878 में से

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पृष्ठ 804

* अध्याय ३५८ * ७७७

कर्ताकी 'हेतु' संज्ञा होती है और प्रयोज्य कर्ता 'कर्म' बन जाता है। प्रयोजकके व्यापार प्रेषण आदि वाच्य हों तो धातुसे 'णिच्' प्रत्यय होता है। उसके होनेपर 'भू' धातुके 'लट्' लकारमें 'भावयति' इत्यादि रूप होते हैं। उदाहरणके लिये—'ईश्वरो भवति, तं यज्ञदत्तो ध्यानादिना प्रेरयति इत्यस्मिन्नर्थे यज्ञदत्त ईश्वरं भावयति इति प्रयोगो भवति' (ईश्वर होता है और यज्ञदत्त उसको ध्यानादिके द्वारा प्रेरित करता है—इस अर्थको व्यक्त करनेके लिये 'यज्ञदत्त ईश्वरं भावयति' यह प्रयोग बनता है)।$^१$ जहाँ कोई धातु इच्छाक्रियाका कर्म बनता है तथा इच्छाक्रियाका कर्ता ही उस धातुका भी कर्ता होता है, वहाँ उस धातुसे इच्छाकी अभिव्यक्तिके लिये 'सन्' प्रत्यय होता है। 'भू' धातुके सन्नन्तमें 'बुभूषति' इत्यादि रूप होते हैं। यथा—'भवितुम् इच्छति बुभूषति।' (होना चाहता है।) वक्ता चाहे तो 'बुभूषति' कहे अथवा 'भवितुम् इच्छति'—इस वाक्यका प्रयोग करे। यह स्मरणीय है कि 'सन्' और 'यङ्' प्रत्यय परे रहनेपर धातुका द्वित्व हो जाता है। शेष कार्य व्याकरणकी प्रक्रियाके अनुसार होते हैं। जहाँ क्रियाका समभिहार हो, अर्थात् पुनः-पुनः या अतिशयरूपसे क्रियाका होना बताया जाय, वहाँ उक्त अभिप्रायका द्योतन या प्रकाशन करनेके लिये धातुसे 'यङ्' प्रत्यय होता है। 'यङ्' और 'यङ्लुगन्त' में धातुका द्वित्व होनेपर पूर्वभागके, जिसे 'अभ्यास' कहते हैं, 'इक्' का 'गुण' हो जाता है। 'भू' धातुके 'यङन्त' में 'बोभूयते' इत्यादि रूप होते हैं। 'पुनः पुनः अतिशयेन वा भवति'—इस अर्थमें 'बोभूयते' क्रियाका प्रयोग होता है। यथा—'वाद्यं बोभूयते।' (वाद्यवादन बार-बार या अधिक मात्रामें होता है)। 'यङ्लुगन्त' में 'भू' धातुके 'बोभोति' इत्यादि रूप होते हैं। अर्थ वही है, जो 'यङन्त' क्रियाका होता है। 'यङन्त' में आत्मनेपदीय प्रत्यय होते हैं और 'यङ्लुगन्त' में परस्मैपदीय ॥ १४ ॥

कहीं-कहीं 'नाम' या 'सुबन्त' शब्दसे 'क्यच्' आदि प्रत्यय होनेपर उस शब्दकी 'धातु' संज्ञा होती है और उसके धातुके ही समान रूप चलते हैं। ऐसे प्रकरणको 'नामधातु' कहते हैं। जो इच्छाका कर्म हो और इच्छा करनेवालेका सम्बन्धी हो, ऐसे 'सुबन्त' से इच्छा-अर्थमें विकल्पसे 'क्यच्' प्रत्यय होता है। 'आत्मनः पुत्रम् इच्छति।' (अपने लिये पुत्र चाहता है)—इस अर्थमें 'पुत्रम्' इस 'सुबन्त' पदसे 'क्यच्' प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप होनेपर 'पुत्र अम् य' हुआ। 'सनाद्यन्ता धातवः।' (३।१।३२) से धातुसंज्ञा होकर 'सुपो धातुप्रातिपदिकयोः।' (२।४।७०) से 'अम्' का लोप हो गया। पुत्र=य—इस स्थितिमें 'क्यचि च।' (७।४।३३)—इस सूत्रके अनुसार 'अकार' के स्थानमें 'ईकार' हो गया। इस प्रकार 'पुत्रीय' से 'तिप्' 'शप्' आदि कार्य होनेपर 'पुत्रीयति' इत्यादि रूप होते हैं। इसी अर्थमें 'काम्यच्' प्रत्यय भी होता है और 'पुत्र' शब्दसे 'काम्यच्' प्रत्यय होनेपर 'पुत्रकाम्यति' इत्यादि रूप होते हैं। 'पटत् भवति इति पटपटायते।' यहाँ 'अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्धादनितौ डाच्।' (५।४।५७)—इस सूत्रके अनुसार 'भू' के योगमें 'डाच्' प्रत्यय होनेपर 'पटत् डा' इस स्थितिमें 'डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम्।' इस वार्तिकसे द्वित्व होकर 'नित्यमाम्रेडितं डाचि।' इस वार्तिकसे पररूप हुआ तो टि-लोपके अनन्तर 'पटपटा+भू'—यह अवस्था प्राप्त हुई। इसके बाद 'लोहितादिडाब्भ्यः क्यष्।' (३।१।१३)—इस सूत्रसे 'भवति' इस अर्थमें 'क्यष्' प्रत्यय हुआ तो 'पटपटा+क्यष्' बना। फिर अनुबन्धलोप, धातु संज्ञा तथा धातुसम्बन्धी कार्य होनेसे 'पटपटायते'—यह रूप सिद्ध हुआ। इसका अर्थ