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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 821, कुल 878 में से

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पृष्ठ 821

७९४ * अग्निपुराण *

है। 'वर्चस्' शब्द तेज और पुरीष (मल)-का तथा 'आगस्' शब्द पाप और अपराधका वाचक है। 'छन्दस्' शब्द पद्य और इच्छाके तथा 'साधीयस्' शब्द साधु (उत्तम) और बाढ (निश्चय या हामी भरने)-के अर्थमें आता है। 'व्यूह' शब्द समूहका वाचक है। 'अहि' शब्द वृत्रासुरके अर्थमें भी आता है। तथा 'तमोपह' शब्द अग्नि, चन्द्रमा एवं सूर्यका बोध करानेवाला है॥ ३०-४१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशविषयक नानार्थ-वर्गका वर्णन' नामक तीन सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६२॥


तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय

भूमि, वनौषधि आदि वर्ग

अग्निदेव कहते हैं— अब मैं भूमि, पुर, पर्वत, वनौषधि तथा सिंह आदि वर्गोंका वर्णन करूँगा। भू, अनन्ता, क्ष्मा, धात्री, क्ष्मा, कु तथा धरित्री—ये भूमिके नाम हैं। मृत् और मृत्तिका—ये मिट्टीका बोध करानेवाले हैं। अच्छी मिट्टीको मृत्स्ना और मृत्सा कहते हैं। जगत्, त्रिविष्टप, लोक, भुवन और जगती—ये सब समानार्थ हैं। (अर्थात् ये सभी संसारके पर्यायवाची शब्द हैं।) अयन, वर्त्म (वर्त्मन्), मार्ग, अध्व (अध्वन्), पन्था (पथिन्) पदवी, सृति, सरणि, पद्धति, पद्या, वर्तनी और एकपदी—ये मार्गके वाचक हैं (इनमेंसे पद्या और एकपदी शब्द पगडंडीके अर्थमें आते हैं।) पूः (स्त्रीलिङ्ग 'पुर' शब्द), पुरी, नगरी, पत्तन, पुटभेदन, स्थानीय और निगम—ये सात नगरके नाम हैं। मूल नगर (राजधानी)-से भिन्न जो पुर होता है, उसे शाखानगर कहते हैं। वेश्याओंके निवास स्थानका नाम वेश और वेश्याजनसमाश्रय है। आपण, शब्द निषद्या (बाजार, हाट, दूकान)-के अर्थमें आता है। विपणि और पण्यवीथिका—ये दो बाजारकी गलीके नाम हैं। रथ्या, प्रतोली और विशिखा—ये शब्द गली तथा नगरके मुख्यमार्गका बोध करानेवाले हैं। खाईसे निकालकर जमा किये हुए मिट्टीके ढेरको चय और वप्र कहते हैं। वप्र शब्दका केवल स्त्रीलिङ्गमें प्रयोग नहीं होता। प्राकार, वरण, शाल और प्राचीर—ये नगरके चारों ओर बने हुए घेरे (चहारदिवारी)-के नाम हैं। भित्ति और कुड्य—ये दीवारके वाचक हैं। इनमें 'भित्ति' शब्द स्त्रीलिङ्ग है। एडूक ऐसी दीवारको कहते हैं, जिसके भीतर हड्डी लगायी गयी हो। वास और कुटी पर्यायवाची हैं। इनमें कुटी शब्द स्त्रीलिङ्ग है तथा कुट शब्दके रूपमें इसका पुँल्लिङ्गमें भी प्रयोग है। इसी प्रकार शाला और सभा पर्यायवाची वाचक हैं। चार शालाओंसे युक्त गृहको संजवन कहते हैं। मुनियोंकी कुटीका नाम पर्णशाला और उटज है। उटज शब्दका प्रयोग पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें होता है। चैत्य और आयतन—ये दोनों शब्द समान अर्थ और समान लिङ्गवाले हैं। (ये यज्ञस्थान, वृक्ष तथा मन्दिरके अर्थमें आते हैं।) वाजिशाला और मन्दुरा—ये घोड़ोंके रहनेकी जगहके नाम हैं। साधारण धनियोंके महलके नाम हर्म्य आदि हैं तथा देवताओं और राजाओंके महलको प्रासाद (मन्दिर) कहते हैं। द्वार, द्वार और प्रतीहार—ये दरवाजेके नाम हैं। आँगन आदिमें बैठनेके लिये बने हुए चबूतरेको वितर्दि एवं वेदिका कहते हैं। कबूतरों (तथा अन्य पक्षियों)-के रहनेके लिये बने हुए स्थानको कपोतपालिका और विटङ्क कहते हैं। 'विटङ्क'