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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 822, कुल 878 में से

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पृष्ठ 822
  • अध्याय ३६३ * ७९५

शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसक दोनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होता है। कपाट और अवर-ये दोनों समान लिङ्ग और समान अर्थमें आते हैं। इनका अर्थ है—किंवाड़। निःश्रेणि और अधिरोहणी-ये सीढ़ीके नाम हैं। सम्मार्जनी और शोधनी-ये दोनों शब्द झाडूके अर्थमें आते हैं। संकर तथा अवकर झाड़ूसे फेंकी जानेवाली धूलके नाम हैं। अद्रि, गोत्र, गिरि और ग्रावा-ये पर्वतके तथा गहन, कानन और वन-ये जंगलके बोधक हैं। कृत्रिम (लगाये हुए) वन अर्थात् वृक्ष-समूहको आराम तथा उपवन कहते हैं। यही कृत्रिम वन, जो केवल राजासहित अन्तःपुरकी रानियोंके उपभोगमें आता है, 'प्रमदवन' कहलाता है। वीथी, आलि, आवलि, पङ्क्ति, श्रेणी, लेखा और राजि-ये सभी शब्द पङ्क्ति (कतार)-के अर्थमें आते हैं। जिसमें फूल लगकर फल लगते हों, उस वृक्षका नाम 'वानस्पत्य' होता है तथा जिसमें बिना फूलके ही फल लगते हैं, उस गूलर (आदि) वृक्षको 'वनस्पति' कहते हैं॥ १-१३॥

फलोंके पकनेपर जिनके पेड़ सूख जाते हैं, उन धान-जौ आदि अनाजोंको 'ओषधि' कहा जाता है। पलाश़ी, द्रु, द्रुम और अगम-ये सभी शब्द वृक्षके अर्थमें आते हैं। स्थाणु, ध्रुव तथा शङ्कु-ये तीन ठूंठ वृक्षके नाम हैं। इनमें स्थाणु शब्द वैकल्पिक पुँल्लिङ्ग है। अर्थात् उसका प्रयोग पुँल्लिङ्ग, नपुंसकलिंग-दोनोंमें होता है। प्रफुल्ल, उत्फुल्ल और संस्फुट-ये फूलसे भरे हुए वृक्षके लिये प्रयुक्त होते हैं। पलाश, छदन और पर्ण-ये पत्तेके नाम हैं। इध्म, एधस् और समिध्-ये समिधा (यज्ञकाष्ठ)-के वाचक हैं। इनमें समिध् शब्द स्त्रीलिङ्ग है। बोधिद्रुम और चलदल-ये पीपलके नाम हैं। दधित्थ, ग्राही, मन्मथ, दधिफल, पुष्पफल और दन्तशठ-ये कपित्थ (कैथ) नामक वृक्षका बोध करानेवाले हैं। हेमदुग्ध शब्द उदुम्बर (गूलर)-के और द्विपत्रक शब्द केविदार (कचनार)-के अर्थमें आता है। सप्तपर्ण और विशालत्वक्-ये छितवनके नाम हैं। कृतमाल, सुवर्णक, आरेवत, व्याधिघात, सम्पाक और चतुरङ्गुल-ये सभी शब्द सोनालु अथवा धनबहेड़ाके वाचक हैं। दन्तशठ-शब्द जम्बीर (जमीरी नीबू)-के अर्थमें आता है। तिक्तशाक-शब्द वरुण (या वरण)-का वाचक है। पुंनाग, पुरुष, तुङ्ग, केसर तथा देववल्लभ-ये नागकेसरके नाम हैं। पारिभद्र, निम्बतरु, मन्दार और पारिजात-ये बकायनके नाम हैं। वञ्जुल और चित्रकृत-ये तिनिश-नामक वृक्षके वाचक हैं। पीतन और कपीतन-ये आम्रातक (अमड़ा)-के अर्थमें आते हैं। गुडपुष्प और मधुद्रुम-ये मधूक (महुआ)-के नाम हैं। पीलु अर्थात् देशी अखरोटको गुडफल और स्रंसी कहते हैं। नादेयी और अम्बुवेतस्-ये पानीमें पैदा हुए बेंतके नाम हैं। शिग्रु, तीक्ष्णगन्धक, काक्षीर और मोचक-ये शोभाञ्जन अर्थात् सहिजनके नाम हैं। लाल फूलवाले सहिजनको मधुशिग्रु कहते हैं। अरिष्ट और फेनिल-ये दोनों समान लिङ्गवाले शब्द रीठेके अर्थमें आते हैं। गालव, शाबर, लोध्र, तिरीट, तिल्व और मार्जन-ये लोधके वाचक हैं। शेलु, श्लेष्मातक, शीत, उद्दाल और बहुवारक-ये लसोड़ेके नाम हैं। वैकङ्कत, श्रुवावृक्ष, ग्रन्थिल और व्याघ्रपाल-ये वृक्षविशेषके वाचक हैं। (यह वृक्ष विभिन्न स्थानोंपर टैंटी, कठेर और कंटाई आदि नामोंसे प्रसिद्ध है।) तिन्दुक, स्फूर्जक और काल (या कालस्कन्ध)-ये तेंदू वृक्षके वाचक हैं। नादेयी और भूमिजम्बुक-ये नागरङ्ग अर्थात् नारंगीके नाम हैं। पीलुक शब्द काकतिन्दुक अर्थात् कुचिलाके अर्थमें भी आता है। पाटलि, मोक्ष और मुष्कक-ये मोरवा या