अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 823, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें७९६ * अग्निपुराण *
पाडलके नाम हैं। क्रमुक और पट्टिका—ये पठानी लोधके वाचक हैं। कुम्भी, कैडर्य और कट्फल—ये कायफलका बोध करानेवाले हैं। वीरवृक्ष, अरुष्कर, अग्निमुखी और भल्लातकी—ये शब्द भिलावा नामक वृक्षके वाचक हैं। सर्जक, असन, जीव और पीतसाल—ये विजयसारके नाम हैं। सर्ज और अश्वकर्ण—ये साल वृक्षके वाचक हैं। वीरद्रु (वीर-तरु), इन्द्रद्रु, ककुभ और अर्जुन—ये अर्जुन नामक वृक्षके पर्याय हैं। इङ्गुदी तपस्वियोंका वृक्ष है; इसीलिये इसे तापस-तरु भी कहते हैं। (कहीं-कहीं यह 'इंगुवा' तथा गोंदी वृक्षके नामसे भी प्रसिद्ध है।) मोचा और शाल्मलि—ये सेमलके नाम हैं। चिरबिल्व, नक्तमाल, करञ्ज और करञ्जक—ये 'कंजा' नामक वृक्षके अर्थमें आते हैं। ('करञ्जक' शब्द भृङ्गराज या भंगरइयाका भी वाचक है।) प्रकीर्य और पूतिकरञ्ज—ये कँटीले करञ्जके वाचक हैं। मर्कटी तथा अङ्गार-वल्लरी—ये करञ्जके ही भेद हैं। रोही, रोहितक, प्लीहशत्रु और दाडिमपुष्पक—ये रोहेड़ाके नाम हैं। गायत्री, बालतनय, खदिर और दन्तधावन—ये खैरा नामक वृक्षके वाचक हैं। अरिमेद और विट्खदिर—ये दुर्गन्धित खैराके तथा कदर—यह श्वेत खैराका नाम है। पञ्चाङ्गुल, वर्धमान, चञ्चु और गन्धर्वहस्तक—ये एरण्ड (रेड़)-के अर्थमें आते हैं। पिण्डीतक और मरुवक—ये मदन (मैनफल) नामक वृक्षके बोधक हैं। पीतदारु, दारु, देवदारु और पूतिकाष्ठ—ये देवदारुके नाम हैं। श्यामा, महिलाह्वया, लता, गोवन्दिनी, गुन्दा, प्रियङ्गु, फलिनी और फली—ये प्रियंगु (कँगनी या टाँग़ुन)-के वाचक हैं। मण्डूकपर्ण पत्रोर्ण, नट, कट्वङ्ग, टुण्टुक, श्योनाक, शुकनास, ऋक्ष, दीर्घवृन्त और कुटन्नट—ये शोणक (सोनापाठा)-का बोध करानेवाले हैं। पीतद्रु और सरल—ये सरल वृक्षके नाम हैं। निचुल, अम्बुज और इज्जल (या हिज्जल)—ये स्थलवेतस् अथवा समुद्र-फलके वाचक हैं। काकोदुम्बरिका और फल्गु—ये कटुम्बरी या कठूमरेके बोधक हैं। अरिष्ट, पिचुमर्दक और सर्वतोभद्र—ये निम्ब-वृक्षके वाचक हैं। शिरीष और कपीतन—ये सिरस वृक्षके अर्थमें आते हैं। वकुल और वञ्जुल—ये मौलिश्रीके नाम हैं। (बञ्जुल शब्द अशोक आदिके अर्थमें आता है।) पिच्छिला, अगरु और शिंशपा—ये शीशमके अर्थमें आते हैं। जया, जयन्ती और तर्कारी—ये जैत वृक्षके नाम हैं। कणिका, गणिकारिका, श्रीपर्ण और अग्निमन्थ—ये अरणीके वाचक हैं। (किसीके मतमें जयासे लेकर अग्निमन्थतक सभी शब्द अरणीके ही पर्याय हैं।) वत्सक और गिरिमल्लिका—ये कुटज वृक्षके अर्थमें आते हैं। कालस्कन्ध, तमाल और तापिच्छ—ये तमालके नाम हैं। तण्डुलीय और अल्पमारिष—ये चौंराईके बोधक हैं। सिन्धुवार और निर्गुण्डी—ये सेंदुवारिके नाम हैं। वही सेंदुवारि यदि जंगलमें पैदा हुई हो तो उसे आस्फीता (आस्फोटा या आस्फोटा ) कहते हैं। [किसी-किसीके मतमें वनमल्लिका (वन-वेला)-का नाम आस्फोटा या आस्फीता है।] गणिका, यूथिका और अम्बष्ठा—ये जूहीके अर्थमें आते हैं। ससला और नवमालिका—ये दोनों पर्यायवाची शब्द हैं। अतिमुक्त और पुण्ड्रक—ये माधवी लताके नाम हैं। कुमारी, तरणि और सहा—ये घीकुँआरिके वाचक हैं। लाल घीकुँआरिको कुरबक और पीली घीकुँआरिको कुरण्टक कहते हैं। नीलझिण्टी और बाणा—ये दोनों शब्द नीली कटसरैयाके वाचक हैं। इनका पुँल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग—दोनों लिङ्गोंमें प्रयोग होता है। झिण्टी और सैरीयक—ये सामान्य कटसरैयाके वाचक हैं। वही लाल हो तो कुरबक और पीली हो तो