अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 824, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३६३ * ७९७
सहचरी कहलाती है। यह शब्द स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग—दोनोंमें प्रयुक्त होता है। धूस्तूर (या धत्तूर), कितव और धूर्त—ये धतूरके नाम हैं। रुचक और मातुलुङ्ग—ये बीजपूर या बिजौरा नीबूके वाचक हैं। समीरण, मरुवक, प्रस्थपुष्प और फणिज्जक—ये मरुआ वृक्षके नाम हैं। कुठेरक और पर्णास—ये तुलसी वृक्षके पर्याय हैं। आस्फीत, वसुक और अर्क—ये आक (मदार)-के नाम हैं। शिवमल्ली और पाशुपती—ये अगस्त्य वृक्ष अथवा बृहत् मौलसिरीके वाचक हैं। वृन्दा (वन्दा), वृक्षादनी—जीवन्तिका और वृक्षरुहा—ये पेड़पर पैदा हुई लताके नाम हैं। गुडूची, तन्त्रिका, अमृता, सोमवल्ली और मधुपर्णी—ये गुरुचिके वाचक हैं। मूर्वा, मोरटी, मधूलिका, मधुश्रेणी, गोकर्णी तथा पीलुपर्णी—ये मूर्वा नामवाली लताके नाम हैं। पाठा, अम्बष्ठा, विद्धकर्णी, प्राचीना और वनतिक्तिका—ये पाठा नामसे प्रसिद्ध लताके वाचक हैं। कटु, कटम्भरा, चक्राङ्गी और शकुलादनी—ये कुटकीके नाम हैं। आत्मगुप्ता, प्रावृषायी, कपिकच्छु और मर्कटी—ये केवाँचके वाचक हैं। अपामार्ग, शैखरिक, प्रत्यक्पर्णी तथा मयूरक—ये अपामार्ग (चिचिड़ा)-का बोध करानेवाले हैं। फञ्जिका (या हञ्जिका), ब्राह्मणी और भार्गी—ये ब्रह्मनेटिके वाचक हैं। द्रवन्ती, शम्बरी तथा वृषा—ये आखुपर्णी या मूसाकानीके बोधक हैं। मण्डूकपर्णी, भण्डीरी, समङ्गा और कालमेषिका—ये मजीठके नाम हैं। रोदनी, कच्छुरा, अनन्ता, समुद्रान्ता और दुरालभा—ये यवासा एवं कचूरके वाचक हैं। पृश्निपर्णी, पृथक्पर्णी, कलशि, धावनि और गुहा—ये पिठवनके नाम हैं। निर्दिग्धिका, स्पृशी, व्याघ्री, क्षुद्रा और दुःस्पर्शा—ये भटकटैया (या भजकटया)-के अर्थमें आते हैं। अवल्गुज, सोमराजी, सुवल्लि, सोमवल्लिका, कालमेषी, कृष्णफला, वाकुची और पूतिफली—ये वकुचीके वाचक हैं। कणा, उष्णा और उपकुल्या—ये पिप्पलीके बोधक हैं। श्रेयसी और गजपिप्पली—ये गजपिप्पलीके वाचक हैं। चव्य और चविका—ये चव्य अथवा वचाके नाम हैं। काकचिञ्ची, गुञ्जा और कृष्णला—ये तीन गुञ्जा (घुँघुची)-के अर्थमें आते हैं। विश्वा, विषा और प्रतिविषा—ये 'अतीस'के बोधक हैं। वनशृङ्गाट और गोक्षुर—ये गोखुरूके वाचक हैं। नारायणी और शतमूली—ये शतावरीका बोध करानेवाले हैं। कालेयक, हरिद्रव, दार्वी, पचम्पचा और दारु—ये दारुहल्दीके नाम हैं। जिसकी जड़ सफेद हो, ऐसी वचा (बच)-का नाम हैमवती है। वचा, उग्रगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमी और शतपर्विका—ये बचके अर्थमें आते हैं। आस्फोता और गिरिकर्णी—ये दो शब्द विष्णुक्रान्ता या अपराजिताके नाम हैं। सिंहास्य, वासक और वृष—ये अड़सेके अर्थमें आते हैं। मिशी, मधुरिका और छत्रा—ये वनसौंफके वाचक हैं। कोकिलाक्ष, इक्षुर और क्षुर—ये तालमखानाके नाम हैं। विडंग और कृमिघ्न—ये वायविडंगके वाचक हैं। वज्रद्रु, स्रुक्, स्नुही और सुधा—ये सेहुँड़के अर्थमें आते हैं। मृद्वीका, गोस्तनी और द्राक्षा—ये दाख या मुनक्काके नाम हैं। वला तथा वात्यालक—ये वरियारके वाचक हैं। काला और मसूरविदला—ये श्यामलता या श्यामत्रिधाराके अर्थमें आते हैं। त्रिपुटा, त्रिवृता और त्रिवृत्त—ये शुक्ल त्रिधाराके वाचक हैं। मधुक, क्लीतक, यष्टिमधुका और मधुयष्टिका—ये जेठी मधुके नाम हैं। विदारी, क्षीरशुक्ला, इक्षुगन्धा, क्रोष्ट्री और यासिता—ये भूमिकूष्माण्डके बोधक हैं। गोपी, श्यामा, शारिवा, अनन्ता तथा उत्पल शारिवा—ये श्यामालता अथवा गौरीसरके वाचक हैं। मोचा, रम्भा और कदली—ये केलेके नाम हैं। भण्टाकी और दुष्प्रधर्षिणी—ये भाँटेके अर्थमें