अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 826, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३६४ * ७९९
कर्मार, वेणु, मस्कर और तेजन—ये वंश (बाँस)-के वाचक हैं। छत्रा, अतिच्छत्र और पालघ्न—ये पानीमें पैदा होनेवाले तृणविशेषके बोधक हैं। मालातृणक और भूस्तृण—ये भी तृणविशेषके ही नाम हैं। ताड़के वृक्षका नाम ताल और तृणराज है। घोण्टा, क्रमुक तथा पूग—ये सुपारीके अर्थमें आते हैं॥ १४—७०$\frac{१}{२}$॥
शार्दूल और द्वीषी—ये व्याघ्र (बाघ)-के वाचक हैं। हर्यक्ष, केशरी (केसरी) तथा हरि—ये सिंहके नाम हैं। कोल, पोत्री और वराह—ये सूअरके तथा कोफ, ईहामृग और वृक भेड़ियेके अर्थमें आते हैं। लूता, ऊर्णनाभि, तन्तुवाय और मर्कट—ये मकड़ीके नाम हैं। वृश्चिक और शूककीट बिच्छूके वाचक हैं। ('शूककीट' शब्द ऊन आदि चाटनेवाले कीड़ेके अर्थमें भी आता है।) सारङ्ग और स्तोक—ये समान लिङ्गमें प्रयुक्त होनेवाले शब्द पपीहाके वाचक हैं। कृकवाकु तथा ताम्रचूड—ये कुक्कुट (मुर्ग)-के नाम हैं। पिक और कोकिल—ये कोयलके बोधक हैं। करट और अरिष्ट—काक (कौए)-के अर्थमें आते हैं। वक और कङ्क—बगुलेके नाम हैं। कोक, चक्र और चक्रवाक—ये चकवाके तथा कादम्ब और कलहंस—ये मधुरभाषी हंस या बत्तकके वाचक हैं। पतङ्गिका और पुत्तिका—ये मधुका छाता लगानेवाली छोटी मक्खियोंके नाम हैं और सरधा तथा मधुमक्षिका—ये बड़ी मधुमक्खीके अर्थमें आते हैं। (इसीको सरँगवा माछी भी कहते हैं।) द्विरेफ, पुष्पालिह्, भृङ्ग, षट्पद, भ्रमर और अलि—ये भ्रमर (भौंरे)-के नाम हैं। केकी तथा शिखी—मोरके नाम हैं। मोरकी वाणीको 'केका' कहते हैं। शकुन्ति, शकुनि और द्विज—ये पक्षीके पर्याय हैं। स्त्रीलिङ्ग पक्षति-शब्द और पक्षमूल—ये पंखके वाचक हैं। चञ्चु और तोटि—ये चोंचके अर्थमें आते हैं। इन दोनोंका स्त्रीलिङ्गमें ही प्रयोग होता है। उड्डीन और संडीन—ये पक्षियोंके उड़नेके विभिन्न प्रकारोंके नाम हैं। कुलाय और नीड शब्द घोंसलेके अर्थमें आते हैं। पेषी (या पेशी), कोष और अण्ड—ये अण्डेके नाम हैं। इनमें प्रथम दो शब्द केवल पुंल्लिङ्गमें प्रयुक्त होते हैं। पृथुक, शावक, शिशु, पोत, पाक, अर्भक और डिम्भ—ये शिशुमात्रके बोधक हैं। संदोह, व्यूहक और गण, स्तोम, ओघ, निकर, व्रात, निकुरम्ब, कदम्बक, संघात, संचय, वृन्द, पुञ्ज, राशि और कूट—ये सभी शब्द 'समूह' अर्थके वाचक हैं॥ ७१—७८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशविषयक भूमि, वनौषधि आदि वर्गका वर्णन' नामक तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६३॥
तीन सौ चौंसठवाँ अध्याय
मनुष्य-वर्ग
अग्निदेव कहते हैं—अब मैं नाम-निर्देशपूर्वक मनुष्यवर्ग, ब्राह्मण-वर्ग, क्षत्रिय-वर्ग, वैश्य-वर्ग और शूद्रवर्गका क्रमशः वर्णन करूँगा। ना, नर, पञ्चजन और मर्त्य—ये मनुष्य एवं पुरुषके वाचक हैं। स्त्रीको योषित्, योषा, अबला और वधू कहते हैं। जो अपने अभीष्ट कामी पुरुषके साथ समागमकी इच्छासे किसी नियत संकेत-स्थानपर जाती है, उसे अभिसारिका कहते हैं।