अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 827, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें८०० * अग्निपुराण *
कुलटा, पुंश्चली और असती—ये व्यभिचारिणी स्त्रीके नाम हैं। नग्निका और कोटवी शब्द नंगी स्त्रीका बोध करानेवाले हैं। (रजोधर्म होनेके पूर्व अवस्थावाली कन्याको भी ‘नग्निका’ कहते हैं।) अर्धवृद्धा (अधबुढ़) स्त्रीको (जो गेरुवाँ वस्त्र धारण करनेवाली और पति-विहीना हो) कात्यायनी कहते हैं। दूसरेके घरमें रहकर (स्वाधीन वृत्तिसे केश-प्रसाधन आदि कलाके द्वारा) जीवन-निर्वाह करनेवाली स्त्रीका नाम सैरन्ध्री है। अन्तःपुरकी वह दासी, जो अभी बूढ़ी न हुई हो—जिसके सिरके बाल सफेद न हुए हों, असिक्नी कहलाती है। रजस्वला स्त्रीको मलिनी कहते हैं। वारस्त्री, गणिका और वेश्या—ये रंडियोंके नाम हैं। भाइयोंकी स्त्रियाँ परस्पर याता कहलाती हैं। पतिकी बहनको ननान्दा कहते हैं। सात पीढ़ीके अंदरके मनुष्य सपिण्ड और सनाभि कहे जाते हैं। समानोदर्य, सोदर्य, सगर्भ और सहज—ये समानार्थक शब्द सगे भाईका बोध करानेवाले हैं। सगोत्र, बान्धव, ज्ञाति, बन्धु, स्व तथा स्वजन—ये भी समान अर्थके बोधक हैं। दम्पती, जम्पती, भार्यापती, जायापती—ये पति-पत्नीके वाचक हैं। गर्भाशय, जरायु, उल्व और कलल—ये चार शब्द गर्भको लपेटनेवाली झिल्लीके नाम हैं। कलल-शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें आता है। (यह शुक्र और शोणितके संयोगसे बने हुए गर्भाशयके मांस-पिण्डका भी वाचक है।) गर्भ और भ्रूण—ये दोनों शब्द गर्भस्थ बालकके लिये प्रयुक्त होते हैं। क्लीब, षण्ड (षण्ढ) और नपुंसक—ये पर्यायवाची शब्द हैं। डिम्भ-शब्द उत्तान सोनेवाले नवजात शिशुओंके अर्थमें आता है। बालकको माणवक कहते हैं। लंबे पेटवाले पुरुषके अर्थमें पिचण्डिल और बृहत्कुक्षि शब्दोंका प्रयोग होता है। जिसकी नाक कुछ झुकी हुई हो, उसको अवभ्रट कहते हैं। जिसका कोई अङ्ग कम या विकृत हो वह विकलाङ्ग और पोगण्ड कहलाता है। आरोग्य और अनामय—ये नीरोगताके वाचक हैं। बहरेको एड और वधिर तथा कुबड़ेको कुब्ज और गड़ुल कहते हैं। रोग आदिके कारण जिसका हाथ खराब हो जाय, उसको तथा लूले मनुष्यको कुनि (या कुणि) कहा जाता है। क्षय, शोष और यक्ष्मा—ये राजयक्ष्मा (थाइसिस, टीबी या तपेदिक)-के नाम हैं। प्रतिश्याय और पीनस—ये जुकामके अर्थमें आते हैं। स्त्रीलिङ्ग-क्षुत्, पुँल्लिङ्ग-क्षव और नपुंसक-क्षुत शब्द छींकके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। कास और क्षवथु—ये खाँसीके नाम हैं। इनका प्रयोग पुँल्लिङ्गमें होता है। शोथ, श्वयथु और शोफ—ये सूजनके अर्थमें आते हैं। पादस्फोट और विपादिका—ये बिवाईके नाम हैं। किलास और सिध्म—सेहुएँको कहते हैं। कच्छू, पाम, पामा और विचर्चिका—ये खुजलीके वाचक हैं। कोठ और मण्डलकम उस कोढ़को कहते हैं, जिसमें गोलाकार चकत्ते पड़ जाते हैं। सफेद कोढ़को कुष्ठ और श्वित्र कहते हैं। दुर्नामक और अर्शस्—ये बवासीरके नाम हैं। मल-मूत्रके निरोधको अनाह और विबन्ध कहते हैं। ग्रहणी और प्रवाहिका—ये संग्रहणी रोगके नाम हैं। बीज, वीर्य, इन्द्रिय और शुक्र—ये वीर्यके पर्याय हैं। पलल, क्रव्य और आमिष—ये मांसके अर्थमें आते हैं। बुक्का और अग्रमांस—ये छातीके मांस (हृत्पिण्ड)-का बोध करानेवाले हैं। (‘बुक्का’ शब्द केवल हृदयका भी वाचक है।) हृदय और हृत्—ये मनके पर्याय हैं। मेदस्, वपा और वसा—ये मेदाके नाम हैं। गलेके पीछेकी नाड़ीको मन्या कहते हैं। नाडी, धमनि और शिरा—ये नाड़ीके वाचक हैं। तिलक और क्लोम—ये शरीरमें रहनेवाले काले तिलके अर्थमें आते हैं।