अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 830, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ३६६ * ८०३
संस्कारपूर्वक वेदका स्वाध्याय आरम्भ करना उपकरण या उपाकर्म कहलाता है। भिक्षु, परिव्राट्, कर्मन्दी, पाराशरी तथा मस्करी—संन्यासीके पर्यायवाची शब्द हैं। जिनकी वाणी सदा सत्य होती है, वे ऋषि और सत्यवचा कहलाते हैं। जिसने वेदाध्ययन और ब्रह्मचर्यके व्रतको विधिवत् समाप्त कर लिया है, किंतु अभी दूसरे आश्रमको स्वीकार नहीं किया है, उसको स्नातक कहते हैं। जिन्होंने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है, वे ‘यती’ और ‘यति’ कहलाते हैं। शरीर-साध्य नित्यकर्मका नाम यम है तथा जो कर्म अनित्य एवं कभी-कभी आवश्यकतानुसार किये जानेयोग्य होता है, वह (जप, उपवास आदि) नियम कहलाता है। ब्रह्मभूय, ब्रह्मत्व और ब्रह्मसायुज्य—ये ब्रह्मभावकी प्राप्तिके नाम हैं॥ १–११॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘कोशगत ब्रह्मवर्गका वर्णन’ नामक तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६५ ॥
तीन सौ छाछठवाँ अध्याय
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्ग
अग्निदेव कहते हैं—मूर्धाभिषिक्त, राजन्य बाहुज, क्षत्रिय और विराट्—ये क्षत्रियके वाचक हैं। जिस राजाके सामने सभी सामन्त-नरेश मस्तक झुकाते हैं, उसे अधीश्वर कहते हैं। जिसका समुद्रपर्यन्त समूची भूमिपर अधिकार हो, उस सम्राट्का नाम चक्रवर्ती और सार्वभौम है तथा दूसरे राजाओंको (जो छोटे-छोटे मण्डलोंके शासक हैं, उन्हें) मण्डलेश्वर कहते हैं। मन्त्रीके तीन नाम हैं—मन्त्री, धीसचिव और अमात्य। महामात्र और प्रधान—ये सामान्य मन्त्रियोंके वाचक हैं। व्यवहारके द्रष्टा अर्थात् मामले-मुकदमेमें फैसला देनेवालेको प्राड्विवाक और अक्षदर्शक कहते हैं। सुवर्णकी रक्षा जिसके अधिकारमें हो वह भौरिक और कनकाध्यक्ष कहलाता है। अध्यक्ष और अधिकृत—ये अधिकारीके वाचक हैं। इन दोनोंका समान लिङ्ग है। जिसे अन्तःपुरकी रक्षाका अधिकार सौंपा गया हो, उसका नाम अन्तर्वशिक¹ है। सौविदल, कञ्चुकी, स्थापत्य और सौविद—ये रनिवासकी रक्षामें नियुक्त सिपाहियोंके नाम हैं। अन्तःपुरमें रहनेवाले नपुंसकोंको षण्ढ और वर्षवर कहते हैं। सेवक, अर्थी और अनुजीवी—ये सेवा करनेवालेके अर्थमें आते हैं। अपने राज्यकी सीमापर रहनेवाला राजा शत्रु होता है और शत्रुकी राज्य-सीमापर रहनेवाला नरेश अपना मित्र होता है। शत्रु और मित्र दोनोंकी राज्यसीमाओंके बाद जिसका राज्य हो, वह (न शत्रु, न मित्र) उदासीन² होता है। विजिगीषु राजाके पृष्ठभागमें रहनेवाले राजाको पाणिग्राह कहते हैं। चर, स्पश और प्रणिधि—ये गुप्तचरके नाम हैं। भविष्यकालको आयति कहते हैं। तत्काल और तदात्व—ये वर्तमान कालके वाचक हैं। भावी कर्मफलको उदर्क कहते हैं। आग लगने या पानीकी बाढ़ आदिके कारण होनेवाले
१. ‘अन्तर्वशिक’के स्थानमें ‘अन्तर्वेष्मिक’ नाम भी प्रयुक्त होता है।
२. रामोक्त नीतिके उपदेशानुसार विजिगीषुके सम्मुखवर्ती पाँच राज्य क्रमशः शत्रु, मित्र, अरिमित्र, मित्रमित्र तथा अरिमित्र-मित्र होते हैं; आगे भी ऐसा ही क्रम है। दोनों पार्श्वगत राज्योंमें क्रमशः मध्यम तथा उदासीन होते हैं।