अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८०४ * अग्निपुराण *
भयको अदृष्टभय कहते हैं। अपने या शत्रुके राज्यमें रहनेवाले सैनिकों या चोरों आदिके कारण जो संकट उपस्थित होता है, उसका नाम दृष्टभय है। भरे हुए घड़ेको भद्रकुम्भ और पूर्णकुम्भ कहते हैं। सोनेके गडुए या झारीका नाम भृङ्गार और कनकालुका है। मतवाले हाथीको प्रभिन्न, गर्जित और मत्त कहते हैं। हाथीकी सूँड़से निकलनेवाले जलकणको वमथु और करशीकर कहते हैं। सृणि और अङ्कुश—ये दो हाथीको हाँकनेके काममें लाये जानेवाले लोहेके काँटेका बोध कराते हैं। इनमें सृणि तो स्त्रीलिङ्ग और अङ्कुश पुँल्लिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग है। परिस्तोम और कुथ हाथीकी गद्दी और झूलके वाचक हैं। स्त्रियोंके बैठनेयोग्य पर्देवाली गाड़ीको कर्णीरथ और प्रवहण कहते हैं। दोला और प्रेङ्खा—ये झूला अथवा डोलीके नाम हैं। इनका स्त्रीलिङ्गमें प्रयोग होता है। आधोरण, हस्तिपक, हस्त्यारोह और निषादी—ये हाथीवानके अर्थमें आते हैं। लड़नेवाले सिपाहियोंको भट और योद्धा कहते हैं। कञ्चुक और वारण—ये कवच (बख्तर)-के नाम हैं। इनका प्रयोग स्त्रीलिङ्गके सिवा अन्य लिङ्गोंमें होता है। शीर्षण्य और शिरस्त्र—ये सिरपर रखे जानेवाले टोपके नाम हैं। तनुत्र, वर्म और दंशन—ये भी कवचके अर्थमें आते हैं। आमुक्त, प्रतिमुक्त, पिनद्ध और अपिनद्ध—ये पहने हुए कवचके वाचक हैं। सेनाकी मोर्चाबंदीका नाम व्यूह और बल-विन्यास है। चक्र और अनीक—ये नपुंसकलिङ्ग शब्द सेनाके वाचक हैं। जिस सेनामें एक हाथी, एक रथ, तीन घोड़े और पाँच पैदल हों, उसे पत्ति कहते हैं। पत्तिके समस्त अङ्गोंको लगातार सात बार तीन गुना करते जायें तो उत्तरोत्तर उसके ये नाम होंगे—सेनामुख, गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू और अनीकिनी। हाथी आदि सभी अङ्गोंसे युक्त दस अनीकिनी सेनाको अक्षौहिणी* कहते हैं। धनुष, कोदण्ड और इष्वास—ये धनुषके नाम हैं। धनुषके दोनों कोणोंको कोटि और अटनी कहते हैं। उसके मध्य भागका नाम नस्तक (या लस्तक) है। प्रत्यञ्चाको मौर्वी, ज्या, शिञ्जिनी और गुण कहते हैं। पृषत्क, बाण, विशिख, अजिह्मग, खग और आशुग—ये वाचक पर्याय शब्द हैं॥ १-१६॥
तूण, उपासङ्ग, तूणीर, निषङ्ग और इषुधि—ये तरकसके नाम हैं। इनमें इषुधि शब्द पुँल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों लिङ्गोंमें आता है। असि, ऋष्टि, निस्त्रिंश, करवाल और कृपाण—ये तलवारके वाचक हैं। तलवारकी मुष्टिको सरु कहते हैं। ईली और करपालिका (करवालिका)—ये गुप्तीके नाम हैं। कुठार और सुधिति (या स्वधिति)—ये कुल्हाड़ीके अर्थमें आते हैं। इनमें कुठार शब्दका प्रयोग पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें होता है। छुरीको क्षुरिका और असिपुत्रिका कहते हैं। प्रास और कुन्त भालेके नाम हैं। सर्वला और तोमर गँड़ासेके अर्थमें आते हैं। तोमर शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—दोनोंमें प्रयुक्त होता है। (यह बाण-विशेषका भी बोधक है)। जो प्रातःकाल मङ्गल-गान करके राजाको जगाते हैं, उन्हें वैतालिक और बोधकर कहते हैं। स्तुति
* सेनामुख आदि विभागोंमें हाथी, रथ आदिकी संख्या जाननेके लिये यह नक्शा दिया जा रहा है—
| सेना | पत्ति | सेनामुख | गुल्म | गण | वाहिनी | पृतना | चमू | अनीकिनी | अक्षौहिणी |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| हाथी और रथ | १ | ३ | ९ | २७ | ८१ | २४३ | ७२९ | २१८७ | २१८७० |
| घोड़े | ३ | ९ | २७ | ८१ | २४३ | ७२९ | २१८७ | ||
| पैदल | ५ | १५ | ४५ | १३५ | ४०५ | १२१५ | ३६४५ | १०९३५० |