भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 878 में से

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पृष्ठ 88

* अध्याय ३१ * ६१

साम तीनों वेदोंसे विभूषित आप कश्यपकुमार वामनको नमस्कार है। फिर विराट्-रूपसे पृथ्वीको लाँघ जानेवाले आप त्रिविक्रमको नमस्कार है॥ ९—१४॥

वराहाशेषदुष्टानि सर्वपापफलानि वै।
मर्द मर्द महादंष्ट्र मर्द मर्द च तत्फलम्॥ १५॥
नारसिंह करालास्य दन्तप्रान्तानलोज्ज्वल।
भञ्ज भञ्ज निनादेन दुष्टान् पश्यार्तिनाशन॥ १६॥
ऋग्यजुःसामगर्भाभिर्वाग्भिर्वामनरूपधृक्।
प्रशमं सर्वदुःखानि नयत्वस्य जनार्दन॥ १७॥
ऐकाहिकं द्व्याहिकं च तथा त्रिदिवसं ज्वरम्।
चातुर्थिकं तथात्युग्रं तथैव सततं ज्वरम्॥ १८॥
दोषोत्थं संनिपातोत्थं तथैवागन्तुकं ज्वरम्।
शमं नयाशु गोविन्द च्छिन्धि च्छिन्ध्यस्य वेदनाम्॥ १९॥

वराहरूपधारी नारायण! समस्त पापोंके फलरूपसे प्राप्त सम्पूर्ण दुष्ट रोगोंको कुचल दीजिये, कुचल दीजिये। बड़े-बड़े दाढ़ोंवाले महावराह! पापजनित फलको मसल डालिये, नष्ट कर दीजिये। विकटानन नृसिंह! आपका दन्त-प्रान्त अग्निके समान जाज्वल्यमान है। आर्तिनाशन! आक्रमणकारी दुष्टोंको देखिये और अपनी दहाड़से इन सबका नाश कीजिये, नाश कीजिये। वामनरूपधारी जनार्दन! ऋक्, यजुः एवं सामवेदके गूढ़ तत्त्वोंसे भरी वाणीद्वारा इस आर्तजनके समस्त दुःखोंका शमन कीजिये। गोविन्द! इसके त्रिदोषज, संनिपातज, आगन्तुक, ऐकाहिक, द्व्याहिक, त्र्याहिक तथा अत्यन्त उग्र चातुर्थिक ज्वरको एवं सतत बने रहनेवाले ज्वरको भी शीघ्र शान्त कीजिये। इसकी वेदनाको मिटा दीजिये, मिटा दीजिये॥ १५—१९॥

नेत्रदुःखं शिरोदुःखं दुःखं चोदरसम्भवम्।
अनिश्चासमतिश्वासं परितापं सवेपथुम्॥ २०॥
गुदघ्राणाङ्घ्रिरोगांश्च कुष्ठरोगांस्तथा क्षयम्।
कामलादींस्तथा रोगान् प्रमेहांश्चातिदारुणान्॥ २१॥
भगन्दरातिसारांश्च मुखरोगांश्च वल्गुलीम्।
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रांश्च रोगानन्यांश्च दारुणान्॥ २२॥
ये वातप्रभवा रोगा ये च पित्तसमुद्भवाः।
कफोद्भवाश्च ये केचिद् ये चान्ये सांनिपातिकाः॥ २३॥
आगन्तुकाश्च ये रोगा लूतास्फोटकादयः।
ते सर्वे प्रशमं यान्तु वासुदेवस्य कीर्तनात्॥ २४॥
विलयं यान्तु ते सर्वे विष्णोरुच्चारणेन च।
क्षयं गच्छन्तु चाशेषास्ते चक्राभिहता हरेः॥ २५॥
अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।
नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ २६॥

इस दुखियाके नेत्ररोग, शिरोरोग, उदररोग, श्वासावरोध, अतिश्वास (दमा), परिताप, कम्पन, गुदरोग, नासिका-रोग, पादरोग, कुष्ठरोग, क्षयरोग, कामला आदि रोग, अत्यन्त दारुण प्रमेह, भगंदर, अतिसार, मुखरोग, वल्गुली, अश्मरी (पथरी), मूत्रकृच्छ्र तथा अन्य महाभयंकर रोगोंको भी दूर कीजिये। भगवान् वासुदेवके संकीर्तनमात्रसे जो भी वातज, पित्तज, कफज, संनिपातज, आगन्तुक तथा लूता (मकड़ी), विस्फोट (फोड़े) आदि रोग हैं, वे सभी अपमार्जित होकर शान्त हो जायँ। वे सभी भगवान् विष्णुके नामोच्चारणके प्रभावसे विलुप्त हो जायँ। वे समस्त रोग श्रीहरिके चक्रसे प्रतिहत होकर क्षयको प्राप्त हों। 'अच्युत', 'अनन्त' एवं 'गोविन्द'—इन नामोंके उच्चारणरूप औषधसे सम्पूर्ण रोग नष्ट हो जाते हैं, यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ॥ २०—२६॥

स्थावरं जङ्गमं वापि कृत्रिमं चापि यद्विषम्।
दन्तोद्भवं नखभवमाकाशप्रभवं विषम्॥ २७॥
लूतादिप्रभवं यच्च विषमन्यत्तु दुःखदम्।
शमं नयतु तत्सर्वं वासुदेवस्य कीर्तनम्॥ २८॥
ग्रहान् प्रेतग्रहांश्चापि तथा वै डाकिनीग्रहान्।
वेतालांश्च पिशाचांश्च गन्धर्वान् यक्षराक्षसान्॥ २९॥

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