भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 89
६२* अग्निपुराण *

शकुनीपूतनाद्यांश्च तथा वैनायकान् ग्रहान्।
मुखमण्डीं तथा क्रूरां रेवतीं वृद्धरेवतीम्॥ ३०॥
वृद्धिकाख्यान्ग्रहांश्चोग्रांस्तथा मातृग्रहानपि।
बालस्य विष्णोश्चरितं हन्तु बालग्रहानिमान्॥ ३१॥
वृद्धाश्च ये ग्रहाः केचिद् ये च बालग्रहाः क्वचित्।
नरसिंहस्य ते दृष्ट्या दग्धा ये चापि यौवने॥ ३२॥
सटाकरालवदनो नारसिंहो महाबलः।
ग्रहानशेषांस्त्रिःशेषान् करोतु जगतो हितः॥ ३३॥
नरसिंह महासिंह ज्वालामालोञ्ज्वलानन।
ग्रहानशेषान् सर्वेश खाद खादाग्निलोचन॥ ३४॥

स्थावर, जङ्गम, कृत्रिम, दन्तोद्भूत, नखोद्भूत, आकाशोद्भूत तथा लूतादिसे उत्पन्न एवं अन्य जो भी दुःखप्रद विष हों—भगवान् वासुदेवका संकीर्तन उनका प्रशमन करे। बालरूपधारी श्रीहरि (श्रीकृष्ण)-के चरित्रका कीर्तन ग्रह, प्रेतग्रह, डाकिनीग्रह, वेताल, पिशाच, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, शकुनी-पूतना आदि ग्रह, विनायकग्रह, मुखमण्डिका, क्रूर रेवती, वृद्धरेवती, वृद्धिका नामसे प्रसिद्ध उग्र ग्रह एवं मातृग्रह—इन सभी बालग्रहोंका नाश करे। भगवन्! आप नरसिंहके दृष्टिपातसे जो भी वृद्ध, बाल तथा युवा ग्रह हों, वे दग्ध हो जायें। जिनका मुख सटा-समूहसे विकराल प्रतीत होता है, वे लोकहितैषी महाबलवान् भगवान् नृसिंह समस्त बालग्रहोंको निःशेष कर दें। महासिंह नरसिंह! ज्वालामालाओंसे आपका मुखमण्डल उज्ज्वल हो रहा है। अग्निलोचन! सर्वेश्वर! समस्त ग्रहोंका भक्षण कीजिये, भक्षण कीजिये॥ २७-३४॥

ये रोगा ये महोत्पाता यद्विषं ये महाग्रहाः।
यानि च क्रूरभूतानि ग्रहपीडाश्च दारुणाः॥ ३५॥
शस्त्रक्षतेषु ये दोषा ज्वालागर्दभकादयः।
तानि सर्वाणि सर्वात्मा परमात्मा जनार्दनः॥ ३६॥
किंचिद्रूपं समास्थाय वासुदेवाश्य नाशय।


क्षिप्त्वा सुदर्शनं चक्रं ज्वालामालातिभीषणम्॥ ३७॥
सर्वदुष्टोपशमनं कुरु देववराच्युत।
सुदर्शन महाज्वाल छिन्धि छिन्धि महारव॥ ३८॥
सर्वदुष्टानि रक्षांसि क्षयं यान्तु विभीषण।
प्राच्यां प्रतीच्यां च दिशि दक्षिणोत्तरतस्तथा॥ ३९॥
रक्षां करोतु सर्वात्मा नरसिंहः स्वगर्जितैः।
दिवि भुव्यन्तरिक्षे च पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः॥ ४०॥
रक्षां करोतु भगवान् बहुरूपी जनार्दनः।
यथा विष्णुर्जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम्॥ ४१॥
तेन सत्येन दुष्टानि शममस्य व्रजन्तु वै।

वासुदेव! आप सर्वात्मा परमेश्वर जनार्दन हैं। इस व्यक्तिके जो भी रोग, महान् उत्पात, विष, महाग्रह, क्रूर भूत, दारुण ग्रहपीडा तथा ज्वालागर्दभक आदि शस्त्र-क्षत-जनित दोष हों, उन सबका कोई भी रूप धारण करके नाश करें। देवश्रेष्ठ अच्युत! ज्वालामालाओंसे अत्यन्त भीषण सुदर्शन-चक्रको प्रेरित करके समस्त दुष्ट रोगोंका शमन कीजिये। महाभयंकर सुदर्शन! तुम प्रचण्ड ज्वालाओंसे सुशोभित और महान् शब्द करनेवाले हो; अतः सम्पूर्ण दुष्ट राक्षसोंका संहार करो, संहार करो। वे तुम्हारे प्रभावसे क्षयको प्राप्त हों। पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशामें सर्वात्मा नृसिंह अपनी गर्जनासे रक्षा करें। स्वर्गलोकमें, भूलोकमें, अन्तरिक्षमें तथा आगे-पीछे अनेक रूपधारी भगवान् जनार्दन रक्षा करें। देवता, असुर और मनुष्योंसहित यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् विष्णुका ही स्वरूप है; इस सत्यके प्रभावसे इसके दुष्ट रोग शान्त हों॥ ३५- ४१$\frac{१}{२}$॥

यथा विष्णौ स्मृते सद्यः संक्षयं यान्ति पातकाः॥ ४२॥
सत्येन तेन सकलं दुष्टमस्य प्रशाम्यतु।
यथा यज्ञेश्वरो विष्णुर्देवेष्वपि हि गीयते॥ ४३॥
सत्येन तेन सकलं यन्मयोक्तं तथास्तु तत्।
शान्तिरस्तु शिवं चास्तु दुष्टमस्य प्रशाम्यतु॥ ४४॥