अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ३२ * | ६३
वासुदेवशरीरोत्थैः कुशैर्निर्णशितं मया। अपामार्जतु गोविन्दो नरो नारायणस्तथा॥ ४५॥ तथास्तु सर्वदुःखानां प्रशमो वचनाद्धरेः। अपामार्जनकं शस्तं सर्वरोगादिवारणम्॥ ४६॥ अहं हरिः कुशा विष्णुर्हता रोगा मया तव॥ ४७॥
श्रीविष्णुके स्मरणमात्रसे पापसमूह तत्काल नष्ट हो जाते हैं, इस सत्यके प्रभावसे इसके समस्त दूषित रोग शान्त हो जायँ। यज्ञेश्वर विष्णु देवताओंद्वारा प्रशंसित होते हैं; इस सत्यके प्रभावसे मेरा कथन सत्य हो। शान्ति हो, मंगल हो। इसका दुष्ट रोग शान्त हो। मैंने भगवान् वासुदेवके शरीरसे प्रादुर्भूत कुशोंसे इसके रोगोंको नष्ट किया है। नर-नारायण और गोविन्द —इसका अपामार्जन करें। श्रीहरिके वचनसे इसके सम्पूर्ण दुःखोंका शमन हो जाय। समस्त रोगादिके निवारणके लिये 'अपामार्जन-स्तोत्र' प्रशस्त है। मैं श्रीहरि हूँ, कुशा विष्णु हैं। मैंने तुम्हारे रोगोंका नाश कर दिया है॥ ४२—४७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कुशापामार्जन-स्तोत्रका वर्णन' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१॥
बत्तीसवाँ अध्याय
निर्वाणादि-दीक्षाकी सिद्धिके उद्देश्यसे सम्पादनीय संस्कारोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—ब्रह्मन्! बुद्धिमान् पुरुष निर्वाणादि दीक्षाओंमें अड़तालीस संस्कार करावे। उन संस्कारोंका वर्णन सुनिये, जिनसे मनुष्य देवतुल्य हो जाता है। सर्वप्रथम योनिमें गर्भाधान, तदनन्तर पुंसवन-संस्कार करे। फिर सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, चार ब्रह्मचर्यव्रत—वैष्णवी, पार्था, भौतिकी और श्रौतिकी, गोदान, समावर्तन, सात पाकयज्ञ—अष्टका, अन्वष्टका पार्वणश्राद्ध, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री एवं आश्वयुजी, सात हविर्यज्ञ—आधान, अग्निहोत्र, दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, पशुबन्ध तथा सौत्रामणी, सात सोमसंस्थाएँ—यज्ञश्रेष्ठ अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र एवं आप्तोर्याम; सहस्रेश यज्ञ—हिरण्याङ्घ्रि, हिरण्याक्ष, हिरण्यमित्र, हिरण्यपाणि, हेमाक्ष, हेमाङ्ग, हेमसूत्र, हिरण्यास्य, हिरण्याङ्ग, हेमजिह्व, हिरण्यवान् और सब यज्ञोंका स्वामी अश्वमेधयज्ञ तथा आठ गुण—सर्वभूतदया, क्षमा, आर्जव, शौच, अनायास, मङ्गल, अकृपणता और अस्पृहा—ये संस्कार करे। इष्टदेवके मूल-मन्त्रसे सौ आहुतियाँ दे। सौर, शाक्त, वैष्णव तथा शैव—सभी दीक्षाओंमें ये समान माने गये हैं। इन संस्कारोंसे संस्कृत होकर मनुष्य भोग-मोक्षको प्राप्त करता है। वह सम्पूर्ण रोगादिसे मुक्त होकर देववत् हो जाता है। मनुष्य अपने इष्टदेवताके जप, होम, पूजन तथा ध्यानसे इच्छित वस्तुको प्राप्त करता है॥ १—१३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाणादि-दीक्षाकी सिद्धिके उद्देश्यसे सम्पादनीय संस्कारोंका वर्णन' नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२॥