भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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६४ * अग्निपुराण *


तैंतीसवाँ अध्याय

पवित्रारोपण, भूतशुद्धि, योगपीठस्थ देवताओं तथा प्रधान देवताके पार्षद—आवरणदेवोंकी पूजा

अग्निदेव कहते हैं— मुने! अब मैं पवित्रारोपणकी विधि बताऊँगा। वर्षमें एक बार किया गया पवित्रारोपण सम्पूर्ण वर्षभर की हुई श्रीहरिकी पूजाका फल देनेवाला है। आषाढ़ (—की शुक्ला एकादशी)—से लेकर कार्तिक (—की शुक्ला एकादशी)—तकके बीचके कालमें ही 'पवित्रारोपण' किया जाता है। प्रतिपदा धनद-तिथि है। द्वितीया आदि तिथियाँ क्रमशः लक्ष्मी आदि देवताओंकी हैं। यथा—लक्ष्मीकी द्वितीया$^२$, गौरीकी तृतीया, गणेशकी चतुर्थी, सरस्वती (तथा नाग देवताओं)—की पञ्चमी, स्वामी कार्तिकेयकी षष्ठी, सूर्यकी सप्तमी, मातृकाओंकी अष्टमी, दुर्गाकी नवमी, नागों (या यमराज)—की दशमी, ऋषियों तथा भगवान् विष्णुकी एकादशी, श्रीहरिकी द्वादशी, कामदेवकी त्रयोदशी, शिवकी चतुर्दशी तथा ब्रह्माकी पौर्णमासी एवं अमावस्या तिथि है। जो मनुष्य जिस देवताका भक्त है, उसके लिये वही तिथि पवित्र है॥ १—३॥

पवित्रारोपणकी विधि सब देवताओंके लिये समान है; केवल मन्त्र आदि प्रत्येक देवताके लिये पृथक्-पृथक् बोले। पवित्रक बनानेके लिये सोने-चाँदी और ताँबेके तार तथा कपास आदिके सूत होने चाहिये$^३$ ॥ ४॥

ब्राह्मणीके हाथका काता हुआ सूत सर्वोत्तम है। वह न मिले तो किसी भी सूतको उसका संस्कार करके उपयोगमें लेना चाहिये। सूतको तिगुना करके, उसे पुनः तिगुना करे और उसीसे, अर्थात् नौ तन्तुओंद्वारा पवित्रक बनाये। एक सौ आठसे लेकर अधिक तन्तुओंद्वारा निर्मित पवित्रक उत्तम आदिकी श्रेणीमें गिना जाता है।


१. वर्षभरके पूजा-विधानकी सम्पूर्ण त्रुटियोंका दोष दूर करके उस कर्मकी साङ्गोपाङ्ग सम्पन्नता एवं उससे समस्त इष्ट फलोंकी प्राप्तिके लिये 'पवित्रारोपण' अत्यन्त आवश्यक कर्म है। इसे न करनेपर मन्त्र-साधक या उपासकको सिद्धिसे वञ्चित होना पड़ता है। जैसा कि आचार्य सोमशम्भुने कहा है—
सर्वपूजाविधिच्छिद्रपूरणाय पवित्रकम्। कर्तव्यमन्यथा मन्त्री सिद्धिभ्रंशमवाप्नुयात्॥ (क० क्र० ३६४)
अतएव ब्र० विष्णु-रहस्यमें भी कहा गया है—
तस्माद् भक्तिसमायुक्तैर्नरैर्विष्णुपरायणैः। वर्षे वर्षे प्रकर्तव्यं पवित्रारोपणं हरेः॥ (वाचस्पत्ये हेमाद्रौ)
पवित्रारोपण सभी देवताओंके लिये उनके उपासकोंद्वारा कर्तव्य है। इसके न करनेसे वर्षभरके देवपूजनके फलसे हाथ धोना पड़ता है। यह कर्म अत्यन्त पुण्यदायक माना गया है।
सबसे पहले शास्त्रोंमें इसके लिये उत्तम कालका विचार किया गया है, जिसका दिग्दर्शन मूलके दूसरे तथा तीसरे श्लोकोंमें कराया गया है। सोमशम्भुके मतसे इसके लिये आषाढ़ मास उत्तम, श्रावण मध्यम तथा भाद्रपद कनिष्ठ है। वे इससे आगे बढ़नेकी आज्ञा नहीं देते। परंतु 'विष्णुरहस्य' के अनुसार भगवान् विष्णुके लिये पवित्रारोपणका मुख्यकाल श्रावण-शुक्ला द्वादशी है। वैसे तो यह सिंहगत सूर्य और कन्यागत सूर्यमें, अर्थात् भादों और आश्विनकी शुक्ला द्वादशीको भी किया जा सकता है। कार्तिकमें इसके करनेका सर्वथा निषेध है—
'तुलास्थे न कदाचन।'
२. कोई-कोई विद्वान् प्रतिपदाको अग्निकी और द्वितीयाको ब्रह्माजीकी तिथि मानते हैं।
३. पवित्रक बनानेके लिये सोने, चाँदी या ताँबेके तार गृहीत हैं और रेशम तथा कपासके सूतोंसे भी इसका निर्माण होता है। सोमशम्भुके विचारसे सोने, चाँदी तथा ताँबेके तारोंसे पवित्रक बनानेका विधान क्रमशः सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगके लिये रहा है। कलियुगमें रूईके सूतोंसे भी काम लिया जा सकता है। शक्ति हो तो रेशमी सूतोंके पवित्रक अर्पित करने चाहिये। विष्णुरहस्यमें दर्भसूत्र, पद्मसूत्र, क्षौमसूत्र, पट्ट-सूत्र तथा शुद्ध कपासका सूत्र—इन सबके द्वारा पवित्रक बनानेका विधान है।