अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ * अग्निपुराण *
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हों तथा उस पवित्रकपर गन्ध (चन्दन, रोली या केसर) लगाया गया हो। (वह उसीमें रँगा गया हो१।) ब्रह्मन्! वनमालामें दो-दो अङ्गुलकी दूरीपर२ क्रमशः एक सौ आठ गाँठें रहनी चाहिये।३ अथवा कनिष्ठ, मध्यम तथा उत्तम पवित्रकमें क्रमशः बारह, चौबीस तथा छत्तीस गाँठें रखनी चाहिये। मन्द, मध्यम और उत्तम मालार्थी पुरुषोंको अनामिका, मध्यमा और अङ्गुष्ठसे ही पवित्रक-माला ग्रहण करनी चाहिये। अथवा कनिष्ठ आदि नामवाले पवित्रकमें समानरूपसे बारह-बारह ही गाँठें रहनी चाहिये। (केवल तन्तुओंकी संख्यामें और लंबाईमें भेद होनेसे उनकी भिन्न संज्ञाएँ मानी जाती हैं।) सूर्य, कलश तथा अग्नि आदिके लिये भी यथासम्भव विष्णु- भगवान्के तुल्य ही पवित्रक अर्पित करना उत्तम माना गया है। पीठके लिये पीठकी लंबाईके अनुसार तथा कुण्डके लिये भी मेखलापर्यन्त लंबा पवित्रक होना चाहिये। विष्णु-पार्षदोंके लिये यथाशक्ति सूत्र-ग्रन्थि देनी चाहिये। अथवा बिना ग्रन्थिके ही सत्रह सूत्र चढ़ावे और भद्र नामक पार्षदको त्रिसूत्र (तिरसूत) अर्पित करे॥ १३-१७॥
पवित्रकको रोचना, अगुरु-कर्पूर-मिश्रित हल्दी एवं कुङ्कुमके रंगसे रँग देना चाहिये। भक्त पुरुष एकादशीको स्नान, संध्या आदि करके पूजागृहमें जाकर भगवान् श्रीहरिका यजन करे। उनके समस्त परिवारको बलि देकर उसकी अर्चना करे। द्वारके अन्तमें 'क्षं क्षेत्रपालाय नमः।'—बोलकर क्षेत्रपालकी पूजा करे। द्वारके ऊपर 'श्रियै नमः।' कहकर श्रीदेवीकी पूजा करे। द्वारके दक्षिण देशमें 'धात्रे नमः।', 'गङ्गायै नमः।'—इन मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए 'धाता' तथा 'गङ्गा'जीकी अर्चना करे और वाम देशमें 'विधात्रे नमः।', 'यमुनायै नमः।'— बोलकर विधाता एवं यमुनाजीकी पूजा करे। इसी तरह द्वारके दक्षिण-वाम देशमें क्रमशः 'शङ्खनिधये नमः।' 'पद्मनिधये नमः।' बोलकर शङ्खनिधि एवं पद्मनिधिकी पूजा करे। (फिर मण्डपके भीतर दाहिने पैरके पाष्णिभागको तीन बार पटककर विघ्नोंका अपसारण करे।)^४ तदनन्तर 'सारङ्गाय नमः' बोलकर विघ्नकारी भूतोंको दूर भगावे। (इसके बाद 'ॐ हां वास्तवधिपतये ब्रह्मणे नमः।' इस मन्त्रका उच्चारण करके ब्रह्माके स्थानमें पुष्प चढ़ावे।) फिर आसनपर बैठकर भूतशुद्धि^५ करे॥ १८-२१॥
१. सोमशम्भुका कथन है कि पवित्रक लालचन्दन या केसर आदि किसी एक रंगसे रँगा रहे। यथा— रक्तचन्दनकाश्मीरकस्तूरीचन्द्ररोचनाः। हरिद्रा गैरिकं चैषां रङ्गेदेकतमेन तत्॥ (३८२-३८३) २. सोमशम्भुका भी यही मत है— द्व्यङ्गुला द्व्यङ्गुलास्तत्र..................ग्रन्थयः ॥ ३९०-९१ ॥ ३. विष्णुरहस्यमें भी यही कहा गया है— शतमष्टोत्तरं कार्यं ग्रन्थीनां तु विधानतः। मुनीन्द्र वनमालायाम्......................... ॥ ४. दक्षपाष्णिंस्त्रिभिर्घातैर्भूमिसंस्थांस्त्रिविधानिति। विघ्नानुत्सारयेन्मन्त्री यागमन्दिरमध्यगः ॥ (सोमशम्भुरचित कर्मकाण्ड-क्रमावली ११८) ५. अग्निपुराणमें भूतशुद्धिके लिये केवल उद्घात-मन्त्र दिये गये हैं। सामान्य पाठकको भूतशुद्धिका सम्यक् परिचय करानेके लिये यहाँ 'मन्त्र-महार्णव' में दिया हुआ प्रकार प्रस्तुत किया जाता है।
भूतशुद्धि पहले— ॐ सूर्यः सोमो यमः कालः संध्या भूतानि पञ्च च। एते शुभाशुभस्येह कर्मणो मम साक्षिणः ॥ भो देव प्राकृतं चित्तं पापाक्रान्तमभून्मम । तन्निःसारय चित्तान्मे पापं तेऽस्तु नमो नमः ॥ —ये दोनों मन्त्र पढ़कर प्रार्थना करे। तदनन्तर अपने दक्षिण भागमें—'श्रीगुरुभ्यो नमः।' बोलकर श्रीगुरुजनोंको तथा वामभागमें 'ॐ गणेशाय नमः।'—बोलकर श्रीगणेशजीको प्रणाम करे। तत्पश्चात् कुम्भक प्राणायाम करते हुए मूलाधार चक्रसे कमलनाल-सी प्रतीत होनेवाली परम-देवता कुण्डलिनीको उठाकर यह भावना करे कि यह कुण्डलिनी वहाँसे ऊपरकी ओर उठती हुई ब्रह्मरन्ध्रतक जा पहुँची है। प्रदीप-कलिकाके आकारवाले हृदयस्थ जीवको साथ ले, सुषुम्नानाडीके पथसे ब्रह्मरन्ध्रमें जाकर स्थित हो गयी है।