अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ३३ * ६७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उसकी विधि यों है—
ॐ हंू हः फट् हंू गन्धतन्मात्रं संहरामि नमः।
ॐ हंू हः फट् हंू रसतन्मात्रं संहरामि नमः।
ॐ हंू हः फट् हंू रूपतन्मात्रं संहरामि नमः।
ॐ हंू हः फट् हंू स्पर्शतन्मात्रं संहरामि नमः।
ॐ हंू हः फट् हंू शब्दतन्मात्रं संहरामि नमः।
—इस प्रकार पाँच उद्घात-वाक्योंका उच्चारण करके गन्धतन्मात्रस्वरूप भूमिमण्डलको, वज्रचिह्नित उस अवस्थामें 'हं सः सोऽहम्।' इस मन्त्रसे जीवको परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त कर दे। तदनन्तर अपने शरीरके पैरोंसे लेकर घुटनोंतकके भागमें चौकोर आकृतिवाले वज्रलाञ्छित भूमण्डलका चिन्तन करे, उसकी कान्ति सुवर्णके समान है तथा वह 'ॐ लम्' इस भू-बीजसे युक्त है। फिर घुटनोंसे लेकर नाभितकके भागमें अर्धचन्द्राकार, जलके स्थानभूत सोममण्डलकी भावना करे। वह दो कमलोंसे अङ्कित, श्वेत वर्णवाला तथा 'ॐ वम्' इस वरुण-बीजसे विभूषित है। इसके बाद नाभिसे लेकर हृदयतकके भागमें त्रिकोणाकार, स्वस्तिक-चिह्नसे अङ्कित, रक्तवर्ण अग्निमण्डलका चिन्तन करे, जो 'ॐ रम्'—इस अग्निबीजसे युक्त है।
तत्पश्चात् हृदयसे लेकर भ्रूमध्यतकके भागमें गोलाकार, षड्बिन्दु-विलसित, धूम्रवर्ण वायुमण्डलकी भावना करे, जो 'ॐ यम्' इस वायुबीजसे युक्त है। तदनन्तर भ्रूमध्यसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त भागमें गोलाकार, स्वच्छ, मनोहर आकाशमण्डलका चिन्तन करे, जो 'ॐ हम्'—इस आकाशबीजसे युक्त है। इस प्रकार भूतगणकी भावना करके पूर्वोक्त भूमण्डलमें पादेन्द्रिय, गमन, घ्राण, गन्ध, ब्रह्मा, निवृत्तिकला, समान वायु तथा गन्तव्य देश—इन आठ पदार्थोंका चिन्तन करे। (सोम या) जल-मण्डलमें हस्तेन्द्रिय, ग्रहण, ग्राह्य, रसना, रस, विष्णु, प्रतिष्ठाकला तथा उदानवायुका ध्यान करे। तेजोमण्डलमें पायु-इन्द्रिय, विसर्ग, विसर्जनीय, नेत्र, रूप, शिव, विद्याकला तथा व्यानवायु—ध्येय हैं। वायुमण्डलमें उपस्थ, आनन्द, स्त्री, स्पर्शन, स्पर्श, ईशान, शान्तिकला तथा अपानवायु—ये आठ पदार्थ चिन्तनीय हैं। इसी तरह आकाशमण्डलमें वाग्, वक्तव्य, वदन, श्रोत्र, शब्द, सदाशिव, शान्त्यतीता कला तथा प्राणवायु—इन आठ वस्तुओंका चिन्तन करना चाहिये।
इस तरह भूतोंका चिन्तन करके पूर्व-पूर्व कार्यका उत्तरोत्तर कारणमें ब्रह्मपर्यन्त विलीन करे। उसका क्रम इस प्रकार है—'ॐ लं फट्।' बोलकर 'पाँच गुणवाली पृथिवीका जलमें उपसंहार करता हूँ।'—इस भावनाके साथ भूमिको जलमें लय करे। फिर 'ॐ वं हुं फट्।'-यह बोलकर 'चार गुणवाले जल-तत्त्वका अग्निमें उपसंहार करता हूँ'—इस भावनाके साथ जलको अग्निमें लय करे। तदनन्तर 'ॐ रं हुं फट्।' बोलकर 'तीन गुणोंसे युक्त तेजका वायुतत्त्वमें उपसंहार करता हूँ'—इस भावनाके साथ अग्निको वायुमें लय करे। फिर 'ॐ यं हुं फट्।' यह बोलकर 'दो गुणवाले वायुतत्त्वका आकाशतत्त्वमें उपसंहार करता हूँ'—इस भावनाके साथ वायुको आकाशमें लय करे। इसके बाद 'ॐ हं हुं फट्।' ऐसा बोलकर 'एक गुणवाले आकाशका अहंकारमें उपसंहार करता हूँ'—इस संकल्पके साथ आकाशका अहंकारमें लय करे। इसी क्रमसे अहंकारका महत्तत्त्वमें, महत्तत्त्वका प्रकृतिमें और प्रकृति या मायाका आत्मामें लय करे।
इस प्रकार शुद्ध सच्चिन्मय होकर पापपुरुषका चिन्तन करे—'वासनामय पाप बायीं कुक्षिमें स्थित है। उसका रंग काला है। वह अँगूठेके बराबर है। ब्रह्महत्या उसका सिर, सुवर्णकी चोरी बाँह, मदिरापान हृदय, गुरुतल्पगमन कटिप्रदेश तथा इन सबके साथ संसर्ग ही उसके दोनों पैर हैं। उपपातक-राशि उसका मस्तक है। उसके हाथमें ढाल और तलवार है। उस दुष्ट पापपुरुषका मुँह नीचेकी ओर है। वह अत्यन्त दुःसह है।' ऐसे पापपुरुषका चिन्तन करके पूरक प्राणायाममें 'ॐ यं'—इस वायुबीजका बत्तीस या सोलह बार जप करके उत्पादित वायुद्वारा उसका शोषण करे। तत्पश्चात् कुम्भक प्राणायाममें चौंसठ बार जपे गये 'ॐ रम्'—इस अग्निबीजद्वारा उत्थापित आगकी ज्वालामें अपने शरीरसहित उस पापपुरुषको जलाकर भस्म कर दे। तदनन्तर रेचक प्राणायाममें 'ॐ यम्'—इस वायुबीजका सोलह या बत्तीस बार जप करके उत्थापित वायुद्वारा दक्षिणानाड़ीके मार्गसे उस भस्मको बाहर निकाले। इसके बाद देहगत भस्मको 'ॐ वम्'—इस प्रकार उच्चारित अमृतबीजके द्वारा आप्लावित करके 'ॐ लम्'—इस भूबीजके द्वारा उस भस्मको घनीभूत पिण्डके आकारमें परिणत कर दे और भावनामें ही देखे कि वह सोनेके अण्डेके समान जान पड़ता है। तदनन्तर 'ॐ हम्'—इस आकाशबीजका जप करते हुए, उस पिण्डके दर्पणकी भाँति स्वच्छ होनेकी भावना करे और उसके द्वारा मस्तकसे लेकर चरण-नखपर्यन्त अवयवोंकी मनके द्वारा रचना करे।
इसके बाद पुनः सृष्टिमार्गका आश्रय ले, ब्रह्मसे प्रकृति, प्रकृतिसे महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे अहंकार, अहंकारसे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल, जलसे पृथ्वी, पृथ्वीसे ओषधि, ओषधिसे अन्न, अन्नसे वीर्य और वीर्यसे पुरुष-शरीरकी उत्पत्ति करके 'ॐ हं सः सोऽहम्।'—इस मन्त्रद्वारा ब्रह्मके साथ संयुक्त हो, एकीभूत हुए जीवको अपने हृदय-कमलमें स्थापित करे। तदनन्तर कुण्डलिनीको पुनः मूलाधारगत हुई देखे। फिर इस प्रकार प्राणशक्तिका ध्यान करे—
रक्ताम्भोधिस्थपोतोल्लसदरुणसरोजाधिरूढा कराब्जैः पाशं कोदण्डमिक्षूद्भवगुणमथ चाप्यङ्कुशं पञ्च बाणान्।
बिभ्राणा सृक्कपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाढ्या देवी बालार्कवर्णा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः॥
'जो लालसागरमें स्थित एक पोतपर प्रफुल्ल अरुण कमलके आसनपर विराजमान हैं, अपने कर-कमलोंमें पाश, इक्षुमयी प्रत्यञ्चासे युक्त कोदण्ड, अङ्कुश तथा पाँच बाण लिये रहती हैं, जिन्होंने खूनसे भरा खप्पर भी ले रखा है, तीन नेत्र जिनके मुखमण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं, जो उभरे हुए पीन उरोजोंसे सुशोभित हैं तथा बाल-रविके समान जिनकी अरुण-पीत कान्ति है, वे प्राणशक्तिस्वरूपा परा देवी हमारे लिये सुखकी सृष्टि करनेवाली हों।'