भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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६८ * अग्निपुराण *


सुवर्णमय चतुरस्र पीठको तथा इन्द्रादि देवताओंको अपने युगल चरणोंमें स्थित देखते हुए उनका चिन्तन करे। इस प्रकार शुद्ध हुए गन्धतन्मात्रको रसतन्मात्रमें लीन करके उपासक इसी क्रमसे रसतन्मात्रका रूपतन्मात्रमें संहार करे। ‘ॐ हूं हः फट् हूं रसतन्मात्रं संहरामि नमः।’, ‘ॐ हूं हः फट् हूं रूपतन्मात्रं संहरामि नमः।’, ‘ॐ हूं हः फट् हूं स्पर्शतन्मात्रं संहरामि नमः।’, ‘ॐ हूं हः फट् हूं शब्दतन्मात्रं संहरामि नमः।’—इन चार उद्घात-वाक्योंका उच्चारण करके जानुसे लेकर नाभितकके भागको श्वेत कमलसे चिह्नित, शुक्लवर्ण एवं अर्धचन्द्राकार देखे। ध्यानद्वारा यह चिन्तन करे कि ‘इस जलीय भागके देवता वरुण हैं।’ उक्त चार उद्घातोंके उच्चारणसे रसतन्मात्रकी शुद्धि होती है। इसके बाद इस रसतन्मात्रका रूपतन्मात्रमें लय कर दे॥ २२—३०॥
‘ॐ हूं हः फट् हूं रूपतन्मात्रं संहरामि नमः।’, ‘ॐ हूं हः फट् हूं स्पर्शतन्मात्रं संहरामि नमः।’, ‘ॐ हूं हः फट् हूं शब्दतन्मात्रं संहरामि नमः।’—इन तीन उद्घातवाक्योंका उच्चारण करके नाभिसे लेकर कण्ठतकके भागमें त्रिकोणाकार अग्निमण्डलका चिन्तन करे। ‘उसका रंग लाल है; वह स्वस्तिकाकार चिह्नसे चिह्नित है। उसके अधिदेवता अग्नि हैं।’ इस प्रकार ध्यान करके शुद्ध किये हुए रूपतन्मात्रको स्पर्शतन्मात्रमें लीन करे। तत्पश्चात् ‘ॐ हूं हः फट् हूं स्पर्शतन्मात्रं संहरामि नमः।’, ‘ॐ हूं हः फट् हूं शब्दतन्मात्रं संहरामि नमः।’—इन दो उद्घातवाक्योंके उच्चारणपूर्वक कण्ठसे लेकर नासिकाके बीचके भागमें गोलाकार वायुमण्डलका चिन्तन करे—‘उसका रंग धूमके समान है। वह निष्कलङ्क चन्द्रमासे चिह्नित है।’ इस तरह शुद्ध हुए स्पर्श-तन्मात्रका ध्यानद्वारा ही शब्दतन्मात्रमें लय कर दे। इसके बाद ‘ॐ हूं हः फट् हूं शब्दतन्मात्रं संहरामि नमः।’—इस एक उद्घातवाक्यसे शुद्ध स्फटिकके समान आकाशका नासिकासे लेकर शिखातकके भागमें चिन्तन करे। फिर उस शुद्ध हुए आकाशका (अहंकारमें) उपसंहार करे॥ ३१—३७॥

तत्पश्चात् क्रमशः शोषण आदिके द्वारा देहकी शुद्धि करे। ध्यानमें यह देखे कि ‘यं’ बीजरूप वायुके द्वारा पैरोंसे लेकर शिखातकका सम्पूर्ण शरीर सूख गया है। फिर ‘रं’ बीज द्वारा अग्निको प्रकट करके देखे कि सारा शरीर अग्निकी ज्वालाओंमें आ गया और जलकर भस्म हो गया। इसके बाद ‘वं’ बीजका उच्चारण करके भावना करे कि ब्रह्मरन्ध्रसे अमृतका बिन्दु प्रकट हुआ है। उससे जो अमृतकी धारा प्रकट हुई है, उसने शरीरके उस भस्मको आप्लावित कर दिया है। तदनन्तर ‘लं’ बीजका उच्चारण करते हुए यह चिन्तन करे कि उस भस्मसे दिव्य देहका प्रादुर्भाव हो गया है। इस प्रकार दिव्य देहकी उद्भावना करके करन्यास और अङ्गन्यास करे। इसके बाद मानस-यागका अनुष्ठान करे। हृदय-कमलमें मानसिक पुष्प आदि उपचारोंद्वारा मूल-मन्त्रसे अङ्गोंसहित देवेश्वर भगवान् विष्णुका पूजन करे। वे भगवान् भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। भगवान्‌से मानसिक पूजा स्वीकार करनेके लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—‘देव! देवेश्वर केशव! आपका स्वागत है। मेरे निकट पधारिये और यथार्थरूपसे भावनाद्वारा प्रस्तुत इस मानसिक पूजाको ग्रहण कीजिये।’ योगपीठको धारण करनेवाली आधारशक्ति कूर्म, अनन्त (शेषनाग) तथा पृथ्वीका पीठके मध्यभागमें पूजन करना चाहिये। तदनन्तर अग्निकोण आदि चारों कोणोंमें क्रमशः धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा