अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३४ * ७१
द्रव्योंका संग्रह करे। हाथ-पैर धो ले। सब सामग्रीको यथास्थान जाँचाकर हाथमें अर्घ्य लेकर मनुष्य उसके जलसे अपने मस्तकको सींचे। फिर द्वारदेश आदिमें भी जल छिड़के। तदनन्तर द्वारयाग (द्वारस्थ देवताओंका पूजन) आरम्भ करे। पहले तोरणेश्वरोंकी भलीभाँति पूजा करे। पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे अश्वत्थ, उदुम्बर, वट तथा पाकर—ये वृक्ष पूजनीय हैं। इनके सिवा पूर्व दिशामें ऋग्वेद, इन्द्र तथा शोभनकी, दक्षिणमें यजुर्वेद, यम तथा सुभद्रकी, पश्चिममें सामवेद, वरुण तथा सुधन्वाकी और उत्तरमें अथर्ववेद, सोम एवं सुहोत्रकी अर्चना करे॥ १—५॥
तोरण (फाटक)-के भीतर पताकाएँ फहरायी जायें, दो-दो कलश स्थापित हों और कुमुद आदि दिग्गजोंका पूजन हो। प्रत्येक दरवाजेपर दो-दो द्वारपालोंकी उनके नाम-मन्त्रसे ही पूजा की जाय। पूर्व दिशामें पूर्ण और पुष्करका, दक्षिण दिशामें आनन्द और नन्दनका, पश्चिममें वीरसेन और सुषेणका तथा उत्तर दिशामें सम्भव और प्रभव नामक द्वारपालोंका पूजन करना चाहिये। अस्त्र-मन्त्र (फट्)-के उच्चारणपूर्वक फूल बिखेरकर विघ्नोंका अपसारण करनेके पश्चात् मण्डपके भीतर प्रवेश करे। भूतशुद्धि, न्यास और मुद्रा करके शिखा (वषट्)-के अन्तमें 'फट्' जोड़कर उसका जप करते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें सरसों छींटे। इसके बाद वासुदेव-मन्त्रसे गोमूत्र, संकर्षण-मन्त्रसे गोमय, प्रद्युम्न-मन्त्रसे गोदुग्ध, अनिरुद्ध-मन्त्रसे दही और नारायण-मन्त्रसे घृत लेकर सबको घृतपात्रमें एकत्र करे; अन्य वस्तुओंका भाग घीसे अधिक होना चाहिये। इन सबके मिलनेसे जो वस्तु तैयार होती है, उसे 'पञ्चगव्य' कहा गया है। पञ्चगव्य एक, दो या तीन बार अलग-अलग बनावे। इनमेंसे एक तो मण्डप (तथा वहाँकी वस्तुओं)-का प्रोक्षण करनेके लिये है, दूसरा प्राशनके लिये और तीसरा स्नानके उपयोगमें आता है। दस कलशोंकी स्थापना करके उनमें इन्द्रादि लोकपालोंकी पूजा करे। पूजन करके उन्हें श्रीहरिकी आज्ञा सुनावे—'लोकपालगण! आपको इस यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीहरिकी आज्ञासे यहाँ सदा स्थित रहना चाहिये'॥ ६—१२॥
याग-द्रव्य आदिकी रक्षाकी व्यवस्था करके विकिर^१ (विघ्न-निवारणके लिये सब ओर छींटे जानेवाले सर्षप आदि) द्रव्योंको बिखेरे। सात^२ बार अस्त्र-सम्बन्धी मूल-मन्त्र (अस्त्राय फट्)-का जप करते हुए ही उक्त वस्तुओंको सब ओर बिखेरना चाहिये। फिर उसी तरह अस्त्र-मन्त्रका जप करके कुश^३-कूर्च ले आवे। उन्हें ईशान कोणमें रखकर उन्हींके ऊपर कलश और वर्धनीको स्थापित करे। कलशमें श्रीहरिका साङ्ग पूजन करके वर्धनीमें अस्त्रकी अर्चना करे। वर्धनीकी छिन्न धारासे यागमण्डपको प्रदक्षिणाक्रमसे सींचते
१. शारदातिलक (पटल ४ श्लोक १४-१५)-में लाजा, चन्दन, सरसों, भस्म, दूर्वाङ्कुर तथा अक्षतको 'विकिर' कहा है; ये समस्त विघ्नसमुहका नाश करनेवाले हैं—
लाजाश्चन्दनसिद्धार्थभस्मदूर्वाङ्कुराक्षताः। विकिरा इति संदिष्टाः सर्वविघ्नौघनाशनाः ॥
२. शारदातिलकमैं भी सात बार अस्त्र-मन्त्र-जपपूर्वक विकिर-विकिरणका विधान है। यथा—
विकिरान् विकिरेत्तत्र सप्तजप्ताञ्छराणुना ॥
३. पचीस कुशोंसे बँधा हुआ कूर्च 'ज्ञानखड्ग' कहा गया है। दो दर्भोंका सामान्य कूर्च तथा पाँच-पाँच कुशोंका विशेष कूर्च होता है। सत्रह कुशोंका 'ब्रह्मकूर्च' होता है। कूर्चोंका दण्ड एक बित्तेका, उनकी ब्रह्मग्रन्थि एक अङ्गुलकी और उसके अग्रभागकी लंबाई तीन अङ्गुलकी होनी चाहिये। (ईशानशिव गुरुदेवपद्धति, सप्तम पटल १४-१५)