अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 99, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
हुए कलशको उसके उपयुक्त स्थानपर ले जाय और स्थिर आसनपर स्थापित करके उसकी पूजा करे। कलशके भीतर पञ्चरत्न डाले। उसके ऊपर वस्त्र लपेटे। फिर उसपर गन्ध आदि उपचारोंद्वारा श्रीहरिका पूजन करे। वर्धनीमें भी सोनेका टुकड़ा डाले। उसके बाद उसपर अस्त्रकी पूजा करके, उसके वाम-भागमें पास ही, वास्तु-लक्ष्मी तथा 'भूविनायक' की अर्चना करे। संक्रान्ति आदिके समय इसी प्रकार श्रीविष्णुके स्नान-अभिषेककी व्यवस्था करे। मण्डपके कोणों और दिशाओंमें कुल मिलाकर आठ और मध्यमें एक—इस प्रकार नौ पूर्ण कलशोंको, जिनमें छिद्र न हों, स्थापित करके उनमें पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा पञ्चगव्य डाले। पूर्व आदिके कलशोंमें उक्त वस्तुएँ डालनी चाहिये। अग्निकोण आदिके कलशोंमें उक्त वस्तुओंके अतिरिक्त पञ्चामृतयुक्त जल अधिक डालनेका विधान है। पाद्यकी अङ्गभूता चार वस्तुएँ हैं—दही, दूध, मधु और गरम जल॥ १३—१९॥
किन्हींके मतमें कमल, श्यामाक (तिन्नीका चावल), दूर्वादल और विष्णुकान्ता ओषधि—इन चार वस्तुओंसे युक्त जल 'पाद्य' कहलाता है¹। इसी तरह अर्घ्यके भी आठ अङ्ग कहे गये हैं। जौ, गन्ध, फल, अक्षत, कुश, सरसों, फूल और तिल—इन आठ द्रव्योंका अर्घ्यके लिये संग्रह करना चाहिये²। जाती (जायफल), लवङ्ग और कङ्कोलयुक्त जलका आचमन³ देना चाहिये। इष्टदेवको मूलमन्त्रसे पञ्चामृतद्वारा स्नान करावे। बीचवाले कलशसे भगवान्के मस्तकपर शुद्ध जलका छींटा दे। कलशसे निकले हुए जल एवं कूर्चाग्रका स्पर्श करे। फिर शुद्ध जलसे पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय निवेदन करे। तत्पश्चात् वस्त्रसे भगवान्के श्रीविग्रहको पोंछकर वस्त्र धारण करावे और वस्त्रके सहित उन्हें मण्डलमें ले जाय। वहाँ भलीभाँति पूजा करके प्राणायामपूर्वक कुण्ड आदिमें होम करे। (हवनकी विधि—) दोनों हाथ धोकर कुण्डमें या वेदीपर तीन पूर्वाग्र रेखाएँ खींचे। ये रेखाएँ दक्षिणकी ओरसे आरम्भ करके क्रमशः उत्तरकी ओर खींची जायँ। फिर इन्हींके ऊपर तीन उत्तराग्र रेखाएँ खींचे। (ये भी दाहिनेसे आरम्भ करके क्रमशः बायें खींची जायँ) ॥ २०—२५॥
तत्पश्चात् अर्घ्यके जलसे इन रेखाओंका प्रोक्षण करे और योनिमुद्रा⁴ दिखावे। अग्निका आत्मरूपसे चिन्तन करके मनुष्य योनियुक्त कुण्डमें उसकी स्थापना करे। इसके बाद दर्भ, स्रुक्, स्रुवा आदिके साथ पात्रासादन करे। बाहुमात्रकी परिधियाँ, इध्मव्रश्चन, प्रणीतापात्र, प्रोक्षणीपात्र, आज्यस्थाली, घी, दो-दो सेर चावल तथा अधोमुख स्रुक् और स्रुवाकी जोड़ी। प्रणीता एवं प्रोक्षणीमें पूर्वाग्र कुश रखे। प्रणीताको जलसे भरकर भगवान्का ध्यान-पूजन करके उसको अग्निके पश्चिम अपने आगे और आसादित द्रव्योंके मध्यमें रखे। प्रोक्षणीको जलसे भरकर पूजनके पश्चात् दाहिने रखे। आगपर चरुको चढ़ाकर पकावे और अग्निसे दक्षिण दिशामें ब्रह्माजीकी स्थापना करे। कुण्ड या वेदीके चारों ओर पूर्वादि दिशामें कुश (बर्हिष्) बिछाकर परिधियोंको स्थापित करे। तदनन्तर
१. शारदातिलकमें भी यही बात कही गयी है—
पाद्यं पादाम्बुजे दद्याद् देवस्य हृदयाणुना। एतच्छ्यामाकदूर्वाब्जविष्णुकान्ताभिरीरितम्॥ (पटल ४।९३)
२. गन्धपुष्पाक्षतयवकुशाग्रतिलसर्षपैः। सदूर्वैः सर्वदेवानामेतदर्घ्यमुदीरितम्॥ (शा०ति० ४।९५-९६)
३. सुधामन्त्रेण वदने दद्यादाचमनीयकम्। जातीलवङ्गकङ्कोलैस्तद्युक्तं तन्त्रवेदिभिः॥ (शा०ति० ४।९४)
४. मन्त्र-महार्णवमें योनिमुद्राका लक्षण इस प्रकार कहा गया है—
मिथः कनिष्ठिके बद्ध्वा तर्जनीभ्यामनामिके। अनामिकोर्ध्वसंश्लिष्टे दीर्घमध्यमयोरपि॥ (पू० ख० १ तरं० २)