अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
* अध्याय ११२ * २३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
अग्निकुण्ड हैं। उनके बीचमें गङ्गा सब तीर्थोंको साथ लिये बड़े वेगसे बहती हैं। वहाँ त्रिभुवन-विख्यात सूर्यकन्या यमुना भी हैं। गङ्गा और यमुनाका मध्यभाग पृथ्वीका 'जघन' माना गया है और प्रयागको ऋषियोंने जघनके बीचका 'उपस्थ भाग' बताया है॥ १-४॥
प्रतिष्ठान (झूसी) सहित प्रयाग, कम्बल और अश्वतर नाग तथा भोगवती तीर्थ—ये ब्रह्माजीके यज्ञकी वेदी कहे गये हैं। प्रयागमें वेद और यज्ञ मूर्तिमान् होकर रहते हैं। उस तीर्थके स्तवन और नाम-कीर्तनसे तथा वहाँकी मिट्टीका स्पर्श करनेमात्रसे भी मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्रयागमें गङ्गा और यमुनाके संगमपर किये हुए दान, श्राद्ध और जप आदि अक्षय होते हैं॥ ५-७॥
ब्रह्मन्! वेद अथवा लोक—किसीके कहनेसे भी अन्तमें प्रयागतीर्थके भीतर मरनेका विचार नहीं छोड़ना चाहिये। प्रयागमें साठ करोड़, दस हजार तीर्थोंका निवास है; अतः वह सबसे श्रेष्ठ है। वासुकि नागका स्थान, भोगवती तीर्थ और हंसप्रपतन—ये उत्तम तीर्थ हैं। कोटि गोदानसे जो फल मिलता है, वही इनमें तीन दिनोंतक स्नान करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है। प्रयागमें माघमासमें मनीषी पुरुष ऐसा कहते हैं कि 'गङ्गा सर्वत्र सुलभ हैं; किंतु गङ्गाद्वार, प्रयाग और गङ्गा-सागर-संगम—इन तीन स्थानोंमें उनका मिलना बहुत कठिन है।' प्रयागमें दान देनेसे मनुष्य स्वर्गमें जाता है और इस लोकमें आनेपर राजाओंका भी राजा होता है॥ ८-१२॥
अक्षयवटके मूलके समीप और संगम आदिमें मृत्युको प्राप्त हुआ मनुष्य भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। प्रयागमें परम रमणीय उर्वशी-पुलिन, संध्यावट, कोटितीर्थ, दशाश्वमेध घाट, गङ्गा-यमुनाका उत्तम संगम, रजोहीन मानसतीर्थ तथा वासरक तीर्थ—ये सभी परम उत्तम हैं॥ १३-१४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन' नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १११॥
एक सौ बारहवाँ अध्याय
वाराणसीका माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं—वाराणसी परम उत्तम तीर्थ है। जो वहाँ श्रीहरिका नाम लेते हुए निवास करते हैं, उन सबको वह भोग और मोक्ष प्रदान करता है। महादेवजीने पार्वतीसे उसका माहात्म्य इस प्रकार बतलाया है॥ १॥
महादेवजी बोले—गौरि! इस क्षेत्रको मैंने कभी मुक्त नहीं किया—सदा ही वहाँ निवास किया है, इसलिये यह 'अविमुक्त' कहलाता है। अविमुक्त-क्षेत्रमें किया हुआ जप, तप, होम और दान अक्षय होता है। पत्थरसे दोनों पैर तोड़कर बैठ रहे, परंतु काशी कभी न छोड़े। हरिश्चन्द्र, आम्रातकेश्वर, जप्येश्वर, श्रीपर्वत, महालय, भृगु, चण्डेश्वर और केदारतीर्थ—ये आठ अविमुक्त-क्षेत्रमें परम गोपनीय तीर्थ हैं। मेरा अविमुक्त-क्षेत्र सब गोपनीयोंमें भी परम गोपनीय है। वह दो योजन लंबा और आधा योजन चौड़ा है। 'वरणा' और 'नासी' (असी)—इन दो नदियोंके बीचमें 'वाराणसीपुरी' है। इसमें स्नान, जप, होम, मृत्यु, देवपूजन, श्राद्ध, दान और निवास—जो कुछ होता है, वह सब भोग एवं मोक्ष प्रदान करता है॥ २-७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वाराणसी-माहात्म्यवर्णन' नामक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११२॥
२३८ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
एक सौ तेरहवाँ अध्याय
नर्मदा-माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं— अब मैं नर्मदा आदिका माहात्म्य बताऊँगा। नर्मदा श्रेष्ठ तीर्थ है। गङ्गाका जल स्पर्श करनेपर मनुष्यको तत्काल पवित्र करता है, किंतु नर्मदाका जल दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देता है। नर्मदातीर्थ सौ योजन लंबा और दो योजन चौड़ा है। अमरकण्टक पर्वतके चारों ओर नर्मदा-सम्बन्धी साठ करोड़, साठ हजार तीर्थ हैं। कावेरी-संगमतीर्थ बहुत पवित्र है। अब श्रीपर्वतका वर्णन सुनो — ॥ १—३ ॥
एक समय गौरीने श्रीदेवीका रूप धारण करके भारी तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर श्रीहरिने उन्हें वरदान देते हुए कहा—‘‘देवि! तुम्हें अध्यात्म-ज्ञान प्राप्त होगा और तुम्हारा यह पर्वत ‘श्रीपर्वत’के नामसे विख्यात होगा। इसके चारों ओर सौ योजनतकका स्थान अत्यन्त पवित्र होगा।’’ यहाँ किया हुआ दान, तप, जप तथा श्राद्ध सब अक्षय होता है। यह उत्तम तीर्थ सब कुछ देनेवाला है। यहाँकी मृत्यु शिवलोककी प्राप्ति करानेवाली है। इस पर्वतपर भगवान् शिव सदा पार्वतीदेवीके साथ क्रीड़ा करते हैं तथा हिरण्यकशिपु यहीं तपस्या करके अत्यन्त बलवान् हुआ था। मुनियोंने भी यहाँ तपस्यासे सिद्धि प्राप्त की है ॥ ४—७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘नर्मदा-माहात्म्य-वर्णन’ नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११३ ॥
एक सौ चौदहवाँ अध्याय
गया-माहात्म्य
अग्निदेव कहते हैं— अब मैं गयाके माहात्म्यका वर्णन करूँगा। गया श्रेष्ठ तीर्थोंमें सर्वोत्तम है। एक समयकी बात है—गय नामक असुरने बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की। उससे देवता संतप्त हो उठे और उन्होंने क्षीरसागरशायी भगवान् विष्णुके समीप जाकर कहा—‘भगवन्! आप गयासुरसे हमारी रक्षा कीजिये।’ ‘तथास्तु’ कहकर श्रीहरि गयासुरके पास गये और उससे बोले—‘कोई वर माँगो।’ दैत्य बोला—‘भगवन्! मैं सब तीर्थोंसे अधिक पवित्र हो जाऊँ।’ भगवान्ने कहा—‘ऐसा ही होगा।’—यों कहकर भगवान् चले गये। फिर तो सभी मनुष्य उस दैत्यका दर्शन करके भगवान्के समीप जा पहुँचे। पृथ्वी सूनी हो गयी। स्वर्गवासी देवता और ब्रह्मा आदि प्रधान देवता श्रीहरिके निकट जाकर बोले—‘देव! श्रीहरि! पृथ्वी और स्वर्ग सूने हो गये। दैत्यके दर्शनमात्रसे सब लोग आपके धाममें चले गये हैं।’ यह सुनकर श्रीहरिने ब्रह्माजीसे कहा—‘तुम सम्पूर्ण देवताओंके साथ गयासुरके पास जाओ और यज्ञभूमि बनानेके लिये उसका शरीर माँगो।’ भगवान्का यह आदेश सुनकर देवताओंसहित ब्रह्माजी गयासुरके समीप जाकर उससे बोले—‘दैत्यप्रवर! मैं तुम्हारे द्वारपर अतिथि होकर आया हूँ और तुम्हारे पावन शरीरको यज्ञके लिये माँग रहा हूँ’॥ १—६ ॥
‘तथास्तु’ कहकर गयासुर धरतीपर लेट गया। ब्रह्माजीने उसके मस्तकपर यज्ञ आरम्भ किया। जब पूर्णाहुतिका समय आया, तब गयासुरका
- अध्याय ११४ * २३९
शरीर चञ्चल हो उठा। यह देख प्रभु ब्रह्माजीने पुनः भगवान् विष्णुसे कहा—‘देव! गयासुर पूर्णाहुतिके समय विचलित हो रहा है।’ तब श्रीविष्णुने धर्मको बुलाकर कहा—‘तुम इस असुरके शरीरपर देवमयी शिला रख दो और सम्पूर्ण देवता उस शिलापर बैठ जायें। देवताओंके साथ मेरी गदाधरमूर्ति भी इसपर विराजमान होगी।’ यह सुनकर धर्मने देवमयी विशाल शिला उस दैत्यके शरीरपर रख दी। (शिलाका परिचय इस प्रकार है—) धर्मसे उनकी पत्नी धर्मवतीके गर्भसे एक कन्या उत्पन्न हुई थी, जिसका नाम 'धर्मव्रता' था। वह बड़ी तपस्विनी थी। ब्रह्माके पुत्र महर्षि मरीचिने उसके साथ विवाह किया। जैसे भगवान् विष्णु श्रीलक्ष्मीजीके साथ और भगवान् शिव श्रीपार्वतीजीके साथ विहार करते हैं, उसी प्रकार महर्षि मरीचि धर्मव्रताके साथ रमण करने लगे ॥ ७—११॥
एक दिनकी बात है। महर्षि जंगलसे कुशा और पुष्प आदि ले आकर बहुत थक गये थे। उन्होंने भोजन करके धर्मव्रतासे कहा—‘प्रिये! मेरे पैर दबाओ।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर प्रिया धर्मव्रता थके-माँदे मुनिके चरण दबाने लगी। मुनि सो गये; इतनेमें ही वहाँ ब्रह्माजी आ गये। धर्मव्रताने सोचा—‘मैं ब्रह्माजीका पूजन करूँ या अभी मुनिकी चरण-सेवामें ही लगी रहूँ। ब्रह्माजी गुरुके भी गुरु हैं—मेरे पतिके भी पूज्य हैं; अतः इनका पूजन करना ही उचित है।’ ऐसा विचारकर वह पूजन-सामग्रियोंसे ब्रह्माजीकी पूजामें लग गयी। नींद टूटनेपर जब मरीचि मुनिने धर्मव्रताको अपने समीप नहीं देखा, तब आज्ञा-उल्लङ्घनके अपराधसे उसे शाप देते हुए कहा—‘तू शिला हो जायगी।’ यह सुनकर धर्मव्रता कुपित हो उनसे बोली—‘मुने! चरण-सेवा छोड़कर मैंने आपके पूज्य पिताकी पूजा की है, अतः मैं सर्वथा निर्दोष हूँ; ऐसी दशामें भी आपने मुझे शाप दिया है, अतः आपको भी भगवान् शिवसे शापकी प्राप्ति होगी।’ यों कहकर धर्मव्रताने शापको पृथक् रख दिया और स्वयं अग्निमें प्रवेश करके वह हजारों वर्षोंतक कठोर तपस्यामें संलग्न रही। इससे प्रसन्न होकर श्रीविष्णु आदि देवताओंने कहा—‘वर माँगो।’ धर्मव्रता देवताओंसे बोली—‘आपलोग मेरे शापको दूर कर दें’ ॥ १२—१८ ॥
देवताओंने कहा—शुभे! महर्षि मरीचिका दिया हुआ शाप अन्यथा नहीं होगा। तुम देवताओंके चरण-चिह्नसे अङ्कित परमपवित्र शिला होओगी। गयासुरके शरीरको स्थिर रखनेके लिये तुम्हें शिलाका स्वरूप धारण करना होगा। उस समय तुम देवव्रता, देवशिला, सर्वदेवस्वरूपा, सर्वतीर्थमयी तथा पुण्यशिला कहलाओगी ॥ १९-२० ॥
देवव्रता बोली—देवताओ! यदि आपलोग मुझपर प्रसन्न हों तो शिला होनेके बाद मेरे ऊपर ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र आदि देवता और गौरी-लक्ष्मी आदि देवियाँ सदा विराजमान रहें ॥ २१ ॥
अग्निदेव कहते हैं—देवव्रताकी बात सुनकर सब देवता 'तथास्तु' कहकर स्वर्गको चले गये। उस देवमयी शिलाको ही धर्मने गयासुरके शरीरपर रखा। परंतु वह शिलाके साथ ही हिलने लगा। यह देख रुद्र आदि देवता भी उस शिलापर जा बैठे। अब वह देवताओंको साथ लिये हिलने-डोलने लगा। तब देवताओंने क्षीरसागरशायी भगवान् विष्णुको प्रसन्न किया। श्रीहरिने उनको अपनी गदाधरमूर्ति प्रदान की और कहा—‘देवगण! आपलोग चलिये; इस देवगम्य मूर्तिके द्वारा मैं स्वयं ही वहाँ उपस्थित होऊँगा।’ इस प्रकार उस दैत्यके शरीरको स्थिर रखनेके लिये व्यक्ताव्यक्त उभयस्वरूप साक्षात् गदाधारी भगवान् विष्णु वहाँ स्थित हुए। वे आदि-गदाधरके नामसे उस तीर्थमें विराजमान
२४० * अग्निपुराण *
| भगवान् ब्रह्मा [ अग्नि० अ० ४९ ] | अष्टभुज विष्णु [ अग्नि० अ० ४९ ] |
| त्रैलोक्यमोहन श्रीहरि [ अग्नि० अ० ४९ ] | विश्वरूप विष्णु [ अग्नि० अ० ४९ ] |
* अध्याय ११४ * २४१
हैं॥ २२-२५॥
पूर्वकालमें ‘गद’ नामसे प्रसिद्ध एक भयंकर असुर था। उसे श्रीविष्णुने मारा और उसकी हड्डियोंसे विश्वकर्माने गदाका निर्माण किया। वही ‘आदि-गदा’ है। उस आदि-गदाके द्वारा भगवान् गदाधरने ‘हेति’ आदि राक्षसोंका वध किया था, इसलिये वे ‘आदि-गदाधर’ कहलाये। पूर्वोक्त देवमयी शिलापर आदि-गदाधरके स्थित होनेपर गयासुर स्थिर हो गया; तब ब्रह्माजीने पूर्णाहुति दी। तदनन्तर गयासुरने देवताओंसे कहा— ‘किसलिये मेरे साथ वञ्चना की गयी है? क्या मैं भगवान् विष्णुके कहनेमात्रसे स्थिर नहीं हो सकता था? देवताओ! यदि आपने मुझे शिला आदिके द्वारा दबा रखा है, तो आपको मुझे वरदान देना चाहिये’॥ २६-३०॥
देवता बोले— ‘दैत्यप्रवर! तीर्थ-निर्माणके लिये हमने तुम्हारे शरीरको स्थिर किया है; अतः यह तुम्हारा क्षेत्र भगवान् विष्णु, शिव तथा ब्रह्माजीका निवास-स्थान होगा। सब तीर्थोंसे बढ़कर इसकी प्रसिद्धि होगी तथा पितर आदिके लिये यह क्षेत्र ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाला होगा।’—यों कहकर सब देवता वहीं रहने लगे। देवियों और तीर्थ आदिने भी उसे अपना निवास-स्थान बनाया। ब्रह्माजीने यज्ञ पूर्ण करके उस समय ऋत्विजोंको दक्षिणाएँ दीं। पाँच कोसका गया-क्षेत्र और पचपन गाँव अर्पित किये। यही नहीं, उन्होंने सोनेके अनेक पर्वत बनाकर दिये। दूध और मधुकी धारा बहानेवाली नदियाँ समर्पित कीं। दही और घीके सरोवर प्रदान किये। अन्न आदिके बहुत-से पहाड़, कामधेनु गाय, कल्पवृक्ष तथा सोने-चाँदीके घर भी दिये। भगवान् ब्रह्माने ये सब वस्तुएँ देते समय ब्राह्मणोंसे कहा— ‘विप्रवरो! अब तुम मेरी अपेक्षा अल्प-शक्ति रखनेवाले अन्य व्यक्तियोंसे कभी याचना न करना।’ यों कहकर उन्होंने वे सब वस्तुएँ उन्हें अर्पित कर दीं॥ ३१-३५॥
तत्पश्चात् धर्मने यज्ञ किया। उस यज्ञमें लोभवश धन आदिका दान लेकर जब वे ब्राह्मण पुनः गयामें स्थित हुए, तब ब्रह्माजीने उन्हें शाप दिया— ‘अब तुमलोग विद्याविहीन और लोभी हो जाओगे। इन नदियोंमें अब दूध आदिका अभाव हो जायगा और ये सुवर्ण-शैल भी पत्थर मात्र रह जायँगे।’ तब ब्राह्मणोंने ब्रह्माजीसे कहा— ‘भगवन्! आपके शापसे हमारा सब कुछ नष्ट हो गया। अब हमारी जीविकाके लिये कृपा कीजिये।’ यह सुनकर वे ब्राह्मणोंसे बोले— ‘अब इस तीर्थसे ही तुम्हारी जीविका चलेगी। जबतक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे, तबतक इसी वृत्तिसे तुम जीवननिर्वाह करोगे। जो लोग गया-तीर्थमें आयेंगे, वे तुम्हारी पूजा करेंगे। जो हव्य, कव्य, धन और श्राद्ध आदिके द्वारा तुम्हारा सत्कार करेंगे, उनकी सौ पीढ़ियोंके पितर नरकसे स्वर्गमें चले जायँगे और स्वर्गमें ही रहनेवाले पितर परमपदको प्राप्त होंगे’॥ ३६-४०॥
महाराज गयने भी उस क्षेत्रमें बहुत अन्न और दक्षिणासे सम्पन्न यज्ञ किया था। उन्हींके नामसे गयापुरीकी प्रसिद्धि हुई। पाण्डवोंने भी गयामें आकर श्रीहरिकी आराधना की थी॥ ४१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘गया-माहात्म्य-वर्णन’ नामक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११४॥
२४२ * अग्निपुराण *
एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय
गया-यात्राकी विधि
अग्निदेव कहते हैं—यदि मनुष्य गया जानेको उद्यत हो तो विधिपूर्वक श्राद्ध करके तीर्थयात्रीका वेष धारणकर अपने गाँवकी परिक्रमा कर ले; फिर प्रतिदिन पैदल यात्रा करता रहे। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे। किसीसे कुछ दान न ले। गया जानेके लिये घरसे चलते ही पग-पगपर पितरोंके लिये स्वर्गमें जानेकी सीढ़ी बनने लगती है। यदि पुत्र (पितरोंका श्राद्ध करनेके लिये) गया चला जाय तो उससे होनेवाले पुण्यके सामने ब्रह्मज्ञानकी क्या कीमत है? गौओंको संकटसे छुड़ानेके लिये प्राण देनेपर भी क्या उतना पुण्य होना सम्भव है? फिर तो कुरुक्षेत्रमें निवास करनेकी भी क्या आवश्यकता है? पुत्रको गयामें पहुँचा हुआ देखकर पितरोंके यहाँ उत्सव होने लगता है। वे कहते हैं—‘क्या यह पैरोंसे भी जलका स्पर्श करके हमारे तर्पणके लिये नहीं देगा?’ ब्रह्मज्ञान, गयामें किया हुआ श्राद्ध, गोशालामें मरण और कुरुक्षेत्रमें निवास—ये मनुष्योंकी मुक्तिके चार साधन हैं।$^१$ नरकके भयसे डरे हुए पितर पुत्रकी अभिलाषा रखते हैं। वे सोचते हैं, जो पुत्र गयामें जायगा, वह हमारा उद्धार कर देगा॥ १—६ $\frac{१}{२}$॥
मुण्डन और उपवास—यह सब तीर्थोंके लिये साधारण विधि है। गयातीर्थमें काल आदिका कोई नियम नहीं है। वहाँ प्रतिदिन पिण्डदान देना चाहिये। जो वहाँ तीन पक्ष (डेढ़ मास) निवास करता है, वह सात पीढ़ीतिकके पितरोंको पवित्र कर देता है। अष्टका$^२$ तिथियोंमें, आभ्युदयिक कार्योंमें तथा पिता आदिकी क्षयाह-तिथिको भी यहाँ गयामें माताके लिये पृथक् श्राद्ध करनेका विधान है। अन्य तीर्थोंमें स्त्रीका श्राद्ध उसके पतिके साथ ही होता है। गयामें पिता आदिके क्रमसे 'नव देवताक' अथवा 'द्वादशदेवताक' श्राद्ध करना आवश्यक है$^३$॥ ७—९ $\frac{१}{२}$॥
पहले दिन उत्तर-मानस-तीर्थमें स्नान करे। परम पवित्र उत्तर-मानस-तीर्थमें किया हुआ स्नान आयु और आरोग्यकी वृद्धि, सम्पूर्ण पापराशियोंका विनाश तथा मोक्षकी सिद्धि करनेवाला है; अतः वहाँ अवश्य स्नान करे। स्नानके बाद पहले देवता और पितर आदिका तर्पण करके श्राद्धकर्ता पुरुष पितरोंको पिण्डदान दे। तर्पणके समय यह भावना करे कि 'मैं स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूमिपर रहनेवाले सम्पूर्ण देवताओंको तृप्त करता हूँ।' स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूमिके
१. ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोगृहे मरणं तथा॥ वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा। (अग्नि पु० ११५। ५-६)
२. मार्गशीर्ष मासकी पूर्णिमाके बाद जो चार कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथियाँ आती हैं, उन्हें 'अष्टका' कहते हैं। उनके चार पृथक्-पृथक् नाम हैं—पौष कृष्ण अष्टमीको 'ऐन्द्री', माघ कृष्ण अष्टमीको 'वैश्वीदेवी', फाल्गुन कृष्ण अष्टमीको 'प्राजापत्या' और चैत्र कृष्ण अष्टमीको 'पित्र्या' कहते हैं।
उक्त चार अष्टकाओंका क्रमशः इन्द्र, विश्वेदेव, प्रजापति तथा पितृ-देवतासे सम्बन्ध है। अष्टकाके दूसरे दिन जो नवमी आती है, उसे 'अन्वष्टका' कहते हैं। 'अष्टका संस्कार'-कर्म है; अतः एक ही बार किया जाता है, प्रतिवर्ष नहीं। उस दिन मातृपूजा और आभ्युदयिक श्राद्धके पश्चात् गृह्याग्निमें होम किया जाता है।
३. पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह तथा वृद्ध प्रमातामह—ये नौ देवता हैं। इनके लिये किया जानेवाला श्राद्ध 'नवदेवताक' या 'नवदैवत्य' कहलाता है। इसमें मातामही आदिका भाग मातामह आदिके साथ ही सम्मिलित रहता है। जहाँ मातामही, प्रमातामही और वृद्ध प्रमातामहीको भी पृथक् पिण्ड दिया जाय, वहाँ बारह देवता होनेसे वह 'द्वादशदेवताक' श्राद्ध है।
* अध्याय ११५ * २४३
देवता आदि एवं पिता-माता आदिका तर्पण करे। फिर इस प्रकार कहे—'पिता, पितामह और प्रपितामह; माता, पितामही और प्रपितामही तथा मातामह, प्रमातामह और वृद्ध-प्रमातामह—इन सबको तथा अन्य पितरोंको भी उनके उद्धारके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। सोम, मङ्गल और बुधस्वरूप तथा बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतुरूप भगवान् सूर्यको प्रणाम है।' उत्तर-मानस-तीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है॥ १०—१६॥
सूर्यदेवको नमस्कार करके मनुष्य मौन-भावसे दक्षिण-मानस-तीर्थको जाय और यह भावना करे—'मैं पितरोंकी तृप्तिके लिये दक्षिण-मानस-तीर्थमें स्नान करता हूँ। मैं गयामें इसी उद्देश्यसे आया हूँ कि मेरे सम्पूर्ण पितर स्वर्गलोकको चले जायँ।' तदनन्तर श्राद्ध और पिण्डदान करके भगवान् सूर्यको प्रणाम करते हुए इस प्रकार कहे—'सबका भरण-पोषण करनेवाले भगवान् भानुको नमस्कार है। प्रभो! आप मेरे अभ्युदयके साधक हों। मैं आपका ध्यान करता हूँ। आप मेरे सम्पूर्ण पितरोंको भोग और मोक्ष देनेवाले हों। कव्यवाट्, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद तथा आज्यप नामवाले महाभाग पितृ-देवता यहाँ पदार्पण करें। आपलोगोंके द्वारा सुरक्षित जो मेरे पिता-माता, मातामह आदि पितर हैं, उनको पिण्डदान करनेके उद्देश्यसे मैं इस गयातीर्थमें आया हूँ।' मुण्डपृष्ठके उत्तर भागमें देवताओं और ऋषियोंसे पूजित जो 'कनखल' नामक तीर्थ है, वह तीनों लोकोंमें विख्यात है। सिद्ध पुरुषोंके लिये आनन्ददायक और पापियोंके लिये भयंकर बड़े-बड़े नाग, जिनकी जीभ लपलपाती रहती है, उस तीर्थकी प्रतिदिन रक्षा करते हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य इस भूतलपर सुखपूर्वक क्रीडा करते और अन्तमें स्वर्गलोकको जाते हैं॥ १७—२४॥
तत्पश्चात् महानदीमें स्थित परम उत्तम फल्गु-तीर्थपर जाय। यह नाग, जनार्दन, कूप, वट और उत्तर-मानससे भी उत्कृष्ट है। इसे 'गयाका शिरोभाग' कहा गया है। गयाशिरको ही 'फल्गु-तीर्थ' कहते हैं। यह मुण्डपृष्ठ और नग आदि तीर्थकी अपेक्षा सारसे भी सार वस्तु है। इसे 'आभ्यन्तर-तीर्थ' कहा गया है। जिसमें लक्ष्मी, कामधेनु गौ, जल और पृथ्वी सभी फलदायक होते हैं तथा जिससे दृष्टि रमणीय, मनोहर वस्तुएँ फलित होती हैं, वह 'फल्गु-तीर्थ' है। फल्गु-तीर्थ किसी हलके-फुलके तीर्थके समान नहीं है। फल्गु-तीर्थमें स्नान करके मनुष्य भगवान् गदाधरका दर्शन करे तो इससे पुण्यात्मा पुरुषोंको क्या नहीं प्राप्त होता? भूतलपर समुद्र-पर्यन्त जितने भी तीर्थ और सरोवर हैं, वे सब प्रतिदिन एक बार फल्गु-तीर्थमें जाया करते हैं। जो तीर्थराज फल्गु-तीर्थमें श्रद्धाके साथ स्नान करता है, उसका वह स्नान पितरोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाला तथा अपने लिये भोग और मोक्षकी सिद्धि करनेवाला होता है॥ २५—३०॥
श्राद्धकर्ता पुरुष स्नानके पश्चात् भगवान् ब्रह्माजीको प्रणाम करे। (उस समय इस प्रकार कहे—) 'कलियुगमें सब लोग महेश्वरके उपासक हैं; किंतु इस गया-तीर्थमें भगवान् गदाधर उपास्यदेव हैं। यहाँ लिङ्गस्वरूप ब्रह्माजीका निवास है, उन्हीं महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। भगवान् गदाधर (वासुदेव), बलराम (संकर्षण), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नृसिंह तथा वराह आदिको मैं प्रणाम करता हूँ।' तदनन्तर श्रीगदाधरका दर्शन करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। दूसरे दिन धर्मारण्य-तीर्थका दर्शन करे।
२४४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
वहाँ मतङ्ग मुनिके श्रेष्ठ आश्रममें मतङ्ग-वापीके जलमें स्नान करके श्राद्धकर्ता पुरुष पिण्डदान करे। वहाँ मतङ्गेश्वर एवं सुसिद्धेश्वरको मस्तक झुकाकर इस प्रकार कहे—'सम्पूर्ण देवता प्रमाणभूत होकर रहें, समस्त लोकपाल साक्षी हों, मैंने इस मतङ्ग-तीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार कर दिया।' तत्पश्चात् ब्राह्म-तीर्थ नामक कूपमें स्नान, तर्पण और श्राद्ध आदि करे। उस कूप और यूपके मध्यभागमें किया हुआ श्राद्ध सौ पीढ़ियोंका उद्धार करनेवाला है। वहाँ धर्मात्मा पुरुष महाबोधि- वृक्षको नमस्कार करके स्वर्गलोकका भागी होता है। तीसरे दिन नियम एवं व्रतका पालन करनेवाला पुरुष 'ब्रह्म-सरोवर' नामक तीर्थमें स्नान करे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करे—'मैं ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित ब्रह्म-सरोवर-तीर्थमें पितरोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेके लिये स्नान करता हूँ।' श्राद्धकर्ता पुरुष तर्पण करके पिण्डदान दे। फिर वृक्षको सींचे। जो वाजपेय-यज्ञका फल पाना चाहता हो, वह ब्रह्माजीद्वारा स्थापित यूपकी प्रदक्षिणा करे॥ ३१-३९॥
उस तीर्थमें एक मुनि रहते थे, वे जलका घड़ा और कुशका अग्रभाग हाथमें लिये आमके पेड़की जड़में पानी देते थे। इससे आम भी सींचे गये और पितरोंकी भी तृप्ति हुई। इस प्रकार एक ही क्रिया दो प्रयोजन सिद्ध करनेवाली हो गयी।* ब्रह्माजीको नमस्कार करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। चौथे दिन फल्गु-तीर्थमें स्नान करके देवता आदिका तर्पण करे। फिर गयाशीर्षमें श्राद्ध और पिण्डदान करे। गयाका क्षेत्र पाँच कोसका है। उसमें एक कोस केवल 'गयाशीर्ष' है। उसमें पिण्डदान करके
मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर सकता है। परम बुद्धिमान् महादेवजीने मुण्डपृष्ठमें अपना पैर रखा है। मुण्डपृष्ठमें ही गयासुरका साक्षात् सिर है, अतएव उसे 'गया-शिर' कहते हैं। जहाँ साक्षात् गयाशीर्ष है, वहीं फल्गु-तीर्थका आश्रय है। फल्गु अमृतकी धारा बहाती है। वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे किया हुआ दान अक्षय होता है। दशाश्वमेध-तीर्थमें स्नान तथा ब्रह्माजीका दर्शन करके महादेवजीके चरण (रुद्रपाद)-का स्पर्श करनेपर मनुष्य पुनः इस लोकमें जन्म नहीं लेता। गयाशीर्षमें शमीके पत्ते-बराबर पिण्ड देनेसे भी नरकोंमें पड़े हुए पितर स्वर्गको चले जाते हैं और स्वर्गवासी पितरोंको मोक्षकी प्राप्ति होती है। वहाँ खीर, आटा, सत्तू, चरु और चावलसे पिण्डदान करे। तिलमिश्रित गेहूँसे भी रुद्रपादमें पिण्डदान करके मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर सकता है॥ ४०-४८॥
इसी प्रकार 'विष्णुपदी'में भी श्राद्ध और पिण्डदान करनेवाला पुरुष पितृ-ऋणसे छुटकारा पाता है और पिता आदि ऊपरकी सौ पीढ़ियों तथा अपनेको भी तार देता है। 'ब्रह्मपद'में श्राद्ध करनेवाला मानव अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य-अग्नि तथा आहवनीय-अग्निके स्थानमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष यज्ञफलका भागी होता है। आवसथ्याग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, गणेश, अगस्त्य और कार्तिकेयके स्थानमें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य अपने कुलका उद्धार कर देता है। मनुष्य सूर्यके रथको नमस्कार करके कर्णादित्यको मस्तक झुकावे। कनकेश्वरके पदको प्रणाम करके गया-केदार-तीर्थको नमस्कार करे। इससे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पाकर
* एको मुनिः कुम्भकुशाग्रहस्त आम्रस्य मूले सलिलं ददाति। आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च तृप्ता एका क्रिया द्व्यर्थकरी प्रसिद्धा॥ (अग्नि पु० ११५।४०)
- अध्याय ११५ * २४५
अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। विशाल भी गयाशीर्षमें पिण्डदान करनेसे पुत्रवान् हुए।
कहते हैं, विशाला नगरीमें एक 'विशाल' नामसे प्रसिद्ध राजपुत्र थे। उन्होंने ब्राह्मणोंसे पूछा—'मुझे पुत्र आदिकी उत्पत्ति किस प्रकार होगी?' यह सुनकर ब्राह्मणोंने विशालसे कहा—'गयामें पिण्डदान करनेसे तुम्हें सब कुछ प्राप्त होगा।' तब विशालने भी गयाशीर्षमें पितरोंको पिण्डदान किया। उस समय आकाशमें उन्हें तीन पुरुष दिखायी दिये, जो क्रमशः श्वेत, लाल और काले थे। विशालने उनसे पूछा—'आपलोग कौन हैं?' उनमेंसे एक श्वेतवर्णवाले पुरुषने विशालसे कहा—'मैं तुम्हारा पिता हूँ; मेरा वर्ण श्वेत है; मैं अपने शुभकर्मसे इन्द्रलोकमें गया था। बेटा! ये लाल रंगवाले मेरे पिता और काले रंगवाले मेरे पितामह थे। ये नरकमें पड़े थे; तुमने हम सबको मुक्त कर दिया। तुम्हारे पिण्डदानसे हमलोग ब्रह्मलोकमें जा रहे हैं।' यों कहकर वे तीनों चले गये। विशालको पुत्र-पौत्र आदिकी प्राप्ति हुई। उन्होंने राज्य भोगकर मृत्युके पश्चात् भगवान् श्रीहरिको प्राप्त कर लिया ॥ ४९-५९ ॥
एक प्रेतोंका राजा था, जो अन्य प्रेतोंके साथ बहुत पीड़ित रहता था। उसने एक दिन एक वणिक्से अपनी मुक्तिके लिये इस प्रकार कहा—'भाई! हमारे द्वारा एक ही पुण्य हुआ था, जिसका फल यहाँ भोगते हैं। पूर्वकालमें एक बार श्रवण-नक्षत्र और द्वादशी तिथिका योग आनेपर हमने अन्न और जलसहित कुम्भदान किया था; वही प्रतिदिन मध्याह्नके समय हमारी जीवन-रक्षाके लिये उपस्थित होता है। तुम हमसे धन लेकर गया जाओ और हमारे लिये पिण्डदान करो।' वणिक्ने उससे धन लिया और गयामें उसके निमित्त पिण्डदान किया। उसका फल यह हुआ कि वह प्रेतराज अन्य सब प्रेतोंके साथ मुक्त होकर श्रीहरिके धाममें जा पहुँचा। गयाशीर्षमें पिण्डदान करनेसे मनुष्य अपने पितरोंका तथा अपना भी उद्धार कर देता है ॥ ६०-६३ ॥
वहाँ पिण्डदान करते समय इस प्रकार कहना चाहिये—'मेरे पिताके कुलमें तथा माताके वंशमें और गुरु, श्वशुर एवं बन्धुजनोंके वंशमें जो मृत्युको प्राप्त हुए हैं, इनके अतिरिक्त भी जो बन्धु-बान्धव मरे हैं, मेरे कुलमें जिनका श्राद्ध-कर्म—पिण्डदान आदि लुप्त हो गया है, जिनके कोई स्त्री-पुत्र नहीं रहा है, जिनके श्राद्ध-कर्म नहीं होने पाये हैं, जो जन्मके अंधे, लँगड़े और विकृत रूपवाले रहे हैं, जिनका अपक्व गर्भके रूपमें निधन हुआ है, इस प्रकार जो मेरे कुलके ज्ञात एवं अज्ञात पितर हों, वे सब मेरे दिये हुए इस पिण्डदानसे सदाके लिये तृप्त हो जायँ। जो कोई मेरे पितर प्रेतरूपसे स्थित हों, वे सब यहाँ पिण्ड देनेसे सदाके लिये तृप्तिको प्राप्त हों।' अपने कुलको तारनेवाली सभी संतानोंका कर्तव्य है कि वे अपने सम्पूर्ण पितरोंके उद्देश्यसे वहाँ पिण्ड दें तथा अक्षय लोककी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अपने लिये भी पिण्ड अवश्य देना चाहिये* ॥ ६४-६८ ॥
बुद्धिमान् पुरुष पाँचवें दिन 'गदालोल' नामक तीर्थमें स्नान करे। उस समय इस मन्त्रका पाठ करे—'भगवान् जनार्दन! जिसमें आपकी गदाका प्रक्षालन हुआ था, उस अत्यन्त पावन 'गदालोल' नामक तीर्थमें मैं संसाररूपी रोगकी शान्तिके लिये स्नान करता हूँ' ॥ ६९$\frac{१}{२}$ ॥
'अक्षय स्वर्ग प्रदान करनेवाले अक्षयवटको नमस्कार है। जो पिता-पितामह आदिके लिये अक्षय आश्रय है तथा सब पापोंका क्षय करनेवाला
* पिण्डो देयस्तु सर्वैश्च सर्वैर्न कुलतारकैः। आत्मनस्तु तथा देयो ह्यक्षयं लोकमिच्छता ॥ (अग्निपु० ११५।६८)
२४६ * अग्निपुराण *
है, उस अक्षय वटको नमस्कार है।'—यों प्रार्थना कर वटके नीचे श्राद्ध करके ब्राह्मण-भोजन करावे॥ ७०-७१॥
वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे कोटि ब्राह्मणोंको भोजन करानेका पुण्य होता है। फिर यदि बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराया जाय, तब तो उसके पुण्यका क्या कहना है? वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय होता है। पितर उसी पुत्रसे अपनेको पुत्रवान् मानते हैं, जो गयामें जाकर उनके लिये अन्नदान करता है। वट तथा वटेश्वरको नमस्कार करके अपने प्रपितामहका पूजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष अक्षय लोकमें जाता है और अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। क्रमसे हो या बिना क्रमसे, गयाकी यात्रा महान् फल देनेवाली होती है॥ ७२—७४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गया-यात्राकी विधिका वर्णन' नामक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११५॥
एक सौ सोलहवाँ अध्याय
गयामें श्राद्धकी विधि
अग्निदेव कहते हैं— गायत्री-मन्त्रसे ही महानदीमें स्नान करके संध्योपासना करे। प्रातःकाल गायत्रीके सम्मुख किया हुआ श्राद्ध और पिण्डदान अक्षय होता है। सूर्योदयके समय तथा मध्याह्नकालमें स्नान करके गीत और वाद्यके द्वारा सावित्री देवीकी उपासना करे। फिर उन्हींके सम्मुख संध्या करके नदीके तटपर पिण्डदान करे। तदनन्तर अगस्त्यपदमें पिण्डदान करे। फिर 'योनिद्वार' (ब्रह्मयोनि)-में प्रवेश करके निकले। इससे वह फिर माताकी योनिमें नहीं प्रवेश करता, पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाता है। तत्पश्चात् काकशिलापर बलि देकर कुमार कार्तिकेयको प्रणाम करे। इसके बाद स्वर्गद्वार, सोमकुण्ड और वायु-तीर्थमें पिण्डदान करे। फिर आकाशगङ्गा और कपिलाके तटपर पिण्ड दे। वहाँ कपिलेश्वर शिवको प्रणाम करके रुक्मिणीकुण्डपर पिण्डदान करे॥ १-५॥
कोटि-तीर्थमें भगवान् कोटीश्वरको नमस्कार करके मनुष्य अमोघपद, गदालोल, वानरक एवं गोप्रचार-तीर्थमें पिण्डदान दे। वैतरणीमें गौको नमस्कार एवं दान करके मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। वैतरणीके तटपर श्राद्ध एवं पिण्डदान करे। उसके बाद क्रौञ्चपादमें पिण्ड दे। तृतीया तिथिको विशाला, निश्चिरा, ऋणमोक्ष तथा पापमोक्ष-तीर्थमें भी पिण्डदान करे। भस्मकुण्डमें भस्मसे स्नान करनेवाला पुरुष पापसे मुक्त हो जाता है। वहाँ भगवान् जनार्दनको प्रणाम करे और इस प्रकार प्रार्थना करे— 'जनार्दन! यह पिण्ड मैंने आपके हाथमें समर्पित किया है। परलोकमें जानेपर यह मुझे अक्षयरूपमें प्राप्त हो।' गयामें साक्षात् भगवान् विष्णु ही पितृदेवके रूपमें विराजमान हैं॥ ६-१०॥
उन भगवान् कमलनयनका दर्शन करके मानव तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। तदनन्तर मार्कण्डेयेश्वरको प्रणाम करके मनुष्य गृध्रेश्वरको नमस्कार करे। महादेवजीके मूलक्षेत्र धारामें पिण्डदान करना चाहिये। इसी प्रकार गृध्रकूट, गृध्रवट और धौतपादमें भी पिण्डदान करना उचित है। पुष्करिणी, कर्दममाल और रामतीर्थमें पिण्ड दे। फिर प्रभासेश्वरको नमस्कार करके
- अध्याय ११६ * २४७
प्रेतशिलापर पिण्डदान दे। उस समय इस प्रकार कहे — 'दिव्यलोक, अन्तरिक्षलोक तथा भूमिलोकमें जो मेरे पितर और बान्धव आदि सम्बन्धी प्रेत आदिके रूपमें रहते हों, वे सब लोग इन मेरे दिये हुए पिण्डोंके प्रभावसे मुक्ति-लाभ करें।' प्रेतशिला तीन स्थानोंमें अत्यन्त पावन मानी गयी है — गयाशीर्ष, प्रभासतीर्थ और प्रेतकुण्ड। इनमें पिण्डदान करनेवाला पुरुष अपने कुलका उद्धार कर देता है॥ ११—१५॥
वसिष्ठेश्वरको नमस्कार करके उनके आगे पिण्डदान दे। गयानाभि, सुषुम्ना तथा महाकोष्ठौमें भी पिण्डदान करे। भगवान् गदाधरके सामने मुण्डपृष्ठपर देवीके समीप पिण्डदान करे। पहले क्षेत्रपाल आदिसहित मुण्डपृष्ठको नमस्कार कर लेना चाहिये। उनका पूजन करनेसे भयका नाश होता है, विष और रोग आदिका कुप्रभाव भी दूर हो जाता है। ब्रह्माजीको प्रणाम करनेसे मनुष्य अपने कुलको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। सुभद्रा, बलभद्र तथा भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करके अपने कुलका उद्धार कर देता और अन्तमें स्वर्गलोकका भागी होता है। भगवान् हृषीकेशको नमस्कार करके उनके आगे पिण्डदान देना चाहिये। श्रीमाधवका पूजन करके मनुष्य विमानचारी देवता होता है॥ १६—२०॥
भगवती महालक्ष्मी, गौरी तथा मङ्गलमयी सरस्वतीकी पूजा करके मनुष्य अपने पितरोंका उद्धार करता, स्वयं भी स्वर्गलोकमें जाता और वहाँ भोग भोगनेके पश्चात् इस लोकमें आकर शास्त्रोंका विचार करनेवाला पण्डित होता है। फिर बारह आदित्योंका, अग्निका, रेवन्तका और इन्द्रका पूजन करके मनुष्य रोग आदिसे छुटकारा पा जाता है और अन्तमें स्वर्गलोकका निवासी होता है। ‘श्रीकपर्दि विनायक' तथा कार्तिकेयका पूजन करनेसे मनुष्यको निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धि प्राप्त होती है। सोमनाथ, कालेश्वर, केदार, प्रपितामह, सिद्धेश्वर, रुद्रेश्वर, रामेश्वर तथा ब्रह्मकेश्वर — इन आठ गुप्त लिङ्गोंका पूजन करनेसे मनुष्य सब कुछ पा लेता है। यदि लक्ष्मीप्राप्तिकी कामना हो तो भगवान् नारायण, वाराह, नरसिंहको नमस्कार करे। ब्रह्मा, विष्णु तथा त्रिपुरनाशक महेश्वरको भी प्रणाम करे। वे सब कामनाओंको देनेवाले हैं॥ २१—२५॥
सीता, राम, गरुड़ तथा वामनका पूजन करनेसे मानव अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लेता है और पितरोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति करा देता है। देवताओंसहित भगवान् श्रीआदि-गदाधरका पूजन करनेसे मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त होकर अपने सम्पूर्ण कुलको तार देता है। प्रेतशिला देवरूपा होनेसे परम पवित्र है। गयामें वह शिला देवमयी ही है। गयामें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ तीर्थ न हो। गयामें जिसके नामसे भी पिण्ड दिया जाता है, उसे वह सनातन ब्रह्ममें प्रतिष्ठित कर देता है। फल्गीश्वर, फल्गुचण्डी तथा अङ्गारकेश्वरको प्रणाम करके श्राद्धकर्ता पुरुष मातङ्गमूनिके स्थानमें पिण्डदान दे। फिर भरतके आश्रमपर भी पिण्ड दे। इसी प्रकार हंस-तीर्थ और कोटि-तीर्थमें भी करना चाहिये। जहाँ पाण्डुशिला नद है, वहाँ अग्निधारा तथा मधुस्रवा तीर्थमें पिण्डदान करे। तत्पश्चात् इन्द्रेश्वर, किलकिलेश्वर तथा वृद्धि-विनायकको प्रणाम करे; तदनन्तर धेनुकारण्यमें पिण्डदान करे, धेनुपदमें गौको नमस्कार करे। इससे वह अपने सम्पूर्ण पितरोंका उद्धार कर देता है। फिर सरस्वती-तीर्थमें जाकर पिण्ड दे। सायंकाल संध्योपासना करके सरस्वती देवीको प्रणाम करे। ऐसा करनेवाला पुरुष तीनों
२४८ * अग्निपुराण *
कालकी सन्ध्योपासनामें तत्पर वेद-वेदाङ्गोंका पारंगत विद्वान् ब्राह्मण होता है॥ २६—३३॥
गयाकी परिक्रमा करके वहाँके ब्राह्मणोंका पूजन करनेसे गया-तीर्थमें किया हुआ अन्नदान आदि सम्पूर्ण पुण्य अक्षय होता है। भगवान् गदाधरकी स्तुति करके इस प्रकार प्रार्थना करे— 'जो आदिदेवता, गदा धारण करनेवाले, गयाके निवासी तथा पितर आदिको सद्गति देनेवाले हैं, उन योगदाता भगवान् गदाधरको मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिके लिये प्रणाम करता हूँ। वे देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकारसे शून्य हैं। नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, द्वैतशून्य तथा देवता और दानवोंसे वन्दित हैं। देवताओं और देवियोंके समुदाय सदा उनकी सेवामें उपस्थित रहते हैं; मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। वे कलिके कल्मष (पाप) और कालकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं। उनके कण्ठमें वनमाला सुशोभित होती है। सम्पूर्ण लोकपालोंका भी उन्हींके द्वारा पालन होता है। वे सबके कुलोंका उद्धार करनेमें मन लगाते हैं। व्यक्त और अव्यक्त—सबमें अपने स्वरूपको विभक्त करके स्थित होते हुए भी वे वास्तवमें अविभक्तात्मा ही हैं। अपने स्वरूपमें ही उनकी स्थिति है। वे अत्यन्त स्थिर और सारभूत हैं तथा भयंकर पापोंका भी मर्दन करनेवाले हैं। मैं उनके चरणोंमें मस्तक झुकाता हूँ। देव! भगवान् गदाधर! मैं पितरोंका श्राद्ध करनेके निमित्त गयामें आया हूँ। आप यहाँ मेरे साक्षी होइये। आज मैं तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया। ब्रह्मा और शंकर आदि देवता मेरे लिये साक्षी बनें। मैंने गयामें आकर अपने पितरोंका उद्धार कर दिया।' श्राद्ध आदिमें गयाके इस माहात्म्यका पाठ करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकका भागी होता है। गयामें पितरोंका श्राद्ध अक्षय होता है। वह अक्षय ब्रह्मलोक देनेवाला है॥ ३४—४३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गयामें श्राद्धकी विधि' विषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११६॥
एक सौ सत्रहवाँ अध्याय
श्राद्ध-कल्प
अग्निदेव कहते हैं—महर्षि कात्यायनने मुनियोंसे जिस प्रकार श्राद्धका वर्णन किया था, उसे बतलाता हूँ। गया आदि तीर्थोंमें, विशेषतः संक्रान्ति आदिके अवसरपर श्राद्ध करना चाहिये। अपराह्नकालमें, अपरपक्ष (कृष्णपक्ष)-में, चतुर्थी तिथिको अथवा उसके बादकी तिथियोंमें श्राद्धोपयोगी सामग्री एकत्रित कर उत्तम नक्षत्रमें श्राद्ध करे। श्राद्धके एक दिन पहले ही ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। संन्यासी, गृहस्थ, साधु अथवा स्नातक तथा श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको, जो निन्दाके पात्र न हों, अपने कर्मोंमें लगे रहते हों और शिष्ट एवं सदाचारी हों—निमन्त्रित करना चाहिये। जिनके शरीरमें सफेद दाग हों, जो कोढ़ आदिके रोगोंसे ग्रस्त हों, ऐसे ब्राह्मणोंको छोड़ दे; उन्हें श्राद्धमें सम्मिलित न करे। निमन्त्रित ब्राह्मण जब स्नान और आचमन करके पवित्र हो जायँ तो उन्हें देवकर्ममें पूर्वाभिमुख बिठावे। देव-श्राद्ध, पितृ-श्राद्धमें तीन-तीन ब्राह्मण रहें अथवा दोनोंमें एक-एक ही ब्राह्मण हों। इस प्रकार मातामह आदिके श्राद्धमें भी समझना चाहिये। शाक आदिसे भी श्राद्ध-कर्म करावे॥ १—५॥
श्राद्धके दिन ब्रह्मचारी रहे, क्रोध और
- अध्याय ११७ * २४९
उतावली न करे। नम्र, सत्यवादी और सावधान रहे। उस दिन अधिक मार्ग न चले, स्वाध्याय भी न करे, मौन रहे। सम्पूर्ण पंक्तिमूर्धन्य (पंक्तिमें सर्वश्रेष्ठ अथवा पंक्तिपावन) ब्राह्मणोंसे प्रत्येक कर्मके विषयमें पूछे। आसनपर कुश बिछावे। पितृकर्ममें कुशोंको दोहरा मोड़ देना चाहिये। पहले देव-कर्म, फिर पितृ-कर्म करे।$^१$ देव-धर्ममें स्थित ब्राह्मणोंसे पूछे—'मैं विश्वेदेवोंका आवाहन करूँगा।' ब्राह्मण आज्ञा दें—'आवाहन करो', तब ‘विश्वेदेवास आगत शृणुताम इमं हवम्, एदं बर्हिर्निषीदत' (यजु० ७। ३४)—इस मन्त्रके द्वारा विश्वेदेवोंका आवाहन करके आसनपर जौ छोड़े तथा 'विश्वेदेवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षे य उपद्यविष्ठ। ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम्॥' (यजु० ३३। ५३)—इस मन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् पितृकर्ममें नियुक्त ब्राह्मणोंसे पूछे—'मैं पितरोंका आवाहन करूँगा।' ब्राह्मण कहें—'आवाहन करो।' तब 'उशन्तस्त्वा०'$^२$ इस मन्त्रका पाठ करते हुए आवाहन करे। फिर ‘अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः॥' (यजु० २। २९)—इस मन्त्रसे तिल बिखेरकर ‘आयन्तु नः०'$^३$ इत्यादि मन्त्रका जप करे। इसके बाद पवित्रकसहित अर्घ्यपात्रमें ‘शं नो देवी०'$^४$ इस मन्त्रसे जल डाले॥ ६—१०॥
तदनन्तर 'यवोऽसि'$^५$ इस मन्त्रसे जौ देकर पितरोंके निमित्त सर्वत्र तिलका उपयोग करे। (पितरोंके अर्घ्यपात्रमें भी 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे जल डालकर) ‘तिलोऽसि सोमदेवत्यो गोसवे देवनिर्मितः। प्रत्नवद्भिः प्रत्तः स्वधया पितॄँल्लोकान् पृणीहि नः स्वधा।' यह मन्त्र पढ़कर तिल डाले। फिर 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्याव-होरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्नि-षाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण॥' (यजु० ३१। २२) इस मन्त्रसे अर्घ्यपात्रमें फूल छोड़े। अर्घ्यपात्र सोना, चाँदी, गूलर अथवा पत्तेका होना चाहिये। उसीमें देवताओंके लिये सव्यभावसे और पितरोंके लिये अपसव्यभावसे उक्त वस्तुएँ रखनी चाहिये। एक-एकको एक-एक अर्घ्यपात्र पृथक्-पृथक् देना उचित है। पितरोंके हाथोंमें पहले पवित्री रखकर ही उन्हें अर्घ्य देना चाहिये॥ ११—१३॥
तत्पश्चात् (देवताओंके अर्घ्यपात्रको बायें हाथमें लेकर उसमें रखी हुई पवित्रीको दाहिने हाथसे निकालकर देव-भोजन-पात्रपर पूर्वाग्र करके रख दे। उसके ऊपर दूसरा जल देकर अर्घ्यपात्रको ढककर) निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े—‘ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूवुर्या अन्तरिक्षा उत पार्थिवीर्याः। हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता न आपः शिवाः शंः स्योनाः सुहवा भवन्तु॥' फिर (जौ, कुश और जल हाथमें लेकर संकल्प पढ़े—) ‘ॐ अद्यामुकगोत्राणां पितृपितामह-प्रपितामहानाम् अमुकामुकशर्मणाम् अमुकश्राद्धसम्बन्धिनो विश्वेदेवाःएष वो हस्तार्घ्यः स्वाहा।'—यों कहकर देवताओंको अर्घ्य देकर पात्रको दक्षिण भागमें सीधे रख दे। इसी प्रकार पिता आदिके लिये भी अर्घ्य दे। उसका संकल्प इस प्रकार है—'ओम्अद्य अमुकगोत्र पितः
१. श्राद्ध आरम्भ करनेसे पूर्व रक्षा-दीप जला लेना चाहिये।
२. ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्तः समिधीमहि। उशन्नुशत आवह पितॄन् हविषे अत्तवे॥ (यजु० १९। ७०)
३. ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः। अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥ (यजु० १९। ५८)
४. ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शंय्योरभिस्स्रवन्तु नः॥ (अथर्व० १। ६। १)
५. ॐ यवोऽसि यवयास्मद्द्वेषो यवयारातीः। (यजु० ५। २६)
२५० * अग्निपुराण *
अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे एष हस्तार्घ्यः ते स्वधा।' इसी तरह पितामह आदिको भी दे। फिर सब अर्घ्यका अवशेष पहले पात्रमें डाल दे अर्थात् प्रपितामहके अर्घ्यमें जो जल आदि हो, उसे पितामहके पात्रमें डाल दे। इसके बाद वह सब पिताके अर्घ्यपात्रमें रख दे। पिताके अर्घ्यपात्रको पितामहके अर्घ्यपात्रके ऊपर रखे। फिर उन दोनोंको प्रपितामहके अर्घ्यपात्रके ऊपर रख दे। तत्पश्चात् तीनोंको पिताके आसनके वामभागमें 'पितृभ्यः स्थानमसि।' ऐसा कहकर उलट दे। तदनन्तर वहाँ देवताओं और पितरोंके लिये गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा वस्त्र आदिका दान किया जाता है॥ १४-१६॥
उसके बाद श्राद्धकर्ता पुरुष पात्रमेंसे घृतयुक्त अन्न निकालकर ब्राह्मणोंसे पूछे—'मैं अग्निमें इस अन्नका हवन करूँगा।' ब्राह्मण आज्ञा दें—'करो'। तब साग्निक पुरुष तो अग्निमें हवन करे और निरग्निक पुरुष पवित्रीयुक्त पितरके हाथ (अथवा जल)-में मन्त्रसे आहुति दे। पहली आहुति 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा।' (यजु० २।२९) कहकर दे। दूसरी आहुति 'सोमाय पितृमते स्वाहा।' (यजु० २।२९) इस मन्त्रसे दे। दूसरे विद्वानोंका मत है कि 'यम' एवं 'अङ्गिरा' के उद्देश्यसे आहुति दे¹। हवनसे शेष बचे हुए अन्नमेंसे क्रमशः देवताओं और पितरोंके पात्रोंमें परोसे और पात्रको हाथसे ढक दे। उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रका जप करे—'ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखेऽमृतेऽमृतं जुहोमि स्वाहा। इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढमस्य पाँसुरे स्वाहा॥ कृष्ण हव्यमिदं रक्ष मदीयम्।' (यजु० ५।१५) ऐसा पढ़कर अन्तमें ब्राह्मणके अँगूठेका स्पर्श करावे। (देवपात्रोंपर 'यवोऽसि यवयास्मद्द्वेषो यवयारातीः।' इस मन्त्रसे जौ छींटे) और पितरोंके पात्रोंपर 'अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः।' इस मन्त्रसे तिल छींटकर संकल्पपूर्वक अन्न अर्पण करे। तदनन्तर 'जुषध्वम्।' (आपलोग अन्न ग्रहण करें) ऐसा कहकर गायत्री-मन्त्र आदिका जप करे॥ १७-२१॥
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥²
'इस मन्त्रका भी जप करे। पितरोंको तृप्त जानकर पात्रमें अन्न बिखेरे। फिर एक-एक बार सबको जल दे। पूर्ववत् सव्यभावसे गायत्री-जप करके **'मधु वाता'**³ इस ऋचाका जप करे।⁴ इसके बाद ब्राह्मणोंसे पूछे—'आपलोग तृप्त हो गये?' ब्राह्मण कहें—'हाँ, हम तृप्त हो गये।' तदनन्तर शेष अन्नको ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर एकमें मिला दे और पिण्ड बनानेके लिये पात्रसे बाहर निकाले और पितरोंके उच्छिष्ट अन्नके पास ही अवनेजन करके कुशोंपर संकल्पपूर्वक
१. यदि दूसरेकी भूमिमें श्राद्ध करते हों तो थोड़ा अन्न और जल कुशापर अपसव्यभावसे रखकर कहें—'इदमन्नमेतद्भूस्वामिपितृभ्यो नमः।'
२. देवताओं, पितरों, महायोगियों, स्वधा और स्वाहाको मेरा सर्वदा नमस्कार है, नमस्कार है।
३. यह मन्त्र तीन ऋचाओंमें है। पूरा मन्त्र इस प्रकार है—ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥ १॥ ॐ मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिव रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता॥ २॥ ॐ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँऽस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः॥ ३॥ (यजु० १३। २७-२९) ॐ मधु मधु मधु॥
४. उक्त ऋचाके अतिरिक्त भी 'उदीरतामवर०' (यजु० १९।४९) इत्यादि पितृमन्त्रोंका 'ॐ कृणुष्व पाजः०' (यजु० १३।९) इत्यादि रक्षोघ्न-मन्त्रोंका, 'सहस्रशीर्षाः०' (यजु० ३१) इत्यादि पुरुषसूक्तका तथा 'ॐ आशुः शिशानः०' (यजु० १७। ३३) इत्यादि मन्त्रोंका एवं शतरुद्रियका पाठ भी किया जाता है।
'नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्तेऽनेकचक्षुषे। नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः॥' इस श्लोकको भी पढ़ना चाहिये।
- अध्याय ११७ * २५१
तीन पिण्डदान करे।$^१$ दूसरोंका मत है कि ब्राह्मण जब भोजनके पश्चात् हाथ-मुँह धोकर आचमन कर लें, तब पिण्डदान देना चाहिये। आचमनके पश्चात् जल, फूल और अक्षत दे॥ २२—२५$\frac{१}{२}$॥
फिर अक्षय्योदक देकर मनुष्य आशीर्वादकी प्रार्थना करे$^२$। ‘ॐ अघोराः पितरः सन्तु।’ (मेरे पितर सौम्य हों।) ऐसा कहकर जल गिरावे, फिर प्रार्थना करे—‘हमारा गोत्र सदा ही बढ़ता रहे, हमारे दाता भी निरन्तर अभ्युदयशील हों, वेदोंकी पठन-पाठन-प्रणाली बढ़े। संतानोंकी भी वृद्धि हो। हमारी श्रद्धांमें कमी न आवे; हमारे पास देने योग्य बहुत सामान संचित रहे; हमारे यहाँ अन्न भी अधिक हो। हम अतिथियोंको प्राप्त करते रहें अर्थात् हमारे घरपर अतिथियोंका शुभागमन होता रहे। हमारे पास माँगनेवाले आवें, किंतु हम किसीसे न माँगें।’ फिर स्वधा-वाचनके लिये पिण्डोंपर पवित्रकसहित कुश बिछावे और ब्राह्मणोंसे पूछे—‘मैं स्वधा-वाचन कराऊँगा।’ ब्राह्मण आज्ञा दें—‘स्वधा-वाचन कराओ।’ तब श्राद्धकर्ता पुरुष इस प्रकार कहे—
‘ब्राह्मणो! आपलोग मेरे पिता, पितामह और प्रपितामहके लिये स्वधा-वाचन करें।’ ब्राह्मण कहें—‘अस्तु स्वधा।’ तदनन्तर ‘ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रुतम् स्वधा स्थ तर्पयत मे पितॄन्’ (यजु० २। ३४)—इस मन्त्रसे कुशोंपर दुग्ध-मिश्रित जलकी दक्षिणाग्रधारा गिरावे,$^३$ फिर (सव्य होकर देवार्घ्यपात्रको हिला दे और पितरोंके) अर्घ्यपात्रको उत्तान करके देवश्राद्ध
१. इसके पहले कुछ दूरपर दक्षिणाग्र कुश बिछाकर भूमिको सींच दे और तिल-घृतसहित अन्न एवं जल लेकर—
‘ॐ अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु परां गतिम्॥’
यह पढ़कर पूर्वोक्त कुशोंपर वह अन्न-जल बिखेर दे। तदनन्तर आचमन करके भगवान्का स्मरण कर तीन बार गायत्री-मन्त्रका जप करे। इसके बाद अपसव्यभावसे बालूकी चौकोर वेदी बनाकर उसके ऊपर कुशके मूलसे प्रादेशमात्र तीन रेखा खींचे; उस समय ‘ॐ अपहता०’ इत्यादि मन्त्र पढ़े। फिर रेखाके चारों ओर उल्मुकसे अङ्गार-भ्रमण करावे। इसका मन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टाँल्लोकात्प्रणुदात्यस्मात्॥’ (यजु० २। ३०) तत्पश्चात् रेखापर तीन कुश बिछाकर सव्यभावसे गायत्री-जप करके फिर अपसव्यभावसे दोनेमें जल, तिल, गन्ध-पुष्प लेकर ‘ॐ अद्यामुकगोत्र पितः अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे पिण्डस्थानेऽत्रावनेनिक्ष्व ते स्वधा’ ऐसा कहकर कुशपर जल गिरावे। यह ‘अवनेजन’ है। पिण्ड देनेके बाद पिण्डके ऊपर उसी पात्रसे जल गिराकर उसी प्रकार संकल्प पढ़कर प्रत्यवनेजन किया जाता है। उसमें ‘प्रत्यवनेनिक्ष्व’ कहना चाहिये। पिण्डदानका संकल्प इस प्रकार है—ओम्द्यामुकगोत्र पितः अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे एष पिण्डस्ते स्वधा।’ इसी प्रकार पितामह आदिको भी देना चाहिये। पिण्डदानके अनन्तर पिण्डके आधारभूत कुशोंमें अपने हाथ पोंछकर कहे—‘ॐ लेपभागभुजः पितरस्तृप्यन्तु।’ फिर सव्यभावसे तीन बार आचमन करके श्रीहरिका स्मरण करे। तदनन्तर अपसव्यभावसे दक्षिणकी ओर मुँह करके कहे—‘अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्।’ (यजु० २। ३१) फिर वामावर्तसे उत्तरकी ओर मुँहकर श्वास रोककर प्रसन्नचित्त हो प्रकाशमान मूर्तिवाले पितरोंका ध्यान करते हुए फिर उसी मार्गसे लौटकर दक्षिणाभिमुख हो जाय और कहे—‘अमीमदन्त पितरो यथाभागमावृषायिषत।’ (यजु० २। ३१) इसके बाद पहलेके अवनेजनपात्रमें जो शेष जल हो, उसे पिण्डपर गिराकर प्रत्यवनेजन दें। उसका संकल्प अवनेजनकी ही भाँति है। ‘अवनेनिक्ष्व’को ‘प्रत्यवनेनिक्ष्व’ कहना चाहिये। बहुवचनमें ‘प्रत्यवनेनिग्ध्वम्’ का उच्चारण करना उचित है।
२. प्रत्यवनेजनके बाद नीवी-विस्रंसन करके सव्यभावसे आचमन करे। फिर अपसव्य हो बायें हाथसे दाहिने हाथमें सूत्र लेकर ‘ॐ नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहान्नः पितरो दत्तसतो वःपितरो देष्म’ (यजु० २। ३२)—इस मन्त्रका पाठ करके ‘एतद् वः पितरो वासः’ (यजु० २। ३२)—ऐसा कहते हुए छहों पिण्डोंपर सूत्र रखकर संकल्प करे—‘अद्यामुकगोत्र पितः (पितामह, प्रपितामह आदि) अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे पिण्डे एतत्ते वासः स्वधा।’ तत्पश्चात् ‘ॐ शिवा आपः सन्तु।’ कहकर जल, ‘ॐ सौमनस्यम् अस्तु।’ इस वाक्यका उच्चारण करके फूल, ‘ॐ अक्षतं चारिष्टमस्तु।’ कहकर अक्षत अन्नपात्रोंपर डाले। फिर मोटक, तिल और जल लेकर ‘ॐ अद्यामुकगोत्रस्य पितुः अमुकशर्मणः अमुकश्राद्धे दत्तान्येतान्यन्नपानादिकानि अक्षय्याणि सन्तु।’ इस प्रकार संकल्प पढ़कर छोड़ दे। तत्पश्चात् सव्य हो दक्षिण दिशाकी ओर देखते हुए पिण्डोंके ऊपर पूर्वाग्र जलधारा गिरावे और पढ़े—‘ॐ अघोराः पितरः सन्तु।’ इसके बाद हाथ जोड़ पूर्वाभिमुख हो मूलमें कहे अनुसार आशीः-प्रार्थना करे।
३. इसके बाद स्वयं झुककर सब पिण्डोंको नाकसे सूँघ ले और उठा दे। पिण्डोंके आधारभूत कुशोंको तथा उल्मुक (जिससे अङ्गार-भ्रमण कराया गया था)—को अग्निमें डाल दे।
२५२ * अग्निपुराण *
तथा पितृश्राद्धकी प्रतिष्ठाके लिये यथाशक्ति क्रमशः सुवर्ण और रजतकी दक्षिणा दे।* इसके बाद ‘विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्।’—ऐसा कहकर देवताओंका विसर्जन करे और ‘वाजेवाजेऽवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा अमृता ऋतज्ञाः। अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः॥’ (यजु० २१।१९)—इस मन्त्रसे पिता आदिका विसर्जन करे॥ २६—३२॥
(तत्पश्चात् सव्यभावसे ‘देवताभ्यश्च०’ इत्यादि पढ़कर भगवान्का स्मरण करे। फिर अपसव्यभावसे रक्षादीपको बुझा दे। उसके बाद सव्यभावसे भगवान्से प्रार्थना करे—‘प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद् विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥’ इत्यादि) तदनन्तर ‘आ मा वाजस्य०’ (यजु० ९।१९) इत्यादि मन्त्र पढ़कर ब्राह्मणके पीछे-पीछे जाय और ब्राह्मणकी परिक्रमा करके अपने घरमें जाय। प्रत्येक मासकी अमावस्याको इसी प्रकार पार्वण-श्राद्ध करना चाहिये॥ ३३॥
अब मैं एकोद्दिष्ट श्राद्धका वर्णन करूँगा। यह श्राद्ध पूर्ववत् ही करे। इसमें इतनी ही विशेषता है कि एक ही पवित्रक, एक ही अर्घ्य और एक ही पिण्ड देना चाहिये। इसमें आवाहन, अग्निकरण और विश्वेदेव-पूजन नहीं होता। जहाँ तृप्ति पूछनी हो, वहाँ ‘स्वदितम्?’ ऐसा प्रश्न करे। ब्राह्मण उत्तर दे—‘सुस्वदितम्।’, ‘उपतिष्ठताम्’—कहकर अर्पण करे। अक्षय्योदक भी दे। विसर्जनके समय ‘अभिरम्यताम्’ का उच्चारण करे। ब्राह्मण कहें—‘अभिरताः स्मः।’ शेष सभी बातें पूर्ववत् करनी चाहिये॥ ३४—३६॥
अब सपिण्डीकरणका वर्णन करूँगा। यह वर्षके अन्तमें और मध्यमें भी होता है। इसमें पितरोंके लिये तीन पात्र होते हैं और प्रेतके लिये एक पात्र अलग होता है। चारों अर्घ्यपात्रोंमें पवित्री, तिल, फूल, चन्दन और जल डालकर भर दिया जाता है। फिर उन्हींसे श्राद्धकर्ता पुरुष अर्घ्य देता है। ‘ये समानाः०’ (यजु० १९।४५-४६) इत्यादि दो मन्त्रोंसे प्रेतके अर्घ्यपात्रको क्रमशः तीनों पितरोंके अर्घ्यपात्रमें मिलाया जाता है। इसी प्रकार पिण्डदान, दान आदि पूर्ववत् करके प्रेतके पिण्डको पितरोंके पिण्डमें मिलाया जाता है। इससे प्रेतको ‘पितृ’ पदवी प्राप्त होती है॥ ३७—३९॥
अब ‘आभ्युदयिक’ श्राद्ध बतलाता हूँ। इसकी सब विधि पूर्ववत् है। इसमें पितृसम्बन्धी मन्त्रके अतिरिक्त अन्य मन्त्रोंका जप करना चाहिये। पूर्वाह्नकालमें आभ्युदयिक श्राद्ध और उसकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। इसमें कोमल कुश ही उपचार है। यहाँ तिलके स्थानपर जौका ही उपयोग होता है। ब्राह्मणोंसे पितरोंकी तृप्तिके लिये प्रश्न करते समय ‘सम्पन्नम्?’ का प्रयोग करना चाहिये। ब्राह्मण उत्तर दे ‘सुसम्पन्नम्’। इसमें दही, अक्षत और बेर आदिके ही पिण्ड होते हैं। आवाहनके समय पूछे—‘मैं ‘नान्दीमुख’ नामवाले
* दक्षिणाका संकल्प इस प्रकार है—त्रिकुशा, जौ और जल हाथमें लेकर—‘ॐ अद्यामुकगोत्राणां पितृपितामहप्रपितामहानाम् (मातामहप्रमातामहवृद्धप्रमातामहानां च) अमुकामुकशर्मणाम् अमुकश्राद्धसम्बन्धिनां विश्वेषां देवानां कृतैतदमुकश्राद्धप्रतिष्ठार्थं हिरण्यमग्निदैवत्यं तन्मूल्योपकल्पितं द्रव्यं वा यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणात्वेन दातुमहमुत्सृजे।’ तुरंत दिया जाता हो तो ‘सम्पददे’ कहना चाहिये। मोटक, तिल, जल लेकर ‘ओमद्यामुकगोत्रस्य पितुः अमुकशर्मणः कृतैतच्छ्राद्धप्रतिष्ठार्थं रजतं चन्द्रदैवत्यं तन्मूल्योपकल्पितं द्रव्यं यथानाम’ इत्यादि कहकर पिता आदिके लिये दक्षिणा दें।
* अध्याय ११७ * २५३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
पितरोंका आवाहन करूँगा।' इसी प्रकार अक्षय्य-तृप्तिके लिये 'प्रीयताम्' ऐसा कहे। फिर पूछे—'मैं नान्दीमुख पितरोंका तृप्ति-वाचन कराऊँगा।' ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर कहे—'नान्दीमुखाः पितरः प्रीयन्ताम्।' (नान्दीमुख पितर तृप्त एवं प्रसन्न हों।) (माता, पितामही, प्रपितामही) पिता, पितामह, प्रपितामह और (सपत्नीक) मातामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह—ये नान्दीमुख पितर हैं॥ ४०—४४॥
आभ्युदयिक श्राद्धमें 'स्वधा' का प्रयोग न करे और युग्म ब्राह्मणोंको भोजन करावे। अब मैं पितरोंकी तृप्ति बतलाता हूँ। ग्राम्य अन्नसे तथा जंगली कन्द, मूल, फल आदिसे एक मासतक पितरोंकी तृप्ति बनी रहती है और गायके दूध एवं खीरसे एक वर्षतक पितरोंकी तृप्ति रहती है तथा वर्षा ऋतुमें त्रयोदशीको विशेषतः मघा-नक्षत्रमें किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है।$^१$ मन्त्रका पाठ करनेवाला, अग्निहोत्री, शाखाका अध्ययन करनेवाला, छहों अङ्गोंका विद्वान्, त्रिणाचिकेत$^२$, त्रिमधु$^३$, धर्मद्रोणका$^४$ पाठ करनेवाला, त्रिसुपर्ण$^५$ तथा बृहत् सामका ज्ञाता—ये ब्राह्मण पंक्तिपावन (पंक्तिको पवित्र करनेवाले) माने गये हैं॥ ४५—४७॥
अब काम्य श्राद्धकल्पका वर्णन करूँगा। प्रतिपदाको श्राद्ध करनेसे बहुत धन प्राप्त होता है। द्वितीयाको श्राद्ध करनेसे श्रेष्ठ स्त्री मिलती है। चतुर्थीको किया हुआ श्राद्ध धर्म और कामको देनेवाला है। पुत्रकी इच्छावाला पुरुष पञ्चमीको श्राद्ध करे। षष्ठीके श्राद्धसे मनुष्य श्रेष्ठ होता है। सप्तमीके श्राद्धसे खेतीमें लाभ होता और अष्टमीके श्राद्धसे अर्थकी प्राप्ति होती है। नवमीको श्राद्धका अनुष्ठान करनेसे एक खुरवाले घोड़े आदि पशु प्राप्त होते हैं। दशमीके श्राद्धसे गो-समुदायकी उपलब्धि होती है। एकादशीके श्राद्धसे परिवार और द्वादशीके श्राद्धसे धन-धान्य बढ़ता है। त्रयोदशीको श्राद्ध करनेसे अपनी जातिमें श्रेष्ठता प्राप्त होती है। चतुर्दशीको उसीका श्राद्ध किया जाता है, जिसका शस्त्रद्वारा वध हुआ है। अमावास्याको सम्पूर्ण मृत व्यक्तियोंके लिये श्राद्ध करनेका विधान है॥ ४८—५१॥
'जो दशार्णदेशके वनमें सात व्याध थे, वे कालंजर गिरिपर मृग हुए, शरद्वीपमें चक्रवाक हुए तथा मानस सरोवरमें हंस हुए। वे ही अब कुरुक्षेत्रमें वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण हुए हैं। अब उन्होंने दूरतकका मार्ग तय कर लिया है; तुमलोग उनसे बहुत पीछे रहकर कष्ट पा रहे
१. कुछ लोग श्राद्धमें मांसका भी विधान मानते हैं, परंतु श्राद्धकर्ममें मांस कितना निन्दनीय है, यह श्रीमद्भागवत, सप्तम स्कन्ध, अध्याय १५ के इन श्लोकोंसे स्पष्ट हो जाता है—
न दद्यादामिषं श्राद्धे न चाद्याद्धर्मतत्त्ववित् । मुन्यन्नैः स्यात्परा प्रीतिर्यथा न पशुहिंसया ॥ नैतादृशः परो धर्मो नृणां सद्धर्ममिच्छताम् । न्यासो दण्डस्य भूतेषु मनोवाक्कायजस्य यः ॥ द्रव्ययज्ञैर्यक्ष्यमाणं दृष्ट्वा भूतानि बिभ्यति । एष माकरुणो हन्यादतज्ज्ञो ह्यसुतृब् ध्रुवम् ॥ (७-८, १०)
"धर्मके मर्मको समझनेवाला पुरुष श्राद्धमें (खानेके लिये) मांस न दे और न स्वयं ही खाय; क्योंकि पितृगणकी तृप्ति जैसी मुनिजनोचित आहारसे होती है, वैसी पशुहिंसासे नहीं होती। सद्धर्मकी इच्छावाले पुरुषोंके लिये 'सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति मन, वाणी और शरीरसे दण्डका त्याग कर देना'—इसके समान और कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है। पुरुषको द्रव्ययज्ञसे यजन करते देखकर जीव डरते हैं कि 'यह अपने ही प्राणोंका पोषण करनेवाला निर्दय अज्ञानी मुझे अवश्य मार डालेगा।' अतएव श्राद्धकर्ममें मांसका उपयोग कभी नहीं करना चाहिये।
२. द्वितीय कठके अन्तर्गत 'अयं वाव यः पवते' इत्यादि 'त्रिणाचिकेत' नामक तीन अनुवाकोंको पढ़ने या उसका अनुष्ठान करनेवाला। ३. 'मधुवाता०' इत्यादि तीन ऋचाओंका अध्ययन और मधुव्रतका आचरण करनेवाला। ४. 'धर्मव्याधा दशार्णेषु' इत्यादि प्रसंगका नाम यहाँ 'धर्मद्रोण' कहा गया है। ५. 'ब्रह्म मेतु माम्' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और तत्सम्बन्धी व्रत करनेवाला।
२५४ * अग्निपुराण *
हो।'* श्राद्ध आदिके अवसरपर इसका पाठ करनेसे श्राद्ध पूर्ण एवं ब्रह्मलोक देनेवाला होता है। यदि पितामह जीवित हो तो पुत्र आदि अपने पिताका तथा पितामहके पिता और उनके भी पिताका श्राद्ध करे। यदि प्रपितामह जीवित हो तो पिता, पितामह एवं वृद्धप्रपितामहका श्राद्ध करे। इसी प्रकार माता आदि तथा मातामह आदिके श्राद्धमें भी करना चाहिये। जो इस श्राद्धकल्पका पाठ करता है, उसे श्राद्ध करनेका फल मिलता है॥५२—५६॥
उत्तम तीर्थमें, युगादि और मन्वादि तिथिमें किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है। आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिककी द्वादशी, माघ तथा भाद्रपदकी तृतीया, फाल्गुनकी अमावास्या, पौष शुक्ला एकादशी, आषाढ़की दशमी, माघमासकी सप्तमी, श्रावण कृष्णपक्षकी अष्टमी, आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन तथा ज्येष्ठकी पूर्णिमा—ये तिथियाँ स्वायम्भुव आदि मनुसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं। इनके आदिभागमें किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है। गया, प्रयाग, गङ्गा, कुरुक्षेत्र, नर्मदा, श्रीपर्वत, प्रभास, शालग्रामतीर्थ (गण्डकी), काशी, गोदावरी तथा श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र आदि तीर्थोंमें श्राद्ध उत्तम होता है॥५७-६२॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'श्राद्ध-कल्पका वर्णन' नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥११७॥ ~~
एक सौ अठारहवाँ अध्याय भारतवर्षका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— समुद्रके उत्तर और हिमालयके दक्षिण जो वर्ष है, उसका नाम 'भारत' है। उसका विस्तार नौ हजार योजन है। स्वर्ग तथा अपवर्ग पानेकी इच्छावाले पुरुषोंके लिये यह कर्मभूमि है। महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, हिमालय, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात यहाँके कुल-पर्वत हैं। इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गान्धर्व और वारुण—ये आठ द्वीप हैं। समुद्रसे घिरा हुआ भारत नवाँ द्वीप है॥१-४॥
भारतद्वीप उत्तरसे दक्षिणकी ओर हजारों योजन लंबा है। भारतके उपर्युक्त नौ भाग हैं। भारतकी स्थिति मध्यमें है। इसमें पूर्वकी ओर किरात और (पश्चिममें) यवन रहते हैं। मध्यभागमें ब्राह्मण आदि वर्णोंका निवास है। वेद-स्मृति आदि नदियाँ पारियात्र पर्वतसे निकली हैं। विन्ध्याचलसे नर्मदा आदि प्रकट हुई हैं। सह्य पर्वतसे तापी, पयोष्णी, गोदावरी, भीमरथी और कृष्णवेणा आदि नदियोंका प्रादुर्भाव हुआ है॥५—७॥
मलयसे कृतमाला आदि और महेन्द्र पर्वतसे त्रिसामा आदि नदियाँ निकली हैं। शुक्तिमान्से कुमारी आदि और हिमालयसे चन्द्रभागा आदिका प्रादुर्भाव हुआ है। भारतके पश्चिमभागमें कुरु, पाञ्चाल और मध्यदेश आदिकी स्थिति है॥८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'भारतवर्षका वर्णन' नामक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥११८॥
* सप्तव्याधा दशारण्ये मृगाः कालञ्जरे गिरौ। चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे॥
तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः। प्रस्थिता दूरमध्वानं यूयं तेभ्योऽवसीदत॥
(अग्नि पु० ११७।५६-५७)
- अध्याय ११९ * २५५
एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय
जम्बू आदि महाद्वीपों तथा समस्त भूमिके विस्तारका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—जम्बूद्वीपका विस्तार एक लाख योजन है। वह सब ओरसे एक लाख योजन विस्तृत खारे पानीके समुद्रसे घिरा है। उस क्षारसमुद्रको घेरकर प्लक्षद्वीप स्थित है। मेधातिथिके सात पुत्र प्लक्षद्वीपके स्वामी हैं। शान्तभय, शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेम तथा ध्रुव—ये सात ही मेधातिथिके पुत्र हैं; उन्हींके नामसे उक्त सात वर्ष हैं। गोमेध, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना और शैल—ये उन वर्षोंके सुन्दर मर्यादापर्वत हैं। वहाँके सुन्दर निवासी 'वैभ्राज' नामसे विख्यात हैं। इस द्वीपमें सात प्रधान नदियाँ हैं। प्लक्षसे लेकर शाकद्वीपतकके लोगोंकी आयु पाँच हजार वर्ष है। वहाँ वर्णाश्रम-धर्मका पालन किया जाता है॥ १-५॥
आर्य, कुरु, विविंश तथा भावी—यही वहाँके ब्राह्मण आदि वर्णोंकी संज्ञाएँ हैं। चन्द्रमा उनके आराध्यदेव हैं। प्लक्षद्वीपका विस्तार दो लाख योजन है। वह उतने ही बड़े इक्षुरसके समुद्रसे घिरा है। उसके बाद शाल्मलद्वीप है, जो प्लक्षद्वीपसे दुगुना बड़ा है। वपुष्मान्के सात पुत्र शाल्मलद्वीपके स्वामी हुए। उनके नाम हैं—श्वेत, हरित, जीमूत, लोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ। इन्हीं नामोंसे वहाँके सात वर्ष हैं। वह प्लक्षद्वीपसे दुगुना है तथा उससे दुगुने परिमाणवाले 'सुरोद' नामक (मदिराके) समुद्रसे घिरा हुआ है। कुमुद, अनल, बलाहक, द्रोण, कङ्क, महिष और ककुद्मान्—ये मर्यादापर्वत हैं। सात ही वहाँ प्रधान नदियाँ हैं। कपिल, अरुण, पीत और कृष्ण—ये वहाँके ब्राह्मण आदि वर्ण हैं। वहाँके लोग वायु-देवताकी पूजा करते हैं। वह मदिराके समुद्रसे घिरा है॥ ६—१० $\frac{१}{२}$ ॥
इसके बाद कुशद्वीप है। ज्योतिष्मान्के पुत्र उस द्वीपके अधीश्वर हैं। उद्भिद, धेनुमान्, द्वैरथ, लम्बन, धैर्य, कपिल और प्रभाकर—ये सात उनके नाम हैं। इन्हींके नामपर वहाँ सात वर्ष हैं। दमी$^१$ आदि वहाँके ब्राह्मण हैं, जो ब्रह्मरूपधारी भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं। विद्रुम, हेमशैल, द्युतिमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि और मन्दराचल—ये सात वहाँ के वर्षपर्वत हैं। यह कुशद्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले घीके समुद्रसे घिरा हुआ है और वह घृतसमुद्र क्रौञ्चद्वीपसे परिवेष्टित है। राजा द्युतिमान्के पुत्र क्रौञ्चद्वीपके स्वामी हैं। उन्हींके नामपर वहाँके वर्ष प्रसिद्ध हैं॥ ११—१४॥
कुशल, मनोनुग, उष्ण, प्रधान, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि—ये सात द्युतिमान्के पुत्र हैं। उस द्वीपके मर्यादापर्वत और नदियाँ भी सात ही हैं। पर्वतोंके नाम इस प्रकार हैं—क्रौञ्च, वामन, अन्धकारक, रत्नशैल$^२$, देवावृत, पुण्डरीक और दुन्दुभि। ये द्वीप परस्पर उत्तरोत्तर दुगुने विस्तारवाले हैं। उन द्वीपोंमें जो वर्ष पर्वत हैं, वे भी द्वीपोंके समान ही पूर्ववर्ती द्वीपके पर्वतोंसे दुगुने विस्तारवाले हैं। वहाँके ब्राह्मण आदि वर्ण क्रमशः पुष्कर, पुष्कल, धन्य और तिष्य—इन नामोंसे प्रसिद्ध हैं। वे वहाँ श्रीहरिकी आराधना करते हैं। क्रौञ्चद्वीप दधिमण्डोदक (मट्ठे)-के समुद्रसे घिरा हुआ है और वह समुद्र शाकद्वीपसे परिवेष्टित है। वहाँके राजा भव्यके जो सात पुत्र हैं, वे ही शाकद्वीपके शासक हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—जलद, कुमार, सुकुमार, मणीवक, कुशोत्तर, मोदाकी और द्रुम। इन्हींके नामसे वहाँके वर्ष
१. दमी, शुषुमी, स्नेह और मन्दे—ये क्रमशः वहाँके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंकी संज्ञाएँ हैं।
२. यहाँ मूलमें छः नाम ही आये हैं, तथापि पुराणान्तरमें आये हुए 'चतुर्थो रत्नशैलश्च' के अनुसार अर्थमें रत्नशैल बढ़ा दिया गया है।
२५६ * अग्निपुराण *
प्रसिद्ध हैं॥ १५-१९॥
उदयगिरि, जलधर, रैवत, श्याम, कोद्रक, आम्बिकेय और सुरम्य पर्वत केसरी—ये सात वहाँके मर्यादापर्वत हैं तथा सात ही वहाँकी प्रसिद्ध नदियाँ हैं$^१$। मग, मगध, मानस्य और मन्दग—ये वहाँके ब्राह्मण आदि वर्ण हैं, जो सूर्यरूपधारी भगवान् नारायणकी आराधना करते हैं। शाकद्वीप क्षीरसागरसे घिरा हुआ है। क्षीरसागर पुष्करद्वीपसे परिवेष्टित है। वहाँके अधिकारी राजा सवनके दो पुत्र हुए, जिनके नाम थे—महावीत और धातकि। उन्हींके नामसे वहाँके दो वर्ष प्रसिद्ध हैं॥ २०-२२॥
वहाँ एक ही मानसोत्तर नामक वर्षपर्वत विद्यमान है, जो उस वर्षके मध्यभागमें वलयाकार स्थित है। उसका विस्तार कई सहस्र योजन है$^२$। ऊँचाई भी विस्तारके समान ही है। वहाँके लोग दस हजार वर्षोंतक जीवन धारण करते हैं। वहाँ देवता लोग ब्रह्माजीकी पूजा करते हैं। पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले समुद्रसे घिरा हुआ है। उस समुद्रका विस्तार उस द्वीपके समान ही है। महामुने! समुद्रोंमें जो जल है, वह कभी घटता-बढ़ता नहीं है। शुक्ल और कृष्ण—दोनों पक्षोंमें चन्द्रमाके उदय और अस्तकालमें केवल पाँच सौ दस अङ्गुलतक समुद्रके जलका घटना और बढ़ना देखा जाता है (परंतु इससे जलमें न्यूनता या अधिकता नहीं होती है)॥ २३-२६॥
मीठे जलवाले समुद्रके चारों ओर उससे दुगुने परिमाणवाली भूमि सुवर्णमयी है, किंतु वहाँ कोई भी जीव-जन्तु नहीं रहते हैं। उसके बाद लोकालोकपर्वत है, जिसका विस्तार दस हजार योजन है। लोकालोकपर्वत एक ओरसे अन्धकारद्वारा आवृत है और वह अन्धकार अण्डकटाहसे आवृत है। अण्डकटाहसहित सारी भूमिका विस्तार पचास करोड़ योजन है॥ २७-२८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'महाद्वीप आदिका वर्णन' नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११९॥
एक सौ बीसवाँ अध्याय
भुवनकोश-वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! भूमिका विस्तार सत्तर हजार योजन बताया गया है। उसकी ऊँचाई दस हजार योजन है। पृथ्वीके भीतर सात पाताल हैं। एक-एक पाताल दस-दस हजार योजन विस्तृत है। सात पातालोंके नाम इस प्रकार हैं—अतल, वितल, नितल, प्रकाशमान महातल, सुतल, तलातल और सातवाँ रसातल या पाताल। इन पातालोंकी भूमियाँ क्रमशः काली, पीली, लाल, सफेद, कँकरीली, पथरीली और सुवर्णमयी हैं। वे सभी पाताल बड़े रमणीय हैं। उनमें दैत्य और दानव आदि सुखपूर्वक निवास करते हैं। समस्त पातालोंके नीचे शेषनाग विराजमान हैं, जो भगवान् विष्णुके तमोगुण-प्रधान विग्रह हैं। उनमें अनन्त गुण हैं, इसीलिये उन्हें 'अनन्त' भी कहते हैं। वे अपने मस्तकपर इस पृथ्वीको धारण करते हैं॥ १-४॥
पृथ्वीके नीचे अनेक नरक हैं, परंतु जो भगवान् विष्णुका भक्त है, वह उन नरकोंमें नहीं पड़ता है। सूर्यदेवसे प्रकाशित होनेवाली पृथ्वीका जितना विस्तार है, उतना ही नभोलोक (अन्तरिक्ष या भुवर्लोक)—का विस्तार माना गया है। वसिष्ठ! पृथ्वीसे एक लाख योजन दूर सूर्यमण्डल है।
१. पुराणान्तरमें इन नदियोंके नाम इस प्रकार मिलते हैं—सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, धेनुका, इक्षु, वेणुका और गभस्ति।
२. विष्णुपुराणमें इसकी ऊँचाई और विस्तार—दोनों ही पचास हजार योजन बताये गये हैं। देखिये विष्णुपुराण २।४।७६।