अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४६२ * अग्निपुराण *
जब विजिगीषु और शत्रु—दोनों एक-दूसरेकी शक्तिका विघात न कर सकनेके कारण आक्रमण न करके बैठ रहें तो इसे ‘आसन’ कहा जाता है; इसके भी ‘यान’की ही भाँति पाँच भेद होते हैं—१. विगृह्य आसन, २. संधाय आसन, ३. सम्भूय आसन, ४. प्रसङ्गासन तथा ५. उपेक्षासन* ॥ २७$\frac{१}{२}$ ॥
दो बलवान् शत्रुओंके बीचमें पड़कर वाणीद्वारा दोनोंको ही आत्मसमर्पण करे—‘मैं और मेरा! राज्य दोनोंके ही हैं’, यह संदेश दोनोंके ही पास गुप्तरूपसे भेजे और स्वयं दुर्गमें छिपा रहे। यह ‘द्वैधीभाव’की नीति है। जब उक्त दोनों शत्रु पहलेसे ही संगठित होकर आक्रमण करते हों, तब जो उनमें अधिक बलशाली हो, उसकी शरण ले। यदि वे दोनों शत्रु परस्पर मन्त्रणा करके उसके साथ किसी भी शर्तपर संधि न करना चाहते हों, तब विजिगीषु उन दोनोंके ही किसी शत्रु का आश्रय ले अथवा किसी भी अधिक शक्तिशाली राजाकी शरण लेकर आत्मरक्षा करे ॥ २८–३० ॥
यदि विजिगीषुपर किसी बलवान् शत्रु का आक्रमण हो और वह उच्छिन्न होने लगे तथा किसी उपायसे उस संकटका निवारण करना उसके लिये असम्भव हो जाय, तब वह किसी कुलीन, सत्यवादी, सदाचारी तथा शत्रु की अपेक्षा अधिक बलशाली राजाकी शरण ले। उस आश्रयदाताके दर्शनके लिये उसकी आराधना करना, सदा उसके अभिप्रायके अनुकूल चलना, उसीके लिये कार्य करना और सदा उसके प्रति आदरका भाव रखना—यह आश्रय लेनेवालेका व्यवहार बतलाया गया है ॥ ३१-३२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘षाड्गुण्यकथन’ नामक दो सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४० ॥
* जब शत्रु और विजिगीषु परस्पर आक्रमण करके कारणवशात् युद्ध बंद करके बैठ जायँ तो इसे ‘विगृह्यासन’ कहते हैं। यह एक प्रकार है। विजिगीषु शत्रु के किसी प्रदेशको क्षति पहुँचाकर जब स्वतः युद्धसे विरत होकर बैठ जाता है, तब यह भी ‘विगृह्यासन’ कहलाता है।
यदि शत्रु दुर्गके भीतर स्थित होनेके कारण पकड़ा न जा सके, तो उसके आसार (मित्रवर्ग) तथा बीज (अनाजकी फसल आदि)-को नष्ट करके उसके साथ विग्रह छोड़कर बैठ रहे। दीर्घकालतक ऐसा करनेसे प्रजा आदि प्रकृतियाँ उस शत्रु राजासे विरक्त हो जाती हैं। अतः समयानुसार वह वशीभूत हो जाता है। शत्रु और विजिगीषु समान बलशाली होनेके कारण युद्ध छिड़नेपर जब समानरूपसे क्षीण होने लगें, तब परस्पर संधि करके बैठ जायँ। यह ‘संधाय आसन’ कहलाता है। पूर्वकालमें निवातकवचोंके साथ जब दिग्विजयी रावणका युद्ध होने लगा, तब दोनों पक्ष ब्रह्माजीके वरदानसे शक्तिशाली होनेके कारण एक-दूसरेको परास्त न कर सके। उस दशामें ब्रह्माजीको ही बीचमें डालकर रावण संधि करके बैठ रहा। यह ‘संधाय आसन’ का उदाहरण है।
विजिगीषु और उसके शत्रु को उदासीन और मध्यमसे आक्रमणकी समानरूपसे शङ्का हो, तब उन दोनोंको मिल जाना चाहिये। इस प्रकार मिलकर बैठना ‘सम्भूय आसन’ कहलाता है। जब मध्यम और उदासीनमेंसे कोई-सा भी विजिगीषु और उसके शत्रु—दोनोंका विनाश करना चाहता हो, तब वह उन दोनोंका शत्रु समझा जाता है; उस दशामें विजिगीषु अपने शत्रु के साथ मिलकर दोनोंके ही अधिक बलवान् शत्रुभूत उस मध्यम या उदासीनका सामना करें। यही ‘सम्भूय आसन’ है।
यदि विजिगीषु किसी अन्य शत्रु पर आक्रमणकी इच्छा रखता हो; किंतु कार्यान्तर (अर्थलाभ या अनर्थ-प्रतिकार)-के प्रसङ्गसे अन्यत्र बैठे रहे तो इसे ‘प्रसङ्गासन’ कहते हैं।
अधिक शक्तिशाली शत्रु की उपेक्षा करके अपने स्थानपर बैठे रहना ‘उपेक्षासन’ कहलाता है। भगवान् श्रीकृष्णने जब पारिजातहरण किया था, उस समय उन्हें अधिक शक्तिशाली जानकर इन्द्रदेव उपेक्षा करके बैठ रहे, यह उपेक्षासनका उदाहरण है। इसका एक दूसरा उदाहरण रुक्मी है। महाभारत-युद्धमें वह क्रथ और कैशिकोंकी सेना लेकर बारी-बारीसे कौरवों और पाण्डवोंके पास गया और बोला, ‘यदि तुम डरे हुए हो तो हम तुम्हारी सहायता करके तुम्हें विजय दिलायें।’ उसकी इस बातपर दोनोंने उसकी उपेक्षा कर दी। अतः वह किसी ओरसे युद्ध न करके अपने घरपर ही बैठा रहा।
* अध्याय २४१ * ४६३
दो सौ इकतालीसवाँ अध्याय
मन्त्रविकल्प
श्रीराम कहते हैं— 'लक्ष्मण! प्रभावशक्ति और उत्साह-शक्तिसे मन्त्रशक्ति श्रेष्ठ बतायी गयी है। प्रभाव और उत्साहसे सम्पन्न शुक्राचार्यको देवपुरोहित बृहस्पतिने मन्त्र-बलसे जीत लिया॥ १॥
जो विश्वसनीय होनेके साथ-ही-साथ नीतिशास्त्रका विद्वान् हो, उसीके साथ राजा अपने कर्तव्यके विषयमें मन्त्रणा करे। (जो विश्वसनीय होनेपर भी मूर्ख हो तथा विद्वान् होनेपर भी अविश्वसनीय हो, ऐसे मन्त्रीको त्याग दे। कौन कार्य किया जा सकता है और कौन अशक्य है, इसका स्वच्छ बुद्धिसे विवेचन करे।) जो अशक्य कार्यका आरम्भ करते हैं, उन्हें क्लेश उठानेके सिवा कोई फल कैसे प्राप्त हो सकता है?॥ २-३॥
अविज्ञात (परोक्ष)-का ज्ञान, विज्ञातका निश्चय, कर्तव्यके विषयमें दुविधा उत्पन्न होनेपर संशयका उच्छेद (समाधान) तथा शेष (अन्तिम निश्चित कर्तव्य)-की उपलब्धि—ये सब मन्त्रियोंके ही अधीन हैं। सहायक, कार्यसाधनके उपाय, देश और कालका विभाग, विपत्तिका निवारण तथा कर्तव्यकी सिद्धि—ये मन्त्रियोंकी मन्त्रणाके पाँच अङ्ग हैं॥ ४॥
मनकी प्रसन्नता, श्रद्धा (कार्यसिद्धिके विषयमें दृढ़ विश्वास), ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियोंकी स्वविषयक व्यापारमें क्षमता, सहाय-सम्पत्ति (सहायकोंका बाहुल्य अथवा सत्त्वादि गुणोंका योग) तथा उत्थान-सम्पत्ति (शीघ्रतापूर्वक उत्थान करनेका स्वभाव)—ये मन्त्रद्वारा निश्चित करके आरम्भ किये जानेवाले कर्मोंकी सिद्धिके लक्षण हैं॥ ५॥
मद (मदिरा आदिका नशा), प्रमाद (कार्यान्तरके प्रसङ्गसे असावधानी), काम (कामभावनासे प्रेरित होकर स्त्रियोंपर विश्वास), स्वप्नावस्थामें किये गये प्रलाप, खंभे आदिकी ओटमें लुके-छिपे लोग, पार्श्ववर्तिनी कामिनियाँ तथा उपेक्षित प्राणी (तोता, मैना, बालक, बहरे आदि)—ये मन्त्रका भेदन करनेमें कारण बनते हैं॥ ६॥
सभामें निर्भीक बोलनेवाला, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न, प्रवचन-कुशल, शस्त्र और शास्त्रमें परिनिष्ठित तथा दूतोचित कर्मके अभ्याससे सम्पन्न पुरुष राजदूत होनेके योग्य होता है। निसृष्टार्थ (जिसपर संधि-विग्रह आदि कार्यको इच्छानुसार करनेका पूरा भार सौंपा गया हो, वह), मितार्थ (जिसे परिमित कार्य-भार दिया गया हो, यथा—इतना ही करना या इतना ही बोलना चाहिये), तथा शासनहारक (लिखित आदेशको पहुँचानेवाला)—ये दूतके तीन भेद कहे गये हैं॥ ७-८॥
दूत अपने आगमनकी सूचना दिये बिना शत्रुके दुर्ग तथा संसद्में प्रवेश न करे (अन्यथा वह संदेहका पात्र बन जाता है)। वह कार्यसिद्धिके लिये समयकी प्रतीक्षा करे तथा शत्रु राजाकी आज्ञा लेकर वहाँसे विदा हो। उसे शत्रुके छिद्र (दुर्बलता)-की जानकारी प्राप्त करनी चाहिये। उसके कोष, मित्र और सेनाके विषयमें भी वह जाने तथा शत्रुके दृष्टि एवं शरीरकी चेष्टाओंसे अपने प्रति राग और विरक्तिका भी अनुमान कर लेना चाहिये॥ ९-१०॥
वह उभय पक्षोंके कुलकी (यथा—'आप उदितोदित कुलके रत्न हैं' आदि), नामकी (यथा—'आपका नाम दिग्दिगन्तमें विख्यात है' इत्यादि), द्रव्यकी (यथा—'आपका द्रव्य परोपकारमें लगता है' इत्यादि) तथा श्रेष्ठ कर्मकी (यथा—'आपके सत्कर्मकी श्रेष्ठ लोग भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं' आदि कहकर) बड़ाई करे। इस तरह चतुर्विध स्तुति करनी चाहिये। तपस्वीके वेषमें रहनेवाले
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अपने चरोंके साथ संवाद करे। अर्थात् उनसे बात करके यथार्थ स्थितिको जाननेकी चेष्टा करे॥ ११॥
चर दो प्रकारके होते हैं—प्रकाश (प्रकट) और अप्रकाश (गुप्त)। इनमें जो प्रकाश है, उसकी 'दूत' संज्ञा है और अप्रकाश 'चर' कहा गया है। वणिक् (वैदेहक), किसान (गृहपति), लिङ्गी (मुण्डित या जटाधारी तपस्वी), भिक्षुक (उदास्थित), अध्यापक (छात्रवृत्तिसे रहनेवाला—कार्पटिक)—इन चारोंकी स्थितिके लिये संस्थाएँ हैं। इनके लिये वृत्ति (जीविका)-की व्यवस्था की जानी चाहिये, जिससे ये सुखसे रह सकें १॥ १२॥
जब दूतकी चेष्टा विफल हो जाय तथा शत्रु व्यसनग्रस्त हो, तब उसपर चढ़ाई करे॥ १२ १/२॥
जिससे अपनी प्रकृतियाँ व्यसनग्रस्त हो गयी हों, उस कारणको शान्त करके विजिगीषु शत्रुपर चढ़ाई करे। व्यसन दो प्रकारके होते हैं—मानुष और दैव। अनय और अपनय दोनोंके संयोगसे प्रकृति-व्यसन प्राप्त होता है। अथवा केवल दैवसे भी उसकी प्राप्ति होती है। वह श्रेय (अभीष्ट अर्थ)-को व्यस्त (क्षिप्त या नष्ट) कर देता है, इसलिये 'व्यसन' कहलाता है। अग्नि (आग लगना), जल (अतिवृष्टि या बाढ़), रोग, दुर्भिक्ष (अकाल पड़ना) और मरक (महामारी)—ये पाँच प्रकारके 'दैव-व्यसन' हैं। शेष 'मानुष-व्यसन' हैं। पुरुषार्थ अथवा अथर्ववेदोक्त शान्तिकर्मसे दैव-व्यसनका निवारण करे। उत्थान-शीलता (दुर्गादि-निर्माणविषयक चेष्टा) अथवा नीति—संधि या साम आदिके प्रयोगके द्वारा मानुष-व्यसनकी शान्ति करे॥ १३—१५ १/२॥
मन्त्र (कार्यका निश्चय), मन्त्रफलकी प्राप्ति, कार्यका अनुष्ठान, भावी उन्नतिका सम्पादन, आय-व्यय, दण्डनीति, शत्रुंका निवारण तथा व्यसनको टालनेका उपाय, राजा एवं राज्यकी रक्षा—ये सब अमात्यके कर्म हैं। यदि अमात्य व्यसनग्रस्त हो तो वह इन सब कर्मोंको नष्ट कर देता है २ ॥ १६—१७ १/२॥
सुवर्ण, धान्य, वस्त्र, वाहन तथा अन्यान्य द्रव्योंका संग्रह जनपदवासिनी प्रजाके कर्म हैं। यदि प्रजा व्यसनग्रस्त हो तो वह उपर्युक्त सब कार्योंका नाश कर डालती है॥ १८ १/२॥
आपत्कालमें प्रजाजनोंकी रक्षा, कोष और सेनाकी रक्षा, गुप्त या आकस्मिक युद्ध, आपत्तिग्रस्त जनोंकी रक्षा, संकटमें पड़े हुए मित्रों और अमित्रोंका संग्रह तथा सामन्तों और वनवासियोंसे प्राप्त होनेवाली बाधाओंका निवारण भी दुर्गका आश्रय लेनेसे होता है। नगरके नागरिक भी शरण लेनेके लिये दुर्गपतियोंका कोष आदिके द्वारा उपकार करते हैं। (यदि दुर्ग विपत्तिग्रस्त हो जाय तो ये सब कार्य विपन्न हो जाते हैं।)॥ १९—२० १/२॥
भृत्यों (सैनिक आदि)-का भरण-पोषण, दानकर्म, भूषण, हाथी-घोड़े आदिका खरीदना, स्थिरता, शत्रुपक्षकी लुब्ध प्रकृतियोंमें धन देकर फूट डालना, दुर्गका संस्कार (मरम्मत और सजावट), सेतुबन्ध (खेतीके लिये जलसंचय करनेके निमित्त बाँध आदिका निर्माण), वाणिज्य, प्रजा और मित्रोंका संग्रह, धर्म, अर्थ एवं कामकी सिद्धि—ये सब कार्य कोषसे सम्पादित होते हैं। कोषसम्बन्धी व्यसनसे राजा इन सबका नाश कर देता है; क्योंकि राजाका मूल है—कोष॥ २१—२२॥
मित्र, अमित्र (अपकारकी इच्छावाले शत्रु),
१. यहाँ कोष्ठमें दिये गये 'वैदेहक' आदि शब्द 'वणिक्' आदि संस्थाओंके चरोंके नामान्तर हैं।
२. इन कर्मोंमें मन्त्र या कार्यका निश्चय मन्त्रीके अधीन है, शत्रुओंको दूरसे ही भगाकर मन्त्रसाध्य फलकी प्राप्ति दूतके अधीन है, कार्यका अनुष्ठान (दुर्गादिकर्मकी प्रवृत्ति) अध्यक्षके अधीन है, आयति अथवा भावी उन्नतिका सम्पादन अमात्योंके अधीन है, आय और व्यय अक्षपटलिक (अर्थमन्त्री)-के अधीन हैं, दण्डनीति धर्मस्थ (न्यायाधिकारी)-के हाथमें है तथा शत्रुओंका निवारण मित्र-साध्य कर्म है—ऐसा विभाग जयमङ्गलाकारने किया है।
- अध्याय २४१ * ४६५
सुवर्ण और भूमिको अपने वशमें करना, शत्रुओंको कुचल डालना, दूरके कार्यको शीघ्र पूरा करा लेना इत्यादि कार्य दण्ड (सेना)-द्वारा साध्य हैं। उसपर संकट आनेसे ये सब कार्य बिगड़ जाते हैं॥ २३॥
‘मित्र’ विजिगीषुके विचलित होनेवाले मित्रोंको रोकता है—उनमें सुस्थिर स्नेह पैदा करता है, उसके शत्रुओंका नाश करता है तथा धन आदिसे विजिगीषुका उपकार करता है। ये सब मित्रसे सिद्ध होनेवाले कार्य हैं। मित्रके व्यसनग्रस्त होनेपर ये कार्य नष्ट होते हैं॥ २४॥
यदि राजा व्यसनी हो तो समस्त राजकार्योंको नष्ट कर देता है। कठोर वचन बोलकर दूसरोंको दुःख पहुँचाना, अत्यन्त कठोर दण्ड देना, अर्थदूषण (वाणीद्वारा पहलेकी दी हुई वस्तुको न देना, दी हुईको छीन लेना, चोरी आदिके द्वारा धनका नाश होना तथा प्राप्त हुए धनको त्याग देना),* मदिरापान, स्त्रीविषयक आसक्ति, शिकार खेलनेमें अधिक तत्पर रहना और जूआ खेलना—ये राजाके व्यसन हैं॥ २५$\frac{१}{२}$॥
आलस्य (उद्योगशून्यता), स्तब्धता (बड़ोंके सामने उद्धण्डता या मान-प्रदर्शन), दर्प (शौर्यादिका अहंकार), प्रमाद (असावधानी), बिना कारण वैर बाँधना—ये तथा पूर्वोक्त कठोर वचन बोलना आदि राजव्यसन सचिवके लिये दुर्व्यसन बताये गये हैं॥ २६ $\frac{१}{२}$॥
अनावृष्टि (और अतिवृष्टि) तथा रोगजनित पीड़ा आदि राष्ट्रके लिये व्यसन कहे गये हैं। यन्त्र (शतघ्नी आदि), प्राकार (चहारदीवारी) तथा परिखा (खाई)-का नष्ट-भ्रष्ट हो जाना, अस्त्र-शस्त्रोंका अभाव हो जाना तथा घास, ईंधन एवं अन्नका क्षीण हो जाना दुर्गके लिये व्यसन बताया गया है॥ २७-२८॥
असद्व्यय किंवा अपव्ययके द्वारा जिसे खर्च कर दिया गया हो, जिसे मण्डलके अनेक स्थानोंमें थोड़ा-थोड़ा करके बाँट दिया गया हो, रक्षक आदिने जिसका भक्षण कर लिया हो, जिसे संचय करके रखा नहीं गया हो, जिसे चोर आदिने चुरा लिया हो तथा जो दूरवर्ती स्थानमें रखा गया हो, ऐसा कोष व्यसनग्रस्त बताया जाता है॥ २९॥
जो चारों ओरसे अवरुद्ध कर दी गयी हो, जिसपर घेरा पड़ गया हो, जिसका अनादर या असम्मान हुआ हो, जिसका ठीक-ठीक भरण-पोषण नहीं किया गया हो, जिसके अधिकांश सैनिक रोगी, थके-माँदे, चलकर दूरसे आये हुए तथा नवागत हों, जो सर्वथा क्षीण और प्रतिहत हो चली हो, जिसके आगे बढ़नेका वेग कुण्ठित कर दिया गया हो, जिसके अधिकांश लोग आशाजनित निर्वेद (खेद एवं विरक्ति)-से भरे हों, जो अयोग्य भूमिमें स्थित, अनृतप्राप्त (अविश्वस्त) हो गयी हो, जिसके भीतर स्त्रियाँ अथवा स्त्रैण हों, जिसके हृदयमें कुछ काँटा-सा चुभ रहा हो तथा जिस सेनाके पीछे दुष्ट पाष्णिग्राह (शत्रु)-की सेना लगी हुई हो, उस सेनाकी इस दुरावस्थाको ‘बलव्यसन’ कहा जाता है॥ ३०-३३॥
जो दैवसे पीड़ित, शत्रुसेनासे आक्रान्त तथा पूर्वोक्त काम, क्रोध आदिसे संयुक्त हो, उस मित्रको व्यसनग्रस्त बताया गया है। उसे उत्साह एवं सहायता दी जाय तो वह शत्रुओंसे युद्धके लिये उद्यत एवं विजयी हो सकता है॥ ३४॥
अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता तथा दण्डविषयक अत्यन्त क्रूरता—ये तीन क्रोधज व्यसन हैं। मृगया, जूआ, मद्यपान तथा स्त्रीसङ्ग—ये चार प्रकारके कामज व्यसन हैं॥ ३५॥
वाणीकी कठोरता लोकमें अत्यन्त उद्वेग पैदा
* पूर्वप्रवृत्त अर्थका उच्छेद होनेसे 'अदान', उसका पण्यागार आदिसे आकर्षण 'आदान', स्वयं उपार्जित धनका अग्नि आदिसे विध्वंस 'विनाश' तथा कहींसे प्राप्त धनके विघातपूर्वक उसका त्याग 'परित्याग' नामक अर्थदूषण है। (जयमङ्गला)
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करनेवाली और अनर्थकारिणी होती है। अर्थहरण, ताड़न और वध—यह तीन प्रकारका दण्ड असिद्ध अर्थका साधक होनेसे सत्पुरुषोंद्वारा 'शासन' कहा गया है। उसको युक्तिसे ही प्राप्त कराये। जो राजा युक्त (उचित) दण्ड देता है, उसकी प्रशंसा की जाती है। जो क्रोधवश कठोर दण्ड देता है, वह राजा प्राणियोंमें उद्वेग पैदा करता है। उस दण्डसे उद्विग्न हुए मनुष्य विजिगीषुके शत्रुओंकी शरणमें चले जाते हैं, उनसे वृद्धिको प्राप्त हुए शत्रु उक्त राजाके विनाशमें कारण होते हैं॥ ३६-३७$\frac{१}{२}$॥
दूषणीय मनुष्यके दूषण (अपकार)-के लिये उससे प्राप्त होनेवाले किसी महान् अर्थका विघातपूर्वक परित्याग नीति-तत्त्वज्ञ विद्वानोंद्वारा 'अर्थदूषण' कहा जाता है॥ ३८$\frac{१}{२}$॥
दौड़ते हुए यान (अश्व आदि)-से गिरना, भूख-प्यासका कष्ट उठाना आदि दोष मृगयासे प्राप्त होते हैं। किसी छिपे हुए शत्रुसे मारे जानेकी भी सम्भावना रहती है। श्रम या थकावटपर विजय पानेके लिये किसी सुरक्षित वनमें राजा शिकार खेले॥ ३९$\frac{१}{२}$॥
जूएमें धर्म, अर्थ और प्राणोंके नाश आदि दोष होते हैं; उसमें कलह आदिकी भी सम्भावना रहती है। स्त्रीसम्बन्धी व्यसनसे प्रत्येक कर्तव्य-कार्यके करनेमें बहुत अधिक विलम्ब होता है—ठीक समयसे कोई काम नहीं हो पाता तथा धर्म और अर्थको भी हानि पहुँचती है। मद्यपानके व्यसनसे प्राणोंका नाशतक हो जाता है, नशेके कारण कर्तव्य और अकर्तव्यका निश्चय नहीं हो पाता॥ ४०-४१॥
सेनाकी छावनी कहाँ और कैसे पड़नी चाहिये, इस बातको जो जानता है तथा भले-बुरे निमित्त (शकुन)-का ज्ञान रखता है, वह शत्रुपर विजय पा सकता है। स्कन्धावार (सेनाकी छावनी)-के मध्यभागमें खजानासहित राजाके ठहरनेका स्थान होना चाहिये। राजभवनको चारों ओरसे घेरकर क्रमशः मौल (पिता-पितामहके कालसे चली आती हुई मौलिक सेना), भृत (भोजन और वेतन देकर रखी हुई सेना), श्रेणि (जनपदनिवासियोंका दल अथवा कुविन्द आदिकी सेना), मित्रसेना, द्विषद्वल (राजाकी दण्डशक्तिसे वशीभूत हुए सामन्तोंकी सेना) तथा आटविक (वन्य-प्रदेशके अधिपति की सेना)—इन सेनाओंकी छावनी डाले॥ ४२-४३॥
(राजा और उसके अन्तःपुरकी रक्षाकी सुव्यवस्था करनेके पश्चात्) सेनाका एक चौथाई भाग युद्धसज्जासे सुसज्जित हो सेनापतिको आगे करके प्रयत्नपूर्वक छावनीके बाहर रातभर चक्कर लगाये। वायुके समान वेगशाली घोड़ोंपर बैठे हुए घुड़सवार दूर सीमान्तपर विचरते हुए शत्रु की गतिविधिका पता लगायें। जो भी छावनीके भीतर प्रवेश करें या बाहर निकलें, सब राजाकी आज्ञा प्राप्त करके ही वैसा करें॥ ४४-४५॥
साम, दान, दण्ड, भेद, उपेक्षा, इन्द्रजाल और माया—ये सात उपाय हैं; इनका शत्रुके प्रति प्रयोग करना चाहिये। इन उपायोंसे शत्रु वशीभूत होता है॥ ४६॥
सामके पाँच भेद बताये गये हैं—१. दूसरेके उपकारका वर्णन, २. आपसके सम्बन्धको प्रकट करना (जैसे 'आपकी माता मेरी मौसी हैं' इत्यादि), ३. मधुरवाणीमें गुण-कीर्तन करते हुए बोलना, ४. भावी उन्नतिका प्रकाशन (यथा—'ऐसा होनेपर आगे चलकर हम दोनोंका बड़ा लाभ होगा' इत्यादि) तथा ५. मैं आपका हूँ—यों कहकर आत्मसमर्पण करना॥ ४७$\frac{१}{२}$॥
किसीसे उत्तम (सार), अधम (असार) तथा मध्यम (सारासार) भेदसे जो द्रव्य-सम्पत्ति प्राप्त हुई हो, उसको उसी रूपमें लौटा देना—यह दानका प्रथम भेद है। २. बिना दिये ही जो धन किसीके द्वारा ले लिया गया हो, उसका अनुमोदन
- अध्याय २४१ * \hfill ४६७
करना (यथा—'आपने अच्छा किया जो ले लिया। मैंने पहलेसे ही आपको देनेका विचार कर लिया था')—यह दानका दूसरा भेद है। ३. अपूर्व द्रव्यदान (भाण्डागारसे निकालकर दिया गया नूतन दान), ४. स्वयंग्राहप्रवर्तन (किसी दूसरेसे स्वयं ही धन ले लेनेके लिये प्रेरित करना। यथा—'अमुक व्यक्तिसे अमुक द्रव्य ले लो, वह तुम्हारा ही हो जायगा') तथा ५. दातव्य ऋण आदिको छोड़ देना या न लेना—इस प्रकार ये दानके पाँच भेद कहे गये हैं॥ ४८-४९$\frac{१}{२}$॥
स्नेह और अनुरागको दूर कर देना, परस्पर संघर्ष (कलह) पैदा करना तथा धमकी देना—भेदज्ञ पुरुषोंने भेदके ये तीन प्रकार बताये हैं॥ ५०$\frac{१}{२}$॥
वध, धनका अपहरण और बन्धन एवं ताड़न आदिके द्वारा क्लेश पहुँचाना—ये दण्डके तीन भेद हैं। वधके दो प्रकार हैं—(१) प्रकाश (प्रकट) और (२) अप्रकाश (गुप्त)। जो सब लोगोंके द्वेषपात्र हों, ऐसे दुष्टोंका प्रकटरूपमें वध करना चाहिये; किंतु जिनके मारे जानेसे लोग उद्विग्न हो उठें, जो राजाके प्रिय हों तथा अधिक बलशाली हों, वे यदि राजाके हितमें बाधा पहुँचाते हैं तो उनका गुप्तरूपसे वध करना उत्तम कहा गया है। गुप्तरूपसे वधका प्रयोग यों करना चाहिये—विष देकर, एकान्तमें आग आदि लगाकर, गुप्त मनुष्योंद्वारा शस्त्रका प्रयोग कराकर अथवा शरीरमें फोड़ा पैदा करनेवाले उबटन लगवाकर राज्यके शत्रुको नष्ट करे। जो जातिमात्रसे भी ब्राह्मण हो, उसे प्राणदण्ड न दे। उसपर सामनीतिका प्रयोग करके उसे वशमें लानेकी चेष्टा करे॥ ५१—५३॥
प्रिय वचन बोलना 'साम' कहलाता है। उसका प्रयोग इस तरह करे, जिससे चित्तमें अमृतका-सा लेप होने लगे। अर्थात् वह हृदयमें स्थान बना ले। ऐसी स्निग्ध दृष्टिसे देखे, मानो वह सामनेवालेको प्रेमसे पी जाना चाहता हो तथा इस तरह बात करे, मानो उसके मुखसे अमृतकी वर्षा हो रही हो॥ ५४॥
जिसपर झूठा ही कलङ्क लगाया गया हो, जो धनका इच्छुक हो, जिसे अपने पास बुलाकर अपमानित किया गया हो, जो राजाका द्वेषी हो, जिसपर भारी कर लगाया गया हो, जो विद्या और कुल आदिकी दृष्टिसे अपनेको सबसे बड़ा मानता हो, जिसके धर्म, काम और अर्थ छिन्न-भिन्न हो गये हों, जो कुपित, मानी और अनादृत हो, जिसे अकारण राज्यसे निर्वासित कर दिया गया हो, जो पूजा एवं सत्कारके योग्य होनेपर भी असत्कृत हुआ हो, जिसके धन तथा स्त्रीका हरण कर लिया गया हो, जो मनमें वैर रखते हुए भी ऊपरसे सामनीतिके प्रयोगसे शान्त रहता हो, ऐसे लोगोंमें, तथा जो सदा शङ्कित रहते हों, उनमें, यदि वे शत्रुपक्षके हों तो फूट डाले और अपने पक्षमें इस तरहके लोग हों तो उन्हें यत्नपूर्वक शान्त करे। यदि शत्रुपक्षसे फूटकर ऐसे लोग अपने पक्षमें आयें तो उनका सत्कार करे॥ ५५—५७$\frac{१}{२}$॥
समान तृष्णाका अनुसन्धान (उभयपक्षको समानरूपसे लाभ होनेकी आशाका प्रदर्शन), अत्यन्त उग्रभय (मृत्यु आदिकी विभीषिका) दिखाना तथा उच्चकोटिका दान और मान—ये भेदके उपाय कहे गये हैं॥ ५८$\frac{१}{२}$॥
शत्रुकी सेनामें जब भेदनीतिद्वारा फूट डाल दी जाती है, तब वह घुन लगे हुए काष्ठकी भाँति विशीर्ण (छिन्न-भिन्न) हो जाती है। प्रभाव, उत्साह तथा मन्त्रशक्तिसे सम्पन्न एवं देश-कालका ज्ञान रखनेवाला राजा दण्डके द्वारा शत्रुओंका अन्त कर दे। जिसमें मैत्रीभाव प्रधान है तथा जिसका विचार कल्याणमय है, ऐसे पुरुषको सामनीतिके द्वारा वशमें करे॥ ५९-६०॥
जो लोभी हो और आर्थिक दृष्टिसे क्षीण हो चला हो, उसको दानद्वारा सत्कारपूर्वक वशमें
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करे। परस्पर शङ्कासे जिनमें फूट पड़ गयी हो तथा जो दुष्ट हों, उन सबको दण्डका भय दिखाकर वशमें ले आये। पुत्र और भाई आदि बन्धुजनोंको सामनीतिद्वारा एवं धन देकर वशीभूत करे। सेनापतियों, सैनिकों तथा जनपदके लोगोंको दान और भेदनीतिके द्वारा अपने अधीन करे। सामन्तों (सीमावर्ती नरेशों), आटविकों (वन्य-प्रदेशके शासकों) तथा यथासम्भव दूसरे लोगोंको भी भेद और दण्डनीतिसे वशमें करे ॥ ६१-६२ ॥
देवताओंकी प्रतिमाओं तथा जिनमें देवताओंकी मूर्ति खुदी हो, ऐसे खंभोंके बड़े-बड़े छिद्रोंमें छिपकर खड़े हुए मनुष्य 'मानुषी माया' हैं।१ स्त्रीके कपड़ोंसे ढँका हुआ अथवा रात्रिमें अद्भुतरूपसे दर्शन देनेवाला पुरुष भी 'मानुषी माया' है। वेताल, मुखसे आग उगलनेवाले पिशाच तथा देवताओंके समान रूप धारण करना इत्यादि 'मानुषी माया' है। इच्छानुसार रूप धारण करना, शस्त्र, अग्नि, पत्थर और जलकी वर्षा करना तथा अन्धकार, आँधी, पर्वत और मेघोंकी सृष्टि कर देना—यह 'अमानुषी माया' है। पूर्वकल्पकी चतुर्युगीमें जो द्वापर आया था, उसमें पाण्डुवंशी भीमसेनने स्त्रीके समान रूप धारण करके अपने शत्रु कीचकको मारा था ॥ ६३-६५ ॥
अन्याय (अदण्ड्यदण्डन आदि), व्यसन (मृगया आदि) तथा बड़ेके साथ युद्धमें प्रवृत्त हुए आत्मीय जनको न रोकना 'उपेक्षा' है। पूर्वकल्पवर्ती भीमसेनके साथ युद्धमें प्रवृत्त हुए अपने भाई हिडिम्बको हिडिम्बाने मना नहीं किया, अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये उसकी उपेक्षा कर दी ॥ ६६ ॥
मेघ, अन्धकार, वर्षा, अग्नि, पर्वत तथा अन्य अद्भुत वस्तुओंको दिखाना, दूर खड़ी हुई ध्वजशालिनी सेनाओंका दर्शन कराना, शत्रुपक्षके सैनिकोंको कटे, फाड़े तथा विदीर्ण किये गये और अङ्गोंसे रक्तकी धारा बहाते हुए दिखाना—यह सब 'इन्द्रजाल' है। शत्रुओंको डरानेके लिये इस इन्द्रजालकी कल्पना करनी चाहिये ॥ ६७-६८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'साम आदि उपायोंका कथन' नामक दो सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४१ ॥
दो सौ बयालीसवाँ अध्याय
सेनाके छः भेद, इनका बलाबल तथा छः अङ्ग
श्रीराम कहते हैं—छः प्रकारकी सेनाको कवच आदिसे संनद्ध एवं व्यूहबद्ध करके इष्ट देवताओंकी तथा संग्रामसम्बन्धी दुर्गा आदि देवियोंकी पूजा करनेके पश्चात् शत्रुपर चढ़ाई करे। मौल, भृत, श्रेणि, सुहृद्, शत्रु तथा आटविक—ये छः प्रकारके सैन्य हैं।२ इनमें परकी अपेक्षा पूर्व-पूर्व सेना श्रेष्ठ कही गयी है। इनका व्यसन भी इसी क्रमसे गरिष्ठ माना गया है। पैदल,
१. वहाँ छिपे हुए मनुष्य यथासमय निकलकर शत्रुपर टूट पड़ते हैं या वहींसे शत्रुके विनाशकी सूचना देते हैं। शत्रुपर यह प्रभाव डालते हैं कि विजिगीषुकी सेवासे प्रसन्न होकर हम देवता ही उसकी सहायता कर रहे हैं।
२. मूलभूत पुरुषके सम्बन्धोंसे चली आनेवाली वंशपरम्परागत सेना 'मौल' कही गयी है। आजीविका देकर जिसका भरण-पोषण किया गया हो, वह 'भृत' बल है। जनपदके अन्तर्गत जो व्यवसायियों तथा कारीगरोंका संघ है, उनकी सेना 'श्रेणिबल' है। सहायताके लिये आये हुए मित्रकी सेना 'सुहृद्बल' है। अपनी दण्डशक्तिसे वशमें की गयी सेना 'शत्रुबल' है तथा स्वमण्डलके अन्तर्गत अटवी (जंगल)-का उपभोग करनेवालोंको 'आटविक' कहते हैं। उनकी सेना 'आटविक बल' है।
- अध्याय २४२ * ४६९
घुड़सवार, रथी और हाथीसवार-ये सेनाके चार अङ्ग हैं; किंतु मन्त्र और कोष-इन दो अङ्गोंके साथ मिलकर सेनाके छः अङ्ग हो जाते हैं॥ १-२॥
नदी-दुर्ग, पर्वत-दुर्ग तथा वन-दुर्ग-इनमें जहाँ-जहाँ (सामन्त तथा आटविक आदिसे) भय प्राप्त हो, वहाँ-वहाँ सेनापति संनद्ध एवं व्यूहबद्ध सेनाओंके साथ जाय। एक सेनानायक उत्कृष्ट वीर योद्धाओंके साथ आगे जाय (और मार्ग एवं सेनाके लिये आवास-स्थानका शोध करे)। विजिगीषु राजा और उसका अन्तःपुर सेनाके मध्यभागमें रहकर यात्रा करे। खजाना तथा फल्गु (असार एवं बेगार करनेवालोंकी) सेना भी बीचमें ही रहकर चले। स्वामीके अगल-बगलमें घुड़सवारोंकी सेना रहे। घुड़सवार सेनाके उभय पार्श्वोंमें रथसेना रहे। रथसेनाके दोनों तरफ हाथियोंकी सेना रहनी चाहिये। उसके दोनों बगल आटविकों (जंगली लोगों)-की सेना रहे। यात्राकालमें प्रधान एवं कुशल सेनापति स्वयं स्वामीके पीछे रहकर सबको आगे करके चले। थके-माँदे (हतोत्साह) सैनिकोंको धीरे-धीरे आश्वासन देता रहे। उसके साथकी सारी सेना कमर कसकर युद्धके लिये तैयार रहे। यदि आगेकी ओरसे शत्रुके आक्रमणका भय सम्भावित हो तो महान् मकरव्यूहकी$^१$ रचना करके आगे बढ़े। (यदि तिर्यग् दिशासे भयकी सम्भावना हो तो) खुले या फैले पंखवाले श्येन पक्षीके आकारकी व्यूह-रचना करके चले। (यदि एक आदमीके ही चलनेयोग्य पगडंडी-मार्गसे यात्रा करते समय सामनेसे भय हो तो) सूची-व्यूहकी रचना करके चले तथा उसके मुखभागमें वीर योद्धाओंको खड़ा करे। पीछेसे भय हो तो शकटव्यूहकी,$^२$ पार्श्वभागसे भय हो तो वज्रव्यूहकी$^३$ तथा सब ओरसे भय होनेपर 'सर्वतोभद्र'$^४$ नामक व्यूहकी रचना करे ॥ ३-८॥
जो सेना पर्वतकी कन्दरा, पर्वतीय दुर्गम स्थान एवं गहन वनमें, नदी एवं घने वनसे संकीर्ण पथपर फँसी हो, जो विशाल मार्गपर चलनेसे थकी हो, भूख-प्याससे पीड़ित हो, रोग, दुर्भिक्ष (अकाल) एवं महामारीसे कष्ट पा रही हो, लुटेरोंद्वारा भगायी गयी हो, कीचड़, धूल तथा पानीमें फँस गयी हो, विक्षिप्त हो, एक-एक व्यक्तिके ही चलनेका मार्ग होनेसे जो आगे न बढ़कर एक ही स्थानपर एकत्र हो गयी हो, सोयी हो, खाने-पीनेमें लगी हो, अयोग्य भूमिपर स्थित हो, बैठी हो, चोर तथा अग्निके भयसे डरी हो, वर्षा और आँधीकी चपेटमें आ गयी हो तथा इसी तरहके अन्यान्य संकटोंमें फँस गयी हो, ऐसी अपनी सेनाकी तो सब ओरसे रक्षा करे तथा शत्रुसेनाको घातक प्रहारका निशाना बनाये॥ ९-११$\frac{१}{२}$॥
जब आक्रमणके लक्ष्यभूत शत्रुके अपेक्षा विजिगीषु राजा देश-कालकी अनुकूलताकी दृष्टिसे बढ़ा-चढ़ा हो तथा शत्रुके प्रकृतिमें फूट डाल दी गयी हो और अपना बल अधिक हो तो शत्रुके साथ प्रकाश-युद्ध (घोषित या प्रकट संग्राम) छोड़ दे। यदि विपरीत स्थिति हो तो कूट-युद्ध (छिपी लड़ाई) करे। जब शत्रुके सेना पूर्वोक्त बलव्यसन (सैन्य-संकट)-के अवसरों या स्थानोंमें फँसकर व्याकुल हो तथा युद्धके अयोग्य भूमिमें स्थित हो और सेनासहित विजिगीषु अपने अनुकूल भूमिपर स्थित हो, तब वह शत्रुपर आक्रमण
१. उसका मुख विस्तृत होनेसे वह पीछेकी समस्त सेनाकी रक्षा करता है। २. शकट-व्यूह पीछेकी ओरसे विस्तृत होता है। ३. वज्रव्यूहमें दोनों ओर विस्तृत मुख होते हैं। ४. सर्वतोभद्रमें सभी दिशाओंकी ओर सेनाका मुख होता है।
४७० * अग्निपुराण *
करके उसे मार गिराये। यदि शत्रु-सैन्य अपने लिये अनुकूल भूमिमें स्थित हो तो उसकी प्रकृतियोंमें भेदनीतिद्वारा फूट डलवाकर, अवसर देख शत्रुना विनाश कर डाले॥ १२-१३$\frac{१}{२}$॥
जो युद्धसे भागकर या पीछे हटकर शत्रुको उसकी भूमिसे बाहर खींच लाते हैं, ऐसे वनचरों (आटविकों) तथा अमित्र सैनिकोंके पाशभूत होकर जिसे प्रकृतिप्रग्रहसे (स्वभूमि या मण्डलसे) दूर- परकीय भूमिमें आकृष्ट कर लिया है, उस शत्रुको प्रकृष्ट वीर योद्धाओं द्वारा मरवा डाले। कुछ थोड़े- से सैनिकोंको सामनेकी ओरसे युद्धके लिये उद्यत दिखा दे और जब शत्रुके सैनिक उन्हींको अपना लक्ष्य बनानेका निश्चय कर लें, तब पीछेसे वेगशाली उत्कृष्ट वीरोंकी सेनाके साथ पहुँचकर उन शत्रुओंका विनाश करे। अथवा पीछेकी ओर ही सेना एकत्र करके दिखाये और जब शत्रु-सैनिकोंका ध्यान उधर ही खिंच जाय, तब सामनेकी ओरसे शूरवीर बलवान् सेनाद्वारा आक्रमण करके उन्हें नष्ट कर दे। सामने तथा पीछेकी ओरसे किये जानेवाले इन दो आक्रमणोंद्वारा अगल-बगलसे किये जानेवाले आक्रमणोंकी भी व्याख्या हो गयी अर्थात् बायीं ओर कुछ सेना दिखाकर दाहिनी ओरसे और दाहिनी ओर सेना दिखाकर बायीं ओरसे गुप्तरूपसे आक्रमण करे। कूटयुद्धमें ऐसा ही करना चाहिये। पहले दूष्यबल, अमित्रबल तथा आटविकबल- इन सबके साथ शत्रुसेनाको लड़ाकर थका दे। जब शत्रुबल श्रान्त, मन्द (हतोत्साह) और निराक्रन्द (मित्ररहित एवं निराश) हो जाय और अपनी सेनाके वाहन थके न हों, उस दशामें आक्रमण करके शत्रुवर्गको मार गिराये। अथवा दूष्य एवं अमित्र सेनाको युद्धसे पीछे हटने या भागनेका आदेश दे दे और जब शत्रुको यह विश्वास हो जाय कि मेरी जीत हो गयी, अतः वह ढीला पड़ जाय, तब मन्त्रबलका आश्रय ले प्रयत्नपूर्वक आक्रमण करके उसे मार डाले। स्कन्धावार (सेनाके
पड़ाव), पुर, ग्राम, सस्यसमूह तथा गौओंके व्रज (गोष्ठ)- इन सबको लूटनेका लोभ शत्रु-सैनिकोंके मनमें उत्पन्न करा दे और जब उनका ध्यान बँट जाय, तब स्वयं सावधान रहकर उन सबका संहार कर डाले। अथवा शत्रु राजाकी गायोंका अपहरण करके उन्हें दूसरी ओर (गायोंको छुड़ानेवालोंकी ओर) खींचे और जब शत्रुसेना उस लक्ष्यकी ओर बढ़े, तब उसे मार्गमें ही रोककर मार डाले। अथवा अपने ही ऊपर आक्रमणके भयसे रातभर जागनेके श्रमसे दिनमें सोयी हुई शत्रुसेनाके सैनिक जब नींदसे व्याकुल हों, उस समय उनपर धावा बोलकर मार डाले। अथवा रातमें ही निश्चिन्त सोये हुए सैनिकोंको तलवार हाथमें लिये हुए पुरुषोंद्वारा मरवा दे॥ १४-२२$\frac{१}{२}$॥
जब सेना कूच कर चुकी हो तथा शत्रुने मार्गमें ही घेरा डाल दिया हो तो उसके उस घेरे या अवरोधको नष्ट करनेके लिये हाथियोंको ही आगे-आगे ले चलना चाहिये। वन-दुर्गमें, जहाँ घोड़े भी प्रवेश न कर सकें, वहाँ हाथियोंकी ही सहायतासे सेनाका प्रवेश होता है- वे आगेके वृक्ष आदिको तोड़कर सैनिकोंके प्रवेशके लिये मार्ग बना देते हैं। जहाँ सैनिकोंकी पंक्ति ठोस हो, वहाँ उसे तोड़ देना हाथियोंका ही काम है तथा जहाँ व्यूह टूटनेसे सैनिकपंक्तिमें दरार पड़ गयी हो, वहाँ हाथियोंके खड़े होनेसे छिद्र या दरार बंद हो जाती है। शत्रुओंमें भय उत्पन्न करना, शत्रुके दुर्गके द्वारको माथेकी टक्कर देकर तोड़ गिराना, खजानेको सेनाके साथ ले चलना तथा किसी उपस्थित भयसे सेनाकी रक्षा करना- ये सब हाथियोंद्वारा सिद्ध होनेवाले कर्म हैं॥ २३-२४॥
अभिन्न सेनाका भेदन और भिन्न सेनाका संधान-ये दोनों कार्य (गजसेनाकी ही भाँति) रथसेनाके द्वारा भी साध्य हैं। वनमें कहाँ उपद्रव
- अध्याय २४२ * | ४७१ ---|---
है, कहाँ नहीं है—इसका पता लगाना, दिशाओंका शोध करना (दिशाका ठीक ज्ञान रखते हुए सेनाको यथार्थ दिशाकी ओर ले चलना) तथा मार्गका पता लगाना—यह अश्वसेनाका कार्य है। अपने पक्षके वीवध$^१$ और आसारकी$^२$ रक्षा, भागती हुई शत्रुसेनाका शीघ्रतापूर्वक पीछा करना, संकटकालमें शीघ्रतापूर्वक भाग निकलना, जल्दीसे कार्य सिद्ध करना, अपनी सेनाकी जहाँ दयनीय दशा हो, वहाँ उसके पास पहुँचकर सहायता करना, शत्रुसेनाके अग्रभागपर आघात करना और तत्काल ही घूमकर उसके पिछले भागपर भी प्रहार करना—ये अश्वसेनाके कार्य हैं। सर्वदा शस्त्र धारण किये रहना (तथा शस्त्रोंको पहुँचाना)—ये पैदल सेनाके कार्य हैं। सेनाकी छावनी डालनेके योग्य स्थान तथा मार्ग आदिकी खोज करना विष्टि (बेगार) करनेवाले लोगोंका काम है॥ २५—२७॥
जहाँ मोटे-मोटे ठूँठ, बाँबियाँ, वृक्ष और झाड़ियाँ हों, जहाँ काँटेदार वृक्ष न हों, किंतु भाग निकलनेके लिये मार्ग हों तथा जो अधिक ऊँची-नीची न हो, ऐसी भूमि पैदल सेनाके संचार योग्य बतायी गयी है। जहाँ वृक्ष और प्रस्तरखण्ड बहुत कम हों, जहाँकी दरारें शीघ्र लाँघने योग्य हों, जो भूमि मुलायम न होकर सख्त हो, जहाँ कंकड़ और कीचड़ न हो तथा जहाँसे निकलनेके लिये मार्ग हो, वह भूमि अश्वसंचारके योग्य होती है। जहाँ ठूँठ वृक्ष और खेत न हों तथा जहाँ पङ्कका सर्वथा अभाव हो—ऐसी भूमि रथसंचारके योग्य मानी गयी है। जहाँ पैरोंसे रौंद डालनेयोग्य वृक्ष और काट देनेयोग्य लताएँ हों, कीचड़ न हो, गर्त या दरार न हो, जहाँके पर्वत हाथियोंके लिये गम्य हों, ऐसी भूमि ऊँची-नीची होनेपर भी गजसेनाके योग्य कही गयी है॥ २८—३०$\frac{१}{२}$॥
जो सैन्य अश्व आदि सेनाओंमें भेद (दरार या छिद्र) पड़ जानेपर उन्हें ग्रहण करता—सहायताद्वारा अनुगृहीत बनाता है, उसे ‘प्रतिग्रह’ कहा गया है। उसे अवश्य संघटित करना चाहिये; क्योंकि वह भारको वहन या सहन करनेमें समर्थ होता है। प्रतिग्रहसे शून्य व्यूह भिन्न-सा दीखता है॥ ३१-३२॥
विजयकी इच्छा रखनेवाला बुद्धिमान् राजा प्रतिग्रहसेनाके बिना युद्ध न करे। जहाँ राजा रहे, वहीं कोष रहना चाहिये; क्योंकि राजत्व कोषके ही अधीन होता है। विजयी योद्धाओंको उसीसे पुरस्कार देना चाहिये। भला ऐसा कौन है, जो दाताके हितके लिये युद्ध न करेगा? शत्रुपक्षके राजाका वध करनेपर योद्धाको एक लाख मुद्राएँ पुरस्कारमें देनी चाहिये। राजकुमारका वध होनेपर इससे आधा पुरस्कार देनेकी व्यवस्था रहनी चाहिये। सेनापतिके मारे जानेपर भी उतना ही पुरस्कार देना उचित है। हाथी तथा रथ आदिका नाश करनेपर भी उचित पुरस्कार देना आवश्यक है॥ ३३-३४$\frac{१}{२}$॥
पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथीसवार—ये सब सैनिक इस तरहसे (अर्थात् एक-दूसरेसे इतना अन्तर रखकर) युद्ध करें, जिससे उनके व्यायाम (अङ्गोंके फैलाव) तथा विनिवर्तन (विश्रामके लिये पीछे हटने)-में किसी तरहकी बाधा या रुकावट न हो। समस्त योद्धा पृथक्-पृथक् रहकर युद्ध करें। घोल-मेल होकर जूझना संकुलावह (घमासान एवं रोमाञ्चकारी) होता है। यदि महासंकुल (घमासान) युद्ध छिड़ जाय तो पैदल आदि असहाय सैनिक बड़े-बड़े हाथियोंका आश्रय लें॥ ३५-३६$\frac{१}{२}$॥
एक-एक घुड़सवार योद्धाके सामने तीन-
१. आगे जाती हुई सेनाको पीछेसे बराबर वेतन और भोजन पहुँचाते रहनेकी जो व्यवस्था है, उसका नाम ‘वीवध’ है।
२. मित्रसेनाको ‘आसार’ कहते हैं।
४७२ * अग्निपुराण *
तीन पैदल पुरुषोंको प्रतियोद्धा अर्थात् अग्रगामी योद्धा बनाकर खड़ा करे। इसी रीतिसे पाँच-पाँच अश्व एक-एक हाथीके अग्रभागमें प्रतियोद्धा बनाये। इनके सिवा हाथीके पादरक्षक भी उतने ही हों, अर्थात् पाँच अश्व और पंद्रह पैदल। प्रतियोद्धा तो हाथीके आगे रहते हैं और पादरक्षक हाथीके चरणोंके निकट खड़े होते हैं। यह एक हाथीके लिये व्यूह-विधान कहा गया है। ऐसा ही विधान रथव्यूहके लिये भी समझना चाहिये¹॥ ३७-३८ $\frac{१}{२}$ ॥
एक गजव्यूहके लिये जो विधि कही गयी है, उसीके अनुसार नौ हाथियोंका व्यूह बनाये। उसे 'अनीक' जानना चाहिये। (इस प्रकार एक अनीकमें पैंतालीस अश्व तथा एक सौ पैंतीस पैदल सैनिक प्रतियोद्धा होते हैं और इतने ही अश्व तथा पैदल—पादरक्षक हुआ करते हैं।) एक अनीकसे दूसरे अनीककी दूरी पाँच धनुष बतायी गयी है। इस प्रकार अनीक-विभागके द्वारा व्यूह-सम्पत्ति स्थापित करे॥ ३९-४० ॥
व्यूहके मुख्यतः पाँच अङ्ग हैं। १. 'उरस्य', २. 'कक्ष', ३. 'पक्ष'—इन तीनोंको एक समान बताया जाता है। अर्थात् मध्यभागमें पूर्वोक्त रीतिसे नौ हाथियोंद्वारा कल्पित एक अनीक सेनाको 'उरस्य' कहा गया है। उसके दोनों पार्श्वभागोंमें एक-एक अनीककी दो सेनाएँ 'कक्ष' कहलाती हैं। कक्षके बाह्यभागमें दोनों ओर जो एक-एक अनीककी दो सेनाएँ हैं, वे 'पक्ष' कही जाती हैं। इस प्रकार इस पाँच अनीक सेनाके व्यूहमें ४५ हाथी, २२५ अश्व, ६७५ पैदल सैनिक प्रतियोद्धा और इतने ही पादरक्षक होते हैं। इसी तरह उरस्य, कक्ष, पक्ष, मध्य, पृष्ठ, प्रतिग्रह तथा कोटि—इन सात अङ्गोंको लेकर व्यूहशास्त्रके विद्वानोंने व्यूहको सात अङ्गोंसे युक्त कहा है²॥ ४१ $\frac{१}{२}$ ॥
उरस्य, कक्ष, पक्ष तथा प्रतिग्रह आदिसे युक्त यह व्यूहविभाग बृहस्पतिके मतके अनुसार है। शुक्रके मतमें यह व्यूहविभाग कक्ष और प्रकक्षसे रहित है। अर्थात् उनके मतमें व्यूहके पाँच ही अङ्ग हैं॥ ४२ $\frac{१}{२}$ ॥
सेनापतिगण उत्कृष्ट वीर योद्धाओंसे घिरे रहकर युद्धके मैदानमें खड़े हों। वे अभिन्नभावसे संघटित रहकर युद्ध करें और एक-दूसरेकी रक्षा करते रहें॥ ४३ $\frac{१}{२}$ ॥
सारहीन सेनाको व्यूहके मध्यभागमें स्थापित करना चाहिये। युद्धसम्बन्धी यन्त्र, आयुध और औषध आदि उपकरणोंको सेनाके पृष्ठभागमें रखना उचित है। युद्धका प्राण है नायक—राजा या विजिगीषु। नायकके न रहने या मारे जानेपर युद्धरत सेना मारी जाती है॥ ४४ $\frac{१}{२}$ ॥
हृदयस्थान (मध्यभाग)-में प्रचण्ड हाथियोंको खड़ा करे। कक्षस्थानोंमें रथ तथा पक्षस्थानोंमें घोड़े स्थापित करे। यह 'मध्यभेदी' व्यूह कहा गया है॥ ४५ $\frac{१}{२}$ ॥
मध्यदेश (वक्षःस्थान)-में घोड़ोंकी, कक्षभागोंमें रथोंकी तथा दोनों पक्षोंके स्थानमें हाथियोंकी सेना खड़ी करे। यह 'अन्तभेदी' व्यूह बताया गया है। रथकी जगह (अर्थात् कक्षोंमें) घोड़े दे दे तथा घोड़ोंकी जगह (मध्यदेशमें) पैदलोंको खड़ा कर दे। यह अन्य प्रकारका 'अन्तभेदी' व्यूह है। रथके अभावमें व्यूहके भीतर सर्वत्र हाथियोंकी ही नियुक्ति करे (यह व्यामिश्र या घोल-मेल युद्धके लिये उपयुक्त नीति है)॥ ४६-४७ $\frac{१}{२}$ ॥
(रथ, पैदल, अश्व और हाथी—इन सबका
१. व्यूह दो प्रकारके होते हैं— 'शुद्ध' और 'व्यामिश्र'। शुद्धके भी दो भेद हैं— गजव्यूह तथा रथव्यूह। मूलमें जो विधान गजव्यूहके लिये कहा गया है, उसीका अतिदेश रथव्यूहके लिये भी समझना चाहिये। व्यामिश्र आगे बतलायेंगे।
२. उरस्य, कक्ष, पक्ष, प्रोरस्य, प्रकक्ष, प्रपक्ष तथा प्रतिग्रह—ये सप्ताङ्ग व्यूहवादियोंके मतमें व्यूहके सात अङ्गोंके नाम हैं।
- अध्याय २४२ * ४७३
विभाग करके व्यूहमें नियोजन करे ।) यदि सेनाका बाहुल्य हो तो वह व्यूह 'आवाप' कहलाता है। मण्डल, असंहत, भोग तथा दण्ड—ये चार प्रकारके व्यूह 'प्रकृतिव्यूह' कहलाते हैं। पृथ्वीपर रखे हुए डंडेकी भाँति बायेंसे दायें या दायेंसे बायेंतक लंबी जो व्यूह-रचना की जाती हो, उसका नाम 'दण्ड' है। भोग (सर्प-शरीर)-के समान यदि सेनाकी मोर्चेबंदी की गयी हो तो वह 'भोग' नामक व्यूह है। इसमें सैनिकोंका अन्वावर्तन होता है। गोलाकार खड़ी हुई सेना, जिसका सब ओर मुख हो, अर्थात् जो सब ओर प्रहार कर सके, 'मण्डल' नामक व्यूहसे बद्ध कही गयी है। जिसमें अनीकोंको बहुत दूर-दूर खड़ा किया गया हो, वह 'असंहत' नामक व्यूह है॥ ४८-४९$\frac{१}{२}$ ॥
'दण्डव्यूह'के सत्रह भेद हैं—प्रदर, दृढ़क, असह्य, चाप, चापकुक्षि, प्रतिष्ठ, सुप्रतिष्ठ, श्येन, विजय, संजय, विशालविजय, सूची, स्थूणाकर्ण, चमूमुख, झषास्य, वलय तथा सुदुर्जय। जिसके पक्ष, कक्ष तथा उरस्य—तीनों स्थानोंके सैनिक सम स्थितिमें हों, वह तो 'दण्डप्रकृति' है; परंतु यदि कक्षभागके सैनिक कुछ आगेकी ओर निकले हों और शेष दो स्थानोंके सैनिक भीतरकी ओर दबे हों तो वह व्यूह शत्रु का प्रदरन (विदारण) करनेके कारण 'प्रदर' कहलाता है। यदि पूर्वोक्त दण्डके कक्ष और पक्ष दोनों भीतरकी ओर प्रविष्ट हों और केवल उरस्य भाग ही बाहरकी ओर निकला हो तो वह 'दृढ़क' कहा गया है। यदि दण्डके दोनों पक्षमात्र ही निकले हों तो उसका नाम 'असह्य' होता है। प्रदर, दृढ़क और असह्यको क्रमशः विपरीत स्थितिमें कर दिया जाय, अर्थात् उनमें जिस भागको अतिक्रान्त (निर्गत) किया गया हो, उसे 'प्रतिक्रान्त' (अन्तःप्रविष्ट) कर दिया जाय तो तीन अन्य व्यूह—'चाप', 'चापकुक्षि' तथा 'प्रतिष्ठ' नामक हो जाते हैं। यदि दोनों पंख निकले हों तथा उरस्य भीतरकी ओर प्रविष्ट हो तो 'सुप्रतिष्ठित' नामक व्यूह होता है। इसीको विपरीत स्थितिमें कर देनेपर 'श्येन' व्यूह बन जाता है॥ ५०-५३ ॥
आगे बताये जानेवाले स्थूणाकर्ण ही जिस खड़े डंडेके आकारवाले दण्डव्यूहके दोनों पक्ष हों, उसका नाम 'विजय' है। (यह साढ़े तीन व्यूहोंका संघ है। इसमें १७ 'अनीक' सेनाएँ उपयोगमें आती हैं।) दो चाप-व्यूह ही जिसके दोनों पक्ष हों, वह ढाई व्यूहोंका संघ एवं तेरह अनीक सेनासे युक्त व्यूह 'संजय' कहलाता है। एकके ऊपर एकके क्रमसे स्थापित दो स्थूणाकर्णोंको 'विशाल विजय' कहते हैं। ऊपर-ऊपर स्थापित पक्ष, कक्ष आदिके क्रमसे जो दण्ड ऊर्ध्वगामी (सीधा खड़ा) होता है, वैसे लक्षणवाले व्यूहका नाम 'सूची' है। जिसके दोनों पक्ष द्विगुणित हों, उस दण्डव्यूहको 'स्थूणाकर्ण' कहा गया है। जिसके तीन-तीन पक्ष निकले हों, वह चतुर्गुण पक्षवाला ग्यारह अनीकसे युक्त व्यूह 'चमूमुख' नामवाला है। इसके विपरीत लक्षणवाला अर्थात् जिसके तीन-तीन पक्ष प्रतिक्रान्त (भीतरकी ओर प्रविष्ट) हों, वह व्यूह 'झषास्य' नाम धारण करता है। इसमें भी ग्यारह अनीक सेनाएँ नियुक्त होती हैं। दो दण्डव्यूह मिलकर दस अनीक सेनाओंका एक 'वलय' नामक व्यूह बनाते हैं। चार दण्डव्यूहोंके मेलसे बीस अनीकोंका एक 'दुर्जय' नामक व्यूह बनता है। इस प्रकार क्रमशः इनके लक्षण कहे गये हैं॥ ५४$\frac{१}{२}$ ॥
गोमूत्रिका, अहिसंचारी, शकट, मकर तथा परिपतन्तिक—ये भोगके पाँच भेद कहे गये हैं। मार्गमें चलते समय गायके मूत्र करनेसे जो रेखा-बनती है, उसकी आकृतिमें सेनाको खड़ी करना—'गोमूत्रिका' व्यूह है। सर्पके संचरण-स्थानकी रेखा- जैसी आकृतिवाला व्यूह 'अहिसंचारी' कहा गया है। जिसके कक्ष और पक्ष आगे-पीछेके क्रमसे दण्डव्यूहकी भाँति ही स्थित हो, किंतु
४७४ * अग्निपुराण *
उरस्यकी संख्या दुगुनी हो, वह ‘शकट-व्यूह’ है। इसके विपरीत स्थितिमें स्थित व्यूह ‘मकर’ कहलाता है। इन दोनों व्यूहोंमेंसे किसीके भी मध्यभागमें हाथी और घोड़े आदि आवाप मिला दिये जायँ तो वह ‘परिपतन्तिक’ नामक व्यूह होता है॥ ५५-५६$\frac{१}{२}$॥
मण्डल-व्यूहके दो ही भेद हैं—सर्वतोभद्र तथा दुर्जय। जिस मण्डलाकार व्यूहका सब ओर मुख हो, उसे ‘सर्वतोभद्र’ कहा गया है। इसमें पाँच अनीक सेना होती है। इसीमें आवश्यकतावश उरस्य तथा दोनों कक्षोंमें एक-एक अनीक बढ़ा देनेपर आठ अनीकका ‘दुर्जय’ नामक व्यूह बन जाता है। अर्धचन्द्र, उड्डान तथा वज्र—ये ‘असंहत’ के भेद हैं। इसी तरह कर्कटशृङ्गी, काकपादी और गोधिका भी असंहतके ही भेद हैं। अर्धचन्द्र तथा कर्कटशृङ्गी—ये तीन अनीकोंके व्यूह हैं, उड्डान और काकपादी—ये चार अनीक सेनाओंसे बननेवाले व्यूह हैं तथा वज्र एवं गोधिका—ये दो व्यूह पाँच अनीक सेनाओंके संघटनसे सिद्ध होते हैं। अनीककी दृष्टिसे तीन ही भेद होनेपर भी आकृतिमें भेद होनेके कारण ये छः बताये गये हैं। दण्डसे सम्बन्ध रखनेवाले १७, मण्डलके २, असंहतके ६ और भोगके समराङ्गणमें ५ भेद कहे गये हैं॥ ५७—६०॥
पक्ष आदि अङ्गोंमेंसे किसी एक अङ्गकी सेनाद्वारा शत्रुके व्यूहका भेदन करके शेष अनीकोंद्वारा उसे घेर ले अथवा उरस्यगत अनीकसे शत्रुके व्यूहपर आघात करके दोनों कोटियों (प्रपक्षों)-द्वारा घेरे। शत्रुसेनाकी दोनों कोटियों (प्रपक्षों)-पर अपने व्यूहके पक्षोंद्वारा आक्रमण करके शत्रुके जघन (प्रोरस्य) भागको अपने प्रतिग्रह तथा दोनों कोटियोंद्वारा नष्ट करे। साथ ही, उरस्यगत सेनाद्वारा शत्रुपक्षको पीड़ा दे। व्यूहके जिस भागमें सारहीन सैनिक हों, जहाँ सेनामें फूट या दरार पड़ गयी हो तथा जिस भागमें दूष्य (क्रुद्ध, लुब्ध आदि) सैनिक विद्यमान हों, वहीं-वहीं शत्रुसेनाका संहार करे और अपने पक्षके वैसे स्थानोंको सबल बनाये। बलिष्ठ सेनाको उससे भी अत्यन्त बलिष्ठ सेनाद्वारा पीड़ित करे। निर्बल सैन्यदलको सबल सैन्यद्वारा दबाये। यदि शत्रुसेना संघटितभावसे स्थित हो तो प्रचण्ड गजसेनाद्वारा उस शत्रुवाहिनीका विदारण करे॥ ६१—६४॥
पक्ष, कक्ष और उरस्य—ये सम स्थितिमें वर्तमान हों तो ‘दण्डव्यूह’ होता है। दण्डका प्रयोग और स्थान व्यूहके चतुर्थ अङ्गद्वारा प्रदर्शित करे। दण्डके समान ही दोनों पक्ष यदि आगेकी ओर निकले हों तो ‘प्रदर’ या ‘प्रदारक’ व्यूह बनता है। वही यदि पक्ष-कक्षद्वारा अतिक्रान्त (आगेकी ओर निकला) हो तो ‘दृढ़’ नामक व्यूह होता है। यदि दोनों पक्षमात्र आगेकी ओर निकले हों तो वह व्यूह ‘असह्य’ नाम धारण करता है। कक्ष और पक्षको नीचे स्थापित करके उरस्यद्वारा निर्गत व्यूह ‘चाप’ कहलाता है। दो दण्ड मिलकर एक ‘वलय-व्यूह’ बनाते हैं। यह व्यूह शत्रुको विदीर्ण करनेवाला होता है। चार वलय-व्यूहोंके योगसे एक ‘दुर्जय’ व्यूह बनता है, जो शत्रुवाहिनीका मर्दन करनेवाला होता है।
कक्ष, पक्ष तथा उरस्य जब विषमभावसे स्थित हों तो ‘भोग’ नामक व्यूह होता है। इसके पाँच भेद हैं—सर्पचारी, गोमूत्रिका, शकट, मकर और परिपतन्तिक। सर्प-संचरणकी आकृतिसे सर्पचारी, गोमूत्रके आकारसे गोमूत्रिका, शकटकी-सी आकृतिसे शकट तथा इसके विपरीत स्थितिसे मकर-व्यूहका सम्पादन होता है। यह भेदोंसहित ‘भोग-व्यूह’ सम्पूर्ण शत्रुओंका मर्दन करनेवाला है। चक्रव्यूह तथा पद्मव्यूह आदि मण्डलके भेद-प्रभेद हैं। इसी प्रकार सर्वतोभद्र, वज्र, अक्षवर, काक, अर्धचन्द्र, शृङ्गार और अचल आदि व्यूह भी हैं। इनकी आकृतिके ही अनुसार ये नाम रखे गये हैं। अपनी
- अध्याय २४३ * ४७५
मौजके अनुसार व्यूह बनाने चाहिये। व्यूह शत्रुसेनाकी प्रगतिको रोकनेवाले होते हैं॥ ६५-७२॥
अग्निदेव कहते हैं—ब्रह्मन् ! श्रीरामने रावणका वध करके अयोध्याका राज्य प्राप्त किया। श्रीरामकी बतायी हुई उक्त नीतिसे ही पूर्वकालमें लक्ष्मणने इन्द्रजित्का वध किया था॥ ७३ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'राजनीति-कथन' नामक दो सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४२॥
दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय
पुरुष-लक्षण-वर्णन
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ ! मैंने श्रीरामके प्रति वर्णित राजनीतिका प्रतिपादन किया। अब मैं स्त्री-पुरुषोंके लक्षण बतलाता हूँ, जिसका पूर्वकालमें भगवान् समुद्रने गर्ग मुनिको उपदेश दिया था॥ १॥
**समुद्रने कहा—**उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले गर्ग ! मैं स्त्री-पुरुषोंके लक्षण एवं उनके शुभाशुभ फलका वर्णन करता हूँ। एकाधिक, द्विशुक्ल, त्रिगम्भीर, त्रित्रिक, त्रिप्रलम्ब, त्रिकव्यापी, त्रिवलीयुक्त, त्रिविनत, त्रिकालज्ञ एवं त्रिविपुल पुरुष शुभ लक्षणोंसे समन्वित माना जाता है। इसी प्रकार चतुर्लेख, चतुस्सम, चतुष्किष्कु, चतुर्दंष्ट्र, चतुष्कृष्ण, चतुर्गन्ध, चतुर्ह्रस्व, पञ्चसूक्ष्म, पञ्चदीर्घ, षडुन्नत, अष्टवंश, सप्तस्नेह, नवामल, दशपद्म, दशव्यूह, न्यग्रोधपरिमण्डल, चतुर्दशसमद्वन्द्व एवं षोडशाक्ष पुरुष प्रशस्त है॥ २-६ $\frac{१}{२}$॥
धर्म, अर्थ तथा कामसे संयुक्त धर्म 'एकाधिक' माना गया है। तारकाहीन नेत्र एवं उज्ज्वल दन्तपङ्क्तिसे सुशोभित पुरुष 'द्विशुक्ल' कहलाता है। जिसके स्वर, नाभि एवं सत्त्व—तीनों गम्भीर हों, वह 'त्रिगम्भीर' होता है। निर्मत्सरता, दया, क्षमा, सदाचरण, शौच, स्पृहा, औदार्य, अनायास (अथक श्रम) तथा शूरता—इनसे विभूषित पुरुष 'त्रित्रिक' माना गया है। जिस मनुष्यके वृषण (लिङ्ग) एवं भुजयुगल लंबे हों, वह 'त्रिप्रलम्ब' कहा जाता है। जो अपने तेज, यश एवं कान्तिसे देश, जाति, वर्ग एवं दसों दिशाओंको व्याप्त कर लेता है, उसको 'त्रिकव्यापी' कहते हैं। जिसके उदरमें तीन रेखाएँ हों, वह 'त्रिवलीमान्' होता है। अब 'त्रिविनत' पुरुषका लक्षण सुनो। वह देवता, ब्राह्मण तथा गुरुजनोंके प्रति विनीत होता है। धर्म, अर्थ एवं कामके समयका ज्ञाता 'त्रिकालज्ञ' कहा जाता है। जिसका वक्षःस्थल, ललाट एवं मुख विस्तारयुक्त हो, वह 'त्रिविपुल' तथा जिसके हस्तयुगल एवं चरणयुगल ध्वज-छत्रादिसे चिह्नित हों, वह पुरुष 'चतुर्लेख' होता है। अङ्गुलि, हृदय, पृष्ठ एवं कटि—ये चारों अङ्ग समान होनेसे प्रशस्त होते हैं। ऐसा पुरुष 'चतुस्सम' कहा गया है। जिसकी ऊँचाई छानबे अङ्गुलकी हो, वह 'चतुष्किष्कु' प्रमाणवाला एवं जिसकी चारों दंष्ट्राएँ चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हों, वह 'चतुर्दंष्ट्र' होता है। अब मैं तुमको 'चतुष्कृष्ण' पुरुषके विषयमें कहता हूँ। उसके नयनतारक, भ्रू-युगल, श्मश्रु एवं केश कृष्ण होते हैं। नासिका, मुख एवं कक्षयुग्ममें उत्तम गन्धसे युक्त मनुष्य 'चतुर्गन्ध' कहलाता है। लिङ्ग, ग्रीवा तथा जङ्घा-युगलके ह्रस्व होनेसे पुरुष 'चतुर्ह्रस्व' होता है। अङ्गुलिपर्व, नख, केश, दन्त तथा त्वचा सूक्ष्म होनेपर पुरुष 'पञ्चसूक्ष्म' एवं हनु, नेत्र, ललाट, नासिका एवं वक्षःस्थलके विशाल होनेसे 'पञ्चदीर्घ' माना जाता है। वक्षःस्थल, कक्ष, नख, नासिका, मुख एवं कृकाटिका (गर्दनकी घंटी)—ये छः अङ्ग उन्नत एवं त्वचा, केश, दन्त, रोम, दृष्टि, नख एवं वाणी—ये सात स्निग्ध होनेपर शुभ होते हैं। जानुद्वय, ऊरुद्वय, पृष्ठ, हस्तद्वय एवं नासिकाको मिलाकर कुल 'आठ वंश' होते हैं। नेत्रद्वय, नासिकाद्वय, कर्णयुगल,
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शिश्न, गुदा एवं मुख—ये स्थान निर्मल होनेसे पुरुष ‘नवामल’ होता है। जिह्वा, ओष्ठ, तालु, नेत्र, हाथ, पैर, नख, शिश्नाग्र एवं मुख—ये दस अङ्ग पद्मके समान कान्तिसे युक्त होनेपर प्रशस्त माने गये हैं। हाथ, पैर, मुख, ग्रीवा, कर्ण, हृदय, सिर, ललाट, उदर एवं पृष्ठ—ये दस बृहदाकार होनेपर सम्मानित होते हैं। जिस पुरुषकी ऊँचाई भुजाओंके फैलानेपर दोनों मध्यमा अङ्गुलियोंके मध्यमान्तरके समान हो, वह ‘न्यग्रोधपरिमण्डल’ कहलाता है। जिसके चरण, गुल्फ, नितम्ब, पार्श्व, वङ्क्षण, वृषण, स्तन, कर्ण, ओष्ठ, ओष्ठान्त, जङ्घा, हस्त, बाहु एवं नेत्र—ये अङ्ग-युग्म समान हों, वह पुरुष ‘चतुर्दशसमद्वन्द्व’ होता है। जो अपने दोनों नेत्रोंसे चौदह विद्याओंका अवलोकन करता है, वह ‘षोडशाक्ष’ कहा जाता है। दुर्गन्धयुक्त, मांसहीन, रूक्ष एवं शिराओंसे व्याप्त शरीर अशुभ माना गया है। इसके विपरीत गुणोंसे सम्पन्न एवं उत्फुल्ल नेत्रोंसे सुशोभित शरीर प्रशस्त होता है। धन्य पुरुषकी वाणी मधुर एवं चाल मतवाले हाथीके समान होती है। प्रतिरोमकूपसे एक-एक रोम ही निर्गत होता है। ऐसे पुरुषकी बार-बार भयसे रक्षा होती है॥ ७—२६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘पुरुष-लक्षण-वर्णन’ नामक दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४३॥
दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय
स्त्रीके लक्षण
समुद्र कहते हैं— गर्गजी! शरीरसे उत्तम श्रेणीकी स्त्री वह है, जिसके सम्पूर्ण अङ्ग मनोहर हों, जो मतवाले गजराजकी भाँति मन्दगतिसे चलती हो, जिसके ऊरु और जघन (नितम्बदेश) भारी हों तथा नेत्र उन्मत्त पारावतके समान मदभरे हों, जिसके केश सुन्दर नीलवर्णके, शरीर पतला और अङ्ग लोमरहित हों, जो देखनेपर मनको मोह लेनेवाली हो, जिसके दोनों पैर समतल भूमिका पूर्णरूपसे स्पर्श करते हों और दोनों स्तन परस्पर सटे हुए हों, नाभि दक्षिणावर्त हो, योनि पीपलके पत्तेकी-सी आकारवाली हो, दोनों गुल्फ भीतर छिपे हुए हों—मांसल होनेके कारण वे उभड़े हुए न दिखायी देते हों, नाभि अँगूठेके बराबर हो तथा पेट लंबा या लटकता हुआ न हो। रोमावलियोंसे रूक्ष शरीरवाली रमणी अच्छी नहीं मानी गयी है। नक्षत्रों, वृक्षों और नदियोंके नामपर जिनके नाम रखे गये हों तथा जिसे कलह सदा प्रिय लगता हो, वह स्त्री भी अच्छी नहीं है। जो लोलुप न हो, कटुवचन न बोलती हो, वह नारी देवता आदिसे पूजित ‘शुभलक्षणा’ कही गयी है। जिसके कपोल मधूक-पुष्पोंके समान गोरे हों, वह नारी शुभ है। जिसके शरीरकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हों और जिसके अङ्ग अधिक रोमावलियोंसे भरे हों, वह स्त्री अच्छी नहीं मानी गयी है। जिसकी कुटिल भौंहें परस्पर सट गयी हों, वह नारी भी अच्छी श्रेणीमें नहीं गिनी जाती। जिसके प्राण पतिमें ही बसते हों तथा जो पतिको प्रिय हो, वह नारी लक्षणोंसे रहित होनेपर भी शुभलक्षणोंसे सम्पन्न कही गयी है। जहाँ सुन्दर आकृति है, वहाँ शुभ गुण हैं। जिसके पैरकी कनिष्ठिका अँगुली धरतीका स्पर्श न करे, वह नारी मृत्युरूपा ही है॥ १—६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘स्त्रीके लक्षणोंका वर्णन’ नामक दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४४॥
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| * अध्याय २४५ * | ४७७ |
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दो सौ पैंतालीसवाँ अध्याय
चामर, धनुष, बाण तथा खड्गके लक्षण
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ ! सुवर्णदण्डभूषित चामर उत्तम होता है। राजाके लिये हंसपक्ष, मयूरपक्ष या शुकपक्षसे निर्मित छत्र प्रशस्त माना गया है। वकपक्षसे निर्मित छत्र भी प्रयोगमें लाया जा सकता है, किंतु मिश्रित पक्षोंका छत्र नहीं बनवाना चाहिये। तीन, चार, पाँच, छः, सात या आठ पर्वोंसे युक्त दण्ड प्रशस्त है॥ १-२$\frac{१}{२}$॥
भद्रासन पचास अङ्गुल ऊँचा एवं क्षीरकाष्ठसे निर्मित हो। वह सुवर्णचित्रित एवं तीन हाथ विस्तृत होना चाहिये। द्विजश्रेष्ठ ! धनुषके निर्माणके लिये लौह, शृङ्ग या काष्ठ—इन तीन द्रव्योंका प्रयोग करे। प्रत्यञ्चाके लिये तीन वस्तु उपयुक्त हैं—वंश, भङ्ग एवं चर्म ॥ ३-४$\frac{१}{२}$॥
दारुनिर्मित श्रेष्ठ धनुषका प्रमाण चार हाथ माना गया है। उसीमें क्रमशः एक-एक हाथ कम मध्यम तथा अधम होता है। मुष्टिग्राहके निमित्त धनुषके मध्यभागमें द्रव्य निर्मित करावे॥ ५-६॥
धनुषकी कोटि कामिनीकी भ्रूलताके समान आकारवाली एवं अत्यन्त संयत बनवानी चाहिये। लौह या शृङ्गके धनुष पृथक्-पृथक् एक ही द्रव्यके या मिश्रित भी बनवाये जा सकते हैं। शृङ्गनिर्मित धनुषको अत्यन्त उपयुक्त तथा सुवर्ण-बिन्दुओंसे अलंकृत करे। कुटिल, स्फुटित या छिद्रयुक्त धनुष निन्दित होता है। धातुओंमें सुवर्ण, रजत, ताम्र एवं कृष्ण लौहका धनुषके निर्माणमें प्रयोग करे। शार्ङ्गधनुषोंमें—महिष, शरभ एवं रोहिण मृगके शृङ्गोंसे निर्मित चाप शुभ माना गया है। चन्दन, वेतस, साल, धव तथा अर्जुन वृक्षके काष्ठसे बना हुआ दारुमय शरासन उत्तम होता है। इनमें भी शरद् ऋतुमें काटकर लिये गये पके बाँसोंसे निर्मित धनुष सर्वोत्तम माना जाता है। धनुष एवं खड्गकी भी त्रैलोक्यमोहन-मन्त्रोंसे पूजा करे ॥ ७-११॥
लोहे, बाँस, सरकंडे अथवा उससे भिन्न किसी और वस्तुके बने हुए बाण सीधे, स्वर्णाभ, स्नायुश्लिष्ट, सुवर्णपुङ्खभूषित, तैलधौत, सुनहले एवं उत्तम पङ्कयुक्त होने चाहिये। राजा यात्रा एवं अभिषेकमें धनुष-बाण आदि अस्त्रों तथा पताका, अस्त्रसंग्रह एवं दैवज्ञका भी पूजन करे॥ १२-१३$\frac{१}{२}$॥
एक समय भगवान् ब्रह्माने सुमेरु पर्वतके शिखरपर आकाशगङ्गाके किनारे एक यज्ञ किया था। उन्होंने उस यज्ञमें उपस्थित हुए लौहदैत्यको देखा। उसे देखकर वे इस चिन्तामें डूब गये कि 'यह मेरे यज्ञमें विघ्नरूप न हो जाय।' उनके चिन्तन करते ही अग्निसे एक महाबलवान् पुरुष प्रकट हुआ और उसने भगवान् ब्रह्माकी वन्दना की। तदनन्तर देवताओंने प्रसन्न होकर उसका अभिनन्दन किया। इस अभिनन्दनके कारण ही वह 'नन्दक' कहलाया और खड्गरूप हो गया। देवताओंके अनुरोध करनेपर भगवान् श्रीहरिने उस नन्दक खड्गको निजी आयुधके रूपमें ग्रहण किया। उन देवाधिदेवने उस खड्गको उसके गलेमें हाथ डालकर पकड़ा, इससे वह खड्ग म्यानके बाहर हो गया। उस खड्गकी कान्ति नीली थी, उसकी मुष्टि रत्नमयी थी। तदनन्तर वह बढ़कर सौ हाथका हो गया। लौहदैत्यने गदाके प्रहारसे देवताओंको युद्धभूमिसे भगाना आरम्भ किया। भगवान् विष्णुने उस लौहदैत्यके सारे अङ्ग उक्त खड्गसे काट डाले। नन्दकके स्पर्शमात्रसे छिन्न-भिन्न होकर उस दैत्यके सारे लौहमय अङ्ग भूतलपर गिर पड़े। इस प्रकार लोहासुरका वध करके भगवान् श्रीहरिने उसे वर दिया कि 'तुम्हारा पवित्र अङ्ग (लोह) भूतलपर आयुधके निर्माणके काम आयेगा।' फिर श्रीविष्णुके कृपा-प्रसादसे ब्रह्माजीने भी उन सर्वसमर्थ श्रीहरिका यज्ञके द्वारा निर्विघ्न पूजन किया। अब मैं खड्गके लक्षण बतलाता हूँ॥ १४-२०$\frac{१}{२}$॥
खटीखट्टर देशमें निर्मित खड्ग दर्शनीय माने गये हैं। ऋषीक देशके खड्ग शरीरको चीर डालनेवाले तथा शूर्पारकडेेशीय खड्ग अत्यन्त दृढ़ होते हैं।
४७८ * अग्निपुराण *
बङ्गदेशके खड्ग तीखे एवं आघातको सहन करनेवाले तथा अङ्गदेशीय खड्ग तीक्ष्ण कहे जाते हैं। पचास अङ्गुलका खड्ग श्रेष्ठ माना गया है। इससे अर्ध-परिमाणका मध्यम होता है। इससे हीन परिमाणका खड्ग धारण न करे ॥ २१—२३ ॥
द्विजोत्तम ! जिस खड्गका शब्द दीर्घ एवं किंकिणीकी ध्वनिके समान होता है, उसको धारण करना श्रेष्ठ कहा जाता है। जिस खड्गका अग्रभाग पद्मपत्र, मण्डल या करवीर-पत्रके समान हो तथा जो घृत-गन्धसे युक्त एवं आकाशकी-सी कान्तिवाला हो वह प्रशस्त होता है। खड्गमें समाङ्गुलपर स्थित लिङ्गके समान व्रण (चिह्न) प्रशंसित है। यदि वे काक या उलूकके समान वर्ण या प्रभासे युक्त एवं विषम हों, तो मङ्गलजनक नहीं माने जाते। खड्गमें अपना मुख न देखे। जूठे हाथोंसे उसका स्पर्श न करे। खड्गकी जाति एवं मूल्य भी किसीको न बतलाये तथा रात्रिके समय उसको सिरहाने रखकर न सोवे ॥ २४—२७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'चामर आदिके लक्षणोंका कथन' नामक दो सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४५ ॥
दो सौ छियालीसवाँ अध्याय
रत्न-परीक्षण
अग्निदेव कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठ! अब मैं रत्नोंके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ। राजाओंको ये रत्न धारण करने चाहिये—वज्र (हीरा), मरकत, पद्मराग, मुक्ता, महानील, इन्द्रनील, वैदूर्य, गन्धसस्य, चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, स्फटिक, पुलक, कर्केतन, पुष्पराग, ज्योतीरस, राजपट्ट, राजमय, शुभसौगन्धिक, गञ्ज, शङ्ख, ब्रह्ममय, गोमेद, रुधिराक्ष, भल्लातक, धूली, मरकत, तुष्यक, सीस, पीलु, प्रवाल, गिरिवज्र, भुजङ्गमणि, वज्रमणि, टिट्टिभ, भ्रामर और उत्पल। श्री एवं विजयकी प्राप्तिके लिये पूर्वोक्त रत्नोंको सुवर्णमण्डित कराके धारण करना चाहिये। जो अन्तर्भागमें प्रभायुक्त, निर्मल एवं सुसंस्थान हों, उन रत्नोंको ही धारण करना चाहिये। प्रभाहीन, मलिन, खण्डित और किरकिरीसे युक्त रत्नोंको धारण न करे। सभी रत्नोंमें हीरा धारण करना श्रेष्ठ है। जो हीरा जलमें तैर सके, अभेद्य हो, षट्कोण हो, इन्द्रधनुषके समान निर्मल प्रभासे युक्त हो, हल्का तथा सूर्यके समान तेजस्वी हो अथवा तोतेके पङ्खोंके समान वर्णवाला हो, स्निग्ध, कान्तिमान् तथा विभक्त हो, वह शुभ माना गया है। मरकतमणि सुवर्ण-चूर्णके समान सूक्ष्म बिन्दुओंसे विभूषित होनेपर श्रेष्ठ बतलायी गयी है। स्फटिक और पद्मराग अरुणिमासे युक्त तथा अत्यन्त निर्मल होनेपर उत्तम कहे जाते हैं। मोती शुक्तिसे उत्पन्न होते हैं, किंतु शङ्खसे बने मोती उनकी अपेक्षा निर्मल एवं उत्कृष्ट होते हैं। ऋषिप्रवर ! हाथीके दाँत और कुम्भस्थलसे उत्पन्न, सूकर, मत्स्य और वेणुनागसे उत्पन्न एवं मेघोंद्वारा उत्पन्न मोती अत्यन्त श्रेष्ठ होते हैं। मौक्तिकमें वृत्तत्व (गोलाई), शुक्लता, स्वच्छता एवं महत्ता—ये गुण होते हैं। उत्तम इन्द्रनीलमणि दुग्धमें रखनेपर अत्यधिक प्रकाशित एवं सुशोभित होती है। जो रत्न अपने प्रभावसे सबको रञ्जित करता है, उसे अमूल्य समझे। नील एवं रक्त आभावाला वैदूर्य श्रेष्ठ होता है। यह हारमें पिरोने योग्य है ॥ १—१५ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'रत्न-परीक्षा-कथन' नामक दो सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४६ ॥
* अध्याय २४७ * ४७९
दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय
गृहके योग्य भूमि; चतुःषष्टिपद वास्तुमण्डल और वृक्षारोपणका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! अब मैं वास्तुके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ। वास्तुशास्त्रमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके लिये क्रमशः श्वेत, रक्त, पीत एवं काले रंगकी भूमि निवास करनेयोग्य है। जिस भूमिमें घृतके समान गन्ध हो वह ब्राह्मणोंके, रक्तके समान गन्ध हो वह क्षत्रियोंके, अन्नकी-सी गन्ध हो वह वैश्योंके और मद्यतुल्य गन्ध हो वह शूद्रोंके वास करनेयोग्य मानी गयी है। इसी प्रकार रसमें ब्राह्मण आदिके लिये क्रमशः मधुर, कषाय और अम्ल आदि स्वादसे युक्त भूमि होनी चाहिये। चारों वर्णोंको क्रमशः कुश, सरपत, कास तथा दूर्वासे संयुक्त भूमिमें घर बनाना चाहिये। पहले ब्राह्मणोंका पूजन करके शल्यरहित भूमिमें खात (कुण्ड) बनावे॥ १—३॥
फिर चौंसठ पदोंसे समन्वित वास्तुमण्डलका निर्माण करे। उसके मध्यभागमें चार पदोंमें ब्रह्माकी स्थापना करे। उन चारों पदोंके पूर्वमें गृहस्वामी 'अर्यमा' बतलाये गये हैं। दक्षिणमें विवस्वान्, पश्चिममें मित्र और उत्तर दिशामें महीधरको अङ्कित करे। ईशानकोणमें आप तथा आपवत्सको, अग्निकोणमें सावित्र एवं सविताको, पश्चिमके समीपवर्ती नैर्ऋत्यकोणमें जय और इन्द्रको और वायव्यकोणमें रुद्र तथा व्याधिको लिखे। पूर्व आदि दिशाओंमें कोणवर्ती देवताओंसे पृथक् निम्नाङ्कित देवताओंका लेखन करे—पूर्वमें महेन्द्र, रवि, सत्य तथा भृश आदिको, दक्षिणमें गृहक्षत, यम, भृङ्ग तथा गन्धर्व आदिको, पश्चिममें पुष्पदन्त, असुर, वरुण और पापयक्ष्मा आदिको, उत्तर दिशामें भल्लाट, सोम, अदिति एवं धनदको तथा ईशानकोणमें नाग और करग्रहको अङ्कित करे। प्रत्येक दिशाके आठ देवता माने गये हैं। उनमें प्रथम और अन्तिम देवता वास्तुमण्डलके गृहस्वामी कहे गये हैं। पूर्व दिशाके प्रथम देवता पर्जन्य हैं, दूसरे करग्रह (जयन्त), महेन्द्र, रवि, सत्य, भृश, गगन तथा पवन हैं। कुछ लोग आग्नेयकोणमें गगन एवं पवनके स्थानपर अन्तरिक्ष और अग्निको मानते हैं। नैर्ऋत्यकोणमें मृग और सुग्रीव—इन दोनों देवताओंको, वायव्यकोणमें रोग एवं मुख्यको, दक्षिणमें पूषा, वितथ, गृहक्षत, यम, भृङ्ग, गन्धर्व, मृग एवं पितरको स्थापित करे। वास्तुमण्डलके पश्चिम भागमें दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, असुर, वरुण, पापयक्ष्मा और शेष स्थित हैं। उत्तर दिशामें नागराज, मुख्य, भल्लाट, सोम, अदिति, कुबेर, नाग और अग्नि (करग्रह) सुशोभित होते हैं। पूर्व दिशामें सूर्य और इन्द्र श्रेष्ठ हैं। दक्षिण दिशामें गृहक्षत पुण्यमय हैं, पश्चिम दिशामें सुग्रीव उत्तम और उत्तरद्वारपर पुष्पदन्त कल्याणप्रद है। भल्लाटको ही पुष्पदन्त कहा गया है॥ ४—१५॥
इन वास्तुदेवताओंका मन्त्रोंसे पूजन करके आधारशिलाका न्यास करे। तदनन्तर निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे नन्दा आदि देवियोंका पूजन करे— 'वसिष्ठनन्दिनि नन्दे! मुझे धन एवं पुत्र-पौत्रोंसे संयुक्त करके आनन्दित करो। भार्गवपुत्रि जये! आपके प्रजाभूत हमलोगोंको विजय प्रदान करो। अङ्गिरसतनये पूर्णे! मेरी कामनाओंको पूर्ण करो। कश्यपात्मजे भद्रे! मुझे कल्याणमयी बुद्धि दो। वसिष्ठपुत्रि नन्दे! सब प्रकारके बीजोंसे युक्त एवं सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न इस मनोरम नन्दनवनमें विहार करो। प्रजापतिपुत्रि! देवि भद्रे! तुम उत्तम लक्षणों एवं श्रेष्ठ व्रतको धारण करनेवाली हो; कश्यपनन्दिनि! इस भूमिमय चतुष्कोणभवनमें निवास करो। भार्गवतनये देवि! तुम सम्पूर्ण विश्वको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली हो; श्रेष्ठ आचार्योंद्वारा पूजित एवं गन्ध और मालाओंसे अलंकृत मेरे
४८० * अग्निपुराण *
गृहमें निवास करो। अङ्गिरा ऋषिकी पुत्रिप पूर्णे! तुम भी सम्पूर्ण अङ्गोंसे युक्त तथा क्षतिरहित मेरे घरमें रमण करो। इष्टके! मैं गृहप्रतिष्ठा करा रहा हूँ, तुम मुझे अभिलषित भोग प्रदान करो। देशस्वामी, नगरस्वामी और गृहस्वामीके संचयमें मनुष्य, धन, हाथी-घोड़े और पशुओंकी वृद्धि करो'॥ १६-२२ $\frac{१}{२}$ ॥
गृहप्रवेशके समय भी इसी प्रकार शिलान्यास करना चाहिये। घरके उत्तरमें प्लक्ष (पाकड़) तथा पूर्वमें वटवृक्ष शुभ होता है। दक्षिणमें गूलर और पश्चिममें पीपलका वृक्ष उत्तम माना जाता है। घरके वामपार्श्वमें उद्यान बनावे। ऐसे घरमें निवास करना शुभ होता है। लगाये हुए वृक्षोंको ग्रीष्मकालमें प्रातः-सायं, शीतऋतुमें मध्याह्नके समय तथा वर्षाकालमें भूमिके सूख जानेपर सींचना चाहिये। वृक्षोंको बायविडंग और घृतमिश्रित शीतल जलसे सींचे। जिन वृक्षोंके फल लगने बंद हो गये हों, उनको कुलथी, उड़द, मूँग, तिल और जौ मिले हुए जलसे सींचना चाहिये। घृतयुक्त शीतल दुग्धके सेचनसे वृक्ष सदा फल-पुष्पसे युक्त रहते हैं। मत्स्यवाले जलके सेचनसे वृक्षोंकी वृद्धि होती है। भेड़ और बकरीकी लेंड़ीका चूर्ण, जौका चूर्ण, तिल, अन्य गोबर आदि खाद एवं जल—इन सबको सात दिनतक ढककर रखे। इसका सेचन सभी प्रकारके वृक्षोंके फल-पुष्प आदिकी वृद्धि करनेवाला है। आम्रवृक्षोंका शीतल जलसे सेचन उत्तम माना गया है। अशोक वृक्षके विकासके लिये कामिनियोंके चरणका प्रहार प्रशस्त है। खजूर और नारियल आदि वृक्ष लवणयुक्त जलसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं। बायविडंग तथा जलके द्वारा सेचन सभी वृक्षोंके लिये उत्तम दोहद है॥ २३-३१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वास्तुलक्षण-कथन' नामक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४७॥
दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय
विष्णु आदिके पूजनमें उपयोगी पुष्पोंका कथन
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! पुष्पोंसे पूजन करनेपर भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण कार्योंमें सिद्धि प्रदान करते हैं। मालती, मल्लिका, यूथिका, गुलाब, कनेर, पावन्ती, अतिमुक्तक, कर्णिकार, कुरण्टक, कुब्जक, तगर, नीप (कदम्ब), बाण, वनमल्लिका, अशोक, तिलक, कुन्द और तमाल—इनके पुष्प पूजाके लिये उपयोगी माने गये हैं। बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृङ्गराजके पत्र, तुलसी, कृष्णतुलसी तथा वासक (अडूसा)-के पत्र पूजनमें ग्राह्य माने गये हैं। केतकीके पत्र और पुष्प, पद्म एवं रक्तकमल—ये भी पूजामें ग्रहण किये जाते हैं। मदार, धत्तूर, गुञ्जा, पर्वतीय मल्लिका, कुटज, शाल्मलि और कटेरीके फूलोंका पूजामें प्रयोग नहीं करना चाहिये। प्रस्थमात्र घृतसे भगवान् विष्णुका अभिषेक करनेपर करोड़ गौओंके दान करनेका फल मिलता है। एक आढक घृतसे अभिषेक करनेवाला राज्य तथा घृतमिश्रित दुग्धसे अभिषेक करनेवाला स्वर्गको प्राप्त करता है॥ १-६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पुष्पादिसे पूजनके फलका कथन' नामक दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४८॥
- अध्याय २४९ *
४८१
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दो सौ उनचासवाँ अध्याय धनुर्वेदका$^१$ वर्णन—युद्ध और अस्त्रके भेद, आठ प्रकारके स्थान, धनुष, बाणको ग्रहण करने और छोड़नेकी विधि आदिका कथन
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! अब मैं चार$^२$ पादोंसे युक्त धनुर्वेदका वर्णन करता हूँ। धनुर्वेद पाँच प्रकारका होता है। रथ, हाथी, घोड़े और पैदल-सम्बन्धी योद्धाओंका आश्रय लेकर इसका वर्णन किया गया है। यन्त्रमुक्त, पाणिमुक्त, मुक्तसंधारित, अमुक्त और बाहुयुद्ध—ये ही धनुर्वेदके पाँच$^३$ प्रकार कहे गये हैं। उसमें भी शस्त्र-सम्पत्ति और अस्त्र-सम्पत्तिके भेदसे युद्ध दो प्रकारका बताया गया है। ऋजुयुद्ध और मायायुद्धके भेदसे उसके पुनः दो भेद हो जाते
१. 'धनुर्वेद' यजुर्वेदका उपवेद है। प्राचीनकालमें प्रायः सभी सभ्य देशोंमें इस विद्याका प्रचार था। भारतवर्षमें इस विद्याके बड़े-बड़े ग्रन्थ थे, जिन्हें क्षत्रियकुमार अभ्यासपूर्वक पढ़ते थे। आजकल वे ग्रन्थ प्रायः लुप्त हो गये हैं। कुछ थोड़े-से ग्रन्थोंमें इस विद्याका संक्षिप्त वर्णन मिलता है। जैसे शुक्रनीति, कामन्दकीय नीतिसार, अग्निपुराण, वीरचिन्तामणि, वृद्ध शार्ङ्गधर, युद्धजयार्णव, युक्तिकल्पतरु तथा नीतिमयूख आदि। 'धनुर्वेद-संहिता' नामक एक अलग भी पुस्तक मिलती है। नेपाल (काठमाण्डू) गोरखनाथ मठके महन्थ योगी नरहरिनाथने भी धनुर्वेदकी एक प्राचीन पुस्तक उपलब्ध की है। कुछ विद्वान् ब्रह्मा और महेश्वरसे इस उपवेदका प्रादुर्भाव मानते हैं, परन्तु मधुसूदन सरस्वतीका कथन है कि 'विश्वामित्रने जिस धनुर्वेदका प्रकाश किया था, यजुर्वेदका उपवेद वही है।' 'वीरचिन्तामणि'में धनुर्वेदकी बड़ी प्रशंसा की गयी है। 'धनुर्वेद-संहिता'में लिखा है कि 'दुष्टों, दस्युओं और चोर आदिसे साधुपुरुषोंका संरक्षण और धर्मानुसार प्रजापालन 'धनुर्वेद'का प्रयोजन है'। अग्निपुराणके इन चार अध्यायोंमें धनुर्वेद-विषयक महत्त्वपूर्ण बातोंपर संक्षेपसे ही प्रकाश डाला गया है। धनुर्वेदपर इस समय जो ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं, उनसे अग्निपुराणगत धनुर्वेदका पाठ नहीं मिलता। विश्वकोषमें 'धनुर्वेद' शब्दपर अग्निपुराणके ये ही चार अध्याय उद्धृत किये गये हैं। कतिपय हस्तलिखित प्रतियोंके अनुसार जो पाठ-भेद उपलब्ध हुए हैं, उन्हें दृष्टिमें रखते हुए इन अध्यायोंका अविकल अनुवाद करनेकी चेष्टा की गयी है। साङ्गवेद विद्यालय, काशीके नैयायिक विद्वान् श्रीहेबूबूर शास्त्री काश्मीर-पुस्तकालयसे अग्निपुराणके धनुर्वेद-प्रकरणपर कुछ पाठभेद संग्रह करके लाये थे, उससे भी इस प्रकरणको लगानेमें सहयोग मिला है। तथापि कुछ शब्द अस्पष्ट रह गये हैं। माननीय विद्वानोंको धनुर्वेदके विषयमें विशेष ध्यान देकर अनुसंधान करना-कराना चाहिये, जिससे भारतकी इस प्राचीन विद्याका पुनरुद्धार हो सके। (अनुवादक)
२. महाभारत, आदिपर्व, अध्याय २२०, श्लोक ७२ में लिखा है कि 'शत्रुदमन बालक अभिमन्युने वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके अपने पिता अर्जुनसे चार पादों और दशविध अङ्गोंसे युक्त दिव्य एवं मानुष—सब प्रकारके धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त कर लिया।' इन चार पादोंको स्पष्ट करते हुए आचार्य नीलकण्ठने 'मन्त्रमुक्त', 'पाणिमुक्त', 'मुक्तामुक्त' और 'अमुक्त'—इन चार नामोंका निर्देश किया है। परंतु मधुसूदन सरस्वतीने अपने 'प्रस्थानभेद'में धनुर्वेदका जो संक्षिप्त विवरण दिया है, उसमें चार पादोंका उल्लेख इस प्रकार हुआ है—दीक्षापाद, संग्रहपाद, सिद्धिपाद और प्रयोगपाद। पूर्वोक्त मन्त्रमुक्त आदि भेद आयुधोंके हैं, वे पादोंके नाम नहीं हैं। अग्निपुराणमें चार पादोंके नामका निर्देश नहीं है। 'मन्त्रमुक्त'के स्थानपर वहाँ 'यन्त्रमुक्त' पाठ है और 'मुक्तामुक्त'के स्थानपर 'मुक्तसंधारित'। इन चारोंके साथ बाहुयुद्धको भी जोड़कर अग्निपुराणमें धनुर्वेद, अस्त्र या युद्धके पाँच प्रकार ही निर्दिष्ट किये गये हैं। अतः धनुर्वेदके चार पाद उपर्युक्त दीक्षा आदि ही ठीक जान पड़ते हैं।
३. महाभारतमें 'चतुष्पादं दशविधम्' कहकर धनुर्वेदके दस प्रकार कहे गये हैं। परंतु अग्निपुराणसे उसका कोई विरोध नहीं है। अग्निपुराणमें अस्त्र या युद्धके पाँच प्रकारोंको दृष्टिमें रखकर ही वे भेद निर्दिष्ट हुए हैं। किंतु महाभारतमें धनुर्वेदके दस अङ्गोंको लेकर ही दस भेदोंका कथन हुआ है। उन दस अङ्गोंके नाम नीलकण्ठने इस प्रकार लिखे हैं—आदान, संधान, मोक्षण, निवर्तन, स्थान, मुष्टि, प्रयोग, प्रायश्चित्त, मण्डल तथा रहस्य। इन सबका परिचय इस प्रकार है—तरकससे बाणको निकालना 'आदान' है। उसे धनुषकी प्रत्यञ्चापर रखना 'संधान' है। लक्ष्यपर छोड़ना 'मोक्षण' कहा गया है। यदि बाण छोड़ देनेके बाद यह मालूम हो जाय कि हमारा विपक्षी निर्बल या शस्त्रहीन है, तो वीर पुरुष मन्त्रशक्तिसे उस बाणको लौटा लेते हैं। इस प्रकार छोड़े हुए अस्त्रको लौटा लेना 'निवर्तन' कहलाता है। धनुष या उसकी प्रत्यञ्चाके धारण अथवा शरसंधानकालमें धनुष और प्रत्यञ्चाके मध्यदेशको 'स्थान' कहा गया है। तीन या चार अँगुलियोंका सहयोग ही 'मुष्टि' है। तर्जनी और मध्यमा अँगुलीसे अथवा मध्यमा और अङ्गुष्ठसे बाणका संधान करना 'प्रयोग' कहलाता है। स्वतः या दूसरेसे प्राप्त होनेवाले ज्याघात (प्रत्यञ्चाके आघात) और बाणके आघातको रोकनेके लिये जो दस्ताने आदिका प्रयोग किया जाता है, उसका नाम 'प्रायश्चित्त' है। चक्राकार घूमते हुए रथके साथ-साथ घूमनेवाले लक्ष्यका वेध 'मण्डल' कहलाता है। शब्दके आधारपर लक्ष्य बाँधना अथवा एक ही समय अनेक लक्ष्योंको बींध डालना—ये सब 'रहस्य'के अन्तर्गत हैं।