ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अध्याय ] ९१ इस रहस्य को समझता है वह सब वृक्षों के सम्बन्ध में जो कामनायें होती हैं उनको पूरा कर लेता है । (१) २-अध्वर्यु होता से कहता है, "हम यूप को चुपड़ते हैं । उपयुक्त मंत्र बोलिये ।" होता पढ़ता है :- अञ्जन्ति त्वामध्वरे देवयन्तो वनस्पते मधुना दैव्येन । यदूर्ध्वस्तिष्ठा द्रविणेह धत्ताद् यद्वा क्षयो मातुरस्या उपस्थे । ( ऋ० ३।८।१ ) ( हे वनस्पति ! तुझ को ऋत्विज लोग यज्ञ में दिव्य मधु से चुपड़ते हैं । जो तू सीधा खड़ा है या इस माता ( भूमि ) की गोद में पड़ा है हमको धन दे ) । यह जो घी है वही दिव्य मधु है । अगले टुकड़े से यह तात्पर्य है कि चाहे खड़ा हो चाहे पड़ा हो मुझे धन दे । अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :- उच्छ्र यस्व वनस्पते वर्ष्मन् पृथिव्या अधि । सुमिती मीयमानो वर्चो धा यज्ञ वाहसे । ( ऋ० ३।८।३ ) ( हे वनस्पति पृथिवी के ऊपर उठ । तू जो अच्छी तरह पड़ा हुआ है। यज्ञ के वाहक या ले जाने वाले के लिये तेज धारण करा ) । यह मंत्र यूप के उठाने के लिये रूप-समृद्ध है । जिस में रूपसमृद्धता होती है वही सफल होता है । 'वर्ष्मन् पृथिव्या अधि' से तात्पर्य है उस स्थान का जहाँ यूप गाड़ते हैं । "सुमितीमीयमानो वर्चोधा यज्ञ वाहसे" से तात्पर्य है कि यूप से आशीर्वाद चाहता है । अब होता नीचे का मंत्र पढ़ता है :- समिद्धस्य श्रयमाणः पुरस्ताद् ब्रह्म वन्वानो अजरं सुवीरम् । आरे अस्मदमतिं बाधमान उच्छ्रयस्व महते सौभगाय । ( ऋ० ३।८।२ ) ( प्रज्वलित अग्नि के सामने खड़ा हुआ तू नाश न होने वाले