ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९२ [ दूसरी पञ्चिका और वीरता युक्त ब्रह्म तेज को देता है हमारे शत्रुओं को रोकता हुआ हमारे बड़े भाग्य के लिये खड़ा हो ) 'समिद्धस्य श्रयमाणः पुरस्तात्' का अर्थ है प्रज्वलित हुई अग्नि के सामने । 'ब्रह्म चन्वानो अजरं सुवीर्यम्' से आशीर्वाद से तात्पर्य है 'आरे अस्मदमतिं बाधमानः' का अर्थ है कि 'अमति' अर्थात् पाप या भूख है। इस से वह यज्ञ और यजमान को भूख से और पाप से मुक्त कर देता है । 'उच्छ्रयस्व' ( खड़ा हो ) आशीर्वाद है । अब होता नीचे के मंत्र को पढ़ता है:- ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता । ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे । ( ऋ० १।३६ १३ ) ( सीधा खड़ा हो ! सविता के समान ! हमारी रक्षा के लिये । खड़ा होकर अन्न दे । जब हम तुझ को बुलाते हैं उस समय जब कि ऋत्विज तुझ को चुपड़ते हैं ) 'देवो न सविता' में 'न' का अर्थ है 'इव' या 'समान' । 'ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता' का अर्थ है अन्न का बांटने वाला । 'अंजिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे' का तात्पर्य है छन्दों से जिनके द्वारा देवों को बुलाते हैं । जब कई यज्ञों में देवों को बुलाते हैं कि 'मेरे यज्ञ में आइये' । 'मेरे यज्ञ में आइये' तो देवता उसके यज्ञ में जाते हैं जहाँ इस रहस्य को समझने वाला होता मंत्र पढ़ कर आवाहन करता है । अब नीचे का मंत्र पढ़ता है :- ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह । कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः । ( ऋ० १।३६।१४ ) ( सीधे खड़ा होकर पाप से बचा । अपनी आग से सब मांसाहारियों के जला । हमको सीधा कर कि हम खड़े हो सकें और जी सकें । हमार हवि को देवों तक ले जा ) । 'अत्रिणं' यां खाने वाले राक्षस हैं । इसके द्वारा यूप से पापी राक्षसों को मरवाता है । 'चरथाय' का अर्थ है 'चरणाय' ( चलने