ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अध्याय ] ९३ के लिये ) । ‘जीवसे’ कहकर वह यजमान को छुड़ाता है चाहे उसे ( मृत्यु ने ) पकड़ ही क्यों न लिया हो। और उसे साल भर के लिये सुरक्षित कर देता है ‘विदा देवेषु नो दुवः’ से आशीर्वाद का तात्पर्य है ( अपने कर्मों की सफलता के लिये प्रार्थना करता है ) । होता अब नीचे का मन्त्र पढ़ता है :— जातो जायते सुदिनत्वे अह्नां समर्य आ विदथे वर्धमानः। पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा देव्या विप्र उदि यर्त्ति वाचम् ॥ ( ऋ० ३।८।५ ) ( उत्पन्न होकर अपनी युवावस्था में मनुष्य के हित के लिये बढ़ता है। धीर लोग इसको बुद्धिमत्ता से अलंकृत करते हैं। ऋत्विक ब्राह्मण समूह देव विषयक वाणी का उच्चारण करता है। इस मन्त्र के पहले भाग को पढ़ कर वह ( धूप को ) बढ़ाते हैं। “पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा” पढ़ कर उसे पवित्र या अलंकृत करते हैं। ‘देव या विप्र उदियीर्त वाचम्’ से धूप को देवों के प्रति निवेदन करते हैं। अर्थात् उसका देवों को परिचय कराते हैं। होता नीचे के मन्त्र के समाप्त करता है :— युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः। तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥ ( ऋ० ३।८।४ ) ( जवान वस्त्रों से अलंकृत आया है। वह उत्पन्न हुआ श्रेष्ठ है। बुद्धिमान विद्वान् लोग अपने उत्तम विचारों को प्रकट करके उसे बढ़ाते हैं ) । “युवा सुवासा” का अर्थ है प्राण। यह शरीरों से घिरा हुआ है। ‘श्रेयान् भवति जायमानः” ‘यूप’ से तात्पर्य है अर्थात् इस मंत्र को पढ़ने से यूप अधिक सुन्दर प्रतीत होता है। ‘कवयः’ का अर्थ है वह मंत्र वाले विद्वान् जो ‘यूप’ को उन्नत करते हैं।