भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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९४ [दूसरी पञ्चिका इन सात रूप-समृद्धता युक्त मंत्रों के पढ़ने से यज्ञ सफल हो जाता है। मंत्रों की रूप-समृद्धता यह है कि उन मंत्रों में उसी क्रिया का वर्णन हो जिसके करने में वह मंत्र पढ़े जाते हैं। इसी से यज्ञ की सफलता है। इनमें से पहले और पिछले को तीन तीन बार पढ़ते हैं। इस प्रकार यह ग्यारह हो जाते हैं। त्रिष्टुभ् छन्द के प्रत्येक पाद् में ग्यारह ग्यारह अक्षर होते हैं। त्रिष्टुभ् इन्द्र का वज्र है। जो इस रहस्य को समझता है वह इन इन्द्र-सम्बन्धी ऋचाओं द्वारा वृद्धि पाता है। पहले और पिछले मंत्र को तीन तीन बार पढ़ने से मानो वह यज्ञ के दोनों सिरों में गांठ दे देता है। जिससे यज्ञ बँधा रहे और खिसक न जाय। (२) ३—अब प्रश्न उठता है कि यूप अग्नि के सन्मुख खड़ा रहे या अग्नि में डाल दिया जाय। इसका उत्तर यह है कि यदि पशु की कामना हो तो खड़ा रहे। एक बार देवों को खाना प्राप्त कराने के लिये पशु खड़े नहीं रहे। वे भाग कर देवों से कहते रहे कि "तुम हमको न पाओगे। तुम हमको न पाओगे।" तब देवों ने इस यूप-वज्र को देखा और गाड़ दिया। इस प्रकार डर कर वह लौट आये। यही कारण है कि यूप की ओर मुख करके ही पशु आज भी खड़े होते हैं। इस प्रकार पशु देवों को भोजन प्राप्त कराने के लिये खड़े रहे। इसी भाँति जो इस रहस्य को समझता है और यूप को खड़ा रखता है उसके पशु भी उसको खाना प्राप्त कराने के लिये खड़े रहते हैं। जिसको स्वर्ग की कामना हो उस यजमान के यूप को (आग में) छोड़ दे ! पहले जमाने के यजमान 'यूप' को अग्नि में छोड़ देते थे। यूप यजमान है, प्रस्तर अर्थात् दर्भ यजमान हैं। अग्नि देवतों की योनि है। इन आहुतियों द्वारा यजमान देवों की