ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०६ [ दूसरी पञ्चिका ( हे अग्नि ! तू आज बड़ा यज्ञ करने वाला होता बनकर पृथ्वी या वेदी के ऊपर बैठा है, पूज्य होता हुआ और इषयन् अर्थात् हमारा भला चाहता हुआ । नेता लोग पहले तेरी इच्छा करते हुये ही और बड़े धन का विचार करते हुये तेरे ही पीछे चले ) । [ (सः अग्निः) वह अग्निः (सपर्य्यण्यः) पूज्य (प्रियः) प्रिय (विक्षु) लोगों में (होता) होता, (मन्द्रः) सुखकारी (यजीयान्) यज्ञ का अधिकारी होकर (निषसाद) स्थित है। (वयं) हम लोग ज्ञुबाधः) घुटने टिकाये हुये (नमसा) नमस्कार द्वारा (तं त्वा दीदिवांसं) उस तुझ प्रकाश युक्त को (दमे) घर में (उप आसदेम) प्राप्त होते हैं ] तं त्वा वयं सुध्यो नव्यमग्ने सुम्नायव ईमहे देवयन्तः । त्वं विशो अनयो दीद्यानो दिवो अग्ने बृहतारोचनेन ॥ ( ऋ० ६।१।७ ) [ (सुध्यः) बुद्धिमान् (सुम्नायव) सुख चाहने वाले (देवयन्तः) देवों की पूजा करने वाले (वयं) हम लोग (तं त्वा नव्यम् ) उस तुझ पूजनीय को (ईमहे) खोजते हैं। (त्वं) तू (दीद्यानः) प्रकाश- वान् (अग्ने) हे अग्नि, (बृहता रोचनेन) बहुत प्रकाश के साथ (विशः) लोगों को (दिवः) दिवा लोक में (अनयः) ले जाता है । ] विशां कविं विश्पतिं शश्वतीनां नितोशनं वृषभं चर्षणीनाम् । प्रेती- षणिमिषयन्तं पावकं राजन्तमग्निं यजतं रयीणाम् ॥ ( ऋ० ६।१।८ ) [ हम तुझ अग्नि की उपासना करते हैं जो तू (शश्वतीनां विशां) सदा रहने वाले लोगों का (कविं) उपदेश या प्रकाश करने वाला (विश्पतिं) स्वामी, (नितोशनं) शत्रुओं का घातक, (वृषभं) कामनों की वर्षा करने वाला, (चर्षणीनाम् ) स्तुति करने वालों का (प्रेतीषणिं) प्राप्ति के योग्य (इषयन्तं) अन्न देने वाला, (पावकं) पवित्र करने वाला (राजन्तं) प्रकाशयुक्त (रयीणाम) धनों द्वारा (यजतं) पूजनीय है । ]