भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 121

प्रथम अध्याय ] १०७ सो अग्न ईजे शशमे च मर्तो यस्त आनट् समिधा हव्यदातिम् । य आहुतिं परि वेदा नमोभिर्विश्वेत्स वामा दधते त्वोतः ॥ ( ऋ० ६ । १ । ६ ) [ (अग्ने) हे अग्नि ! (सः मर्त्तो) वह मनुष्य (ईजे) पूजता है (शशमे) और स्तुति करता है (यः) जो (ते) तुझको (समिधा) समिधा के साथ (हव्य दातिम् ) हवियों को ( आनट् ) लाता है । (यः) जो (नमोभिः) स्तुतियों द्वारा (आहुतिं) पूजा को (परिवेद) समझता है । (सः) वह (त्वोतः) तुझसे रक्षा किया हुआ होकर ( विश्वेत् ) सब (वामा) सुखों को (दधते) धारण करता है । अस्मा उ ते महि महे विधेम नमोभिरग्ने समिधोत हव्यैः । वेदी सूनो सहसो गीर्भिरुक्थैरा ते भद्रायां सुमतौ यतेम ॥ (ऋ० ६।१।१०) घृतेव यन्तं बहुभिर्वसव्यैस्त्वे रयिं जागृवांसो अनुग्मन् । रुशन्तमग्निं दर्शतं बृहन्तं वपावन्तं विश्वहा दीदिवांसम् ॥ ( ऋ० ६।१।१३ ) [ (बहुभिर्वसव्यैः) बहुत धनों के साथ (घृता इव यन्तं) मार्ग पर जाते हुये के समान तेरे (अनुग्मन् ) पीछे चलते हैं, (त्वे रयिं जागृवांसो) वे लोग जो तुझ में अपने धन को अर्पण कर देते हैं । तू कैसा है ? रुशन्तम् अर्थात् प्रकाशवान, अग्नि, दर्शतं अर्थात् सुन्दर, बृहन्तं अर्थात् बड़ा, वपावन्तं* अर्थात् बीज को बोने की शक्ति रखने वाला है, विश्वहा दीदिवांसम् अर्थात् सदा चमकने वाला है ] पदं देवस्य नमसायन्तः श्रवस्यवः श्रव आपन्नमृक्तम् । *‘वपा’ का अर्थ चटनी किया जाता है । परन्तु वप् धातु में अच् प्रत्यय करके ‘वपा’ बनाता है । वप् का अर्थ है बीज बोना । अग्नि को चर्बीवाला कहने का कोई तात्पर्य नहीं । इस दृष्टि में केवल ‘वपा’ शब्द के कारण इस को पशु की वपा के साथ सम्बद्ध किया है ।