ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ [ दूसरी पञ्चिका अन्त को यजमान ही तो है। वह मानते हैं कि इस प्रकाश द्वारा यजमान स्वर्ग को जायगा और इस प्रकार यजमान स्वर्ग को जाता है। जहाँ पशु मारा जाने वाला है वहाँ अध्वर्यु दर्भ छोड़ देता है। जब आप्री मंत्र पढ़कर और अग्नि को चारों ओर फिरा कर, पशु को वेदी के बाहर लाते हैं तो दर्भों पर बिठा देते हैं। उसके मलमूत्र के लिये गड़्ढा खोदते हैं। मलमूत्र वनस्पति से सम्बन्ध रखते हैं। वनस्पति का उपयुक्त स्थान भूमि है। इस प्रकार वह इनको उपयुक्त स्थान में रखते हैं। इस पर आक्षेप होता है कि जब समस्त पशु हवि है और जब उसके बहुत से भाग जैसे, रोम, त्वचा, रुधिर, अधपचा खाना, खुर, सींग गिर पड़ते हैं तो यह कमी कैसे पूरी की जाती है। इसका उत्तर यह है कि यदि पशु के साथ पूरा पूरा पुरोडाश भी आहुति में दिया जाय तो यह कमी पूरी हो जाती है। जब पशुओं में से मेध निकल गया तब चावल और जौ उत्पन्न हुये। जब पशु के साथ पूरा-पूरा भाग करके पुरोडाश डालते हैं तो समझते हैं कि पशु को मेध के साथ आहुत किया। पूरा पशु आहुत किया।” जो इस रहस्य को समझता है उसका पशु पूरा पूरा आहुत होता है। (१) १२—उसकी वपा को निकाल कर (भूनने के लिये) लाते हैं। अध्वर्यु स्रुवा से घी टपकाता है और जब बूँदें टपकती हैं तो कहता है, “इसके योग्य मंत्र पढ़ो।” बूँदें सभी देवतों की होती हैं। शायद वह सोचे कि यह मेरे नहीं हैं। और वे बिना निर्देश किये ही देवों के पास चली जायें (परन्तु उसको अनुवाक्य पढ़ना चाहिये)। वह पढ़ता है :— जुषस्व सप्रथस्तमं वचो देवप्सरस्तमम् । हव्या जुषानि आसनि ॥ (ऋ० १।७५।१)