भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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दूसरा अध्याय ] ११३ हमारी अति विस्तीर्णां और देवों के लिये प्रिय वाणी को स्वीकार कर। जब तेरे मुँह में आहुतियाँ पड़ती हों)। इस मंत्र से वह अग्नि के मुख में वह बूँदें डालता है। अब वह तीसरे मंडल के २१वें सूक्त को पढ़ता है :— इमं नो यज्ञममृतेषु धेहीमा हव्या जातवेदो जुषस्व। स्तोकानामग्ने मेदसो घृतस्य होतः प्राशान प्रथमो निषद्य॥ (ऋ० ३।२१।१) (हमारे इस यज्ञ को अमर लोगों में रख। हे जातवेद अग्नि! हमारी आहुतियों को स्वीकार कर! हे होता अग्नि! पहले बैठकर चिकने घी की बूँदों को खा।) घृतवन्तः पावक ते स्तोकाः श्चोतन्ति मेदसः। स्वधर्मन् देववीतये श्रेष्ठं नो धेहि वार्यम्॥ (ऋ० ३।२१।२) (हे पवित्र करने वाले चिकनी घी युक्त बूँदें तेरे लिए पड़ रही हैं। अपने धर्म के अनुसार श्रेष्ठवर को जो देवों के योग्य है हमको दे)। तुभ्यं स्तोका घृतश्चुतोऽग्ने विप्राय सन्त्य। ऋषिः श्रेष्ठः समिध्यसे यज्ञस्य प्राविता भव॥ (ऋ० ३।२१।३) (हे अग्नि तुझ विप्र के लिये घी युक्त बूँदें पड़ रही हैं। ऋषि और श्रेष्ठ तू प्रज्वलित होता है। तू यज्ञ का रक्षक बन)। तुभ्यं श्चोतन्त्यद्रिगो शचीवः स्तोकासो अग्ने मेदसो घृतस्य। कवि- शस्तो बृहता भानुनागा हव्या जुषस्व मेधिर॥ (ऋ० ३।२१।४) (हे तेज चलने वाले और शक्तिशाली अग्नि तेरे लिये घी की चिकनी बूँदें पड़ रही हैं। कवियों द्वारा प्रशंसित और मेधिर अर्थात् प्रज्ञावान् अग्नि तू बड़े प्रकाश से आया है। हमारी आहुतियों को स्वीकार कर)। ओजिष्ठं ते मध्यतो मेद उद्धृतं प्र ते वयं ददामहे। श्चोतन्ति ते वसो स्तोका अधि त्वचि प्रति तान् देवशो विहि॥ (ऋ० ३।२१।५) ८